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हम पत्रकार हैं, केवल महिला पत्रकार नहीं

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हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ एक मुलाकात के लिए इंडिया इंटरनैशनल सैंटर में आयोजित अत्यंत गोपनीय कार्यक्रम में 50 से अधिक  महिला पत्रकारों को आमंत्रित किया गया। कांग्रेस को गोपनीयता पसंद है और हैरानी की बात है कि महिला पत्रकारों को भी यह पसंद है।

अब विवाद इस बात को लेकर है कि किसे आमंत्रित किया गया और किसे नहीं तथा किसने इस चुनिंदा बातचीत को आयोजित करने में सहायता की। क्या यह इंडियन वूमैन्स प्रैस कॉप्र्स (आई.डब्ल्यू.पी.सी.)थी? यदि ऐसा था तो क्यों नहीं इसका आयोजन संगठन के कार्यालय में किया गया और सभी सदस्यों के लिए इसे खुला रखा गया? क्यों केवल कुछ सदस्यों को आमंत्रित किया गया बाकियों को नहीं। किस आधार पर सूची तैयार की गई थी?

क्या इसका आयोजन कांग्रेस ने किया था? मगर कांग्रेस भी इसका श्रेय नहीं ले रही। पता चला है कि यह कार्यक्रम कांग्रेस द्वारा नहीं बल्कि आईडब्ल्यूपीसी द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें संगठन की अध्यक्ष तथा कुछ अन्य पदाधिकारियों ने हिस्सा नहीं लिया। तो इसे आई.डब्ल्यू.पी.सी. का समारोह कैसे कहा जा सकता है, जब इसमें संगठन का ही प्रतिनिधित्व नहीं था। स्वाभाविक है कि खुद मुझे आमंत्रित नहीं किया गया था इसलिए मैं नहीं कह सकती कि यह प्रयास कैसा रहा। मगर दुर्भाग्य से कांग्रेस की तरह ‘मुस्लिम विद्वान’ तथा ‘महिला पत्रकार’ जैसी बातें कभी भी मेरी पसंद नहीं रहीं।

हम जैसे बहुत से पत्रकारों ने अपने करियर के प्रारम्भिक दिन यह पहचान पाने के लिए संघर्ष में बिताए हैं कि हम पत्रकार हैं न कि महिला पत्रकार। हमने सम्पादकों से लड़ाई की है जो हमें ‘महिला’ समारोहों को कवर करने के लिए भेजकर छोटे से कोने में धकेलना चाहते थे। हम जोर देकर कहती थीं कि हम भी पुरुषों जैसा काम कर सकती हैं- झगड़े, अपराध अथवा हत्याओं जैसी वही असाइनमैंट्स क्योंकि हम पत्रकार थीं न कि महिलाएं। लड़ाई बहुत प्रचंड और कठिन थी तथा उस समय असम्भव थी मगर हमें अपना रास्ता मिला और हमने एक ऐसा स्थान बनाया जहां हमें अपने काम के लिए सम्मान मिलता था। अच्छी या बुरी, हमें बराबर समझा जाता था।

मुझे याद है एक समाचार पत्र में काम करने के दौरान कुछ नए नौसिखियों को टेबल पर लाया गया। कुछ समय बाद ही हमारे समाचार सम्पादक रिपोर्टर्स सैक्शन में आए। वह वास्तव में दुखी तथा परेशान लग रहे थे। वह बोले-मैं क्या करूं? एक महिला कहती है कि वह समाचार पत्र को मशीन पर चढ़ाए जाने तक (तड़के 2 बजे) नहीं रुक सकती, दूसरी कहती है कि अंधेरा होने के बाद वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं ले सकती। कहने की जरूरत नहीं कि उन्हें जाने के लिए कह दिया गया, जो एक ऐसा कदम था जिसका हम सभी ने समर्थन किया, जिन्हें यह आश्वासन दिया गया था कि ऐसी सीमाओं को लेकर हमारे काम के साथ समझौता नहीं किया जाएगा।

इसलिए जब द इंडियन वूमैन्स प्रैस कॉप्र्स अस्तित्व में आई तो मैंने कई वर्षों तक उसे ज्वाइन नहीं किया। हमें लिंग के आधार पर एक अलग संगठन की जरूरत क्यों थी, जबकि हम सभी पत्रकार थीं? हम सभी एक जैसी स्टोरीज उसी जोश तथा ईमानदारी व हिम्मत के साथ कवर करती हैं तो हम कैसे खुद को महिला पत्रकार के तौर पर अलग न्यायोचित ठहरा सकती हैं? जब गौरी लंकेश की हत्या हुई तो सभी पत्रकारों को साथ होना पड़ा। निश्चित तौर पर उनकी हत्या महिलाओं का मुद्दा नहीं थी। जब शुजात बुखारी को मारा गया तो निश्चित तौर पर वह केवल पुरुष पत्रकारों का मुद्दा नहीं थे। क्यों महिला पत्रकारों को अलगाववाद सहना पड़े जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

क्या दुष्कर्म केवल महिलाओं का मुद्दा है? मैं इस तर्क को स्वीकार नहीं कर सकती कि ‘महिलाएं अधिक संवेदनशील हैं’ और जैसे पुरुष नहीं हैं और इसलिए उन्हें कोई अन्य काम ढूंढ लेना चाहिए। मैंने इस व्यवसाय में कई वर्षों के दौरान अपने सहयोगियों (पुरुष तथा महिलाएं) को देखा है जो ऐसे मुद्दों पर रिपोॄटग के मामले में एक जैसा अच्छा काम करते हैं।
राहुल गांधी का महिला पत्रकारों से मिलना सम्भवत: एक आकर्षक कार्य हो सकता है मगर एक ऐसा समय भी होगा जब अलगाव पैदा करने के किसी भी ऐसे प्रयास का खुद पत्रकार विरोध करेंगे। यह बहुत दुख की बात है कि एक बड़े भाईचारे और एक विशिष्ट क्लब का हिस्सा बनने की बजाय हम अपनी इच्छा से ऐसा होने दे रहे हैं।

—सीमा मुस्तफा पत्रकार दिल्ली

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