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संघ और संघी में जो बहुत अच्छा है वो ये है..

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता। फाइल फोटो

पत्रकार जफर इरशाद बता रहे हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके कार्यकर्ता के बारे में आंखों देखी। ये कितना सच है ये तो वो ही जानें पर अगर सच है तो हर व्यक्ति को संघ कार्यकर्ता से प्रेरणा लेनी चाहिए। 

 

अपना यह अनुभव मुझसे मेल पर साझा किया, पढने के लिए. यह इतना spontaneous and sentimental है कि शेयर करना जरूरी लगा.
“एक पत्रकार की हैसियत से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम कई बार कवर करने गया लेकिन संघ के बारे में ज़्यादा जानकारी मुझे नहीं है. अब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय नागपुर जाने पर जो स्यापा मचा हैं उससे कुछ अजीब लग रहा है, यह वो लोग हैं जिन्होंने संघ के समाज सेवा के कामों को नज़दीक से नहीं देखा है. मैंने एक पत्रकार की हैसियत से संघ के निस्वार्थ सामाजिक कामों को खुद नज़दीक से देखा है और उसको लिखने से आज अपने आप को रोक नहीं पा रहा हूँ. अब संघ मुस्लिम विरोधी है या हिन्दू हितैषी इस बारे में न मुझे कोई जानकारी हैं और न ही कोई अनुभव, लेकिन इतना अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि संघ मानवता विरोधी तो नहीं है. 24 साल के पत्रकारिता कैरियर में अनेक बार हादसों या आपदाओं की कवरेज के दौरान संघ के लोगो को बिना किसी प्रचार प्रसार के खामोशी से राहत के काम करते अनेकों बार देखा लेकिन किसी सांप्रदायिक तनाव के दौरान उनकी कोई भूमिका मैंने तो नहीं देखी, अब बाकी पत्रकारों और नेताओं ने देखा हो संघ को दंगा कराते हुए तो मुझे नहीं मालूम. और हाँ एक बात और साफ कर दूँ मैं न तो संघ और न ही भाजपा से किसी भी स्तर पे जुड़ा हूँ. एक खालिस पत्रकार जिसने अपने पत्रकारिता कैरियर में कभी संघ या भाजपा की बीट भी कवर नहीं की..
10 जुलाई 2011 रविवार का दिन मै कानपुर में एक समाचार एजेंसी के प्रमुख रिपोर्टर के रूप में तैनात था, रविवार का दिन होने के कारण आराम से लेटा था कि दोपहर करीब एक बजे दिल्ली से मेरे संपादक का फोन आया कि फतेहपुर के पास मलवा में एक बड़ा ट्रेन हादसा हो गया है तुरंत जाने की तैयारी करो, मेरे करंट लग गया मैंने अपने रेलवे के सूत्रों को फोन किया उन्होने बड़ा एक्सिडेंट होने की बात कही, मै तुरंत रवाना हो गया. करीब एक घंटे बाद मै घटना स्थल पर पहुंचा, घटना स्थल मलवा कसबे से 10-12 किलोमीटर दूर एक वीरान स्थान पर था जहां पहुंचने के लिए मुझे करीब 4 किलोमीटर खेतो से पैदल जाना पड़ा. वहां दूर दूर तक कोई आबादी नहीं थी.
घटनास्थल पर पहुंच कर मै अपने रिपोर्टिंग काम में लग गया और फोन पर अपने दिल्ली में संपादक और डेस्क को लगातार खबर लिखवाने के अपने काम में जुट गया, बोगियों से एक एक लाश निकाली जा रही थी और घायलों को अस्पताल पहुंचाया जा रहा था, बड़ा ही दर्दनाक मंज़र था. किसी बच्चे से उसके माँ बाप बिछड़ गए थे तो किसी का पति और भाई, कोई रो रहा था तो कोई ज़ख्मों के दर्द से कराह रहा था. बोगियों से लाशे निकाली जा रही थी और उन्हें पास के एक खेत में रखा जाने लगा, तभी मैंने देखा कुछ खाकी हाफ़ पैंट पहने लोग आए और ट्रेन से निकाले गए शवों पर सफेद कपड़ा डालने लगे. जैसे ही कोई शव आता वो खाकी पैंट पहने लोग शव को कपड़े से ढक देते क्योंकि शव बहुत ही बुरी तरह से कटे और अंग भंग थे, बाद में उन शवों को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया जाता.
अब मै वहां से हट कर थोड़ी दूर उस जगह पर आया जहाँ ट्रेन दुर्घटना में मारे गए लोगो के परिजन बेहाल भूखे प्यासे बैठे रो रहे थे और अपने खोए बिछड़े परिजनों की सलामती की दुआ मांग रहे थे. तभी मैंने देखा कि कुछ लोग यहां बैठे यात्रियों और उनके परिजनों को चाय, पानी और बिस्कुट दे रहे हैं. मेरे अलावा वहाँ करीब दो दर्जन पत्रकार भी खबरों के अपने काम में लगे थे, तभी एक व्यक्ति ने मेरी तरफ एक प्लास्टिक के ग्लास में चाय और दो बिस्कुट बढ़ाए, करीब चार घंटे से काम कर रहे मेरे और अन्य पत्रकारों के लिए उस वीरान जगह में यह चाय किसी फाइव स्टार होटल की चाय से कम नहीं थी.
अब मेरे पत्रकार मन में यह जिज्ञासा जगी कि अखिर यह लोग कौन है जो ऐसे मुफ्त में चाय बिस्कुट और पानी सबको बांट रहे हैं. क्या यह काम सरकार के लोग कर रहे हैं? मैंने एक साहिब को रोक कर पूछा भाई साहिब आप यह क्यों और किसकी तरफ से बांट रहे हैं? वो मुस्कुराए और कहा जब आपको और चाय चाहिए तो वहां पीपल के पेड़ के नीचे आ जाइएगा. मैं जिज्ञासा शांत करने के लिए उनके पीछे पीछे थोड़ा दूर पीपल के पेड़ के नीचे गया. वहां एक अजब नज़ारा देखा, वहां पर करीब दो दर्जन घरेलू महिलाये बैठी सब्ज़ी काट रही थी और आटा गूंथ रही थी, पास में एक बड़े से चूल्हे पर चाय चढ़ी थी और सैकड़ों बिस्कुट के पैकेट और ड्रम में पानी भरा रखा था जिसे पॉलिथीन की थैली में भरा जा रहा था लोगो को देने के लिए.
एक कुर्ता पायजामा पहने वरिष्ठ व्यक्ति सभी महिलाओं और पुरुषों को जल्दी जल्दी काम करने के निर्देश दे रहे थे, मैं उनके पास पहुंचा उनका नाम पूछा लेकिन वो मुस्कुरा दिए लेकिन कुछ बोले नहीं. मैंने बताया मैं जफर हूँ पत्रकार, आप किस संगठन या संस्था से हैं आप अपना नाम बताए मैं आप की इस निस्वार्थ सेवा पर खबर लिखूंगा, खबर लिखने का नाम सुनते ही वो साहिब हमसे दूर चले गए..और बिना किसी यात्री या घायल का नाम या धर्म पूछे उन्हें चाय और पानी देने लगे..
मैं भी ट्रेन से निकलने वाले शवों की गिनती और राहत बचाव कार्य में लगे अधिकारियों से बात करने और खबर लिखवाने के अपने काम में व्यस्त हो गया. रात करीब 12 बज गए थे और ट्रेन से शव निकालने का काम अभी भी जारी था,अचानक वही दोपहर वाले साहिब मेरे पास आए और एक पॉलिथीन का पैकेट पकड़ा दिया, मैंने पूछा भाई साहिब यह क्या है, उन्होने कहा कुछ नहीं चार रोटी और सब्ज़ी है बस, आप दोपहर से खबर लिखवा रहे हैं कुछ खा लीजिए, भूख लगी होगी आपको, भूख वाकई बहुत ज़ोरदार लगी थी मुझे लेकिन मैंने कहा भाई मैं खाऊँगा तो लेकिन आप अपना परिचय दे पहले, उन्होंने कहा वादा करे कि आप छापेंगे नहीं कुछ. मैंने कहा ठीक है, तब उन्होंने बताया कि वो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता है और वो आपस मे सहयोग कर यहां ट्रेन हादसे में पीड़ित लोगो के परिजनों के लिए खाने पीने की व्यवस्था कर रहे हैं.
मेरा पत्रकार मन जागा मैंने कहा इस पर तो बहुत बढ़िया खबर लिखी जा सकती है, आप अपना नाम बताए, उन्होने कहा नाम नहीं बताएंगे और आपने पहले ही खबर न लिखने का वादा किया है, हमने पूछा यह महिलाये जो दिन भर चाय खाना बना रही है यह कौन है, उन्होंने कहा कि यह हमारे घर परिवार की महिलाये हैं. हमने पूछा कि जो यह शव ट्रेन से निकल रहे हैं उन पर सफेद कपड़ा आप डाल रहे हैं वो कहा से ला रहे हैं, उन्होंने कहा कि हमारे लोगो में जिसकी कपड़े की दुकान है वो कपड़े निशुल्क दे रहा है, जिसकी खाने के सामान की दुकान है वो आटा तेल दे रहा है, जिस सदस्य की जिस चीज़ की दुकान है वो निस्वार्थ भाव से सामान लाकर दे रहा है, हमने पूछा कि संघ तो हिंदुओं का संगठन है यहाँ इतने लोगो मे आप कैसे काम कर रहे हैं? उन्होने कहा भाई साहिब हम सभी रेल दुर्घटना में घायल हुए लोगो और उनके परिजनों को एक तरफ से एक साथ खाने पीने का सामान दे रहे हैं हम किसी का नाम नहीं पूछ रहे हैं. हमारे संगठन का काम पीड़ितों की मदद करना है न कि नाम और धर्म पूछना. मैंने पूछा आप तो शवों पर सफेद कपड़ा भी डाल रहे हैं, इस पर वो बोले जो भी शव ट्रेन से निकल रहा है हम उस पर कपड़ा डाल रहे हैं, हमें उस शव का नाम न मालूम करना है न इसकी कोई ज़रूरत है.
इतना कह कर खुदा का नेक बंदा वहां से जाने लगा बिना अपना नाम बताए बिना अपनी पहचान बताएँ. साथ में इस वादे के साथ की वो कि मैं खबर नहीं छापउंगा..
मै घटना स्थल पर करीब 36 घंटे रहा लेकिन इन लोगों को लगातार सेवा करते देखता रहा पीड़ितों की, पत्रकारों की, वहां ड्यूटी कर रहे अधिकारियो की. और बाद में मैंने सारे अखबार देखे किसी अखबार में इन निस्वार्थ भाव से सेवा करने वालों का नाम कही नहीं छपा था..”

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