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ट्रम्प के खिलाफ 350 मीडिया संस्थानों ने लिखी संपादकीय

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

अमेरिका के बोस्टन ग्लोब अख़बार ने ‘एनमी ऑफ नन’ हैशटैग का इस्तेमाल करके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मीडिया विरोधी रुख़ की राष्ट्रव्यापी निंदा की अपील की थी. जिस पर हर अख़बार ने ट्रंप की मीडिया विरोधी टिप्पणियों के विरुद्ध अपना-अपना संपादकीय लिखा है.

 

न्यूयॉर्क: करीब साढ़े तीन सौ मीडिया संगठनों ने पत्रकारों पर बार-बार हमला करने और कुछ समाचार संगठनों को अमेरिकी जनता के दुश्मन के रूप में पेश करने को लेकर गुरुवार को अमेरिका के राष्ट्रपति के खिलाफ एकजुट अभियान शुरू किया.

ट्रंप ने हाल के हफ्तों में मीडिया पर हमले तेज किए हैं. व्हाइट हाउस ने पिछले ही महीने ट्रंप से अनुपयुक्त सवाल पूछने को लेकर एक सीएनएन पत्रकार पर सार्वजनिक कार्यक्रम के कवरेज पर पाबंदी लगा दी थी.

बोस्टन ग्लोब अखबार ने ‘एनमी ऑफ नन’ हैशटैग का इस्तेमाल करते हुए पिछले हफ्ते राष्ट्रपति ट्रंप के मीडिया के खिलाफ ‘डर्टी वॉर’ की राष्ट्रव्यापी निंदा की अपील की थी. इस पर हर अखबार ने अमेरिकी राष्ट्रपति की ‘मीडिया विरोधी’ टिप्पणियों के विरुद्ध अपना-अपना संपादकीय लिखा है.

ट्रंप ने प्रतिकूल मीडिया रिपोर्टों को फर्जी खबरें बताकर बार-बार उनकी निंदा की और पत्रकारों को जनता का दुश्मन बताया.

ट्रंप के ट्विटर अकाउंट को खंगालने से पता चलता है कि ‘फर्जी खबरें’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए वे अब तक 281 बार ट्वीट कर चुके हैं.

बोस्टन ग्लोब ने अपने संपादकीय में लिखा है कि स्वतंत्र मीडिया की जगह सरकारी मीडिया लाना भ्रष्ट प्रशासन के लिए सदैव पहली प्राथमिकता रही है.

नॉर्थ कैरोलिना के अखबार फायट्टेविल्ले ऑब्जर्वर ने कहा कि उसे उम्मीद है कि राष्ट्रपति के सभी समर्थक यह मानेंगे कि वे जो कर रहे हैं उसे वास्तविकता को अपनी मर्जी के हिसाब से तोड़ना-मरोड़ना कहा जाता है.

स्टिंगिंग के संपादकीय में टिप्पणी की गई है, ‘आज अमेरिका में एक ऐसा राष्ट्रपति है जिसने इस मंत्र का निर्माण किया है कि मीडिया के सदस्य, जो वर्तमान अमेरिकी प्रशासन की नीतियों को समर्थन नहीं करते हैं, लोगों के दुश्मन हैं. यह इस राष्ट्रपति के कई झूठों में से एक झूठ है.’

न्यूयॉर्क टाइम्स के संपादकीय मंडल ने कहा कि इस साल कुछ सबसे नुकसानदेह प्रहार सरकारी अधिकारियों की ओर से हुए हैं.

उम्मीद 100 की थी बढ़ता गया कारवां

वॉशिंगटन. अमेरिका के 100 से ज्यादा अखबार एकजुट होकर गुरुवार (16 अगस्त) को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ लेख प्रकाशित करेंगे। इनमें ट्रम्प की मीडिया पर हमले की नीति का विरोध किया जाएगा। अभियान की शुरुआत बोस्टन ग्लोब ने की। इसके कर्मचारियों ने देशभर में बाकी अखबारों से संपर्क करके ट्रम्प विरोधी लेख लिखने की अपील की। इसमें कहा गया कि प्रेस की आजादी के लिए हो रही इस लड़ाई का अंत होना चाहिए।

ग्लोब के डिप्टी एडिटोरियल पेज एडिटर मरजोरी प्रिटचार्ड ने न्यूज एजेंसी को बताया कि इस अभियान में हॉस्टन क्रॉनिकल, मियामी हेराल्ड और डेनेवर पोस्ट समेत कई छोटे साप्ताहिक अखबार भी शामिल हैं। इनमें से हर अखबार ट्रम्प विरोधी आर्टिकल प्रकाशित करने को तैयार है। इस अभियान को अमेरिकन सोसायटी ऑफ न्यूज एडिटर्स ने भी समर्थन दिया है।
मीडिया पर लगातार हमले कर रहे ट्रम्प : ट्रम्प उन अखबारों और पत्रकारों की निंदा करते रहे हैं, जिनकी खबरें उन्हें नापसंद हैं। अपने खिलाफ लिखी हर खबर को वे फेक न्यूज कह देते हैं। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संघ के निवर्तमान आयुक्त जैद राद अल-हुसैन ने बताया कि ट्रम्प मीडिया को लोगों का दुश्मन बताते रहे हैं। इसके अलावा पिछले महीने ट्रम्प ने न्यूयॉर्क टाइम्स के प्रकाशक से मुलाकात की थी, जिसे उन्होंने काफी शानदार बताया था। हालांकि, कुछ घंटे बाद ही उन्होंने ट्वीट किया कि मुझे पसंद नहीं करने वाले लोग न्यूज पेपर इंडस्ट्री को खत्म कर रहे हैं।

  • द वायर और भाषा से साभार

 

मिरर विचारः

एक तरफ जब विश्वभर में मीडिया पर सरकारी नियंत्रण की बातें, अंकुश लगाने की बातें हो रही हैं। मीडिया को सरकार की कठपुतली की तरह काम करना पड़ रहा है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी देखें तो एनडीटीवी औऱ बीबीसी जैसे कुछेक संस्थानों को छोड़ दें सबपर बीजेपी की चाकरी के आरोप हैं और ये महज आरोप नहीं है बल्कि भारतीय मीडिया ये साबित भी करता रहा है। ऐसे में विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति के खिलाफ वहां की मीडिया की एकजुटता वैश्विक मीडिया के लिए उदाहरण है। ऐसा नहीं है कि अमेरिकी मीडिया विज्ञापन या तथाकथित लाभों के लिए सरकार पर आश्रित नहीं है। पर वहां का मीडिया विज्ञापन लोभ से इतर खबरों से समझौते के मूड़ में नहीं है। ऐसी एकजुटता भारत को भी समय समय पर दिखानी चाहिए लेकिन सरकारी नियमों और कोर्ट के कानून की अवहेलना करके अपने ही पत्रकारों का शोषण करने वाले भारतीय मीडिया संस्थान सरकार से खिलाफत करेंगे ये लगता नहीं है।

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