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आप बेपनाह मोहब्बत में और डूबना चाहें तो “गौतम राजऋषि” को पढ़ें

गौतम राजऋषि
गौतम राजऋषि की किताब

रंग भर जाते हैं ख़ुशी के जिन्दगी में तमाम,जब भी लहराये वो तिरंगा,
नींद तकिये से करती है इश्क-ए- सुकूँ ,जब घेर के हमें “वर्दियाँ हरी” खड़ी हों ।

कहते हैं कि अगर आपको किसी से बेपनाह मोहब्बत हो तो “अमीर खुसरो”साहब को पढ़ें…मगर मेरा कहना है कि आप बेपनाह मोहब्बत में और डूबना चाहें तो “गौतम राजऋषि जी” को पढ़ें ,यकीनन आप प्रेम में गोते लगायेंगे और प्रेम एक नहीं कई परिपाटी का होगा…. उन्मुक्त प्रेम, कमसिन प्रेम,गलियों,चौराहों,छतों,बालकनी,मोबाइल,छज़्जों ,स्कूटी का,रसोई से बैठक तक,घर से दफ़्तर तक, और यही सितम क्या कम है कि हिज़्र की यादें भी डुबकियाँ मारती हैं ,,, सच्चा एक देशप्रेम जो हम सब के दिल में बसता है कहीं न कहीं,,।
साहित्यिक धरा पर प्रेम का ये रोग लाइलाज़ है…पर ऐसे रोग को हर इंसान पालना ही चाहेगा ….जी हाँ दोस्तों …इस रोग का नाम है ~”पाल ले इक रोग नादाँ”

गौतम राजऋषि साहित्य प्रेमियों के बीच किसी तार्रुफ़ के मोहताज़ नहीं बड़े-बड़े नामों ने इनकी शान में कशीदे किये हैं । भारतीय सेना में गौतम जी कर्नल रैंक पर पदस्थापित हैं । सेना के तमगों से मन भरा नहीं साहब का तो बंदूक और कलम के बीच गज़ब का तारतम्य ऐसा बनाया कि उनकी बंदूक से घायल होना है या उनकी गज़लों व कहानियों से घायल होना है ये तय स्वयं कर लें…… इस ” हरी मुस्कुराहटों वाले कोलाज” में तो फिट होना ही पड़ेगा “पाल ले इक रोग नादाँ” लेकर ।

“थोडे आँसू भी निकलते हैं हँसी के वास्ते
‘पाल ले इक रोग नादाँ’ ज़िंदगी के वास्ते”!

गौतम राजऋषि …तारीफ़ तो गद़र हमसे सुन ही ली आगे पढ़ भी लीजिये…

“जब से हरी वर्दी पहनी
ये दिल हिंदुस्तान हुआ”

जी हाँ दोस्तों… मैं मेरे हिस्से के गौतम जी से तार्रुफ़ कराती हूँ मेरी नज़र से….
जनाब को पहले ब्लौग में पढ़ा तब नहीं जानती थी कि किसी रोज़ करम होगा ख़ुदा का और आपसे मुलाकात होगी…वर्चुअल वाली । पंखे(फैन) तो हम तभी से थे… खुशी सिर पर मानो नाचने लगी जब इनके साथ रह कर ही इन्हें पढ़ना शुरू किया । कोई इंसान बिना कुछ कहे,सुने महज अपनी ‘साधारण सी दिखने वाली बेहद खास शख्सियत’ से जब एक दिल में एक फरिश़्ते की जगह इख़्तियार करता है तो हम उसे किसी भी हालात में सोचें भर और लब मुस्कुरा उठें …..मेरे लिये गौतम जी वही मासूम,पाक,खिली-खिली सी मुस्कुराहट हैं । इस फ़ौजी की डायरी पढ़ते हुये कहीं भीतर छिपा किशोर मन भी झाँकता दीखता है….न वो बच्चा है और न अभी युवा हुआ…जिसकी चाहतों और उदासियों भरी अपनी ही एक अलग नीली सी दुनिया है…..कभी छत और छज्जों की कनखियों से बातें करता युवा है और कहीं…रौबीला, गर्वीला मुस्तैद सिपाही….. obviously Deadly combination मने सोने पर सुहागा….सच्चा सिपाही और सच्चा कलमकार-सूरतगर ।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।~~दुष्यंत कुमार…….
जी हाँ दोस्तों “दुष्यंत जी” मेरे महबूब कवि हैं उन्हें मैं “बिजनौर का राजकुमार”ही कहती हूँ….और उनके बाद “गौतम जी सहरसा के राजकुमार”बन गये हैं ।
एक उलग सा उफ़ान मगर ठहरा हुआ,बदलाव की पछुआ हवायें,चिनारों की सी ऊँचाइयाँ और हरी वर्दी के हाथों में लहराते तिरंगे का उन्मत्त वीर शौर्य सा दीखता है इनकी लेखनी में । पढ़ते-पढ़ते तन देश की भीगी सी माटी और मन लडकपन लिये इक आम युवा सा हो जाता है ।
यूँ तो कर्नल साहब धरती के स्वर्ग की नियत्रंण-रेखा के रखवाले हैं पर लेखनी में कश्मीर से कन्याकुमारी तक लहराता वो आम सा जज़्बा है जो बस बहा ले जाता है…और उस बहाव में तैरते रहने को ही दिल हिचकोले लेता है ।
मेरा लेखक वो होता है सदा कि जिसको पढ़ते समय बस भूख बढ़ती जाये कुछ और पढ़ने की …और उसके एक एक शब्द में मैं खुद ही नज़र आने लगूँ ,,,हर भाव लिखा उसने हो और महसूस मुझे हो रहा हो..प्यार,विरह,खुशी,उदासी,देशभक्ति, बुलंद हौंसले,जरा सा गुस्सा, थोड़ा दर्द, कुछ तंज़ सियासती और बेपनाह हुनरमंद भरोसा खुद पर …..मेरे लेखक “गौतम” ऐसे ही हैं ।

आम सी बातों का जिक़्र जब छेड़ा किसी ने
गुमशुदा मैं मिल गई खुद को वहीं पर ऐ-प्रीत~~गौतम रोज़मर्रा की चुटपुट बातों में भी हिज़्र और विसाल बो देते हैं बड़ी सफाई से….

करवट बदलकर सो गया था ‘बिस्तरा’ फिर नींद में
बस आह भरती रह गई ‘प्याली’ अकेली चाय की ।
~~
इक गुनगुनी सी ‘सुब्ह’ शावर में नहा कर देर तक
बाहर जब आई,सुगबुगाकर धूप छत पर जग उठी ।
~~
उलझी हुई थी जब ‘रसोई’ सेंकने में रोटियाँ
सिगरेट के कश ले रही थी ‘बैठकी’औंधी पड़ी।
~~
सुब्ह के स्टोव पर चाय जब खौल उठी
ऊँघता बिस्तरा कुनमुना कर जगा ।
दोपहर सोफे पर थक के लुढ़की सी थी
न्यूज-पेपर था बिखरा हुआ आज का ।
यही नहीं… बहुत जगह पढ़ते में “गुलजार बाबा” याद हो आये…कुदरत के निज़ाम से छेड़खानी गौतम जी ने भी कम नहीं की है….और बाबा के चाँद को बा-हक चुरा भी लिया……
चाँद कमरे में सिगरेट पीता रहा ।
फ़र्श का सुर्ख़ कालीन क्यूँ हँस पड़ा ।
रात की सिलवटें नज़्म बुनने लगीं ।
~~
चाँद के माथे से टपकेगा पसीना रात भर आज
दे गयी है ऐसी धमकी गर्मियों की ये दुपहरी ।
ताश के पत्ते खुले दालान पर,अब ‘छुट्टियों’संग
खेलती है तीन पत्ती गर्मियों की ये दुपहरी ।
~~
चाँद उतर आया था मेरे छज्जे पर कल शाम ढ़ले
बात खुलेगी आज,सितारे जलने-भुनने वाले हैं ।

चाँदनी परेशां थी,खलबली थी तारों में,रात थी अजब कल की
बादलों की इक टोली गुनगुनाये जाती थी बारिशों के अफ़साने ।
उबासी लेते सूरज ने जो पहाड़ों से माँगी चाय
उमड़ते बादलों की केतली फिर खौलती उट्ठी ।
तपाया दोपहर ने जब समंदर को अंगीठी पर
उफनकर साहिलों से शाम की तब देगची उट्ठी ।

यही नहीं… कुछ शेर गजब के नास्टैल्जिया उछालते हैं….. बचपन हो या,बीती कयी बातें या फसाने मोहब्बत के बनते बिगड़ते….बहुत कुछ ज़ेहन के झूले पर …पींगें लेने लगता है…समकालीन शब्दों की मौलिकता और रस बरकरार रखते हुये…. “उड़न खटोला-गौतम”

उन होठों की बात न पूछो कैसे वो तरसाते हैं
इंग्लिश गाना गाते हैं और हिन्दी में शरमाते हैं ।
बिस्तर की सिलवट के क़िस्से सुनती हैं सूनी रातें
तन्हा तकिये को दरवाजे आहट से भरमाते हैं ।
घर -घर में तो आ पहुँचा है मोबाइल बेशक,लेकिन
बस्ती के कुछ छज्जे अब भी आईने चमकाते हैं ।

अटक के छज्जे पर चिढ़ा रही है मुँह गली को वो
मुँडेर से गिरी जो तेरी ओढ़नी अभी -अभी ।
मचलती लाल स्कूटी पर थी नीली-नीली साड़ी जो
है कर गयी सड़क को पूरी बैंगनी अभी-अभी ।
~~~
बजी घंटी,दुपट्टे खिलखिलाते क्लास से निकले
अचानक सूने से कॉलेज का गलियारा मचल उट्ठा ।

मेरा जादूगर लेखक जब अपने कार्मिक अवतार में आता तो कुछ यूँ लिखता है~~
हम आम लोगों के जीवन को फ़िजा कर देने वाला
अपने जीवन को ख़िज़ाँ बना लेता है हमारी मुस्कान के लिये~~ तुम पर और तुम्हारी संवेदनशीलता पर गर्व है ….हरियाली वर्दी

है लौट आया क़ाफ़िला जो सरहदों से फ़ौज का
तो कैसे हँस पड़ी उदास छावनी अभी-अभी ।
~~
घड़ी तुमको सुलाती है,घड़ी के साथ जगते हो
ज़रा -सी नींद क्या है चीज़ पूछो इक सिपाही से ।
~~
लिखती हैं क्या क़िस्से कलाई की खनकती चूड़ियाँ
जो सरहदों पर जाती हैं ,उन चिट्ठियों से पूछ लो ।
बिन बाप के होती हैं कैसे बेटियाँ इनकी बड़ी
दिन-रात इन मुस्तैद सीमा-प्रहरियों से पूछ लो ।
~~
ट्रेन ओझल हो गयी,इक हाथ हिलता रह गया
वक़्ते-रुख़्सत की उदासी चूड़ियों में आ गयी ।
अधखुली रक्खी रही यूँ ही वो नॉवल गोद में
उठ के पन्नों से कहानी सिसकियों में आ गई ।
रात ने यादों की माचिस से निकाली तीलियाँ
और इक सिगरेट सुलगी,उँगलियों में आ गई ।
~~
कितने झुरमुट कट गये बाँसों के,किसको है पता
इक सुरीली सी,मधुर सी बाँसुरी के वास्ते ।

सलाम…..कबूल करें~
यूँ उट्ठी यादों की पलटन दिल में आज अचानक से
थम-खाली-दो करते फ़ौजी जैसे निकलें बैरक से ।
बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शहर की “गौतम”
चलो,चल कर चखें अब धूल फिर रणभूमियों वाली ।…..(फर्ज़ पर वापसी की तुरही)

~~ समकालीन बिगड़ती व्यवस्था और सियासतदानों के दाँबपेंच से भी दो-दो हाथ…. ये ज़िगर इसी चौड़े सीने में झिलमिलाता खौलता दीखा……
~~~~~आतंकवाद से लड़ते शहीदों को समर्पित कुछ शेर~~
मिट गया इक नौजवाँ कल फिर वतन के वास्ते
चीख़ तक उट्ठी नहीं इक भी किसी अखबार में ।
मुट्ठियाँ भीचे हुये कितने दशक बीतेंगे और
क्या सुलगता है कोई मुद्दा कभी हथियार से ।
मूर्तियाँ बन रह गये वो चौक पर,चौराहे पर
खींच लाये थे जो किश्ती मुल्क की मँझधार से ।
बैठता हूँ जब भी “गौतम”दुश्मनों की घात में
रात भर आव़ाज देता है कोई उस पार से ।

हालातों और व्यवस्थाओं की रेतीली किरकिरी आँख में~~~
काँपती रहती हैं कोहरे में ठिठुरती झुग्गियाँ
धूप महलों में ना जाने कब से है अटकी हुई ।
हुक्मरानों से कभी रौशन था अपना मुल्क ये
छोड़िये उस बात को वो बात अब कल की हुई।
करवटें साँप लेते हैं अंदर
और ऊपर से संदली बातें ।
उनके ही हाथों से देखो बिक रहा हिन्दोस्ताँ
है पहन रखा जिन्होंने तन पे खद्दर गौर कर।
आस्माँ तक जा चढ़ा सेंसेक्स अपने देश का
चीथड़े हैं अब भी कितनों के बदन पर गौर कर ।
हर फैसला टलता गया
जब जब दिवस निश्चित हुआ ।
प्रस्ताव अनुमोदित हुआ
अब मामला लंबित हुआ ।
~~
मसीहा बना फिरता था जो इक हुक्मराँ अपना
मुखौटा हट गया तो क़ातिलों का सरगन निकला ।
~~
कब पिटारी से निकल दिल्ली गये विषधर
ये सियासत की बहस अब है सपेरों में ।
~~
पूछे तो कोई जाकर ये कुनबों के सरदारों से
हासिल क्या होता है आख़िर जलसों से या नारों से ।
रोज़ाना ही ख़ून-ख़राबा पढ़कर ऐसा हाल हुआ
सहमी रहती मेरी बस्ती सुब्हों के अख़बारों से ।
पैर बचाये चलते हो जिस गीली मिट्टी से साहिब
कितनी ख़ुशबू होती है इसमें पूछो तो कुम्हारों से ।
इल्ज़ाम संभल कर लगाना जरा
उसने खद्दर पहना साहिब ।

ये Attitude….हमेशा बरकरार रहे~~~
🌾हैं म़गरूर वो गर तो हम हैं मिज़ाजी
भला ऐसे में कौन किसको मनाये ।
बहुत है नाज़ रुतबे पर उन्हें अपने ,,चलो माना
कहाँ हम भी किसी मग़रूर का अहसान लेते हैं ।

एक गौतम बदलाव की बयार चलाते हुये भी…और आशावादी पौध लगाते …पानी से पारदर्शी …हो कर इक मशाल जलाते हैं….

🌾‘यूँ ही चलता है’ये कह कर कब तलक सहते रहें
कुछ नये रस्ते, नयी कुछ कोशिशों की बात हो ।
दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्ह खड़ी है आने को
धुँध हटेगी , धूप खिलेगी, वक़्त नया है छाने को ।
चलो ,चलते रहो,पहचान रुकने से नहीं बनती
बहे दरिया तो पानी पत्थरों पर नाम लिखता है ।
बड़े हो तुम कि तुम तो चाँदनी से घर सजाते हो
हमारी झुग्गियों में चाँद भी छन छन के चुभता है ।
पल भर का इतराना है काले बादलों का देखना
निकलेगा सूरज चीर कर बाहर,भले कुछ देर से ।
परबतों से जो गले लग के हँसा इक बादल
बूढ़े दरिया को मिली फिर से जवानी उसकी ।
~~
कोई जवाब तो सूरज के जुल्म का भी हो
मैं बारिशों की जो ठंडी फुहार हो जाऊँ ।

इक मुस्तैद के भीतर भी इक मासूम सा दिल छिपा होता है जो रिश्तों पर जान छिड़कता है,प्यार भी करता है,नटखट बालक सी चुहलबाजी भी,विरह और रिजेक्शन से दर्द लिये कराहता भी है और…..फिर जिंदगी की सिम्फनी में…मुस्कुरा के जिंदगी का शुक्रिया भी करता है~~~
🌾झीने से लगने लगे हैं घर के उसे सब पर्दे
बेटियाँ होने लगीं जब से सयानी उसकी ।
घर ये सारा ही महक उट्ठे है ख़ुशबू ख़ुशबू
जब भी चिट्ठी मैं पढूँ कोई पुरानी उसकी ।
~~
महके सारा घर जब माँ
बैठे माला जपने को ।
आँखों से कह डाला सब
और रहा क्या कहने को ।
सुलग उट्ठी है यादों की लपट माज़ी से टकरा कर
रगड़ खाते ही जल उठती है तीली जैसे माचिस की ।
लब थे ख़ामोश फिर भी होती रहीं
शोख़ आँखों से मनचली बातें ।
अब न चौबारों पे वो गप्पें ठहाके हैं
गुम पडौसी हो गये ऊँची मुंडेरों में ।
भीड़ में गुम हो गये सब आपसी रिश्ते
हर बशर अब कैद है अपने ही घेरों में ।
कितने दिन बीते कि हूँ मुस्तैड सरहद पर इधर
बाट जोहे है उधर माँ पिछले ही त्यौहारों से ।
पूरे घर को महकाता है
माँ का माला जपना साहिब।
झगड़ा है कैसा आख़िर,जब
दिल्ली-सा लाहौर बना है ।
घर आया है फ़ौजी जब से थमी है गोली सीमा पर
देर तलक अब छत के ऊपर सोती तान मसहरी धूप

ठहराव भरे दिल में जब मुडकियाँ आने लगती हैं तो…ज्वार-भाटे उठना जरा लाज़मी ही है~~

कैसे कैसे ख़्वाब दिखाये
इक चेहरे का दिखना साहिब
कायनात सारी ठहरा दे
उस आँचल का ढ़लना साहिब ।
तेरी गोरी रंगत से तपती दुनिया को छाँव मिली
पलकों की कोरों पर तू ने जब काजल का नाम लिखा ।
भरी-भरी निगाह से ये देखना तेरा हमें
नसों में जैसे धीमे-धीमे बज रहा गिटार है ।
जब तौलिये से कसमसाकर ज़ुल्फ़ उसकी खुल गई
फिर बालकोनी में हमारे झूमकर। बारिश गिरी ।
‘येल्लो पोल्का डॉट’दुपट्टा तेरा उड़े
तो मौसम भी चितकबरा हो जाता है ।
शोख़ आँखों से संभाला न गया
राज़ सब खुल गये आखिर मेरे
रात बाक़ी है,न जा उठकर यूँ
आ इधर ! सीने पे आ ,गर मेरे ।
कोई बंदगी है कि दीवानगी ये
मैं बुत बन के देखूँ,वो जब मुस्कुराये ।
बस इक उँगली छुई थी चाय की प्याली पकडते वक़्त
ना जाने क्यूँ समूचे ज़िस्म का पारा मचल उट्ठा ।
~~
हाय करिश्मा चाहत का ये रोम रोम पाज़ेब हुआ
थाप मिलाता लहू नसों में है धड़कन के कत्थक से ।

और जब मेरे दिलनवाज़ शायर का रंगीन मौसम उदास होने लगता है तब…वो कसक मुझे भी महसूस होती है ~~

रतजगे,बेचैनियाँ, आवारगी और बेबसी
इश़्क ने क्या क्या चुना है पेशगी के वास्ते ।
अहमियत सन्नाटे की क्या है बगैर आव़ाज के
अब करो कुछ शोर यारों ख़ामुशी के वास्ते ।
~~
न मंदिर की ही घंटी से ,न मस्जिद की अज़ानों से
करे जो इश़्क, वो समझे जगत का सार चुटकी में ।
इसे पढ़ते में गालिब़ भी अंकित हो आये ~~
हुआ अब इश़्क ये आसान बस इतना समझ लीजे
कोई हो आग का दरिया,वो होवे पार चुटकी में ।

इक तन्हा तकिये पर आँखें मलता है एक सवेरा
मीलों दछर कहीं छत पर इक सूनी शाम टहलती है ।
बर्फ़ की चादर ओढ़े परबत कब से हैं चुपचाप खड़े
याद तुम्हारी अक्सर इन पर बनकर धूप पिघलती है ।

एक सिगरेट-सी दिल में सुलगी कसक
अधजली,अधबुझी,अधफुकी?हाँ वही !
आईनों पर आज जमी है काई,लिख
झूठे सपनों की सारी सच्चाई लिख ।
किसकी यादों की बारिश में धुल धुलकर
भीगी भीगी अब के है तन्हाई लिख ।

दोस्तों दिल मान ही नहीं रहा कि कुछ काटूँ,छाँटूँ…..।
सच कहूँ तो …सिंह साहब ने गज़ल को सुनने वालों के लिये आसान और रोचक बना दिया था….वैसे ही गौतम जी ने…हमारी निहायत ही आम सी भाषा को गजल की शक्ल में ऐसा ढाला है कि …किसी भी पेज पर,किसी भी पंक्ति और शब्द में हम खुद को ढूँढ ही लेते हैं… कि अरे ये तो बिलकुल मेरे टाइप की बात है … कहना अतिश्योक्ति न होगी कि….. गौतम जी ने इतना आसान कर दिया है कि…. “गजलऋषि”कह दिया जाये उन्हें ।हर पन्ना एक बार में पढकर जे़हन में छप जाता है ,याद रह जाये किसी” फ़नकार का शाहकार”….ये वो दस्ताव़ेज़ है ।
मेरा मन भी बाबले बच्चे सा हो गया था एक गज़ल के शेरों को पढ़कर…
🌾दिन की रंगत ख़ैर गुज़र जाती है बिन तेरे,लेकिन
कत्थई कत्थई रातों का हर मंज़र नीला नीला है
हुस्न भला हो रौशन तेरा लाल-गुलाबी रंग लिये
इश़्क का तेरे परतौ लेकिन दिल पर नीला नीला है….

🌷तेरी नीली चुनरी ने क्या हाल किया बागीचे का
नारंगी फूलों वाला गुलमोहर नीला नीला है ।🌷

निहाल हूँ अपने इस अदब़ के शायर पर…सम्मान से भरी प्रीत और पावन हो जाती है जब “गजलऋषि” मुझे अपना “शुभाशीष”बहुत स्नेह के साथ मर्यादा की चुनर में लपेट कर देते हैं…..
मेरे लेखक ….ने जिंदगी को शुकरान कर कह दिया….
मौत पर किसलिए रोयें हम
जिन्द़गी अच्छी ख़ासी रही ।
साथ ही रगों का खून गर्व से उबल उठा जब गौतम जी ने “मेजर संदीप उन्नीकृष्णन”के लिये कहा….

चिता की अग्नि ने बढ़कर छुआ था आसमाँ को जब
धुयें ने दी सलामी,पर तिरंगा अनमना निकला ।

आप से बहुत से होते हैं होते रहेंगे…मगर आप अपने आप में बिलकुल अलहदा हो….क्योंकि बहुत विरले होते हैं जिनका हाथ…सिर पर महसूसना…महफ़ूज होने सा लगता है ~~मुस्कुराहट मेरी कायम रहेगी आप के नाम से ही…और देश की धड़कनें भी,कलम की रौशनी भी~~~

“हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश़्क बोते हैं
हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं ।”

(सदा आपको पढ़ते रहने की दुआओं और शुभकामनाओं के साथ….प्रीति राघव,गुड़गांव, हरियाणा)

पुस्तक का नाम~ पाल ले इक रोग नादाँ
लेखक ~ गौतम राजऋषि
मूल्य ~ ₹१०० मात्र
प्रकाशक ~ हिन्द – युग्म

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