Home > बात-मुलाकात > वर्तमान दौर पत्रकारिता का संक्रमण काल हैः डॉ.राकेश पाठक

वर्तमान दौर पत्रकारिता का संक्रमण काल हैः डॉ.राकेश पाठक

कर्मवीर
कर्मवीर के प्रधान सम्पादक डॉ. राकेश पाठक

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में इस बार हमारे विशेष अतिथि हैं कर्मवीर न्यूज़ पोर्टल के प्रधान सम्पादक डॉ. राकेश पाठक जी। श्री पाठक मध्यप्रदेश ग्वालियर से हैं। पूर्व में नवभारत, नवप्रभात, नई दुनिया, प्रदेश टुडे व डेटलाइन इंडिया के सम्पादक रह चुके हैं। श्री पाठक की गिनती मध्यप्रदेश के मूर्धन्य सम्पादकों में होती है। मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत से उन्होंने निजी व पेशेवर जीवन से जुड़ी लम्बी बातचीत की। 

 

प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीतः-

 

सवालः प्रणाम सर।  सबसे पहले आपको शुभकामनाएं माखनलाल चतुर्वेदी की विरासत कर्मवीर की जिम्मेदारी के लिए। सबसे पहले यही बताएं कि अचानक से कैसे कर्मवीर को पुनः जिंदा करने की योजना बनी।

जवाबः . धन्यवाद प्रिय प्रशांत सबसे पहले तो मैं आपको शुभकामनाएं देता हूं कि आप मीडिया मिरर के जरिए बहुत सार्थक भूमिका अदा कर रहे हैं । जहां तक “कर्मवीर” का सवाल है निश्चित तौर पर यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे दादा माखनलाल चतुर्वेदी जैसे पत्रकारिता के शीर्षस्थ पुरोधा की विरासत संभालने का अवसर मिला है । दरअसल पत्रकारिता के मेरे जो गुरु हैं आदरणीय विजय दत्त श्रीधर जी यह उत्तरदायित्व उन्होंने मुझे सौंपा है ।
जैसा कि आप जानते हैं कि कर्मवीर सन 1920 में शुरू हुआ था और दादा माखनलाल चतुर्वेदी उसके संस्थापक संपादक थे।
आजादी की लड़ाई में कर्मवीर का बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है । बाद में उनके न रहने के बाद कर्मवीर टाइटल उनके भाई के पास रहा । कालांतर में दादा के भाई श्री बृजभूषण चतुर्वेदी जी ने इसका सारा अधिकार श्री विजय दत्त श्रीधर जी को दे दिया ।
श्रीधर जी के मार्गदर्शन में कर्मवीर पत्रिका के रूप में भोपाल से निरंतर प्रकाशित हो ही रहा है ।
हाल के दौर में ऐसा महसूस किया गया कि डिजिटल माध्यम जो है वह बहुत तेजी से उभर रहा है तब यह निर्णय लिया गया कि “कर्मवीर” को न्यूज पोर्टल के रूप में शुरू किया जाए। इस तरह मुझे कर्मवीर की जिम्मेदारी आदरणीय श्रीधर जी ने मुझे प्रदान की

 

सवालः कर्मवीर पत्रकारिता के पितामह दादा माखनलाल चतुर्वेदी की विरासत है। वो इसके संस्थापक सम्पादक थे। अब आप कर्मवीर के प्रधान सम्पादक हैं। कैसा महसूस करते हैं इतनी बड़ी और प्रभावशाली जिम्मेदारी के बाद।

जवाबः  दादा माखनलाल चतुर्वेदी की विरासत को संभालना बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है ।सच कहूं तो मेरे पास शब्द नहीं है यह कहने के लिए कि मैं कैसा महसूस कर रहा हूं।
और वास्तव में तो मैं खुद को इस योग्य मानता भी नहीं हूं कि मैं कर्मवीर का प्रधान संपादक हो सकूं लेकिन गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करना मेरा कर्तव्य था इसलिए मैंने कर्मवीर की महती ज़िम्मेदारी संभाली है। कोशिश करूंगा कि पूरी ईमानदारी से इसका निर्वाह कर सकूं।
 

सवालः कर्मवीर जब माखनलाल चतुर्वेदी देखते थे, तो उन्होंने कुछ नियम बनाए थे कर्मवीर के लिए। वो थे कर्मवीर विज्ञापन नहीं लेगा, विज्ञापन नहीं मांगेगा, किसी के आगे झुकेगा नहीं-बिकेगा नहीं। क्या आप इन नियमों से वास्ता रख पाएंगे।

जवाबः  प्रशांत… यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि दादा माखनलाल चतुर्वेदी के बनाए नियमों का पालन कर पाऊंगा या नहीं …!असल में जब दादा ने कर्मवीर प्रारंभ किया था तब अंग्रेजी शासन काल था और कर्मवीर आजादी की लड़ाई का एक औजार था इसलिए उस समय उन्होंने जैसे विज्ञापन नहीं लिया जाएगा , किसी के आगे झुकेगा नहीं, बिकेगा नहीं ….आदि आदि नियम और अनुशासन बनाये थे।
मैं दो बातें स्पष्ट कहना चाहता हूं कर्मवीर का जो ध्येय है वह लोक और लोकतंत्र की पक्षधरता है। आज इस दौर में कर्मवीर अपनी इस भूमिका को बखूबी निभाएगा यह भरोसा दिलाना चाहता हूं ।
जहां तक विज्ञापन का प्रश्न है आप जानते हैं …आप मीडिया से जुड़े हुए हैं कि विज्ञापन हर समाचार माध्यम के लिये महत्वपूर्ण होते हैं।
उसके लिए आर्थिक संसाधन जुटाने का एक माध्यम होता है विज्ञापन…इसलिए मैं यह तो नहीं कहूंगा कि विज्ञापन कर्मवीर में प्रकाशित ही नहीं होंगे। हां इतना जरूर कहूंगा कि किसी भी तरह के विज्ञापन के लिए कर्मवीर अपने सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेगा। और किसी भी सत्ता या व्यक्ति के सामने झुकने और बिकने का तो सवाल ही नहीं है

 

 

सवालः राजा की गद्दी का मतलब है राजा के लिए बनाए गए विधान का पालन करना। माखनलाल चतुर्वेदी की गद्दी में बैठने का मतलब है कि उनके आदर्शों का पालन करना। कवियित्री महादेवी वर्मा अपने साथियों को एक प्रसंग बताया करती थीं कि जब भारत आजाद हुआ तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए राजनीतिक विचार विमर्श के बाद माखनलाल चतुर्वेदी जी को चुना गया। जब उन्हें इस बात की सूचना दी गई तो दद्दा ने विनम्र मुस्कान के साथ कहा था कि शिक्षक और साहित्यकार बनने के बाद मुख्यमंत्री बना तो मेरी पदावनति होगी। क्या भविष्य में आप भी किसी तरह के राजनीतिक पद या लाभ के पद से दूर रहेंगे।
जवाबः  यह सवाल तो काल्पनिक ही है लेकिन फिर भी मैं इसका उत्तर जरूर दूंगा ।
देखिए लगभग तीन दशक सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद मुझे नहीं मालूम कि राजनीति में जाना चाहिए या नहीं । फिर भी मेरा अगर मुझे लगा कि कोई उपयुक्त भूमिका मेरी हो सकती है तो मैं उससे पीछे नहीं हटूंगा।

किसी तरह के राजनीतिक पद या लाभ के पद की बात तो अभी भविष्य के गर्त में है फिर भी मैं किसी पत्रकार के राजनीति में जाने को अनुचित नहीं मानता । आदरणीय अटल बिहारी वाजपेई से लेकर इस दौर में तमाम ऐसे नाम हैं जो प्रारंभ में लंबे समय तक पत्रकार रहे और बाद में सक्रिय राजनीति शामिल हुए।
वैसे मेरा मानना है कि राजनीति बुरी इसलिये है कि अच्छे लोग इसमें शामिल नहीं हो रहे…अगर मैं ख़ुद को अच्छा मानूं.. हा हा हा…  तो राजनीति में जाने में कोई बुराई नहीं है।
और हां प्रशांत…भविष्य कौन जानता है..
हुइहे वही जो राम रचि राखा..

 

सवालः कर्मवीर मूलरूप से प्रिंट संस्करण थी आप वेबसाईट संस्करण लेकर आए हैं। क्या पत्रिका की भी शुरूआत करेंगे।
जवाबः जैसा कि मैंने शुरू में ही बताया कि कर्मवीर पत्रिका की शक्ल में तो निरंतर प्रकाशित हो ही रहा है.. विवेक श्रीधर इसके संपादक हैं।
जहाँ तक अख़बार का सवाल है..अभी कहना मुश्किल है। वैसे भी अख़बार निकालना बहुत खर्चीला उपक्रम हो गया है।फिलहाल इसके वेब पोर्टल को ही ज्यादा से ज्यादा ऊंचाइयों तक ले जाना लक्ष्य है।

 

 

कर्मवीर
फिल्म अभिनेता आशुतोष राणा के साथ डॉ.राकेश पाठक

सवालः थोड़ा सवालों का स्वाद बदलते हैं। आपको बहुत हैंडसम और डैशिंग एडीटर बोला जाता है। कद काठी तो ईश्वर की देन है लेकिन आपके परिधान बहुत सिलेक्टिव होते हैं। परिधानों को लेकर आपका शौक कितना सच है।

जवाबः   अरे रे रे…काहे का हैंडसम और डेशिंग एडिटर …..!
बहुत सादा आदमी हूँ भाई। जैसा कि आप कह रहे है कि कद काठी तो ईश्वर की देन है.. बस सच यही है। इसमें मेरा क्या…?
हां परिधानों की बात सही है..अच्छे से, सलीके से रहना मेरा शौक कह सकते हैं आप… कपड़े भी थोड़े से सुरुचि से पहनता हूँ। लेकिन भाई ये सब चीजें मायने नहीं रखतीं…आपका किरदार कैसा है ये मायने रखता है।

वो नज़ीर अकबराबादी ने कहा है न…

सब ठाठ पड़ा रह जायेगा
जब लाद चलेगा बंजारा।

 

सवालः मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले में (आपका गृहक्षेत्र)  पिछले दिनों एक टीवी चैनल के संवाददाता की ट्रक से कुचलकर हत्या करवा दी गई। आप लोगों के प्रयासों से मामला सीबीआई के पास है। यहां दो सवाल हैं। पहला है कि भिण्ड में दबंगई शेष है देखिए पत्रकार भी सुरक्षित नहीं। दूसरा सवाल क्षेत्रीय पत्रकारिता कितनी चुनौतीपूर्ण है। थोड़ा रेखांकित करिए और हल क्या है जिससे क्षेत्रीय पत्रकारिता में सहजता आए।

जवाब. हां प्रशांत भिंड में पत्रकार की मौत का जो सवाल तुमने पूछा है निश्चित तौर पर वह एक दुखद घटना है ।
जैसा कि आप जानते हैं कि पत्रकार संदीप शर्मा ने रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ का स्टिंग ऑपरेशन किया था ।उसके बाद ट्रक से कुचलकर उनकी मौत हुई । मध्य प्रदेश सरकार ने उसकी सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं । वास्तव में ये हत्या है या दुर्घटना ये तो सीबीआई जांच के बाद ही पता लगेगा लेकिन निश्चित तौर पर पत्रकारिता एक जोखिम भरा काम है।
आपने क्षेत्रीय और आंचलिक पत्रकारिता के खतरों की बात कही मैं ऐसा मानता हूं कि जिस तरह के खतरे आंचलिक पत्रकारिता में है वैसे खतरे राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होते ।
मैं एक उदाहरण से इस बात को साफ करना चाहता हूं बहुत साल पहले की बात है । उत्तराखंड में एक पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या हुई थी । तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उसकी जांच के आदेश दिए थे । उमेश डोभाल शराब माफिया के खिलाफ खबरें लिखते थे जिसके कारण उनकी हत्या की गई थी।

इस हत्याकांड पर “नवभारत टाइम्स” के तत्कालीन प्रधान संपादक राजेंद्र माथुर जी ने विशेष संपादकीय लिखा था
माथुर जी ने लिखा था कि देश की राजधानी में बैठकर प्रधानमंत्री के खिलाफ खबर लिखना या या राज्यों की राजधानी में बैठकर मुख्यमंत्री के खिलाफ खबर लिखना आसान है लेकिन जिला और तहसील स्तर पर स्थानीय प्रशासन या क्षेत्रीय दबंगों के खिलाफ खबर लिखना ज्यादा जोखिम भरा काम है।

इसके बावजूद क्षेत्रीय या आंचलिक पत्रकारिता में आज भी तमाम लोग हैं जो खतरे उठा कर भी अपने फ़र्ज़ को अंजाम दे रहे हैं।

 

सवालः भिण्ड पत्रकार की हत्या मामले की जांच अब सीबीआई के पास है। आपको लगता है दोषियों को सजा मिलेगी। क्योंकि पत्रकारों पर हुए हमलों पर नजर रखने वाली एजेंसी कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिज्म का कहना है कि भारत में सबसे ज्यादा असुरक्षित क्षेत्रीय पत्रकार हैं। इसके साथ ही एजेंसी कहती है कि पिछले 10 वर्षों में पत्रकारों पर हुए हमलों में दर्ज किसी भी केस की जांच आजतक पूरी नहीं हो पाई। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि पत्रकारों पर हुए हमलों की जांच अधर में है। कौन काम कर रहा है पर्दे की पीछे।

जवाबः  हां भिंड के पत्रकार संदीप शर्मा की मौत की सीबीआई जांच के आदेश हो चुके हैं। भरोसा रखना चाहिए कि इस जांच में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
आपका यह कहना बिल्कुल ठीक है क्षेत्रीय या आंचलिक पत्रकारिता में खतरे ज्यादा है।इन खतरों के बीच छोटी छोटी जगह पर जो पत्रकार अपने फ़र्ज़ को अंजाम दे रहे हैं मैं उन्हें सलाम करता हूँ।

 

सवालः भिण्ड में जिस पत्रकार की पिछले दिनों हत्या हुई उसके परिवार को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने 2 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की बात कही है। हालांकि ये बहुत कम है। बहरहाल जिस चैनल में संवाददाता कार्यरत था उस चैनल की ओर से पत्रकार के परिवार को कितनी धन राशि दी गई या देनी चाहिए। आप कृपया बताएं।

जवाबः  दिवंगत पत्रकार संदीप के परिवार को मुख्यमंत्री ने दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता घोषित की है। यह सचमुच बहुत कम है। मैंने भोपाल में सेंट्रल प्रेस क्लब के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह से मांग की थी कि सहायता राशि बढ़ाई जाए लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ।

हां उस चैनल न्यूज़ वर्ड के एडिटर इन चीफ रिजवान अहमद सिद्दीकी और उनके साथियों ने संदीप के परिवार को आर्थिक सहायता दी है। भिंड ,ग्वालियर और भोपाल के पत्रकारों ने भी आर्थिक सहायता दी है।

 

 

सवालः ओके। डॉ राकेश पाठक। मतलब एक पत्रकार, मतलब एक कवि। एक चिंतक। एक समाज सेवक ( लेखनी के माध्यम से तो आप हमेशा से ही जनहित के मुद्दे उठाते रहे हैं, पर हाल ही में आप तमाम सामाजिक मुद्दों को लेकर सड़कों पर भी उतर रहे हैं)। वाकई डॉ राकेश पाठक इनमें से सबसे ज्यादा क्या हैं।

जवाबः  बहुत मजेदार सवाल है प्रशांत…राकेश पाठक मूलतः क्या हैं..या सबसे ज्यादा क्या हैं..?
सच कहूं तो मूलतः सिर्फ पत्रकार हूँ… क़लम का सिपाही। पत्रकारिता मेरा इश्क़ है…मुझे मुहब्बत है अपने काम से।
इसके बाद अगर कुछ हूँ तो कविता का विद्यार्थी। हां समाजसेवा के लिए हमेशा तत्पर रहता हूँ। सड़कों पर उतर कर जनपक्ष के लिए लड़ाई भी लड़ता हूँ….लेकिन अब तक ऐसा कुछ खास नहीं किया कि समाजसेवी कहलाऊँ। बस जनता का सिपाही समझ लीजिए।
सवालः आप हमेशा चुस्त दुरुस्त। फिट दिखते हैं। क्या जिम जाते हैं। कैसे इतना फिट रखते हैं खुद को इस उम्र में। हाहाहा… उम्र नहीं पूछूंगा। हालांकि चाणक्य कहते थे कि पुरुषों से उनके धन और महिलाओं से उम्र नहीं पूछना चाहिए पर आजकल पुरुष भी उम्र बताने से परहेज कर रहे हैं। हाहाह….

जवाबः अरे यार…अब कहाँ फिट रहा..! अब तो सेठ जी टायप लगने लगा हूँ। हा हा हा….
वैसे पहले जिम जाता था…।बाद में साइक्लिंग करता रहा। करीब 15 से 20 किलोमीटर प्रतिदिन। लेकिन इधर कुछ अस्त व्यस्त रहा सो सब बन्द है। जल्द फिर शुरू करूँगा।
और हाँ मुझे उम्र बताने में कोई परहेज नहीं है बल्कि मैं तो हमेशा कुछ साल बढ़ा कर ही बताता हूँ ताकि ज़रा मैच्योर लगूँ। फिलहाल 53 साल का हो चुका हूं….ये बढ़ा कर नहीं बताई असली वाली है…हा हा हा।
सवालः ओके। सर एक बेहद निजी सवाल है। आपकी पत्नी का निधन हो गया शायद बीते वर्ष। मुझे ये सवाल शायद पूछना भी चाहिए या नहीं दोनो स्थितियां हैं पर जवाब देने और न देने के लिए भी आप स्वतंत्र हैं।

दरअसल सवाल में जीवन प्रबंधन का हल खोजने की कोशिश कर रहा हूं और सामने जब आप जैसा सुलझा सा व्यक्ति हो तो सवाल कर देना चाहिए। सवाल ये है कि आपकी पत्नी को कैंसर था, काफी लम्बा समय वो एम्स में भर्ती रहीं। मैं क्या आपको जानने वाले जानते हैं कि आपने उनके प्रति अथाह समर्पण, निष्ठा, प्यार और सम्मान और फिर सेवा की उनकी बीमारी के दौरान उसपर आप सार्वजनिक रूप से लिखते रहे। स्तंभ भी लिखे। मैंने पढ़े हैं। उन्हें पढ़कर कोई भी भावुक हो जाए। आपने सीधे लिखा कि 5 साल के दौरान एम्स का कैंसर वार्ड आपका दूसरा घर हो गया। आपने अंतिम वक्त तक साथ निभाने और साथ लड़ने की बात लिखी। पर ईश्वर और नियति को कुछ और मंजूर था। मैं बिल्कुल भी आम पत्रकारों वाला बेवकूफाना सवाल नहीं करूंगा कि उनके जाने के बाद कैसा महसूस होता है। मेरा सवाल ये है कि कैसे हर व्यक्ति खुद को संतुलित करे, पूरा करे, उसके बगैर जिसके बगैर वो अधूरा है। ये जीवन प्रबंधन कैसे सुनिश्चित किया जाए।

जवाबः सवाल बेहद निजी है फिर भी मैं इसका जवाब दूंगा। वैसे भी काफी हद तक सार्वजनिक जीवन में हूँ तो मेरा जीवन खुली किताब की तरह है। आपको भी जानने का हक़ है।

मेरी जीवन संगिनी प्रतिमा को 2011 में ब्लड कैंसर हुआ था।। डॉक्टर्स ने कहा था कि छह महीने या इससे कुछ अधिक ही है जीवन। लेकिन वे अदभुत जिजीविषा वाली थीं…डटकर मुकाबला किया और करीब पांच बरस कैंसर से जूझते निकले।
सन 2015 में उनका निधन हुआ।
इन कठिन दिनों में मैं और दोनों बेटियों ने जो बन पड़ा वह सब किया। मैंने वही किया जो कोई भी प्रेम करने वाला मनुष्य करता।
दरअसल 25 साल के साथ के बाद जीवन साथी से बिछड़ने की जो पीड़ा है वह शब्दों में तो व्यक्त की ही नहीं जा सकती।

जहां तक जीवन प्रबंधन का प्रश्न है…बहुत कठिन होता है इस तरह के हालात का सामना करना लेकिन ज़िन्दगी सब सिखा देती है। इसके बावजूद जीवनसाथी के जाने से जो खालीपन आता है वो कभी भर नहीं सकता।
और ज्यादा विस्तार से कुछ कह नहीं पाऊंगा प्रशांत।

 

 

सवालः  … ऊपर वाले सवाल को लिखते वक्त मैं स्वयं भावुक हो गया और आंखे भर आईं क्योंकि मैं आपसे और आपकी पत्नी से मिल चुका हूं। बात कर चुका हूं। बहरहाल … आपकी दो बेटियां हैं। दोनों कथक करती हैं। शायद एक गाती भी हैं। मैंने कोई एलबम सुना उनका जो मुंबई रहती हैं। दूसरी योग शिक्षक हैं। कथक की प्रेरणा शायद उनको अपनी मां से मिली हो। पर मैं ये जानना चाहता हूं आप पत्रकार हैं। पत्रकारिता की ओर इनको लाने का प्रयास क्यों नहीं किया।

जवाबः दोनों बेटियां सौम्या और शची माँ के प्रभाव से ही नृत्य करतीं हैं लेकिन सिर्फ शौकिया। प्रतिमा जी बहुत श्रेष्ठ कथक नृत्यांगना थीं।
जहां तक पत्रकारिता में आने का सवाल है दोनों ने इस ओर रुचि नहीं दिखाई। अपने अपने रास्ते उन्होंने खुद चुने हैं। बड़ी वाली बेटी अब योग शिक्षक है और छोटी फोरेंसिक सांइस में एमएससी फाइनल ईयर में है, मुम्बई में। वो शौकिया गाना गाती है। जो गाना आपने देखा था वह काफी पसंद किया गया।
सवालः पत्रकारिता अब करियर के लिहाज से कितना सुरक्षित है। क्योंकि पत्रकार ही अब नहीं चाहते कि उनके बेटे या बेटियां पत्रकार बनें।

जवाबः  पत्रकारिता का पेशा है तो बहुत जोखिम भरा। खास तौर से इसमें जो अनिश्चितता है वह कभी कभी घातक साबित होती है। आज नौकरी है कल नहीं है। ऐसे में नई पीढ़ी में जो लोग इस जोखिम को लेने का साहस करते हैं वे आ ही रहे हैं।
बहुत बड़ी संख्या में पत्रकारों के बच्चे भी पत्रकार बन रहे हैं।

 

सवालः आप पिछले दिनों भोपाल में आयोजित मीडिया महोत्सव में वक्ता के रूप में शामिल हुए। एक बड़ा तबका ये मानता है कि वो संघ औऱ बीजेपी का सम्मेलन था। जिसमें बीजेपी के ही उप संगठनों से जुड़े लोग शामिल हुए। उसमें मुख्यधारा की मीडिया से जुड़ा कोई विमर्श नहीं हुआ और न ही ये पत्रकारों का सम्मेलन था। कुछ लोगों ने स्पष्ट लिखा कि ये निक्कर गिरोह या चड्डी वाले पत्रकारों का जमावड़ा है। पर क्या कहेंगे इस सम्मेलन के बारे में। चूंकि आपने सब देखा औऱ जाना। क्या वाकई निक्कर गिरोह (आरएसएस) का जमावड़ा था। निक्कर गिरोह और चड्डी वाले पत्रकार मेरी शब्दावली का हिस्सा नहीं हैं। चूंकि लोगों ने ऐसा बोला तो मुझे जिक्र करना पड़ा।

जवाबः  हाँ प्रशांत मैं संघ से संबद्ध एक मीडिया महोत्सव में गया था। उस महोत्सव का केंद्रीय विषय राष्ट्रीय सुरक्षा था। चूंकि मैं सैन्य विज्ञान का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए मुझे वक्ता के तौर पर बुलाया गया था।

नहीं प्रशांत उसमें तमाम पत्रकार और अन्य राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी भी इसमें शामिल हुई थी ।
महोत्सव में संघ से जुड़े हुए लोग अधिक थे लेकिन फिर भी अन्य लोगों को भी अपनी बात कहने का पूरा अवसर मिला था। कुछ लोग “निक्कर वाले” या “चड्डी वाले” शब्दों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे शब्दों से परहेज करता हूं ।
जहां तक उस महोत्सव में विचार विमर्श का प्रश्न है मुझे वहां जाकर यह लगा कि संघ और उससे जुड़े हुए लोग एक खास खाँचे में फिट होकर ही सब कुछ देखते समझते हैं।
कई बार संघ को “अज्ञानता का अंधकूप” भी कहा जाता है। थोड़े से में बस यह समझ लीजिए कि वे लोग एक अजीब तरह के हिंदुत्व के “कल्पना लोक” में विचरने वाले लोग हैं ।फिर भी मुझे जैसे घोषित असहमत और स्पष्ट वैचारिक विरोधी पत्रकार को अपनी बात कहने का मौका वहां मिला यही बड़ी बात है।

 


सवालः आप किस राजनैतिक दल को समर्थन देते हैं। किस राजनैतिक दल को मतदान करते हैं। वर्तमान में कौन सा राजनेता पसंद है।

जवाब.  देखिए मैं किस राजनीतिक दल को समर्थन देता हूँ…. इस बारे में मेरा अभिमत है कि पत्रकार और नागरिक दोनों रूप में मेरी राय अलग अलग है ।
एक नागरिक के तौर पर मुझे कांग्रेस की विचारधारा, उसका समरसता वादी दर्शन और गांधीवादी परंपरा ज्यादा लुभाती है। लेकिन एक पत्रकार के रूप में दोनों ही बड़े राजनीतिक दलों की गुण दोष के आधार पर आलोचना करने से पीछे नहीं रहता।
दस साल की यूपीए सरकार की विफलताओं पर भी वैसे ही लिखता था जैसे आज मोदी सरकार के बारे में लिखता हूँ।

वर्तमान राजनेताओं में बहुत ज्यादा प्रभावित तो मुझे किसी ने नहीं किया लेकिन फिर भी मुझे सोनिया गांधी का व्यक्तित्व ज्यादा प्रभावित करता है ।उन्होंने जिस तरह विषम परिस्थितियों में कांग्रेस की नैया पार लगाई और गरिमामय व्यक्तित्व बनाए रखा वह एक महत्वपूर्ण बात है।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में मेरी क्या राय है आपने भले नहीं पूछा तो फिर भी मैं स्पष्ट कहना चाहता हूं कि वह निरंतर चुनावी सफलताओं के बावजूद मुझे प्रभावित नहीं कर सके । मेरी एक नागरिक के तौर पर यह राय है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी रीति-नीति से न केवल देश और समाज को नुकसान पहुंचाया है बल्कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है।

 

 

कर्मवीर
तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपने अखबार की ख़बरें दिखाते डॉ. राकेश पाठक।

सवालः मुझे याद है आप एक बार तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के साथ कंबोडिया की यात्रा पर गए थे। जैसा कि मैंने जाना विशेष विमान में सभी पत्रकार अंग्रेजी में माननीय राष्ट्रपति से सवाल कर रहे थे और आपने हिंदी में किया था। बिल्कुल स्पष्ट 2 बातें मैं कहूंगा। क्या आपको अंग्रेजी नहीं आती इसलिए हिंदी में सवाल किया। और दूसरा सवाल आपने हिंदी में सवाल करते हुए असहजता महसूस नहीं की थी जहां सब अंग्रेजी में बोल रहे हों। और खासतौर पर उस समय राष्ट्रपति की मीडिया प्रभारी भी हिंदी में तंग थीं। अर्चना दत्ता। श्रीमती दत्ता अब मेरी वेबसाईट मीडिया मिरर की सलाहकार हैं। आपका जिक्र किया था उनसे एक बार, बोलीं कि राकेश जी मेरे फ्रेंड हैं।

जवाब.  बहुत अच्छा सवाल है प्रशांत …दरअसल जो “ऑन बोर्ड” प्रेस कॉन्फ्रेंस राष्ट्रपति की होती है उसमें यह अवसर आया था जिसका आप जिक्र कर रहे हैं।
स्वाभाविक है बाकी लोग अंग्रेजी में सवाल कर रहे थे लेकिन मैंने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी से स्पष्ट कहा कि मैं हिंदी अखबार का संपादक हूं ,नई दुनिया का इसलिए मैं हिंदी में ही सवाल पूछूंगा और मुझे जवाब भी हिंदी में ही चाहिए।
राष्ट्रपति ने हिंदी में सवाल पूछने का स्वागत किया और जवाब भी हिंदी में ही दिया ।
वैसे यह साफ कहना चाहता हूं कि मेरी अंग्रेजी सचमुच अच्छी नहीं है लेकिन इसके बावजूद अगर मैं बेहतर अंग्रेजी जानता भी तब भी सवाल हिंदी में ही करता क्योंकि हिंदी का पत्रकार हूं ।
हां आपने ठीक याद दिलाया अर्चना दत्ता जी मेरी मित्र हैं। उस समय राष्ट्रपति की मीडिया प्रभारी थीं। वह बहुत रचनात्मक और सौजन्यशील महिला हैं। यह जानकर खुशी हुई कि वे “मीडिया मिरर” की सलाहकार हैं।

 

सवालः राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के साथ जब पत्रकार विदेश यात्राओं पर जाते हैं तो चयन का आधार क्या होता है। चूंकि आप गए हैं तो आप बता सकते हैं कि पूरे नई दुनिया समूह से आपका ही चयन क्यों किया गया। क्योंकि ऐसे आरोप हर बार लगते हैं कि विदेश यात्राओं में या तो मीडिया संस्थानों के मालिक स्वयं जाते हैं या अपने खास लोगों को भेजते हैं, यहां पारदर्शिता का अभाव है।
जवाबः राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में पत्रकार आमतौर पर अखबार या मीडिया समूह से रोस्टर के आधार पर जाते हैं।
मेरा चयन उस समय “नईदुनिया” के जो प्रधान संपादक थे श्री आलोक मेहता जी उन्होंने किया था। मेरा सौभाग्य है कि उन्होंने इतने बड़े नईदुनिया समूह में से ग्वालियर के संपादक को इस यात्रा के लिए चुना।
इस यात्रा की खबरें प्रतिदिन कंबोडिया और लाओस से मैं भेजता था और हर दिन मेरी खबर पहले पन्ने पर पूरे नईदुनिया समूह के हर संस्करण में छपती थी। इसके लिए मैं श्री आलोक मेहता जी का हृदय से आभारी हूं ।
यह जो आप आरोप बता रहे हैं कि मीडिया संस्थानों के मालिक स्वयं जाते हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है… कभी कभी समूह के मालिक भी जाते हैं और देश में कई ऐसे मीडिया समूह हैं जिनके मालिक बाकायदा पत्रकार भी हैं ।इस में पारदर्शिता के अभाव जैसी कोई बात नहीं है। क्रम से सभी बड़े अखबार समूहों का नंबर इसमें आता है।

 

सवालः आपकी तीन किताबों का प्रकाशन हो चुका है। यात्रा वृतांत भी आया। कविताएं लिखते हैं। कविता संग्रह बसंत के पहले दिन से पहले काफी लोकप्रिय रहा। हेमंत स्मृति कविता सम्मान मिला। आपकी कविताएं मैंने पढ़ीं उसने प्रेम किया-मैंने प्रेम किया, स्मृतियां, तुम्हारा पता, लौट आना..। मुझे अच्छी लगीं। इन्हें पढ़कर लगा कि कविताएं किसी व्यक्ति विशेष के लिए हैं। यही कविताओं का स्वरूप भी है। लेकिन मैं आपको तक़रीबन 9-10 वर्ष पीछे ले चलता हूं। नई दुनिया ग्वालियर की ओर से कवि सम्मेलन आय़ोजित था। कुमार विश्वास भी थे, पवन जैन भी। कांग्रेस नेता अरुण यादव उसमें आए थे। ये नाम इसलिए बता रहा हूं ताकि आपको स्मृति आ जाए। मैं भी उस कवि सम्मेलन में था। हुआ ये था कि मैं सबसे पीछे बैठा था। एक से एक दिग्गज कवियों का जमावड़ा था सबने एक से एक बेहतर प्रस्तुति दी। उसमें आपने भी रचना पाठ किया था। मुझे आज भी याद है आप जैसे ही मंच पर आए और पंक्तियां बोलनी शुरू कीं मेरे इर्द गिर्द बैठे काफी लोगों ने आपके रचना पाठ का मुखर विरोध किया और बोले कि अब ये आयोजक ही हैं तो इनको झेलना पड़ेगा। मुझे याद है ये सुधी श्रोता थे और गंभीर, उम्रदराज। ये लगातार कह रहे थे कि आपकी कविताओं में वो बात नहीं कि उन्हें प्रस्तुत किया जाए।

मैं ये प्रसंग इसलिए जाहिर कर रहा हूं कि हर व्यक्ति को बराबर हक़ है अपनी प्रशंसाओं के साथ आलोचनाओं को जानने का, ताकि वो आत्ममंथन और सुधार कर सके। कैसे लेते हैं इस पूरे परिदृश्य को।

 

जवाबः . अरे वाह प्रशांत… बहुत साल पुरानी बात याद दिलाई वह जो कवि सम्मेलन था जिसमें कुमार विश्वास और तमाम दिग्गज कवि थे ,असल में वह हमारी एक सामाजिक संस्था है “सार्थक” उसका आयोजन था।
मैं सार्थक का अध्यक्ष भी हूं। असल में उस दिन मैं और कुमार विश्वास होटल में बैठे हुए थे तो कुमार ने कहा कि आज शाम को आपको भी कविता पढ़ना है ।मैंने उन्हें मना भी किया लेकिन वह नहीं माने। कवि सम्मेलन का संचालन कुमार खुद कर रहे थे और उन्होंने जब मुझे आवाज दी तो कविता पढ़ने जाना ही पड़ा।

असल में प्रशांत मैं जानता हूं कि जो उस तरह के कवि सम्मेलन होते हैं जिनमें मंचीय कविता पढ़ी और सुनी जाती है मेरी कविताएं वहां सुनाने लायक नहीं हैं लेकिन कुमार विश्वास मित्र हैं उनका आग्रह था तो मुझे सुनाना पड़ी ।
मुझे यह भी मालूम है कि कुछ श्रोताओं को मेरा कविता पढ़ना अच्छा नहीं लगा था लेकिन सचमुच मैं अपनी हर आलोचना को सुनना पसंद करता हूं और मुझे आपके इस प्रश्न से जरा भी असुविधा नहीं हुई क्योंकि मैं जानता हूं कि उस कवि सम्मेलन में मेरा कविता पढ़ना ठीक नहीं था।

वैसे भी मैं कविता का साधारण विद्यार्थी हूं यह अलग बात है कि मेरे इस कविता संग्रह “बसंत के पहले दिन से पहले” पर मुझे “हेमंत स्मृति कविता सम्मान” जैसा राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया है।
सवालः आप जब प्रदेश टुडे से कार्य़मुक्त हुए तो आपने उस संदर्भ में एक नोट प्रकाशित करवाया था अखबार में। उसमें लिखा था कि कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाटी हाथ, अब जहां दाना पानी मिलेगा वहां देखेंगे। तो दाना पानी अबतक मिला या नहीं। क्योंकि कर्मवीर को फिलवक्त आप मुख्यधारा के मीडिया संस्थान से नहीं जोड़ सकते। जैसा कि आपका पिछला रिकॉर्ड रहा है आप लगातार बड़े अखबारों में सम्पादक रहे हैं। मेरा मतलब ये कि डॉ राकेश पाठक क्या फिर किसी बड़े अखबार में सम्पादक के रूप में देखने को मिलेंगे। कोई ऑफर प्रदेशटुडे के बाद आया कि नहीं।
जवाबः “प्रदेश टुडे” छोड़ते वक्त जिस नोट की आप बात कर रहे हैं वह अखबार में प्रकाशित नहीं हुआ था… मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था “अलविदा प्रदेश टुडे”।
बहुत लंबा अरसा पत्रकारिता में हो चला है… लगभग तीन दशक होने को हैं। इस अवधि में “नईदुनिया” “नवभारत” “नवप्रभात” और “प्रदेश टुडे” जैसे महत्वपूर्ण अखबारों में संपादक रह लिया वह भी बरसों बरस।
उसके बाद डिजिटल मीडिया में आया और “डेटलाइन इंडिया” में प्रधान संपादक रहा और अब यह कर्मवीर का दायित्व ।

प्रशांत मुझे अब बिलकुल नहीं लगता कि मैं प्रिंट मीडिया में वापस लौटूंगा क्योंकि मैं जिस स्वायत्तता के साथ “कर्मवीर” में काम कर पा रहा हूं वैसी आजादी अब किसी बड़े अखबार में संभव नहीं है।
मैं बहुत खुश हूं कि मैं “कर्मवीर” को ठीक से चला पा रहा हूं, जो उचित लगता है वह लिख पा रहा हूं। किसी तरह की कोई रोक-टोक ,कोई अंकुश नहीं है ।
जहां तक प्रदेश टुडे से दोबारा ऑफर आने का प्रश्न है ऐसा कोई ऑफर ना आया और नहीं वहां मेरे लौटने का कोई विचार है।
सवालः आप जब प्रदेशटुडे से मुक्त हुए तो आपने प्रदेश टुडे के मालिक ह्द्येश दीक्षित के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा था कि एक रिपोर्टर से अखबार का मालिक बनने की यात्रा उन्होंने पूरी की। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने हाल ही में कहा और राम बहादुर राय ने भी कि एक पत्रकार कभी अखबार या चैनल का मालिक बन ही नहीं सकता। इतना धन नैतिकता से, सिद्धांतों से चलते हुए किसी पत्रकार के पास संभव ही नहीं कि वो अखबार या चैनल खड़ा कर दे। ऐसे में ह्दयेश दीक्षित ने रिपोर्टर से अखबार मालिक बनने तक का सफर कैसे तय किया होगा।

जवाबः यह सही है कि मैंने श्री हृदयेश दीक्षित के एक रिपोर्टर से अखबार मालिक बनने की यात्रा पर कुछ लिखा था लेकिन ऐसे विरले ही लोग होते हैं।
पुण्य प्रसून या राम बहादुर राय ने ठीक ही कहा है कि अब किसी पत्रकार का अखबार या चैनल मालिक बनना संभव नहीं है । ह्रदयेश दीक्षित कैसे अखबार मालिक बने उनके सफर पर तो मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा लेकिन आज के दौर में अखबार निकालना बहुत महंगा सौदा है जो किसी पत्रकार के लिए सीधे सीधे रास्तों पर चलकर संभव नहीं है।

 

 

कर्मवीर
ग्वालियर में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के दौरान किसी बात पर मुस्कुराते अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. राकेश पाठक

सवालः सवालों के अंतिम दौर में ग्वालियर के पत्रकार से अटल जी की बात न हो तो क्या बात है। अटल जी और अपने रिश्तों से जुड़ी एक बात, कोई संस्मरण जरूर साझा करिए।
जवाब.  श्री अटल बिहारी वाजपेई जी से मेरा सीधा परिचय था ।
उन दिनों मैं नवभारत में संपादक था और ग्वालियर में पत्रकारों के संगठन “ग्वालियर जर्नलिस्ट एसोसिएशन” का अध्यक्ष भी था ।
मेरा सौभाग्य है कि अटल जी मेरे बुलावे पर ग्वालियर में तीन बार “प्रेस से मिलिए” कार्यक्रम में उपस्थित हुए ।दो बार प्रधानमंत्री रहते हुए और एक बार पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में ।
अटलजी के साथ का एक मजेदार वाकया है जो संक्षेप में बताता हूं…
ग्वालियर में होटल तानसेन में प्रेस से मिलिए कार्यक्रम के बाद जब वे कार में बैठ रहे थे तो मैंने धीरे से उनसे कहा
सर.. मैं भी गोरखी और एमएलबी कॉलेज में पढ़ा हूं और ‘स्वदेश’ में भी काम किया है.. तब वे हल्के से मुस्कुरा कर बोले अरे वाह तब तो आपके लिए भी राजनीति में बहुत संभावनाएं हैं फिर ठहाका लगा कर हँस दिये।
सच कहूं तो अटल जी की इस बात को सोचकर आज भी मैं राजनीति में हाथ आजमाने के शेखचिल्ली जैसे ख्वाब कभी कभी देख लेता हूं..! हा हा हा…
सवालः आपने हाल ही में लिखा आप टीवी न्यूज चैनल नहीं देखते। ऐसा क्यों।

जवाब. हां मैंने लिखा था की मैं TV न्यूज़ चैनल नहीं देखता। आमतौर पर तो नहीं ही देखता ।जब कोई बहुत विशेष घटना हो, कोई खास खबर देखना हो तभी चैनल देखता हूं।
दरअसल हमारे न्यूज़ चैनल्स पर बहसों का जो स्तर है वह इतना घटिया हो चुका है कि मैं समझ नहीं पा रहा हूं किस तरह की बहसों से क्या हासिल होने वाला है ..?
लगभग सभी चैनल्स अपने अपने एजेंडे के मुताबिक डिबेट करवाते हैं। उनमें हाल यह है कि एक पक्ष ,जो कि स्वाभाविक है सत्ता पक्ष ही है उसकी तरफ से बहस करने वाले तीन से चार लोग होते हैं और प्रतिपक्ष का एक व्यक्ति । ऐसी असंतुलित डिबेट को सुनने का कोई फायदा नहीं और खास तौर से तब जब ज्यादातर एंकर खुद भी सत्ता पक्ष के हितैषी बनकर बात करते हों। इसलिए मैंने TV न्यूज़ चैनल देखना बंद कर दिया है।
सवालः मैंने सुना था कहीं कि राकेश पाठक ग्वालियर के वो पत्रकार हैं जो सिंधिया जी को फोन करें और सिंधिया न उठा पाएं तो मिस कॉल देख कॉल बैक करते थे। कितना सच है।

जवाबः  यह जरा अटपटा सवाल है प्रशांत…
एक पत्रकार ,संपादक होने के नाते ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ही नहीं प्रदेश के अन्य राजनेताओं से भी साधारण और सामान्य संपर्क हैं।
तो जहां तक रिश्तों का सवाल है सभी राजनेता जो संपर्क में होते हैं वह तमाम संपादकों के कॉल बैक करते हैं या कभी-कभी खुद फोन लगाकर भी बात करते हैं ।
“ग्वालियर के राकेश पाठक” इसमें कोई बहुत विशिष्ट हो गए हो
हों ऐसा कुछ भी नहीं है । नरेंद्र सिंह तोमर जी, हो प्रभात झा जी ,दिग्विजय सिंह जी सुरेश पचौरी जी, ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ये सभी लोग सभी संपादकों को और जान पहचान वाले पत्रकारों को फोन पर बात करते रहते हैं। इसमें कोई बहुत विशिष्टता वैसी बात नहीं है।

 

 

सवालः सम्पादक बनाम क्लर्क। सम्पादक बनाम मैनेजर। संपादक बनाम मालिक और राजनेताओं के बीच की कड़ी। सम्पादक बनाम दलाल जो कि मालिक के लिए तमाम सरकारी सुख सुविधाओं, पद्म पुरस्कारों की पैरवी करता है। कितना सहमत हैं इन बातों से।

जवाबः  संपादक बनाम क्लर्क… संपादक बनाम मैनेजर आदि आदि जो भी आपने तुलना की है मैं उस से सहमत नहीं हूं ।
अगर कोई सच्चा संपादक है तो वह ना क्लर्क हो सकता है ,ना मैनेजर न दलाल न और न मालिक के लिए सरकारी सुख सुविधाएं जुटाने या पुरस्कारों के लिए पैरवी करने वाला कोई बिचौलिया।
मुझे लगता है कि आज भी देश में तमाम ऐसे संपादक हैं जो अपनी गरिमा बनाए रखते हुए पूरी स्वायत्तता के साथ काम कर रहे हैं।
सवालः जब लोग ये कहते हैं कि संपादक अब पहले जैसे नहीं रहे। क्लर्क हैं, मैनेजर हैं। मालिक और सरकार के बीच की कड़ी हैं। चूंकि आप भी संपादक रहे हैं और ढाई दशक तक रहे हैं। शीर्ष अखबारों में। आपने किस तरह अपनी भूमिका अदा की। प्रबंधन का दबाव, खबरों में मालिकों का दखल, मालिकों के बच्चों के आगे सम्पादक का कुर्सी छोड़ देना । आपके कैसे अनुभव रहे।

जवाब. संपादक के रूप में मेरा जो तजुर्बा है वह बिल्कुल अलग है। मैं जिन अखबारों में संपादक रहा वहां कभी खबरों के लिए न मालिक का दखल सहना पड़ा और न प्रबंधन का ।
मैंने पूरी आजादी के साथ चारों अखबारों में खुलकर काम किया। मालिक के बच्चों के आगे के संपादक की कुर्सी छोड़ना, ऐसी कोई नौबत मुझे कभी नहीं आई ।
मेरा अनुभव यह कहता है कि अगर आप खबर और अखबार दोनों के प्रति सच्ची निष्ठा रखते हैं तो आपको न कभी मालिकों का दबाव सहना पड़ेगा और ना प्रबंधन आपके काम में हस्तक्षेप कर सकेगा।
 

सवालः सम्पादक के अधिकारों में कटौती तो हुई है। सम्पादक मालिकों के दलाल और उनके काले धंधों पर सरकारी नियंत्रण को साधने का कार्य करते हैं। क्या मानते हैं आप।

जवाब.  हां संपादक के अधिकारों में कटौती तो हुई है और कमोबेश संपादक की सत्ता का बहुत अवमूल्यन हो गया है। दरअसल बड़े अखबार जो हैं उनमें अब ब्रांड मेनेजर होने लगे हैं ।ब्रांड मैनेजर संपादक को बताते हैं कि उन्हें प्रोडक्ट के लिए क्या चाहिए ।
उनके लिए अखबार विचार के लिए नहीं है बल्कि एक वस्तु मात्र है।
यह गंभीर समस्या है और फिलहाल ऐसे आसार नहीं दिखते कि संपादक की सत्ता और स्वायत्तता दोबारा वैसी प्रतिष्ठा पा सकेगी जैसी आज से दो तीन दशक पहले थी।

 

सवालः अभी फेक न्यूज के नाम पर अधिमान्य पत्रकारों की मान्यता खत्म करने का निर्देश केंद्र सरकार ने दिया, हालांकि विरोध के बाद वापस भी ले लिया। फिर ऑनलाइन मीडिया में शिकंजे की बात। इससे पहले राजस्थान की वसुंधरा सरकार द्वारा प्रशासन या जजों से जुड़ी खबर को आदेश के बाद प्रकाशित करने संबंधी कानून। क्या ये आहिस्ता आहिस्ता मीडिया को गुलाम बनाने की तैयारी नहीं है। एक तरह का आपातकाल नहीं है। एक व्यापारी के खिलाफ (अमित शाह के बेटे) खबर करने पर केंद्र सरकार के मंत्रियों का बचाव में उतरना और 100 करोड़ का दावा ठोकना। ये किस तरह की कोशिश हो रही हैं उन मीडिया संस्थानों के खिलाफ जो सरकार को आइना दिखा रहे हैं। कैसे जीवित रहेगी पत्रकारिता। वो तो सिद्धार्थ वरदराजन थे कोई और होता तो घुटने टेक देता।
जवाब. यह सही बात है कि वर्तमान सरकार येन केन प्रकारेण मीडिया पर अंकुश लगाना चाहती है। फेक न्यूज़ के बहाने पत्रकारों की अधिमान्यता खत्म करने वाला प्रस्ताव हो या वसुंधरा सरकार का कानून… यह सब शनै शनै पत्रकारिता पर अंकुश लगाने की कोशिश यही है। भले ही सरकार अभी अपने प्रयासों में सफल नहीं रही लेकिन आने वाले दिन और कठिन होंगे।
सरकारें आमतौर पर प्रेस की आजादी से डरती ही रही हैं। इस दौर में ऑनलाइन मीडिया के आने के बाद सरकार असहमति की आवाज़ से कुछ ज्यादा ही डरी हुई है। हो सकता है इस पर अंकुश लगाने के लिए कुछ और क़दम सरकार उठाये।
फिर भी मैं इसे आपातकाल नहीं कहूंगा हाँ उसकी आहट सुनी जा सकती है।

 

अंतिम सवालः आप जैसा वरिष्ठ सम्पादक सामने हो तो सवाल बढ़ते ही जाते हैं। पर अंतिम सवाल.. ये कैसा दौर है पत्रकारिता का, लोकतंत्र के चौथे खम्बे का। पत्रकारों की हत्याएं हो रही हैं, व्यापारी, दो नम्बरी, खनन माफिया, चिटफंड वाले अखबार औऱ चैनल खोल रहे हैं कानून से बचने के लिए। रवीश कुमार जैसे काबिल टीवी पत्रकार ही चीख चीखकर कह रहे हैं कि टीवी न्यूज न देखें, पुण्य प्रसून जैसे खांटी जुझारू पत्रकार सार्वजनिक मंचों पर कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय से मीडिया दफ्तरों में सीधे फोन आते हैं खबरों को लेकर। पीएमओ की दखलंदाजी होती है खबरों पर, एमजे अकबर जैसे पत्रकार कहते थे कि (जब नेता नहीं थे) खबरें छापने औऱ न छापने का पैसा लिया जा रहा है, राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार कहते हैं कि पत्रकार वो बन रहा है जो कुछ नहीं बन सकता।

ये किस तरह का संक्रमण है पत्रकारिता में…

जवाबः  पत्रकारिता के लिए यह सचमुच संक्रमण काल है ।लोकतंत्र का चौथा खंभा एक ऐसे समय में से गुजर रहा है जबकि तमाम ऐसे लोग भी इस में घुस आए हैं जिनकी नियत साफ नहीं है ।

बेजा तरीके से कमाए गए पैसे से चैनल और अखबार शुरू हो रहे हैं। निश्चित तौर पर उनसे आप किसी भी तरह की सैद्धांतिक पत्रकारिता की आशा नहीं कर सकते।
जहां तक राजदीप के इस बयान का सवाल है कि “पत्रकार वो बन रहा है जो कुछ नहीं बन सकता” इस से मैं सहमत नहीं हूं। तमाम ऐसे युवा भी पत्रकारिता में आ रहे हैं जो किसी भी अन्य व्यवसाय में जा सकते थे ।और आज सचमुच इसी तरह के सच्चे और जुनूनी लोगों की जरूरत है जो लोक और लोकतंत्र के हित में पत्रकारिता कर सकें ।
मैं बहुत आशावादी हूं मुझे लगता है कि यह संक्रमण काल भी बीत ही जाएगा और एक बार फिर हम और आप जनपक्षधर पत्रकारिता को देख पाएंगे।

 

 

 

मिरर के दर्शकों के कुछ सवालः

श्वेता आर रश्मी दिल्ली से- मध्यप्रदेश में मीडिया में काम करने के हालात कैसे है वर्तमान में, ग्वालियर में मौजूदा जलस्तर व पानी के उपलब्ध स्रोत क्या हैं।

जवाबः
मध्यप्रदेश में मीडिया में काम करने के हालात बहुत अच्छे हैं। यहां खबरों के लिए बहुत गुंजाइश है चाहे वह राजनीतिक क्षेत्र की खबरें हो या प्रशासन की।
अन्य क्षेत्र भी खबरों के मामले में बहुत उर्वर हैं ।अगर आप पर्यावरण के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं तो मध्य प्रदेश में अथाह प्राकृतिक संसाधन बिखरे पड़े हैं और उनके भीतर बिखरी पड़ी है खबरें जिन्हें कोई भी जिज्ञासु पत्रकार खोज कर निकाल सकता है ।
मुझे लगता है कि अन्य प्रदेशों की तुलना में मध्यप्रदेश में पत्रकारिता बहुत बेहतर ढंग से की जा सकती है आपका स्वागत है श्वेता।
ग्वालियर में जल स्तर सचमुच चिंताजनक स्तर तक नीचे चला गया है। प्रमुख जल प्रदाय श्रोत तिघरा जलाशय है जो कि सूख रहा है। इस बार अगर अच्छी बारिश नहीं हुई तो पेयजल की भीषण समस्या होगी।

 

 

परमबीर राजपूत- मीडिया छात्रों के लिए प्रिंट और डिजिटल मीडिया में कौन बेहतर माध्यम है।

जवाबः
प्रिंट और डिजिटल दोनो ही महत्वपूर्ण माध्यम हैं। डिजिटल के असीमित विस्तार के बावजूद प्रिंट का अपना महत्व है जो अभी खत्म नहीं होगा।
वैसे डिजिटल मीडियम की गति और विस्तार इतना अधिक है कि उसमें काम करने का आनन्द ही अलग है। इसके अलावा अपनी अपनी रुचि पर भी निर्भर करता है।

 

दिनेश दिनकर सोनीपत से- स्वतंत्र पत्रकारिता व राजनैतिक दबाव से मुक्त पत्रकारिता कैसे की जाए…

जवाब….

स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए ऑनलाइन मीडिया ही अब एकमात्र माध्यम है। आप अपने पोर्टल,ब्लॉग,वेबसाइट आदि के जरिये अपनी बात कह सकते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया राजनैतिक दवाब और हस्तक्षेप से मुक्त नहीं रह गया।

Share this: