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मोदी राज में दूरदर्शन को आजादी मिली कि नहीं बताएं अशोक श्रीवास्तव

नरेंद्र मोदी
2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी से बात करते अशोक श्रीवास्तव। ये साक्षात्कार काफी विवादित रहा था।

26 मई 2014 का  दिन मतलब देश में एक तरफ नरेंद्र मोदी नए प्रधानमंत्री के रूप में शपथ की तैयारी में जुटे थे, तो दूसरी ओर भारत के सबसे पुराने व सबसे प्रभावी चैनल दूरदर्शन के वरिष्ठ पत्रकार और एंकर अशोक श्रीवास्तव नई सरकार से ये सवाल कर रहे थे  कि क्या दूरदर्शन को आजादी मिलेगी। उन्होंने 26 मई 2014 को लिखे अपने आलेख में ये भी कहा था  कि केंद्र में सत्तारूढ़ दलों ने आकाशवाणी और दूरदर्शन का जमकर दुरुपयोग किया। 

दूरदर्शन जो कि सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के अधीन चैनल है। उसके किसी पत्रकार द्वारा सीधे सीधे सरकार पर ऐसे आरोप लगाना कोई सामान्य बात नहीं थी। अब चूंकि मोदी सरकार के भी चार साल पूरे हो गए हैं और सरकार अपने अंतिम चरण की ओर से अग्रसर है ऐसे में अशोक श्रीवास्तव को जनता को एक बार फिर जवाब जरूर देना चाहिए कि क्या मोदी राज में दूरदर्शन को आजादी मिली या नहीं या पूर्ववर्ती सरकारों की तरह मोदी सरकार ने भी दूरदर्शन का दुरुपयोग किया। अशोक श्रीवास्तव दमदार पत्रकार हैं। 56 इंच का सीना तानते हुए उन्हें जरूर बताना चाहिए कि दूरदर्शन को आजादी मिली या नहीं वरना उनका पूर्व आलेख महज दिखावा साबित होगा। 

  • प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

प्रस्तुत है उनका पूर्व आलेख, जो उन्होंने मोदी सरकार को सांकेतिक रूप से लिखा था……

क्या दूरदर्शन को आजादी मिलेगी?
केंद्र में सत्तारूढ़ दलों ने आकाशवाणी और दूरदर्शन का जमकर दुरुपयोग किया।
अशोक श्रीवास्तव | Last Modified – May 26, 2014, 06:35 AM IST

नरेंद्र मोदी के साथ मेरे इंटरव्यू में जो कांट-छांट हुई वह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस सारे विवाद ने दूरदर्शन और प्रसार भारती की स्वायत्तता के
मुद्दे को जरूर फिर जिंदा कर दिया है। ऐसी कोशिशें पहले भी हुई हैं। 2004 के आम चुनावों में एनडीए सरकार ने दूरदर्शन के जरिये
इंडिया शाइनिंग का प्रचार कर वोट बटोरने की कोशिश की। पर चुनाव में भाजपा और एनडीए को मुंह की खानी पड़ी। किंतु कांग्रेस ने
इससे कोई सबक नहीं सीखा। उसने दूरदर्शन के कंधे पर भारत निर्माण की जिम्मेदारी डाल दी और वह चारों खाने चित हो गई।

इस खेल में न कांग्रेस का कुछ गया न भाजपा का, लेकिन दूरदर्शन ने टीआरपी के साथ अपनी विश्वसनीयता भी गंवा दी। मुझे याद है
अगस्त 1989 में मैं बनारस में अपने गांव में था। वहां बिजली नहीं थी। लोग ट्रांजिस्टर सुनते थे। उस वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव
गांधी का विरोध करने के लिए समूचे विपक्ष ने एक दिन के भारत का बंद का एलान किया था। ऑल इंडिया रेडियो ने बंद को नाकाम
बताया पर गांव के लोगों ने सच जानने के लिए बीबीसी ट्यून किया। सोचिए, 25 साल पहले भी लोगों को यह मालूम था कि ऑल
इंडिया रेडियो ‘हिज मास्टर्स वॉइसÓ है। 2003 में 24 घंटे के न्यूज चैनल डीडी न्यूज की शुरुआत हुई, जिसने जल्दी ही देश के चुनिंदा
न्यूज चैनलों में अपनी जगह बना ली। लेकिन 2004 में चुनावों का एलान होते ही इंडिया शाइनिंग के चक्कर में डीडी न्यूज ने चमक खो
दी।

नई यूपीए सरकार ने इसे तटस्थ बनाने की बजाय पहले तो उन लोगों को चुन-चुनकर निकाला, जिन्हें एनडीए सरकार इंडिया शाइनिंग के
मकसद से लाई थी। फिर प्रोफेशनल्स के नाम पर ऐसे लोग लाए गए, जिनकी एकमात्र उपलब्धि राजनीतिक पार्टियों के लिए प्रचार की
फिल्में बनाना था। नतीजन पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता होने लगी।

2004 से लेकर 2014 के लोकसभा चुनावों तक 5 सूचना प्रसारण मंत्रियों के कार्यकाल मैंने देखे। इनमें अंबिका सोनी ही एकमात्र ऐसी
मंत्री थीं, जिन्होंने डीडी न्यूज का गलत इस्तेमाल नहीं किया। मंत्री बनते ही तमाम मंत्रियों ने सबसे पहला काम यह किया कि अपने
खासमखास लोगों को नौकरियां बांटीं। एक मंत्री तो ऐसे भी रहे, जिनके दफ्तर के बाहर एक कैमरा टीम स्थायी रूप से तैनात कर दी गई
थी और कई बार तो वे अपनी एक ही साउंड बाइट अलग-अलग एंगल से रिकॉर्ड करवाते थे।

दूरदर्शन के सरकारीकरण ने पिछले एक दशक में प्रसार भारती को अप्रासंगिक बना दिया है और डीडी न्यूज को सरकारी भोंपू। लोकतंत्र के
लिए जरूरी है कि विरोधी पक्ष के विचार को भी जगह दी जाए। पर होता रहा इसके ठीक उलट। 2005 में एक कार्यक्रम में एक विशेषज्ञ
ने भारत-अमेरिका परमाणु संधि का विरोध किया। उसके बाद उन्हें डीडी न्यूज में विशेषज्ञ के तौर पर बुलाना बंद कर दिया गया। एक
जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट ने सरकार को परेशान करने वाली कई सूचनाएं आरटीआई से निकालकर जनता तक पहुंचाई, लिहाजा वे
भी बैन हो गए। अब मोदी के कार्यकाल में क्या दूरदर्शन-प्रसार भारती का कायाकल्प होगा?
लेखक डीडी न्यूज में एंकर हैं।
asoka2022@gmail.com

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