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इमेज ब्रांडिंग में लगा राज्यसभा टीवी, प्रधान सम्पादक परेशान

राज्यसभा टीवी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल
राज्यसभा टीवी के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी व प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल

एडीटर अटैकः

राज्यसभा टीवी। वही गुरदीप सिंह सप्पल वाला।

जी हां राज्यसभा टीवी की पूरी पहचान और वजूद अबतक भी गुरदीप सिंह सप्पल से ही जुड़ा हुआ है। जबकि चैनल के पूर्व प्रधान सम्पादक सप्पल कई महीने पहले ही  इस्तीफा देकर जा चुके हैं। राज्यसभा टीवी अब अपनी पुरानी पहचान से निकलना चाहता है। आज भी जब कुछ बात होती है तो लोग अनायास ही कह देते हैं अच्छा सप्पल वाला राज्यसभा टीवी न, अच्छा उर्मिलेश वाला राज्यसभा टीवी न, अच्छा बादल जी वाला राज्यसभा टीवी। अमृता रॉय वाला। अच्छा जिसमें अरफा खानम थीं।

जबकि ये तमाम बड़े नाम चैनल छोड़कर जा चुके हैं। हालांकि अंदर की बात ये कि ये सब गए नहीं बल्कि इन्हें चलता किया गया है। क्योंकि ये यूपीए सरकार की नियुक्ति पर थे और उपराष्ट्रपति जैसे ही एनडीए समर्थित नायडू हुए इन सबकी विदाई हो गई।

अब नए प्रधान सम्पादक महोदय आ गए हैं। पर उनकी कोई चर्चा ही नहीं करता। देखिए मीडिया खबरों की वेबसाईट चलाने वाला मैं स्वयं उनका नाम नहीं जानता। चैनल में नए-नए एंकर्स और प्रोग्राम भी चल रहे हैं। पर उनकी भी कोई चर्चा नहीं करता। यही सब नए प्रधान सम्पादक को परेशान करता है। सूत्रों से जानकारी मिली है कि नए सम्पादक महोदय नए नए प्रयोग कर रहे हैं। लोगों को काम की स्वतंत्रता दे रहे हैं। नए नए कार्यक्रमों का निर्माण कर रहे हैं। पर चर्चा नहीं मिल रही। इसका दुःख अंदर अंदर नए सम्पादक को खाए जा रहा है। आज भी जब राज्यसभा टीवी के कसीदे नए सम्पादक के सामने कोई पढ़ता है तो प्रोग्राम वही सप्पल के दौर के होते हैं। चाहे गुफ्तगू हो या शख्सियत या सरोकार या मीडिया मंथन।

वहीं जो साथी राज्यसभा चैनल को छोड़कर गए हैं उनका विकल्प ढूढ़ने में राज्यसभा प्रबंधन को पसीने छूट रहे हैं। अमृता रॉय, उर्मिलेश, राजेश बादल, अरफा खानम जैसे महारथियों का विकल्प राज्यसभा को अबतक नहीं मिला। उर्मिलेश के टाइम स्लॉट मीडिया मंथन पर कविंद्र सचान को बैठा तो जरूर दिया पर वो कार्य़क्रम को साध नहीं पाए। मीडिया के महारथी जो उस कार्य़क्रम में बुलाए जाते हैं उनका भी मानना है उर्मिलेश जी की कुछ बात ही और थी। कविंद्र में अभी अनुभव की कमी है मीडिया विश्लेषक बनने के लिहाज से। बड़े बड़े पत्रकारों के सामने उनकी प्रस्तुति दब जाती है। ऐसे ही गिरीश निकम के निधन के बाद भी उनका शो तो चल रहा है पर नए एंकर अंग्रेजी के अलावा और कुछ नहीं साध पाए जबकि गिरीश निकम के दौर में देशभर में सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वालों के लिए गिरीश निकम का शो पसंदीदा हुआ करता था। ये शो भी कंटेंट औऱ प्रस्तुति के लिहाज से काफी नीचे पहुंच चुका है।

वहीं राजेश बादल की लाजवाब कार्यक्रम निर्माण शैली से भी राज्यसभा अछूता ही है। कुछ भर्तियां नए प्रधान सम्पादक के कार्य़काल में हुईं हैं। उनसे कामकाज में क्या सुधार हुआ है या होगा ये तो पता नहीं पर नई भर्तियों को लेकर विवाद जरूर दिखा। कहा गया साक्षात्कार को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती गई।

वहीं नीम पर करैला वाली कहावत तब चरितार्थ हो गई जब राज्यसभा टीवी के एक कर्मचारी ने सार्वजनिक रूप से चैनल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया।

मिरर का तो यही मानना है कि नए प्रधान सम्पादक गुरदीप सिंह सप्पल पर भारी तभी पड़ेंगे जब वो सप्पल जैसी टीम को तैयार कर पाएंगे। अगर सप्पल की बात करें तो उनका तो कोई चैनल के कामकाज में दखल था नहीं। बस उन्होंने सम्पादकीय टीम को फ्री हैंड दिया और शानदार टीम ढूढकर लाए। ऐेसे ऐसे लोगों को लेकर आए जिनका टीवी पत्रकारिता से कोई वास्ता नहीं था और यही लोग (गिरीश निकम, उर्मिलेश आदि) मील का पत्थर साबित हुए राज्यसभा टीवी के लिए।

नए प्रधान सम्पादक को बधाई हो.. बेहतर करेंगे तो बेहतर बनेंगे। इन्ही कामनाओं के साथ

नमस्ते।

  • प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

(एटीटर अटैक मिरर सम्पादक का नियमित कॉलम है। इस पर कोई प्रतिक्रिया देने के लिए मिरर के संपर्क में जाकर मेल कर सकते हैं। )

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