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राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की व्यथा-कथा

हरिवंश जी
राज्यसभा में उप सभापति का चुनाव जीतने के बाद सर्वोच्च आसन पर बैठने से पहले अभिभावदन करते हरिवंश जी

मीडिया मिरर विशेषः–

 

साधाररण चेहरे मोहरे वाले, तड़क भड़क से दूर सामान्य कपड़े पहनने वाले और चेहरे पर एक निश्छल मुस्कान बिखेरते रहने वाले हरिवंश नारायण सिंह परमार अचानक चर्चा में हैं। हों भी क्यों न देश के उच्च सदन की सबसे ऊंची कुर्सी पर वो विराजमान हो गए हैं जहां से प्रधानमंत्री की कुर्सी भी नीची ही है। 

खैर हरिवंश जी की बात मिरर इसलिए कर रहा है क्योंकि वो पत्रकार भी रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मीडिया सलाहकार भी रहे हैं। फिलहाल नीतीश के खास हैं दूसरी भाषा में कहें तो चमचा भी। ऐसा हम नहीं लोग कह रहे हैं। 

लोग तो बहुत कुछ कह रहे हैं। कोई कह रहा है हरिवंश जी पत्रकारिता के दौरान भी संबंधों की जमीन नेताओं के साथ पुख्ता करने में लगे रहे औऱ ये तमगा उसी संबंधों का नतीजा है जो कुलदीप नैय्यर जैसे पत्रकार न कर पाए। 

बहरहाल दो प्रमुख टिप्पणियों के साथ हरिवंश जी की व्यथा कथा को हम समेट कर लाए हैं आपके लिए। 

हां एक बात औऱ बलिया के लोग खुश हैं, प्रभात खबर खुश है, राजपूत लोग खुश हैं। पत्रकार भी खुश हैं हरिवंश बाबू की इस जीत से। साथ ही आशा है कि उच्च सदन में अब पत्रकारों के हित में सुनवाई गंभीरता पूर्वक हो सकेगी। 

 

 

हरिवंश जी को बधाई देते उपराष्ट्रपति व अन्य नेता। 

दो दशक तक पत्रकारिता में दी अपनी सेवाएं 
हरिवंश नारायण सिंह का जन्म 30 जून 1956 को बलिया जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ था। उन्होंने 1976 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में एमए और 1977 में बीएचयू से ही पत्रकारिता में डिप्लोमा की पढ़ाई की और अपने कैरियर की शुरुआत टाइम्स समूह से की। इसके बाद हरिवंश ने कई प्रसिद्ध पत्रिकाओं में काम किया। इसके बाद वे 90 के दशक में बिहार के बड़े मीडिया समूह से जुड़े जहां उन्होंने दो दशक तक अपनी सेवाएं दी।

नीतीश कुमार के हैं करीबी 
अपने कार्यकाल के दौरान हरिवंश ने बिहार के ज्वलंत विषयों और आर्थिक रुप से कमजोर बिहार की तस्वीर सरकार के सामने रखी। इसी दौरान वह नीतीश कुमार के करीब आए इसके बाद हरिवंश को जेडीयू का महासचिव बना दिया गया। साल 2014 में जेडीयू ने हरिवंश को राज्यसभा के लिए नामांकित किया और इस तरह से हरिवंश पहली बार संसद तक पहुंचे।

पूर्व पीएम चंद्रशेखर के रह चुके हैं सलाहकार 
हरिवंश ने वर्ष 1990-91 के कुछ महीनों तक तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (संयुक्त सचिव) के रूप में प्रधानमंत्री कार्यालय में भी काम किया। नब्बे के दशक में ही उन्होंने बिहार की स्थिति को केंद्र के सामने रखने के लिए दिल्ली में दस्तक दी। कहा जाता है कि दिल्ली से लेकर पटना तक नीतीश कुमार की बेहतर छवि बनाने में भी उनका खास योगदान रहा। दरअसल हरिवंश राजपूत जाति से आते हैं एनडीए उनके सहारे राजपूत वोट बैंक को अपना ओर खींचने की कोशिश में है। इसके साथ ही हरिवंश की साफ छवि होने के कारण भाजपा को किसी भी विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा।

 

राज्यसभा उपसभापति के तौर पर हरिवंश नारायण सिंह का चुनाव हो चुका है. NDA उम्मीदवार हरिवंश के पक्ष में राज्यसभा में 125 सदस्यों ने वोट दिया. आइए आपको बताते हैं, कौन हैं हरिवंश?

कहां से आते हैं हरिवंश?

हरिवंश एक साधारण किसान परिवार से आते हैं. हरिवंश लोकनायक जयप्रकाश नारायण के गांव सिताब दियारा के रहने वाले हैं जहां उनके परिवार ने अपनी खेती की जमीन गंगा नदी के कटान की वजह से खो दी थी.

सरकारी नौकरी छोड़कर पत्रकारिता की

हरिवंश नें अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री अर्थशास्त्र में हासिल की और 80 के दशक में अपनी आजीविका एक हिंदी अखबार धर्मयुग से पत्रकार के तौर पर शुरू की. जिसके बाद हरिवंश बैंक ऑफ इण्डिया में सरकारी अधिकारी के तौर पर नियुक्त हुए. लेकिन परिवार के न चाहने के बावजूद सरकारी नौकरी छोड़कर फिर से पत्रकारिता शुरू की. साल 1989 में हरिवंश ने रांची से छपने वाले प्रभात खबर के साथ नौकरी की और बाद में इसी अखबार में संपादक के तौर पर भी भूमिका निभाई. साल 2014 में जेडीयू से राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद प्रभात खबर के संपादक के पद से हरिवंश ने इस्तीफा दे दिया.

राज्यसभा का सदस्य बनने से पहले हरिवंश ने एकमात्र राजनीतिक पारी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार के तौर पर खेली. चंद्रशेखर के सलाहकार का पद ग्रहण करने की खातिर हरिवंश ने प्रभात खबर से इस्तीफा दिया लेकिन चंद्रशेखर सरकार से कांग्रेस के समर्थन वापसी के बाद फिर से अखबार लौट गए.

 सादा जीवन जीने वाले हरिवंश बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते हैं लेकिन उन्होंने ने इस रिश्ते को अपने सार्वजनिक जीवन में कभी जाहिर नहीं होने दिया. कहा जाता है कि बिहार में नीतीश कुमार की छवि बनाने में हरिवंश ने बड़ी भूमिका अदा की. उच्च सदन में उपसभापति के तौर पर हरिवंश की जीत को जेडीयू और बीजेपी के रिश्तों में गर्माहट के तौर पर देखा जा रहा है. हरिवंश, जेडीयू से संबंध रखने वाले ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिसे बीजेपी ने दोनों दलों के लंबे समय से चल रहे रिश्तों में खटास के बाद केंद्र में एनडीए का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना.

हरिवंश के चुनाव से बीजेपी-जेडीयू के रिश्ते और बेहतर होंगे जब यह कयास लगाए जा रहे थें कि नीतीश लोकसभा चुनाव से पहले फिर से महागंठबंधन का दामन थाम सकते है.

बतौर सांसद क्या किया?

राज्यसभा सांसद बनने के बाद जब प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना के तहत एक गांव को गोद लेना था तब हरिवंश ने तय किया वह एक ऐसे गांव को गोद लेंगे जिसका उनके किसी भी संबंधी से दूर दूर का रिश्ता न हो और वो गांव राजनीतिक रूप से कोई महत्व न रखता हो. हरिवंश ने अंत में बिहार के रोहतास जिले के बहुआरा गांव को चुना.

हरिवंश ने अपनी सांसद निधि का बड़ा हिस्सा बिहार के आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय के नदियों पर अध्ययन व शोध करने वाले सेंटर और आईआईटी पटना में लुप्त होती भाषाओं पर शोध करने वाले सेंटर को विकसित करने में खर्च किया.

संबंधों की पत्रकारिता

(वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की कलम से) 

हिन्दी पत्रकारिता करते हुए राज्यसभा के उपाध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने के लिए पत्रकार हरिवंश निश्चित रूप से प्रशंसा के पात्र हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनकी खूब तारीफ की। पर यह बता ही दिया कि निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता करते हुए सत्ता के करीब पहुंचना हरिवंश के लिए भी संभव नहीं था। उन्होंने बताया कि हरिवंश ने पत्रकारिता से ज्यादा महत्व संबंधों को दिया और खबर अपने अखबार को भी नहीं दी। पहली ही बार में राज्यसभा का उपाध्यक्ष बन जाना साधारण नहीं है। और यह यूं ही नहीं है।

हरिवंश भारतीय राजनीति में एक अलग ही धारा कहे जा सकने वाले चंद्रशेखर के प्रिय थे। जयप्रकाश नारायण के प्रशंसक हैं। अंतरात्मा की आवाज तक को राजनीति के लिए भुना लेने वाले नीतिश कुमार के समर्थन से राज्य सभा में पहुंचे और देश जब गोभक्तों, कांवड़ियों, भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ भाजपा समर्थक ट्रोल की गंदगी से परेशान है तो भाजपा के समर्थन से उपसभापति बन गए। यह संबंधों की राजनीति या पत्रकारिता ही है जो ऐसी सफलता दिलाती है। वरना तमाम मामलों पर चुप रह जाना पत्रकार के लिए साधारण नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि एक पाठक के रूप में कई लोग, कई मुद्दों पर हरिवंश की राय जानने को तरस गए।

प्रधानमंत्री ने कहा कि चंद्रशेखर के करीबी और मीडिया सलाहकार रहते हुए उन्हें पता था कि चंद्रशेखर इस्तीफा देने वाले हैं पर उन्होंने यह खबर किसी को बताई नहीं। यह खबर नहीं छपी। वैसे, इस मामले में सच्चाई यही होगी कि उस समय वे संपादक नहीं होंगे और पत्रकारिता उनकी पहली प्राथमिकता नहीं थी। फिर भी, सफलता के लिए किया वही जाता है जिससे संबंध बने। प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक कर दिया कि हरिवंश जी ने भी वही किया। पत्रकारिता अगर राजनीति की सीढ़ी है तो संबंध बनाना हाईस्पीड लिफ्ट।

हरिवंश जी अपना पूरा नाम नहीं लिखते हैं और अब जब सब कुछ सार्वजनिक है तो लोग चकित हैं कि यह सब कैसे हुआ? मौजूदा स्थिति के लिए भले ही इस समय की राजनीति और माहौल को दोषी बना दिया जाए पर चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री बनते ही उनके करीबी के रूप में चर्चित होने के बाद कुछ छिपा हुआ नहीं था। कुछ लोग नहीं जान पाए यह अलग बात है।

चुपचाप आर्थिक मदद की

साहित्य समीक्षक कलावंती सिंह की कलम से

हरिवंशजी के सादगी के अनेकों उदाहरण हैं। मेरी ड्यूटि रांची स्टेशन पर थी । जब कभी उन्हें कहीं जाना होता वे चुपचाप प्लेटफार्म पर आकार आम आदमी की तरह ट्रेन की प्रतीक्षा करते थे। कभी समय रहने पर स्टेशन पर किताबों की दुकान पर खड़े होकर किताबें देखते। उनके साथ कभी लाव -लश्कर नहीं होता। कभी उनसे पूछा भी कि भैया , वी आई पी लाउंज में बैठिए तो उन्होने मना कर दिया। इसी तरह रांची स्टेशन के एक कुली को, जिसकी आंखो में मोतियाबिंद के कारण कम दिखने लगा था और वह ठीक से कार्य नहीं कर पाता था , उसकी बहुत सालों तक चुपचाप आर्थिक मदद की। प्रभात खबर में काम किए लोग आज देश भर के मीडिया संस्थानों में हैं। आज बहुत गर्व का क्षण है ।

चंद्रशेखर टू नीतीश कुमार से इतर हरिवंशजी की राजनीतिक चेतना
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निराला बिदेशिया की कलम से 
हरिवंशजी आज देश के एक शीर्ष राजनीतिक पद के लिए चुन लिये गये.. अधिकांश लोग यह जानते हैं कि उनकी राजनीतिक यात्रा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से शुरू हुई थी, नीतीश कुमार के रास्ते होते हुए यहां तक पहुंची. जयप्रकाश नारायण के गांव सिताबदियारा के दलजीत टोला में जनमे हरिवंशजी के इलाके के जो लोग होंगे, वे ऐसी बात नहीं करेंगे. वे जानते हैं कि वह जो सिताबदियारा का इलाका है, वह घनघोर रूप से राजनीतिक इलाका है. माटी में राजनीति का ही राग है. अभी सिर्फ उसी इलाके से कुल जमा चार—पांस सांसद हैं देश में. आप कभी जायेंगे उस इलाके में तो मालूम चलेगा कि दियारा के उस इलाके के रहनिहारों के रग—रग में राजनीति कैसे समाया हुआ रहता है. खैर, यह तो एक बात हुई. स्कूली पढ़ाई वहीं हुई तो राजनीति का खादपानी वहीं से मिला. और वहां से जैसे ही निकले, उसका असर दिखने लगा. पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय गये पढ़ने, फिर बनारस के यूपी कॉलेज में आ गये. यूपी कॉलेज के बाद बीएचयू. बनारस में जब पढ़ने लगे तो वहां छात्रजीवन में ही चुनाव लड़े. चुनाव छोटा था लेकिन राजनीति का खादपानी मिला था तो आजमा लिये. और बनारस मे रहते सबसे पहले जुड़े कृष्णनाथजी से. काशी विद्यापीठ में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे कृष्णनाथजी और बाद में लोहियाजी के सबसे करीबी हुए. तीन आना बनाम तेरह आना सिद्धांत के सूत्रधार. छात्रजीवन में मौज—मस्ती का दिन होता है लेकिन हरिवंशजी तब कृष्णनाथजी के यहां जाने लगे और फिर राजघाट पर सर्वोदय संघ में. बाद में जब पत्रकारिता में आये और धर्मयुग से जुड़े तो पोलिटिकल रिपोर्टिंग ही ज्यादा करते रहे. रविवार से भी जुड़कर वही करते रहे. बिंदेश्वरी दुबे पर जो रिपोर्ट उन्होंने की थी, उसकी कॉपी ब्लैक में बिकी थी. अब तक उनका सीधा परिचय चंद्रशेखरजी से नहीं हुआ था लेकिन धर्मयुग अपने जमाने की मशहूर पत्रिका थी. सात लाख कॉपी बिकनेवाली पत्रिका तो उसके पॉलिटिकल रिपोर्टर का पूरे देश में परिचय हो जाना स्वाभाविक था लेकिन हरिवंशजी पर उसका असर नहीं पड़ा. बाद में जब वे प्रभात खबर आये तब चंद्रशेखरजी उनको पीएमओ ले गये. पीएमओ गये हरिवंशजी तो अखबार में भी प्रधान संपादक नहीं बने रहे, छोड़कर गये. लेकिन जब लौटे तो बचपन से मिले राजनीति के खाद—पानी का असर दिखने लगा. प्रभात खबर चूंकि रांची जैसे छोटे जगह से निकलता था इसलिए देश की प​त्रकारिता ने उसे नोटिस नहीं लिया लेकिन जिस किस्म की राजनीतिक पत्रकारिता प्रभात खबर कर रहा था या हरिवंशजी कर रहे थे, वह देश में दुर्लभ ही था. झारखंड आंदोलन की लड़ाई तब चल रही थी, हरिवंशजी ने प्रभात खबर को झारखंड आंदोलन के राजनीतिक स्वर को तेज करने का मंच बना दिया. रामदयाल मुंडा,बीपी केशरी, रोज केरकेट्टा से लेकर न जाने कितने लोग झारखंड आंदोलन को अखबार के जरिये मज​बूत स्वर देने लगे. उसी वक्त दिल्ली में एक सेमिनार करवाया हरिवंशजी ने. अखबारों की कटिंग का एक कोलाज बनाये. दिल्ली में दक्षिण बिहार के नेताओं को जुटाये, बिहार के नेताओं को जुटाये और दक्षिण बिहार के साथ होनेवाले भेदभाव पर बोलने को बोले. यह उनकी राजनीतिक चेतना थी. एक पत्रकार के रूप में यह उनकी राजनीतिक भूमिका थी. बाद में अखबार में राजनीतिक रिपोर्टिंग को लेकर जो करते—करवाते रहे, वह तो एक बात है. देश भर में फैले राजनीति के टॉप लोगों से लिखवाना शुरू किये. उनलोगों से नहीं जो बड़े नेता हों, बड़े पद पर हो बल्कि उन लोगों से जो खांटी राजनीति के आदमी हो, सामाजिक राजनीति के आदमी हों. उसी दौरान उन्होंने ‘भारत किधर’ नाम से अखबार की ओर से व्याख्यानमाला शुरू किया. देश की चुनौतियों पर बात करने के लिए. चंद्रशेखर, कामरेड विनोद मिश्रा, दत्तोपंत ठेंगड़ी, सिताराम येचुरी, गोविंदाचार्य,जावेद अख्तर, जस्टिस पीवी सामंत, प्रभाष जोशी, योगेंद्र यादव, लालू प्रसाद यादव, कृष्णनाथ, कृष्णबिहारी मिश्र जैसे लोग आते रहे. देश की राजनीति पर बात होती रही. इन सबसे इतर भी पत्रकार रहते हुए राजनीतिक चेतना दिखती रही. कितने राजनीतिक काम किये, यह भी जानने की चीज है. एक ही उदाहरण देता हूं. 2007—08 में हरिवंशजी ने एक परचा छपाया. गाड़ी के पीछे रखा. परचा क्या था तो यह बताना कि राजनीति से घृणा नहीं कीजिए, राजनेता कोई काम नहीं करता, बुरा है तो उसे बदलिये, यह आपके हाथ में है. वोट डालिये, इस दुनिया में लोकतंत्र से बेहतर कोई मॉडल नहीं है. उस परचा के साथ हरिवंशजी झारखंड के सुदूर इलाके में घूमने लगे. कॉलेज में जाना, विश्वविद्यालयों में जाना, कस्बे में जाना, छोटे—छोटे शहरों में जाना और फिर दिन भर तपती गरमी में घूमने के बाद रात में पास के किसी शहर में भी बोलना. गले में चूना लग गया था सातवें दिन. बोलने से गला बैठ गया था लेकिन धनबाद, जमशेदपुर,रांची से लेकर तमाम इलाके में यह अभियान उन्होंने चलाया. उस पूरी यात्रा में ​साथ था तो गवाह था. टूंडी की एक घटना बताता हूं. वहां पहुंचने के बाद एक भी आदमी नहीं थे सुननेवाले. तीन लोग थे. हरिवंशजी को बोला कि क्या बोलिएगा यहां, उनका गला भी फंसा हुआ था लेकिन तीन लोगों के बीच लोकतंत्र, चुनाव आदि पर बोलना शुरू कर दिये. धीरे—धीरे आसपास की दुकानें बंद होने लगी, लोग जुटने लगे. और देखते ही देखते ढेरों लोग. रास्ता में पूछा कि आप तो तीन लोगों के बीच भी बोलने लगे थे सर, उनका जवाब था—जेपी के गांव से हैं न. जेपी लोगों का इंतजार नहीं करते थे. दो लोगों के बीच भी बोलते थे. हम यहां प्रचार कर के थोड़ी आये हैं कि लोग रहेंगे. जहां लोग मिलेंगे, वहीं बोलेंगे. राजनीतिक चेतना पर और बातें फिर कभी. हजारीबाग से लेकर पलामू तक के ढेरों प्रसंग हैं, जिनसे मालूम चलेगा कि वे सक्रिय राजन​ीति में भले बाद में दिखते हों लेकिन राजनीति तो उनकी रग—रग में रहा है. पलामू में ज्यांद्रेज के साथ वाली यात्रा, सूचनाधिकार पर अरविंद केजरीवाल के साथ किया हुआ काम.
और बातें बाद में

 

 

 

इनपुटः आजतक और पंजाब केसरी

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