Home > जरा हटके > द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट

द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

 

 मीडिया पढ़ाई के नाम पर गोरखधंधा

  • प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

दरअसल हमलोग निरे देहाती किस्म के लोग थे। शहर आया जाया करते थे पर शहर को समझा-जाना कभी नहीं और यहां के फ़रेबी लोगों से वास्ता नहीं पड़ा। इसलिए जब शहर पढ़ने के लिए आए तो हमें फ़रेबी इंसान भी पहले भलामानुष ही लगा।

हम बीए की पढ़ाई खत्म करके अपने मित्र के साथ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली आ पहुंचे। पापा ने कहा था पत्रकार बन जाओ, हमारे यहां एक पत्रकार थे उनका बड़ा जलवा था। मंत्री मिनिस्टर सब जानते थे। बस पापा ने ठान लिया पत्रकार बनाएंगे। हम भी अपना बैग उठाए और आ गए। फिर क्या पश्चिमी दिल्ली में किराए से एक कमरा लिया और गांव के मित्र के साथ रहने लगे। दरअसल हम जो गांव देहात के लोग होते हैं। दृढ़ निश्चयी बहुत होते हैं, फिर भले ही वो सपना पूरा हो या न हो। प्रयास जरूर करते हैं। सो गांव से चले थे भारत के सबसे बड़े विश्वविद्यालय जेएनयू में पढ़ने के लिए। गांव में बड़ा नाम सुना था। सुना था जेएनयू से एमए भी कर लो तो सीधे कलेक्टर ही बनते हैं। क्योंकि उसी समय हमारे क्षेत्र की लड़की जो जेएनयू से एमए कर रही थी रुचि श्रीवास्तव। वो कलेक्टर बनी थी।

खैर अब जब दिल्ली आ गए तो तलाश शुरू। तब पता चला जेएनयू में पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं है। जेएनयू से जुड़ा भारतीय जन संचार संस्थान यानी आईआईएमसी जरूर पत्रकारिता की पढ़ाई कराता है पर सिर्फ डिप्लोमा। पर मालूम चला की ये भारत का पत्रकारिता की शिक्षा देने वाला सबसे बड़ा संस्थान है। फिर क्या हमारे मित्र गए और दो एडमिशन फार्म ले आए। पूरी तरह याद नहीं पर शायद 500 या 700 का एक फार्म था। 2007 की बात है। फार्म घर आ गया। पूरा पढ़ा। मन ही मन बड़ी प्रसन्नता हो रही थी कि चलो देश के सबसे बड़े संस्थान में पढ़ने को मिलेगा। और सुना था वहां लड़कियां छोटे छोटे कपड़े पहनती हैं। तो ये उत्सुकता अलग से थी। हम जो गांव के लोग होते हैं। जो एकदम शहरी संस्कृति में रचते बसते हैं। वो किसी भी कार्य के प्रारंभ में ही सपने संजोने लगते हैं, अवरोध या समस्याओं पर मंथन नहीं करते। आईआईएमसी का फार्म हाथ में आय़ा नहीं कि हम तो सबड़े बड़े संस्थान के छात्र हो भी गए। जिस दिन फार्म लेकर मित्र आया उसी रात की बात है। खाना पीना खाकर हम लोग फोल्डिंग पलंग पर लेटे तो देखा कि मित्र बड़ी चिंता में था। पूछा भैय्या क्या संकट है। बोला यार फार्म तो ले आए पर फार्म भरने के बाद प्रवेश परीक्षा होगी वो कैसे पास करेंगे। फिर बोला कि देख अगर भारत के सबसे बड़े संस्थान की परीक्षा है तो सवाल भी कठिन होंगे। हम लोग देहाती लोग उतने पढ़े लिखे नहीं है। परीक्षा पास नहीं कर पाएंगे। हम भी चिंता में आ गए। लेकिन हमने कहा कि भैय्या कोशिश में क्या जाता है। परीक्षा देकर देखेंगे। तो मित्र बोले कि देखो यार हम जानते हैं न तुम्हारा निकलेगा न हमारा। बेकार में फार्म का पैसा बरबाद होगा। तो हमने कहा वो तो परीक्षा नहीं भी दोगे तब भी बरबाद होगा अब फार्म लौटेगा थोड़ा। तो मित्र बोले कि कल देखते हैं। जहां से लिया था वहां लौटा देंगे। अभी हमने भरा थोड़ी है। अंततः तय हुआ कि फार्म नहीं भरते। अगली सुबह फार्म लेकर आईआईएमसी पहुंचे। फार्म लौटाने लगे तो वहां कर्मचारी बोला कि लौटाने की व्यवस्था नहीं है। तो मित्र ने कहा कि क्या किया जाए हमारे लिए तो ये बेकार हैं। तब कर्मचारी ने कहा कि देखो आज लास्ट डेट है बहुत लोग खिड़की पर आएंगे लेने तो तुम बात करके अपने फार्म उन्हें दे देना। तो इसी तरह दोनो फार्म बिक गए। और हम दोनो आईआईएमसी से वंचित हो गए। कुछ लोग परीक्षा देकर फेल होते हैं पर हम दोनो आईआईएमसी से बगैर परीक्षा दिए ही फेल हो गए।

अब क्या हो। फिर भटकना शुरू। एकदिन दैनिक जागरण हाथ लगा। उसमें मीडिया संस्थानों का जिक्र था औऱ फोन नम्बर भी। एक नम्बर नोट किया और मित्र ने फोन घनघना दिया। वहां से बड़ी सुंदर आवाज आई किसी लड़की की हैलो एम श्वेता स्पीकिंग….. मित्र थोड़ा बहुत अंग्रेजी समझते थे बांकी हम भी फोन से कान चिपकाए थे। बात हुई कि हम लोग पत्रकार बनना चाहते हैं। तो मैडम बोलीं कल आइए और फार्म भर दीजिए। फिर परीक्षा होगी फिर नाम शार्ट लिस्ट किए जाएंगे। अगर सीट के आधार पर आपका नाम आ गया तो पढ़ाई शुरू। फीस भी बता दी। अगले दिन ही हम लोग अपनी पल्सर मोटरसाइकिल पर बैठ पहुंच गए मैडम के बताए पते पर। देखा बोर्ड शोर्ड तो लगा था पर पूरा संस्थान कुल सौ गज जगह पर बना था दो मंजिला। घुसते ही मिनी स्कर्ट में हौकके मेकप चुपरे एक मैडम जी मिलीं। हम समझ गए यही हैं श्वेता जी। हमने अपना परिचय दिया लजाते लजाते औऱ उन्होंने खिटिर पिटिर अंग्रेजी में अपना इठलाते लहराते। फिर बोली कि चलिए आपको कॉलेज दिखा दें। अलग अलग कमरों में ले गईं। चूंकि ये मीडिया के साथ साथ एक्टिंग कॉलेज भी था तो अमिताभ बच्चन से लेकर हिमानी शिवपुरी, अनुपम खेर आदि के हस्तलिखित शुभकामना संदेश कालेज के नाम टंगे थे। हालांकि ये पत्र संबंधित कलाकारों ने ही लिखे इस पर हमे पूरा शक था। जंका मंका फुल था। दीवारे एकदम प्लास्टिंक नुमा। प्लेसमेंट असिस्टेंस, प्लेसमेंट, चैनल विजिट फलाना ढिमका। गोरी मैम की बातों और अदाओं का जादू असर कर रहा था। हमने फार्म खरीद लिया फिर से 2 और हमें तत्काल ही प्रवेश परीक्षा की डेट मिल गई। हालांकि मित्र तो कुछ नहीं बोला पर हमारे मन में जरूर था कहां देश के सबसे बड़े संस्थान में पढ़ने आए थे कहां ये सौ गज के घर में आ गए। वो कॉलेज तो कहीं से लग नहीं रहा था। अगल बगल में लोग रहते थे। इस कालेज के ऊपर भी परिवार रहता था और उसके कपड़े बगैरह सूखते रहते थे। हम थोड़ा असंतुष्ट थे पर दोस्त बोला अपने को पढ़ने से मतलब है यहां फैकल्टी बढ़िया हैं।

जो प्रोसपेक्टस दिखाया था उसमें सभी फैकल्टी किसी मीडिया हाउस से जुड़ी थीं। तो हम लोगों ने प्रवेश परीक्षा दी। वो महज औपचारिक थी और फिर एकदिन फोन आया कि आप दोनो का चयन हो गया है। हालांकि हमें पता था चयन होना ही है। खैर जो है सो है। खादी का कुर्ता और जींस पहनकर हम दोनो फिर पल्सर पर बैठे और हवा हो गए। पहले दिन परिचय सरिचय हुआ। आदि आदि। दिन गुजरे महीने गुजरे। जंका मंका धीरे धीरे कम होने लगा। वो एडमिशन प्रक्रिया खत्म हो गई तो वो गोरी मैडम भी गायब हो गई रिशेप्शन से, जिसका हम दोनो को दुख था। एकदिन हमे बताया गया कि आपका ये कॉलेज पीटीयू यानि पंजाब टेक्निकल युनिवर्सिटी से एफ्लीएटेड है। प्रोसपेक्टस में भी यही लिखा था। प्रोसपेक्टस तो ऐसा बना था लगभग 50 पेजों का कि ऑक्सफोर्ड भी फेल हो जाए। लड़के को लगे बस जो है यही कालेज है। वो आज भी पड़ा होगा कहीं। दिन में दो क्लास होतीं। व्यवस्था ऐसी थी कि एक फैकल्टी सप्ताह में एक बार ही आती। 7 दिन 7 फैकल्टी। उनमें से दूरदर्शन के बुढ़ऊ एंकर वेद प्रकाश को छोड़ दें तो कोई नामी गिरामी नहीं था। वेदप्रकाश भी आते टपर टपर अंग्रेजी बोलते और किताब उठाकर लिखवाने लग जाते। मतलब पूरे सालभर कोई ऐसी न्यूज पर्सनाल्टी इस संस्थान में नहीं आई जो लोकप्रिय हो। कोई प्रेक्टिकल नहीं, कोई बताने और समझाने वाला नहीं। हां चैनल विजिट जरूर साल के अंतिम महीने में भेजा जाने लगा। परीक्षा जब पास आने को हुई तो एक दिन इस संस्थान का निदेशक आय़ा और बोला किसी कारणवश हमारा कालेज पीटीयू से अलग हो गया है अब ये गुरु जम्भेश्वर विवि. से एफ्लीएटेड हो गया है। तो आप लोग फार्म भर दीजिए। हम लोगों ने फार्म भर दिए। पेपर की डेट से 2 दिन पहले बताया गया कि आपके पेपर कालेज में नहीं बल्कि रोहणी की किसी जगह में होंगे। हम लोगों को कुछ पता ही नहीं चल रहा था कि ये क्या हो रहा है।

हम लोग तो यही सोच रहे थे कि कालेज में ही परीक्षा होगी। खैर हम लोग बताए गए स्थान पर परीक्षा देने पहुंचे तो वहां परीक्षक ने पूछा कहां से आए हो तो हमने इस कालेज का नाम बताया। तो वो बोला ऐसा कोई कालेज यहां लिस्ट में नहीं है। तब एक अन्य व्यक्ति आय़ा और बोला सर ये लोग फलाने कालेज से हैं और हम 15 के लगभग छात्र अंदर जा पाए। दरअसल जहां गोरी मैम को दिखाकर और सुनवाकर हमे ठगा गया था वो कोई कालेज ही नहीं था। वो तो कह सकते हैं कि कोचिंग सेंटर था। उसका किसी भी विश्वविद्यालय से किसी तरह का कोई करार था ही नहीं। वो तो किसी दूसरे कालेज से जुगाड़ करके गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय के दिल्ली स्थिति दूरस्थ परीक्षा केंद्र में हम लोगों को परीक्षा दिलवाने के लिए बस काम करता था। यूनिवर्सिटी की मामूली फीस लगभग 8 हजार थी और इसने हमसे उस समय 50 हजार वसूले थे। तो ऐसे ये सीधे सीधे 42 हजार एक छात्र से कमा रहा था। तो ऐसे दिल्ली में मीडिया कालेज के नाम पर गोरखधंधा चल रहा है। हम लोग ठगे गए। पर गनीमत रही परीक्षा दे दी और वो भी ठीकठाक विश्वविद्यालय से। पर पूरी तरह से इस कालेज ने छात्रों से धोखा किया। इतना ही नहीं ये कालेज छात्रों से अलग अलग विश्वविद्यालयों में किसी समारोह के अवसर पर अपना प्रचार भी करवाता, पम्पलेट भी बंटवाता। सौ गज के इस दड़बे में एक्टिंग, वाइस ओवर, वीडियो एडीटिंग, डासिंग, माडलिंग, एंकरिंग, पत्रकारिता और न जाने जाने क्या क्या सिखाने का दावा किया जाता। फुल नौटंकी। पर हम लोग फंस चुके थे औऱ मजे की बात ये कि इस संस्थान में मूलरूप से दिल्ली के बेहद कम लोग थे, हम जैसे देहाती ज्यादा थे। ज्यादातर हरियाणा, फिर बिहार औऱ हम दो मध्यप्रदेशी।

परीक्षा हुई। इनकी करतूत हमे पता लगी कि ये कालेज तो फर्जी है। इसे तो परीक्षा दिलवाने का भी अधिकार नहीं है। तो हमने तो निश्चय कर लिया कि अगले साल सीधे कहीं और से पढ़ेंगे तो यहां से अलविदा किया। जब चले आए तो पता लगा कि कालेज की ही एक फैकल्टी ने जो डांस सिखाता था। अपनी एक छात्रा को घर बुलाया औऱ कोल्ड्रिंक में नशे की गोलियां मिलाकर दे दीं फिर रेप किया। एमएमएस भी बनाया। पुलिस केस हुआ। लड़की पत्रकारिता की थी औऱ डांस क्लास भी करने लगी थी। हम सबको पता पड़ा। लड़की ने कालेज आना छोड़ दिया। शायद फैकल्टी को जेल हो गई बाद में। हालांकि वो हरामी जो डांस टीचर था लम्बी लम्बी जुल्फों वाला। वो जब लड़कियों की कमर पकड़कर बड़े से शीशे के सामने लटके झटके मारता तभी मुझे कुछ गड़बड़ लगता था पर चूंकि लड़कियां टीचर से ज्ञान ले रही थीं तो हमने बोलना उचित नहीं समझा। तो साथियों हम तो दूसरे साल इसे छोड़ सीधे गुरु जम्भेश्वर विवि से जुड़ गए। पर ये कालेज आज भी हम जैसे छात्रों को लूट ही रहा होगा। अगली कड़ी में अपने पत्रकारिता की शुरूआत हो जाएगी। वहां भी आपको रंगीन-संगीन किस्से पढ़ने को मिलेंगे।

…..जारी

अगली कड़ी अगले सोमवार को।

( मैं इस डायरी को प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित करूंगा, जिसमें मेरे दस वर्ष की पत्रकारिता का लेखा जोखा होगा। ये डायरी पूरी तरह से वास्तविकता पर आधारित है। संस्थान या व्यक्ति विशेष का नाम लिखकर मैं आज भी उनकी मानहानि का इरादा नहीं रखता – प्रशांत राजावत

Share this: