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“टोकने वाले लोग न्यूज रूम से हटा दिए जा रहे हैं”

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में रवीश कुमार।
रवीश कुमार।

सच कहा रवीश जी….
“टोकने वाले लोग न्यूज रूम से हटा दिए जा रहे हैं”

रविशकुमार जी को दो फीट ऊंचे मंच पर, 30 फीट दूर से देखने और सुनने का पहला मौका आज ग्वालियर में मिला। रवीश जी!! आपके जैसे हर पत्रकार को लगता होगा कि वो बिलकुल आपके जैसा है। जब आप अपने काम करने के तरीके और सोचने के ढंग को बयां कर रहे थे, तब मुझे भी स्वाभाविक रूप से यही लगा कि मैं भी रवीश के जैसा हूँ। लेकिन हकीकत में ऐसे कैसे कोई रविशकुमार हो सकता है?
हां ये हो सकता है कि पत्रकारिता में जो रवीश के साथ हुआ वो कहीं न कहीं किसी और के साथ हो रहा हो।
पत्रकारिता का धर्म सत्ता की आलोचना है। लेकिन जब, सत्ता आलोचना सुनना न चाहे और मीडिया संस्थान वित्त के निमित्त सत्ता का मुंह ताकने लगे तो सत्ता की आलोचना करना किसी पत्रकार के लिए व्यक्तिगत तौर से आसान नहीं रह जाता। क्योंकि सत्ता से लड़ने से पहले लगभग हर पत्रकारिता धर्मी को मीडिया संस्थान से लड़ाई लड़नी होती है।
रवीश जी आपने ठीक कहा कि- “भारत को मिटाने का जो काम अब तक चोरी छिपे हो रहा था वह काम सड़क पर हो रहा है” ऐसे में जिस मीडिया की भूमिका आलोचक मीडिया की होनी चाहिए थी वह मीडिया प्रलोभित मीडिया बनकर रह गई है।
ये सही है रवीश और सौ फीसदी सही है..
जिन लोगों को मैने नजदीक से आलोचनात्मक पत्रकारिता करते देखा था। उन्हें अब घर बैठा देख रहा हूँ। आपने सही ही कहा था कि-
“न्यूज़ रूम से उन लोगो को हटा दिया गया है या हटाया जा रहा है जो अपने ही मीडिया संस्थान के साथी और सीनियर को टोक दिया करते थे”
दरअसल कोई भी मीडिया स्थान गार्जियन की भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहा है। पत्रकार धर्मी लोगों की बात उनके संस्थानों को ठीक उसी तरह सुननी चाहिए थी जैसे एक रोते हुए बच्चे की बात मां सुनती है।
हैरानी होती है जब पता चलता है कि संस्थान सौतेले हो गए हैं। उनसे भी ज्यादा निष्ठुर हो गए हैं वे लोग जो खुद वहाँ नौकरी करते हैैं। आप उन्हें टोक नहीं सकते। उनसे शिकायत नहीं कर सकते उन्हें ये भी नहीं बता सकते कि उनके अगले कदम के नीचे खाई है।
एक डर होता है जो किसी भी औसत वेतन वाले पत्रकार को सताता है। वो डर है नौकरी चले जाने का। कम से कम मेरा ये डर आज जाता रहा, जब आपने कहा कि-
“इस डर का एक ही इलाज है कि एक बार नौकरी चली ही जाए”
आपकी ये बात भी अच्छी लगी कि- अगर आप किन्ही हुजूर के दवाब में नौकरी से निकाल दिए गए तो टी शर्ट पर लिखकर घूमेंगे कि नौकरी क्यूँ गई।
आज समझ आया कि आप ” दि रविशकुमार” हैं क्योंकि आपके संस्थान में अभी भी टोके जाने की स्वतंत्रता है और शिकायत सुनने के लिए ममत्व की भावना है”
ये दोनों ही बात शायद ही कहीं और दिखें..
क्योंकि मीडिया संस्थान अब एक पालतू बकरी की तरह हैं, जिसे कसाई को बेच दिया गया है। गर्दन कब तक सलामत है पता नहीं..
✍🏻— आपको सुनने के बाद …मैं
शिवप्रताप सिंह जादौन
“मीडिया जगत का एक फालतू आदमी”

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