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मीडिया सेंटर कितना पास कितना फेल…

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बाखबर – राघवेन्द्र सिंह
(नया इंडिया में रोजाना)

मीडिया के भरोसेमंद होने का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि एक अखबार में खबर छपती है कि आज अवकाश है और लोग उसे पढ़कर आफिस और बच्चे स्कूल नहीं जाते। अलग बात है बाद में जिस रिपोर्टर की गलती से ये भ्रमपूर्ण खबर छपी उनकी अखबार से विदाई भी हो जाती है। ऐसी ही विश्वसनीयता को खरीदने बेचने वाले आज के जमाने में मीडिया मैनेजमेंट का नाम देते हैं। पार्टियां सत्ता में हो तो इस तरह के मैनेजमेंट के बिना माना जाता है कि पत्ता भी नहीं हिलेगा। चुनावी साल में ये मीडिया मैनेजमेंट का भूत भाजपा और कांग्रेस दोनों के सिर चढ़कर बोल रहा है। कौन मीडिया की विश्वसनीयता को मैनेज कर दागदार कर पाता है।
मीडिया से दोस्ताना ताल्लुकात तक तो ठीक लेकिन अपने मन मुताबिक संचालित करने की कोशिशें से दिक्कतें ज्यादा पैदा हो रही हैं। भाजपा के मीडिया सेन्टर के परफार्मेंस को लेकर प्रदेश के नेताओं और पार्टी हाईकमान भी खासा नाराज है। सेन्टर पत्रकारों से संवाद करने के बजाए पसंद न पसंद के बीच बंट गया है। प्रेस नोट से लेकर खबरों के प्रकाशन तक में पदाधिकारियों का कोई आग्रह नजर नहीं आता। ऐसी तमाम बातें हैं जिसके चलते सेन्टर के धुरंधरों से जवाब तलब भी होते रहते हैं। यह तब है जब प्रदेश सरकार के जनसंपर्क महकमे का टेका भी लगा रहता है। संवाद केन्द्र का आलम ये है कि पहले यह डाक्टरों के क्लीनिक की तरह सुबह शाम ही खुलता था। अब हालत और भी दयनीय है। दरअसल इस संवाद केन्द्र के सबसे पहले मुखिया प्रभात झा हुए थे जो अपनी सफलता के साथ राज्यसभा सदस्य,प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के ओहदे पर विराजे हुए हैं। सारे संवाद प्रमुख बनना तो झा की तरह चाहते हैं लेकिन मेहनत और पत्रकारों से दोस्ताना संबंध बनाने में पसंद न पसंद का ध्यान रखते हैं। इस तरह की तुलना से हाल के मीडिया प्रमुख लोकेन्द्र पाराशर स्वत: ही चर्चा में आ जाते हैं। हालांकि प्रभात झा के बाद दीपक विजयवर्गीय,विजेश लूनावत और गोविन्द मालू तक यह सेन्टर गरिमा और उपयोगिता के मान से बेहतर रहा। मगर इसके बाद भाजपा की सत्ता के चलते जनसंपर्क और माध्यम जैसे संस्थानों की मदद से मीडिया प्रमुख और मैनेजरों ने रिश्ते नातों की बजाए आर्थिक तराजू पर तोलना शुरू कर दिया। ज्यादातर झा की तरह राज्यसभा में जाने का सपना देखने लगे। इन सपनों पर फिर कभी विस्तार से बात करेंगे लेकिन मीडिया सेन्टर अपनों की लड़ाई और पत्रकारों में भेदभाव का केन्द्र बनने लगा। इस सबके चलते एक बार अमित शाह के एक कार्यक्रम की खबर तक अखबारों में छपने के लिए तैयार नहीं हो पाई थी। जिस पर मीडिया प्रमुख की खिंचाई भी हुई।
चुनाव के दौरान अब खबरों की निगरानी के लिए एक पदाधिकारी की नियुक्ति की गई है। यह दायित्व काफी पहले दे दिया जाना चाहिए था। कुलमिलाकर भाजपा के सेन्टर की हालत पतली है। पत्रकारों से प्रोफेशनल और दिल के रिश्ते कमजोर ही हैं। इस तुलना में कांग्रेस तंगहाली के बावजूद भाजपा से बेहतर संबंध भी बनाए हुए है और खबरों से जुड़े तार भी मजबूत हैं। इस पूरे मुद्दे पर मशहूर शायर बाकी सिद्धीकी का एक शेर सटीक है-
तुम जमाने की राह से आए, वरना सीधा था रास्ता दिल का।
पत्रकारों की पहली जरूरत खबर और दूसरी आत्मीय रिश्ते। फिलहाल तो ये दोनों ही ढ़ंढ़ने पड़ेंगे।

  • राघवेंद्र सिंह भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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