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मृत्यु अंत नहीं है जीवन का, इट इज अनअदर गेट ऑफ अनअदर लाइफः गोपालदास नीरज

गोपालदास नीरज
गोपालदास नीरज अब स्मृतियों में शेष हैं। वो किसी परिचय के मोहताज नहीं। वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह कहते हैं कि वो रोमांस, प्रेरणा और अदम्य विद्रोह के गीतकार थे। शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, अबकी सावन में शरारत मेरे साथ हुई के रचयिता नीरज जी का कल एम्स दिल्ली में 93 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 
मिरर श्रद्धांजलि स्वरूप उनका ये साक्षात्कार आपके लिए प्रस्तुत कर रहा है। उल्लेखनीय है ये साक्षात्कार देवेश वशिष्ठ खबरी ने साहित्य शिल्पी के लिए किया था।
गोपालदास नीरज
गोपालदास नीरज और देवआनंद

नीरज जी, कुछ लोगों ने आपको हिंदी का अश्वघोष कहा,दिनकर ने हिंदी की वीणा कहा। भाषाभाषियों ने संत कवि माना तो कुछ ने आपको मृत्युवादी-निराशावादी माना। स्वयं को कैसे परिभाषित करते हैं आप? 

देखिए, मैं तो शुद्ध कविता लिखता हूं। शुद्ध कविता में जीवन के बहुत से आयाम आते हैं। कहीं आशा है तो वहीं निराशा भी है, जीवन है तो मृत्यु भी है, कहीं जय है तो कहीं पराजय भी है, कहीं सुख है तो कहीं दुख भी है, संसार का रूप ही द्वंद्वात्मक है। अंधकार के बाद प्रकाश है और प्रकाश के बाद अंधकार।
क्या है- आध्यात्मिकता?  भौतिकता, समन्वय- असमन्वय कहीं! लेकिन मैंने जीवन के सभी पक्षों को उजागर किया है। इसमें निराशा भी आती है, आशा भी आती है, संलिप्तता भी आती है, भोगवाद भी आता है, योगवाद भी आता है। मैंने जीवन को उसकी संपूर्णता में जीया है, इसलिए बहुत सी मेरी कविता में आपको विरोध भी मिलेगा लेकिन साथ-साथ समन्वय है उनमें।
शेक्सपियर से एक बार किसी ने पूछा कि आप ट्रेजडी के साथ कॉमेडी क्यों लिखते हैं? तो उन्होंने कहा- आई वांट टू होल्ड मिरर अप टू दी नेचर। मैं प्रकृति के सामने दर्पण लेकर खड़ा हूं, उसमें ट्रेजडी भी है और कॉमेडी भी.
नीरज में छिपे गीतकार को थोड़ी देर भुला दिया जाय तो नीरज क्या हैं?
मेरा तो अस्तित्व ही कवितामय है। बचपन से ही इसको मैंने अपनी साधना माना है, तप माना है, तपस्या माना है। इसी को मैंने अपना संपूर्ण जीवन दे दिया है, इसलिए कवि के अतिरिक्त मेरा और कोई स्वरूप याद नहीं किया जाएगा।
मेरा तो अस्तित्व ही कवितामय है। बचपन से ही इसको मैंने अपनी साधना माना है, तप माना है, तपस्या माना है। इसी को मैंने अपना संपूर्ण जीवन दे दिया है, इसलिए कवि के अतिरिक्त मेरा और कोई स्वरूप याद नहीं किया जाएगा। हालांकि मैंने ज्योतिष में भी बहुत अध्ययन किया है, लेकिन ज्योतिषी के रूप में मुझे याद नहीं किया जाएगा। मुझे सिर्फ और सिर्फ एक कवि के रूप में याद किया जाएगा।
युवा नीरज और अनुभवी नीरज में क्या फर्क महसूस करते हैं?
यौवन में जो ऊर्जा होती है, जो भावनाएं होती हैं वही सृजन में प्रयुक्त होती हैं। जैसे जैसे आदमी बूढ़ा होता है वैसे वैसे सृजन की शक्ति भी कम होती चली जाती है। कविताएं बहुत कम लिख पाता हूं अब, पहले एक महीने में 60-70 कविताएं लिखता था। 70 के दशक के बाद कविता लिखना कम हो गया, फिर दोहे लिखने लगा, मुक्तक लिखना शुरू कर दिये, हाईकू लिखना शुरू कर दिये, छोटी कविताएं लिखने लगा। जैसे जैसे वृद्धावस्था आती है ऊर्जा कम हो जाती है, और याद रखियेगा- ऊर्जा ही सृजन की शक्ति होती है।
तब तो मैं था ही युवाओं के लिए लेकिन आज भी मेरे चाहने वाले लाखों करोड़ों में हैं। जितना मैं छपता हूं अपनी पीढ़ी में उतना कोई नहीं छपता। पांच-छ: प्रकाशक लगातार मेरी रचनाएं छाप रहे हैं, लोग कहते हैं कि कविताओं की पुस्तकें छपती नहीं हैं आजकल, लेकिन मेरी कविताओं के 25-25 संस्करण छप चुके हैं. हर साल एक नया संस्करण आ जाता है। मैं आज भी पढ़ा जा रहा हूं और सुना भी जा रहा हूं। 67 साल हो गये मंच पर, आज भी लोकप्रियता कायम है।
आपकी कौन सी पुस्तक सबसे ज्यादा अपील करती है?
हाल में ही मेरी सभी रचनाओं का तीन खंडो में संग्रह निकला है- नीरज रचनावली, लेकिन हृदय के सबसे करीब दो पुस्तकें हैं- प्राणगीत और दर्द दिया है। इसमें मेरे यौवनकाल की कविता हैं।
कोई दूसरा कवि जिसकी रचनाओं ने प्रभावित किया?
मुझे सबसे ज्यादा टैगोर पसंद हैं। टैगोर में उदात्तीकरण तत्व है जो बहुत कम कवियों में मिल पाता है। जीवन भर वो कवि बने रहे और इसलिए बने रहे कि वो विषय बदलते रहे। अगर आप एक ही बात को पकड़ कर बैठ जाएंगे तो उस बात के लिए निष्ठुर हो जाएंगे। टैगोर के अलावा खलील जिब्रान, जिन्होंने धार्मिक आडम्बर के खिलाफ बहुत कुछ लिखा और इसी वजह से उन्हें लेबनान से निकाला गया. हालांकि बाद में उन्हें पैगम्बर समझा गया।
मुझे भी हमेशा विवादास्पद माना गया, कोई मुझे निराशावादी समझता है, कोई भोगवादी को कोई सुरावादी. मैंने लिखा-
हम तो इतने बदनाम हुए इस जमाने में
यारो सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में..
जो विवादास्पद होता है वही लोकप्रिय होता है.
कोई कवि या किताब जिसे आप नापसंद करेंगे, जो उतनी शोहरत के काबिल नहीं हैं जितनी उन्हें मिली? 
साहित्य के पतनशील युग में हम जी रहे हैं. आज हर आदमी अर्थ के पीछे भाग रहा है। पेट की भूख के बाद हृदय की भूख लगती है। जिसे घृणास्पद शब्द के तौर पर सैक्स कहा जाता है, हमारे यहां इसे काम कहा गया है। काम एक सृजन शक्ति है।…। ये कविताएं मेरा सृजन हैं- मेरे बच्चे हैं सब.
आजकल तो अधिकांश कवि ऐसे ही हैं। मंच पर बहुत से गीतकार ऐसे ही हैं. अध्ययन नहीं है इनके पास। जीवन के बारे में अध्ययन नहीं है, साहित्य का कोई गहन अध्ययन नहीं है इनके पास, न देशज साहित्य का और न ही विदेशी साहित्य का। न भारतीय मूल्यों का और न ही भारतीय संस्कृति का अध्ययन है। बस बाजार है जो चला जा रहा है। साहित्य के पतनशील युग में हम जी रहे हैं. आज हर आदमी अर्थ के पीछे भाग रहा है। पेट की भूख के बाद हृदय की भूख लगती है। जिसे घृणास्पद शब्द के तौर पर सैक्स कहा जाता है, हमारे यहां इसे काम कहा गया है। काम एक सृजन शक्ति है।…। ये कविताएं मेरा सृजन हैं- मेरे बच्चे हैं सब। (हंसते हुए) मैंने बच्चे इतने पैदा कर लिए हैं कि अब शक्ति नहीं बची पैदा करने की।
आजकल के कवियों ने सृजन को धन से जोड़ लिया है. वो पैसे के पीछे भाग रहे हैं. सस्ती लोकप्रियता के पीछे भाग रहे हैं। 
गीतों की किस्मत में एक दिन ऐसा भी दिन आना था.
उतना ही वो महंगा था, जो जितना ज्यादा सस्ता था.
हिंदी कविता और गीतों के मंच पर कितना बदलाव आया है? हास्य व्यंग्य के बारे में क्या कहेंगे?
हास्य व्यंग्य बहुत बड़ी चीज है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता हास्य व्यंग्य है। जैसे-जैसे समाज में विद्रूपताएं आती हैं, भ्रष्टाचार आता है. खाईयां बड़ी-बड़ी होने लगती हैं, तब हास्य व्यंग्य लिखा जाता है। हास्य व्यंग्य का मतलब-हम कुरेद रहे हैं आपको, लेकिन आपको ठीक करने के लिए कुरेद रहे हैं, लेकिन आज हास्य व्यंग्य के नाम पर चुटकुले मिमिक्री या अभिनय ही देखने को मिलता है।
आप जिस हास्य व्यंग्य की बात कर रहे हैं, वो किस पीढ़ी के कवियों तक बचा हुआ था ?
हास्य व्यंग्य के बहुत से कवि हैं – सुरेन्द्र शर्मा हैं, माणिक वर्मा हैं, सुरेश उपाध्याय हैं। ये सब अच्छे हास्य कवि हैं। हास्य के साथ आध्यात्मिक हैं। होशंगाबाद के सुरेश उपाध्याय को अब लोग नहीं जानते, नगण्य से हो गये हैं लेकिन मंच से आरंभ उन्हीं ने किया था। ओम प्रकाश आदित्य और अशोक चक्रधर भी अच्छा हास्य लिखते हैं।
कोई किताब जिसे पढ़ने की ख्वाहिश हमेशा रही पर अभी तक नहीं पढ़ पाए? 
पढ़ा तो बहुत कुछ; जीजस को पढ़ा, कुरान पढ़ी, गीता पढ़ी…पर पूरी कोई नहीं पढ़ पाया. लेकिन अगर आपने गीता का दूसरा अध्याय पढ़ लिया, और समझ लिया तो समझो सब पढ़ लिया।
कोई लक्ष्य जो अभी बचा है? 
कविताई।…। इस जन्म में जो लिख सका लिख ली, अब अगले जन्म में लिखूंगा।
यानि अगले जन्म में भी कवि बनना चाहते हैं? 
बेशक! मैं तो चाहता हूं, मृत्यु अंत नहीं है जीवन का। इट इज अनअदर गेट ऑफ अनअदर लाइफ। इस दरवाजे में आप जो इच्छा लेकर जाओगे वैसा ही निकलोगे, ऐसा मेरा मानना है। लाओत्से था, दार्शनिक था- बूढ़ा ही पैदा हुआ वो। जुरथ्रुस्ट था ईरान का, हंसता हुआ पैदा हुआ वो। दिनकर जी की बड़ी सुंदर पंक्तियां हैं-
बड़ा वो आदमी जो जिंदगी भर काम करता है।
बड़ी वो रूह जो तन से बिना रोए निकलती है।
मैं यही चाहता हूं कि कविता करते करते इस तन से प्राण निकल जाएं।
आपने भावप्रधान प्रेमगीत लिखे. प्रेम को कैसे परिभाषित करेंगे?
प्रेम के कई पायदान हैं, पहले तो शारीरिक आकर्षण भाव पैदा करते हैं। शरीर से ऊपर उठकर जब वो मन तक पहुंचता है तो वो प्रेम बनता है। प्रेम से ऊपरी दशा भक्ति की होती है, लेकिन भक्ति में भी आदान-प्रदान रहता है. उसके ऊपर सिर्फ आनंद रह जाता है। काम ऊर्ध्वगामी होता है तो आनंद में परिवर्तित हो जाता है, और आखिरकार व्यक्ति प्रेम विश्वप्रेम में परिवर्तित हो जाता है। अपने बारे में कहूं तो-
किन्तु पूछा गया नाम जब प्रेम से
खोजता ही फिरा किन्तु
मिल सका न तेरा ठिकाना कहीं.
ध्यान से बात की तो कहा बुद्धि ने
सत्य तो है मगर आजमाना नहीं.
आपकी सबसे पसंदीदा रचना-
एक दोहा मुझे बहुत पसंद है:
आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य।
मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।
पिछले जन्म का कोई पुण्य था जिसने मुझे कवि बना दिया। इन द बिगनिंग वाज वर्ड एंड वर्ड वाज थॉट. सृष्टि विचारों से बनती है…और कवि विचार सृजन करता है। जब किसी विचार में स्वयं को डुबो दिया जाता है, खो जाया जाता है, तब कविता का जन्म होता है।
पिछले जन्म का कोई पुण्य था जिसने मुझे कवि बना दिया। इन द बिगनिंग वाज वर्ड एंड वर्ड वाज थॉट। सृष्टि विचारों से बनती है…और कवि विचार सृजन करता है। जब किसी विचार में स्वयं को डुबो दिया जाता है, खो जाया जाता है, तब कविता का जन्म होता है। जब मैं कविता लिखता हूं, तब न हिंदू होता हूं, न मुसलमान होता हूं. सिर्फ शुद्ध-बुद्ध चैतन्य होता हूं। कविता ऐसे ही लिखी जा सकती है।
आपने कई युग देखे हैं, साहित्य के भी और वक्त के भी, लेकिन अभी जो अलगाववाद फैल रहा है उसके बारे में क्या कहेंगे?
राजनीति देश पर शासन करती है, ढ़ांचा तैयार कर सकती है, वो शरीर बनाती है देश का।  लेकिन कोई भी शरीर बिना आत्मा के जड़ और निष्ठुर ही होता है। आत्मा का निर्माण तब होगा जब साहित्य का ज्ञान और राजनीति का समन्वय होगा।
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