Home > नई किताब/फ़िल्म > प्रसिद्ध पत्रकार करण थापर की किताब ‘डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी के अंश

प्रसिद्ध पत्रकार करण थापर की किताब ‘डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी के अंश

'डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी

प्रसिद्ध टीवी पत्रकार करण थापर की किताब  ‘डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी प्रकाशित हो गई है। चूंकि करण थापर अद्भुत व्यक्तित्व हैं और भारत के श्रेष्ठ पत्रकारों में से एक हैं। ऐसे में उनकी ये किताब बहुत ही महत्वपूर्ण होगी। ये किताब जरूर पठनीय होगी। 

फिलहाल बीबीसी के रेहान फजल जी ने किताब को लेकर करण थापर से लम्बी बातचीत की। यही बातचीत बीबीसी हिंदी से साभार मिरर अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहा है। 

ऐसा बहुत कम होता है कि दुनिया के दो मशहूर विश्वविद्यालयों की यूनियन के अध्यक्ष भारतीय उप-महाद्वीप से हों वो भी एक साथ और उनमें से एक भारतीय हो और दूसरा पाकिस्तानी.

ऐसा विचित्र संयोग 1977 में हुआ था, जब बाद में मशहूर पत्रकार बने करन थापर कैंब्रिज यूनियन सोसाएटी के अध्यक्ष बने. उसी समय बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनी बेनजीर भुट्टो भी ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय यूनियन में इसी पद के लिए चुनी गई थीं.

इन दोनों के बीच पहली मुलाक़ात इससे कुछ महीने पहले हुई थी जब बेनज़ीर ऑक्सफ़र्ड यूनियन की कोषाध्यक्ष और करन कैंब्रिज यूनियन के उपाध्यक्ष हुआ करते थे.

करन बताते हैं, “मुझे वो दिन अभी भी याद है जब बेनज़ीर कैंब्रिज आई थीं और उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि क्यों न इस विषय पर डिबेट कराया जाए कि ‘शादी से पहले सेक्स’ करने में कोई बुराई नहीं है.”

किसी भी महिला के लिए जो पाकिस्तान की राजनीति में कुछ कर गुज़रने की महत्वाकांक्षा रखती हो, ये एक बहुत ‘बोल्ड’ विषय था.

करन कहते हैं, “जब इस पर पहली बार बात हुई तो मैंने बैठक में ही बेनज़ीर की तफ़रीह लेने के इरादे से कहा कि मैडम जो आप कह रही हैं, उसका आप अपनी निजी ज़िंदगी में पालन करने की हिम्मत रखती हैं?”

ये सुनते ही वहाँ मौजूद लोगों ने ज़ोर का ठहाका लगाया और तालियाँ बजानी शुरू कर दीं.

करन ने कहा, “बेनज़ीर ने तालियों के रुकने का इंतज़ार किया. अपने चेहरे से चश्मा उतारा. अपनी नाक चढ़ाई और मेरी आँखों में आँखें डालकर बोलीं, ज़रूर, लेकिन आपके साथ नहीं.”

बेनज़ीर भुट्टोइमेज कॉपीरइटAFP
Image captionबेनज़ीर भुट्टो

आइसक्रीम की शौकीन बेनज़ीर भुट्टो

ईस्टर की छुट्टियों में करन के पास बेनज़ीर का फ़ोन आया. उस वक़्त दोनों ही यूनियन के अध्यक्ष थे. वो बोलीं, “क्या मैं अपनी दोस्त अलीसिया के साथ कुछ दिनों के लिए कैंब्रिज आ सकती हूँ?”

उस समय तक कैंब्रिज के हॉस्टल में रहने वाले अधिकांश छात्र अपने घर जा चुके थे. बेनज़ीर को ठहराने की कोई समस्या नहीं थी. इसलिए करन ने हाँ कह दी.

करन याद करते हैं, “कैंब्रिज में अपने प्रवास के आख़िरी दिन बेनज़ीर ने हम सब के लिए अपने हाथों से खाना बनाया था. और क्या स्वादिष्ट खाना था वो! कॉफ़ी पीने के बाद अचानक बेनज़ीर ने कहा था चलो आइसक्रीम खाने चलते हैं. हम सब लोग उनकी बहुत ही छोटी एमजी कार में किसी तरह समाए. हम समझे कि हम आइसक्रीम खाने कैंब्रिज जा रहे हैं लेकिन स्टेयरिंग व्हील संभाले बेनज़ीर ने गाड़ी लंदन की तरफ़ मोड़ दी. वहाँ हम सबने बैस्किन-रोबिंस की आइसक्रीम खाई. हम 10 बजे रात में चले थे और डेढ़ बजे रात को कैंब्रिज वापस लौटे.”

करन कहते हैं, “अगली सुबह ऑक्सफ़ोर्ड लौटने से पहले उन्होंने मुझे 45 आरपीएम का एक रिकार्ड भेंट किया, जिसमें एक गाना था, ‘यू आर मोर देन ए नंबर इन माई लिटिल रेड बुक.’ वो हँसते हुए बोलीं, मुझे पता है कि तुम हर जगह इसका ढिंढोरा पीटोगे, लेकिन अगर तुम ऐसा करते हो तो मैं अपने दिल में सोचूंगी कि तुम हो तो दुष्ट भारतीय ही.”

Presentational grey line
सरेआम गाल चूमने से परहेज़

इस बीच करन पत्रकार बन गए. उन्होंने पहले द टाइम्स की नौकरी की और फिर वो एलडब्लूटी टेलीविज़न में रिपोर्टर हो गए.

बेनज़ीर पाकिस्तान से निकाले जाने के बाद लंदन में ही रहने लगीं. दोनों की कैंब्रिज से शुरू हुई दोस्ती प्रगाढ़ हुई और एक दिन बेनज़ीर ने करन से कहा कि तुम मुझे अपने घर क्यों नहीं बुलाते?

करन बताते हैं, “उसके बाद बेनज़ीर का मेरे घर आने का सिलसिला शुरू हुआ.”

उन्होंने कहा, “पत्नी निशा की भी बेनज़ीर से दोस्ती हो गई. एक दिन वो और हम दोनों अपने फ़्लैट के फ़र्श पर बैठे वाइन और सिगरेट पीते हुए बाते कर रहे थे. उस ज़माने में बेनज़ीर सिगरेट पिया करती थीं. बातें करते-करते भोर हो आई. बेनज़ीर ने कहा कि हम लोग इतनी वाइन पी चुके हैं कि तुम्हारा अपनी कार से मुझे मेरे घर छोड़ना सुरक्षित नहीं होगा.”

उन्होंने बताया, “बेनज़ीर बोलीं कि वो कैब से घर जायेंगी क्योंकि अगर कोई पुलिसवाला हमें नशे की हालत में पकड़ लेता तो अगले दिन समाचार पत्रों में अच्छी हेडलाइन बनती. बेनज़ीर को ये डर भी था. हालांकि जब कैब ड्राइवर मेरे घर पहुँचा तो वो भारतीय उप-महाद्वीप का ही निकला.”

करन ने कहा, “बेनज़ीर ने विदा लेते हुए मेरी पत्नी के गाल चूमे, लेकिन मेरी तरफ़ उन्होंने अपने हाथ बढ़ा दिए. मुझे ये थोड़ा अजीब-सा लगा क्योंकि इससे पहले बेनज़ीर चलते समय हमेशा अपने गाल मेरी तरफ़ बढ़ा देती थीं.”

करन याद करते हैं, “उन्होंने फुसफुसा कर कहा कि ये कैब ड्राइवर अपने इलाक़े का है. उसको ये नहीं दिखना चाहिए कि तुम मेरा चुंबन ले रहे हो. मैं एक मुस्लिम देश की अविवाहित महिला हूँ.”

संजय गांधी की दिलेरी

कैंब्रिज जाने से कहीं पहले करन थापर की संजय गांधी से दोस्ती हुआ करती थी.

वास्तव में संजय गाँधी उनकी बड़ी बहन शोभा के दोस्त थे. वो शोभा से 6 साल छोटे थे लेकिन तब भी वो उनसे मिलने अक्सर उनके घर आया करते थे.

करन थापर याद करते हैं, “हर रोज़ स्कूल ख़त्म होने के बाद संजय मेरी बहन से मिलने हमारे घर आ जाते थे. वो बहुत बातूनी नहीं थे. वो एक कोने में चुपचाप बैठे रहते थे. वो चाय के शौकीन थे. इसके अलावा कोई भी सॉफ्ट या हार्ड ड्रिंक उनको कतई पसंद नहीं थी. यहाँ तक कि नीबू पानी भी उनको नहीं भाता था. शोभा की शादी हो जाने के बाद भी उन्होंने हमारे घर आना जारी रखा था. मेरी माँ अक्सर उनसे दरवाज़े के हैंडिल या उनका ट्रांजिस्टर ठीक करने के लिए दे देती थीं.”

उन्होंने बताया, “संजय हमेशा ज़मीन पर बैठकर ये काम निपटाया करते थे. पार्टियों से उन्हें नफ़रत थी. संजय को कुत्तों और घोड़ों से बहुत प्यार था. एक बार उन्होंने मुझसे पूछा था कि तुम जहाज़ उड़ाना पसंद करोगे? मैं एक बार उनके साथ उनकी बगल में बैठकर जहाज़ पर गया था. थोड़ी देर में ही हम दिल्ली से दूर निकल आए थे.”

करन कहते हैं, “अचानक संजय ने तय किया कि खेतों में काम कर रहे किसानों को डराया जाए. उन्होंने विमान को उनकी तरफ़ मोड़ दिया. जब हमारा जहाज़ उनकी तरफ़ गया तो शुरू में तो उन्होंने हाथ हिलाकर अपनी खुशी जताई लेकिन जब उन्हें लगा कि जहाज़ उनकी तरफ़ ही चला आ रहा है तो वो डर के मारे इधर-उधर भागने लगे. आखिरी क्षण पर संजय ने विमान का रुख़ मोड़ा और वो फिर उसे ऊपर ले गए. संजय को इस तरह से किसानों को तंग करने में बहुत मज़ा आया. एक बात मैं ज़ोर दे कर कह सकता हूँ कि संजय में और बहुत से दोष भले ही रहे हों, लेकिन उनमें हिम्मत की कमी नहीं थी.”

अमिताभ से रेखा पर क्या पूछ लिया करन ने?

भारत वापस आने के बाद अमिताभ बच्चन के साथ किए गए इंटरव्यू से करन थापर का बहुत नाम हुआ.

करन बताते हैं, “हमने तय किया कि अमिताभ की 50वीं सालगिरह पर हम उनके साथ एक लंबा इंटरव्यू करेंगे. इंटरव्यू के दौरान जब एक छोटा सा ब्रेक हुआ तो अमिताभ ने मुझसे कहा कि एक बार वॉरेन बेट्टी के साथ एक इंटरव्यू किया गया था जिसमें उनकी लव लाइफ़ के बारे में कई बेबाक सवाल पूछे गए थे.”

उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि शायद अमिताभ चाहते हैं कि मैं भी उनसे इस तरह के सवाल पूछूँ. मैं भी चूका नहीं. मैंने उनसे पूछा कि शादी के बाद आपका किसी महिला से इश्क़ हुआ है. अमिताभ ने बिना पलक झपकाए जवाब दिया, ‘नहीं, कभी नहीं.’ मैंने फिर पूछा, रेखा से भी नहीं? अमिताभ ने जवाब दिया, नहीं उनसे भी नहीं.”

इस पर करन ने अमिताभ के बगल में बैठी उनकी पत्नी जया भादुड़ी से भी पूछ लिया कि क्या अमिताभ जो कह रहे हैं, उसपर आपको विश्वास है?

जया ने जवाब दिया, “मैं अपने पति पर हमेशा विश्वास करती हूँ.”

करन बताते हैं, “बात यहीं पर ख़त्म नहीं हुई. अमिताभ बच्चन ने इसरार किया कि इंटरव्यू के बाद हम खाने के लिए रुकें. जब हम डाइनिंग रूम में खाने के लिए पहुँचे तो अमिताभ बच्चन का अब तक रुका हुआ गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फटा. और इसकी शुरुआत तब हुई जब जया ने उनसे पूछा कि क्या आप चावल लेना पसंद करेंगे.”

करन ने बताया, “जया का ये पूछना था कि अमिताभ ने तमक कर जवाब दिया, तुम्हें पता है कि मैं चावल नहीं खाता. जया ने कहा, ‘मैं चावल खाने के लिए इसलिए कह रही हूँ क्योंकि रोटी आने में अभी थोड़ी देर है.’ तब तक अमिताभ का गुस्सा सातवें आसमान पर था. वो चिल्लाए, तुम्हें पता है, मैं कभी भी चावल नहीं खाता.”

करन कहते हैं, “अब हमारी समझ में आने लगा था कि मेरे सवालों से उपजे गुस्से को अमिताभ ने जिस तरह रोक कर रखा था, वो अब बाहर आ रहा था. हमारे लिए ये थोड़ी और परेशानी की बात थी क्योंकि हम उनकी ही खाने की मेज़ पर बैठकर उनका दिया खाना खा रहे थे. हम पंद्रह मिनट तक वहाँ रहे. इस बीच खाने की मेज़ पर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा.”

इस वाकये के अगले दिन जब करन दिल्ली पहुँचे तो उनसे उनकी मालकिन शोभना भारतिया ने कहा कि वो अपने इंटरव्यू से अमिताभ के इश्क़ वाला सवाल हटा दें.

करन कहते हैं, “मैंने वो हिस्सा हटा भी दिया. लेकिन अंदर ही अंदर मुझे ये चीज़ पसंद नहीं आई. मैंने अपने एक पत्रकार मित्र आनंद सहाय से संपर्क किया जो उस समय पायनियर अख़बार में काम करते थे. उन्होंने ये ख़बर पूरे आठ कॉलम में अपने अख़बार में छापी. उन्होंने इस ख़बर में मेरा नाम नहीं लिया, लेकिन इसका स्रोत मैं ही था. शोभना को इसका आभास हो गया. वो मुझसे थोड़ी नाराज़ भी हुईं, लेकिन ये नाराज़गी बहुत दिनों तक जारी नहीं रही.”

आडवाणी की पाकिस्तानी उच्चायुक्त से गुप्त मुलाक़ात

साल 2000 के शुरुआती दिनों में अशरफ़ जहाँगीर काज़ी भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त बनाए गए.

वो उस समय भारत के उप-प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ अपने रिश्ते मज़बूत करना चाहते थे.

करन थापर ने बताया, “मुझे ये ज़िम्मेदारी दी गई कि मैं अशरफ़ को अपनी कार में बैठाकर आडवाणी के पंडारा पार्क वाले घर पर ले जाऊँ. मैं रात के 10 बजे उन्हें लेकर वहाँ गया. ये गुप्त मुलाक़ात क़रीब डेढ़ घंटे तक चली. इसके बाद अगले 18 महीनों में आडवाणी और अशरफ़ क़रीब बीस या तीस बार इस तरह मिले.”

मई 2001 में भारत ने घोषणा की कि उसने जनरल मुशर्ऱफ़ को अपने यहाँ आमंत्रित किया है.

वो कहते हैं, “एक दिन सुबह साढ़े 6 बजे मेरा फ़ोन बजा. आडवाणी लाइन पर थे. उन्होंने कहा आपने मुशर्ऱफ़ वाली ख़बर तो सुन ली होगी. आप हम दोनों के दोस्त को बताइए कि इसका बहुत कुछ श्रेय हम दोनों की मुलाक़ातों को जाता है.”

आडवाणी की आँखों में आँसू

दिलचस्प बात ये है कि जब मई 2002 में जम्मू के पास कालूचक हत्याकांड हुआ तो भारत सरकार ने इन्हीं काज़ी अशरफ़ जहाँगीर को वापस पाकिस्तान भेजने का फ़ैसला किया.

करन बताते हैं, “अशरफ़ के पाकिस्तान वापस जाने से एक दिन पहले आडवाणी की पत्नी कमला का मेरे पास फ़ोन आया कि क्या आप अशरफ़ साहब और उनकी पत्नी आबिदा को मेरे यहाँ चाय पीने ला सकते हैं? मेरी समझ में नहीं आया कि एक तरफ़ भारत सरकार इस शख़्स को अपने देश से निकाल रही है और दूसरी तरफ़ उसका उप-प्रधानमंत्री उसी शख़्स को अपने यहाँ चाय पर बुला रहा है.”

“बहरहाल मैं उनको लेकर आडवाणी के यहाँ पहुंच गया. हम लोगों ने आडवाणी की स्टडी में चाय पी. विदा लेते समय जब अशरफ़ आडवाणी की तरफ़ हाथ मिलाने बढ़े, तभी कमला ने कहा, गले लगो. दोनों व्यक्ति ये सुनकर आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने एक साथ उनकी तरफ़ देखा. कमला आडवाणी ने फिर कहा, गले लगो. आडवाणी और अशरफ़ ने एक दूसरे को गले लगाया. मैं आडवाणी के पीछे खड़ा था. मैंने देखा कि आडवाणी की आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं.”

करन थापर, डेविल्स एडवोकेट, devil's advocate, karan thapar, जनरल परवेज़ मुशर्ऱफ़

जनरल मुशर्रफ़ ने अपनी टाई करन को दी

साल 1999 में इंडियन एयरलाइंस के विमान के हाईजैक के कुछ हफ़्तों बाद जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ करन थापर को इंटरव्यू देने के लिए तैयार हो गए.

ये इंटरव्यू चूंकि दूरदर्शन के लिए किया जाना था, इसलिए करन थापर से कहा गया कि वो बहुत ही आक्रामक इंटरव्यू लें.

करन उस इंटरव्यू को याद करते हुए बताते हैं, “इंटरव्यू शुरू होते ही मैंने मुशर्रफ़ पर हमला बोल दिया. मुशर्ऱफ़ भी उतने ही आक्रामक थे. कमर्शियल ब्रेक के दौरान मैंने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने के उद्देश्य से जनरल मुशर्रफ़ से कहा जनरल साहब आपने बहुत अच्छी टाई पहन रखी है. मुशर्रफ़ को ये तारीफ़ बहुत अच्छी लगी. जैसे ही इंटरव्यू ख़त्म हुआ, उन्होंने अपनी टाई उतारी और मेरे हाथ में रख दी. मैं विरोध करता ही रह गया कि मेरा ये उद्देश्य नहीं था. उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी और कहा कि ये टाई अब से तुम्हारी हुई. मैंने भी मज़ाक किया कि मुझे पता होता कि आप हर वो चीज़ दे देते हैं, जिसकी तारीफ़ होती है, तो मैं आपसे इस टाई में लगी हुई सोने की टाई पिन की तारीफ़ करता.”

करन कहते हैं, “इस पर मुशर्रफ़ ने ठहाका लगाया और कहा, ‘हाँ, अगर आपको मेरे जूते भी पसंद आते, तो वो भी आपको मिल जाते.”

जब जयललिता थापर से उखड़ीं

करन थापर का इसी तरह का एक मुश्किल इंटरव्यू जयललिता से भी हुआ था.

कई दिनों की मशक्कत के बाद मिले इंटरव्यू में पूछे गए सवालों से जयललिता बहुत नाराज़ हो गई थीं.

करन को ये इंटरव्यू अभी तक याद है. उन्होंने बताया, “जयललिता का क़मरा इतना ठंडा था कि मेरे दांत किटकिटा रहे थे. इंटरव्यू बिगड़ना तब शुरू हुआ, जब जयललिता के सामने फूलों का एक वाज़ रख दिया गया. मुझे ये पता नहीं था कि फूल वहाँ इसलिए रखे गए थे कि उनकी आड़ में जयललिता कुछ कागज़ों को पढ़कर जवाब दे सकें. मेरी ये ग़लती थी कि मैंने ये चीज़ उन्हें बता दी.”

करन कहते हैं, “उन्होंने उखड़कर कहा, मैं आपकी आँखों में सीधे देख रही हूँ. एक समय ऐसा भी आया जब जयललिता ने कहा कि मुझे अफ़सोस है कि मैं इस इंटरव्यू के लिए तैयार ही क्यों हुई? इंटरव्यू ख़त्म होने पर मैंने उनकी तरफ़ अपना हाथ बढ़ा कर कहा, चीफ़ मिनिस्टर आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा. जयललिता ने उनकी तरफ़ घूर कर जवाब दिया, आपसे बात करके मुझे बिल्कुल भी ख़ुशी नहीं हुई. नमस्ते. उन्होंने माइक निकालकर मेज़ पर पटका और कमरे के बाहर चली गईं.”

बीच इंटरव्यू में मोदी का वॉक आउट

साल 2007 में नरेंद्र मोदी जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, करन थापर का इंटरव्यू बीच में ही छोड़कर चले गए थे.

करन ने इंटरव्यू की शुरुआत में ही उनसे पूछ लिया, “राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन ने गुजरात को भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रशासित राज्य कहा है. लेकिन इसके बावजूद लोग आपके मुँह पर आपको सामूहिक हत्यारा कहते हैं और ये भी कहते हैं कि आप मुसलमानों के ख़िलाफ़ हैं.”

करन याद करते हैं, “नरेंद्र मोदी उस ज़माने में वैसी भी अंग्रेज़ी नहीं बोलते थे, जिस तरह आज कल बोलते हैं. लेकिन तब भी उन्होंने उस सवाल का जवाब अंग्रेज़ी में दिया. वो बोले कि लोग ऐसा नहीं कहते. कुछ व्यक्ति ऐसा ज़रूर कह सकते हैं.”

करन ने कहा, “मैंने उनसे पूछा कि आप गुजरात में हुए ख़ून ख़राबे के लिए अपना दुख क्यों नहीं प्रकट करते. मोदी ने जवाब दिया मुझे जो कुछ कहना था वो मैं कह चुका हूँ. तभी उन्होंने ये कहते हुए माइक मेज़ पर रख दिया कि मुझे आराम करना है. उन्होंने पानी पीने की इच्छा प्रकट की. मैंने कहा कि पानी तो आपके बगल में रखा हुआ है. लेकिन उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी और इंटरव्यू बीच में ही छोड़ दिया. उसके बाद मैं उनके यहाँ एक घंटे रहा. उन्होंने मुझे मिठाई और ढोकला खिलाया. मैंने कोशिश की कि दोबारा उनका इंटरव्यू शुरू हो सके, लेकिन वो इसके लिए राज़ी नहीं हुए. उनके मुझसे आख़िरी शब्द थे, ‘बस दोस्ती बनी रहे.’ शाम को उन्होंने फ़ोन कर कहा, ‘करन भाई, जब मैं दिल्ली आऊंगा तो भोजन करेंगे साथ में’. लेकिन उसके बाद नरेंद्र मोदी ने कभी मेरी शक्ल नहीं देखी. और तो और साल 2017 के बाद भाजपा के दूसरे किसी नेता ने भी मुझसे बात करना बंद कर दिया.”
Share this: