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सम्पादक आत्महत्या मामलाः आरोप की परिभाषा दोषी होना नहीं है

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एडीटर अटैक- 

 

एक स्त्री। जो एक छोटे बच्चे की मां भी है और तलाकशुदा भी। सारे रिश्ते नाते बिखर चुके हैं और अब माथे पर एक नामी गिरामी व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है।

आरोप, आरोप होता है। आरोप की परिभाषा दोषी होना नहीं है। किसी आरोपी को दोषी सिद्ध करना प्रथम दृष्टया अदालत का काम है। मीडिया और हम किसी आरोपी को अदालत से पहले ही दोषी क्यों मान लें। आरोपी जिसे हमें ज़लील करते हैं, मीडिया चटखारे ले लेकर मसालेदार खबरें करता है, वही आरोपी जब अदालत से दोषमुक्त हो जाता है, तो उस आरोपी की छविभंजन के दोषी कौन लोग होंगे और उनकी सजा का क्या प्रावधान होना चाहिए।

24 घंटे की दौड़ में अमादा वर्तमान मीडिया संयमित नहीं है। आपराधिक या महिला या बच्चों से जुड़े मामलों की रिपोर्टिंग के लिए एक नियमावली है। क्यों नहीं हमे उसका पीछा करना चाहिए।

एक बड़े अखबार के समूह सम्पादक की मौत हो जाती है, फिर उसे आत्महत्या का रंग दिया जाता और फिर एक कथा सामने आती है कि पूरे मामले कि विलेन एक पत्रकार लड़की है। तमाम कपोल कथाएं इस मामले पर हम सभी बहुत हल्के माध्यमों के जरिए ही प्राप्त कर रहे हैं और कहानियां गढ़ रहे हैं। मैं आएदिन पढ़ रहा हूं कि अरे वो लड़की तो ऐसी ही है। इंदौर के एक बड़े चिकित्सक के साथ भी उसके संबंध थे, चिकित्सक ने इस महिला की बदौलत अपने पत्नी से तलाक ले लिया था। सम्पादक का भी एक पत्र वायरल हो रहा है औऱ कुछेक आडियो।

माना कि वो सही हैं। पर फिर भी जब मामला अदालत में है और भारतीय संविधान में हमे अपनी न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है तो क्यो न हम सब अदालत के अंतिम निर्णय का इंतजार करें। प्रियंका गांधी ने तो जेल में जाकर अपने पिता के हत्या की दोषी को माफ कर दिया था। मैं तो माफ करने की बात कर ही नहीं रहा। बस एक सही फैसले के बाद टिप्पणी की बात कर रहा हूं। मेरी अपील बस इतनी है कि वो महिला जो अभी महज आरोपी है जब दोषमुक्त साबित होगी या सजा भोगकर वापसी करेगी अपने जीवन की एक नई शुरुआत के लिए तो उसे ये जीवन कष्टकर न लगे, उसे हम आपकी शक्लें डरावनी न लगे, उसे लोगों से चेहरा न छिपाना पड़े। इसलिए उस चेहरे को छिपाकर रखिये। उसके नाम का उपयोग कम करिए।

सुनने में आ रहा है 2 दिन पहले इंदौर के महिला थाने में पत्रकारों ने पुलिस वालों पर दबाव बनाकर इस महिला पत्रकार के चेहरे से जबरन दुपट्टा हटवाया, ताकि इसका चेहरा कैमरे में आ सके। उससे पहले कोर्ट में भी पत्रकारों ने महिला पत्रकार पर फब्तियां कसीं।

आप लोग ऐसा करके उसे प्रायश्चित का अवसर भी नहीं देंगे। प्रायश्चित करने वाले को माफी का प्रावधान है हमारे सनातन धर्म में। पर आप तो कहानियों पर कहानियां बनाने में अमादा हैं। अभी एकपक्षीय मामला है, इस महिला पत्रकार के बयान आने तो दीजिए…

  • प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर… संपर्क..099583-77353
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