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मास्टरनी की आपबीतीः सुडौल छात्र हमारी छाती नापते हैं

मास्टरनी
तस्वीर प्रतीकात्मक है। साभार-गूगल

 

देखा कि 10,11, 12 वीं के लड़के बहुत भद्दे प्रकार की अंडरवियर में मेरे सामने खड़े थे। हुआ ये कि झिझककर मुझे वापस आना पड़ा। वो क्षण ऐसा था जैसे मैं किसी कोठे में पहुंच गईं हूं और ये सब मेरे खरीददार।

 

मास्टरनी। हां मैं मास्टरनी हूं। वही मास्टरनी जिसे देश का सबसे आरामदायक और सुरक्षित पेशा समझा जाता है। मैं इसी पेशे में हूं। आमतौर पर यही समझा जाता है कि मास्टरनी की नौकरी बड़े आराम की नौकरी है। 4 से 5 घंटे स्कूल और बच्चों को पढ़ाकर घर वापसी।

सुना था मैंने एक दौर था। जब महिला शिक्षक सम्मान पाती थीं और कक्षा में आत्मगौरव से पढ़ाती थीं। मजाल क्या कोई छात्र आंख उठाकर देख ले। पर अब समय वो नहीं है। अब स्कूल पहले की तरह मंदिर नहीं हैं। वो महज एक शिक्षा व्यापार का केंद्र हैं। जहां मास्टरनी के मान-सम्मान से ज्यादा महत्वपूर्ण है एक छात्र को स्कूल में बनाए रखने वाला माहौल देना। भले ही छात्र या उसके परिजन कितने ही उद्दंड क्यों न हों।

अब स्कूल मंदिर नहीं रहे तो फिर शिक्षक भगवान कैसे हुए। कक्षा में रहना अब टॉर्चर रूप में रहने जैसा है। समय तेजी बदल गया है। अगर कोई महिला या लड़की स्कूल जा रही है पढ़ाने जो आपके घर की है। तो आप बिल्कुल ये न सोचें कि वो वहां सहज है। आठवीं कक्षा से ऊपर 12वीं तक के जो बच्चे हैं। वो अब पहले जैसे बच्चों की तरह नहीं सोचते और रहते। आजकल के ये छात्र पूरे परिपक्व हैं। इनकी देह सुडौल है.. हाथों में इंटरनेट से लैस मोबाइल हैं। और दिमाग में खुराफात। मास्टरनी कक्षा में कितना असहज हो जाती होंगी। ये मेरे सिवा आपको कौन बता सकता है। मैं हर रोज स्कूल जाती हूं। पर हर अगले दिन के लिए मुझे मानसिक रूप से तैयार होना पड़ता है। मुझे अब रास्ते में छेड़छाड़ का डर नहीं होता। मुझे डर होता है अपने ही स्कूल की अपनी ही कक्षा में अपने ही छात्रों से छेड़छाड़ का। जी हां। और ये डर सिर्फ मुझे नहीं मेरे जैसी तमाम मास्टरनियों को होता होगा। जब मैं पढ़ा रही होती हूं। तो मेरे पल्लू को मेरे ये छात्र खींच देते हैं। मैं नजरअंदाज कर देती हूं। मेरी छाती को ये स्कैन करते हैं, मैं नजर अंदाज कर देती हूं। क्लास के वक्त मोबाइल पर पोर्न फिल्मस की आवाज निकालते हैं आपस में। मैं नजर अंदाज कर देती हूं।

मैं नजरअंदाज कर देती हूं सबकुछ। पर ये सब बेहद खतरनाक है। मैं इन्हें डांट नहीं सकती। ये भरे पूरे शरीर के पूरे मर्द हैं। इनको डांटने का मतलब है अपने फोन पर धमकियों को आमंत्रण देना। राह चलते आफत बुलाना। ह्वाटसएप पर अश्लील संदेशों को आमंत्रित करना। ये सब इसमें माहिर हैं। आप स्कूल प्रबंधन से या इनके अभिभावकों से शिकायत करेंगे तब भी आपको खुलेआम ये धमकियां देंगे। स्कूल में इनके हावभाव देखिए। चुस्त कमीज, खुले बटन। बैग में सिगरेट, लाइटर, कंडोम से लेकर चाकू छुरी भी। अब हाल पहले जैसे नहीं रहे। मुझे याद पड़ता है कि कैसे मैं जब एक स्कूल में नई नई पहुंची थी और बॉयोलाजी पढ़ाना शुरू की। कुछ ही दिन बाद छात्र खड़े होकर ये मांग करने लगे कि हमें आठवां अध्याय पढ़ाया जाए। मैं आश्चर्य में थी कि अचानक से आठवें अध्याय की मांग क्यों। जबकि शेष अध्याय बाकी बचे हैं। तब घर जाकर देखा आठवें अध्याय में गुप्तांगों की बनावट के साथ उनकी क्रियाओं का वर्णन था। दरअसल वो मुझे असहज करना चाहते थे। और आप यकीन नहीं मानेंगे वो आठवां अध्याय मुझे स्कूल प्रिंसिपल की मौजूदगी में पढ़ाना पड़ा। जबकि आमतौर पर ऐसी स्टडी मास्टरनी केवल लिखवाती हैं उस पर लेक्चर नहीं दे पातीं।

ये बड़ा खतरनाक दौर है। मैं बोर्डिंग स्कूल का हिस्सा थी एक समय। मैंने देखा कि हास्टल से बहुत शिकायत आ रही हैं। वार्डन कहती थी छात्र बहुत परेशान करते हैं। कंडोम पड़े रहते हैं। स्पर्म भरे हुए कंडोम वार्डन के घर में डाल जाते हैं। नंगे घूमते हैं। तो अचानक एक कमेटी बनी और मुझे इंचार्ज बनाया कि आप जाइए ब्वायज हास्टल का दौरा कीजिए और रिपोर्ट दीजिए। मैं दौरे में गई। लड़कों को पहले ही पता लग गया और देखा कि 10,11, 12 वीं के लड़के बहुत भद्दे प्रकार की अंडरवियर में मेरे सामने खड़े थे। हुआ ये कि झिझककर मुझे वापस आना पड़ा। वो क्षण ऐसा था जैसे मैं किसी कोठे में पहुंच गईं हूं और ये सब मेरे खरीददार। ये आरोप नहीं हैं मेरी ओर से। ये आधुनिक समाज औऱ विकास की देन है। जहां मां-बाप को वक्त ही नहीं बच्चों को संस्कार देने के लिए। वो महज शिक्षा के नाम पर बच्चों को स्कूल भेजकर इतिश्री कर लेते हैं। स्कूल में उनका व्यवहार ये होता है, तो समाज में जो होता है उसका परिणाम हम आप आएदिन अखबारों में पढ़ते ही हैं।

मेरी एक सहकर्मी बताती है कि दो छात्र जो आपस में बात कर रहे थे कि जिम जाकर बढ़िया बॉडी बनाना है औऱ दिल्ली में टाइम पास प्ले ब्वाय का काम करेंगे। ये छात्रों की सोच है। हर छात्र की नहीं है, पर है। पब्लिक स्कूलों में ये छात्र बेहूदगी की हद तक प्रदर्शन करते हैं। कभी शिक्षिकाओं को लव लेटर लिखते हैं या ह्वाट्सएप करते हैं। तो क्लास की लड़कियों के कंधे में हाथ डाले कहीं स्मूच करते मिलेगे तो कहीं बहुत भद्दे तरीके से चिपके हुए। उन्हें हमारी उपस्थिति से कोई परेशानी नहीं। पिछले दिनों यमुनानगर में एक छात्र ने स्कूल प्रिंसिपल को गोली मार दी थी। क्योंकि प्रिंसिपल लड़के की स्कूली हरकतों को मां बाप से बोलने के लिए कह रही थी और उसे रेस्टीकेट करने को। ऐसे में कौन ऐसा साहस करेगा। मां-बाप की बात पर आते हैं। मां-बाप से अगर बोला भी जाए तो वो अपने बच्चों के खिलाफ नहीं जाते। शायद सब जानते हुए भी नहीं। मैंने देखा है। दिल्ली एनसीआर के जितने भी बड़े पब्लिक स्कूल हैं। इन सभी के बच्चे जो कि 14 से 20 वर्ष के हैं। गुड़गांव, दिल्ली, सोनीपत में अवैध हुक्का बारों में पार्टियां करते कई बार पकड़े गए हैं। ये सभी बड़े घरों के लड़के हैं। सबके साथ छोटे छोटे कपड़ों में लड़कियां होती हैं। लड़कियों के साथ ये बारों में खुलेआम इंटीमेट होते हैं। ड्रग्स लेते हैं। नशा करते हैं। महंगी महंगी गाड़ियों से जाते हैं। देर रात वापस आते हैं। मुझे नहीं पता इन बड़े घरों के लड़कों-लड़कियों के बारे में इनके मां बाप को कितना पता होता है। ये कई बार पुलिस रेड में पकड़े भी जाते हैं। बावजूद मां-बाप क्या एक्शन लेते हैं। ये बड़ा सवाल है। इतना ही नहीं पब्लिक स्कूलों के ये बच्चे कॉल गर्ल के पास जाते हैं। ये इकट्ठे होकर काल गर्ल बुलाते हैं। अवैध हुक्का बारों में पकड़े जाते हैं। हास्टल में ही गंदी हरकते करते हैं। क्लास में पोर्न देखते हैं। बिना इजाजत आते औऱ जाते हैं।

ऐसे में डेढ़ पसली की मास्टरनी जिसे कुछ पैसों में घर चलाना है और घर चलाने के लिए नौकरी बचाना है। उसकी क्या मजाल इन छात्रों जैसे दिखने वाले लड़कों से दो दो हाथ करे। नही करती वो। बल्कि वो खून का घूंट पी पीकर नौकरी करती है। बड़े बुरे हालात में पब्लिक औऱ बोर्डिंग स्कूलों के। स्टडी होना चाहिए। छात्रों की काउंसलिंग होनी चाहिए। छात्रों और महिला शिक्षकों के बीच व्यवहार पर सर्वे रिपोर्ट बननी चाहिए। वरना देश में रेप होते रहेंगे, छेड़खानी बढ़ती रहेगी और हम मोमबत्तियां जलाते रहेंगे, शांति मार्च निकालते रहेंगे और कभी कभार गुस्सा भी… पर बेहतर होगा कि हम स्कूलों में ही ऐसी व्यवस्था करें जिससे ये छात्र बाहर जाकर मनुष्य बनें न कि हैवान….

कुछ लोगों को लग सकता है मेरे आऱोप झूठे हैं.. आवश्यक्ता से अधिक हैं। या कुछ प्रतिशत सही है। या सब छात्र ऐसे नहीं हैं। आपका सोचना जायज है। पर अब कुछ-कुछ से बढ़कर संख्या बहुत कुछ में पहुंच रही है। या तो ये बात मान लीजिए या आपको मानने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

बात खत्म करें इससे पहले बता दूं कि हमारे स्कूल में प्ले में बच्चे पढ़ते हैं। वहां एक टीचर है। वो मुझसे कह रही थीं कि एक बच्चा जो अक्सर टिफिन लाता और मुझसे बोलता मैम आप भी खाइए। एकदिन टीचर से बोलता है मैम जींस की जिप खोलकर दिखाओ न अंदर क्या है। मुझे देखना है। ये सच है। प्ले का बच्चा जो बस ठीक से बोलना सीख पाता है। वो आखिर किस वातावरण में पोषित हो रहा है जहां उसे ये सवाल करने की समझ विकसित हो रही है। उसे एहसास है कि जींस की जिप के पीछे कुछ चीज है जिसे वो देखना चाहता है। पता लगाना चाहिए कि ऐसे बच्चों के मां बाप आखिर उसे मोबाइल में गेम के साथ साथ कहीं पोर्न सामग्री भी तो नहीं दिखा रहे। जिस मास्टरनी से ये बोला उस बच्चे ने वो शर्म के मारे लाल हो गई क्योंकि वहां उसके पुरुष सहकर्मि भी मौजूद थे। और हां छात्राएं मैं उन्हें कोई लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड नहीं दे रही। उनकी भूमिका भी संदिग्ध है। जवान होती छात्राएं और विकसित होते शरीर को देखते हुए कई बार स्कूल में उन्हें सतर्क किया जाता है। पर नियमों को तोड़कर हास्टल में लड़कों को दाखिल कराना, देर रात हास्टल में लौटना, स्कूल में ही छात्रों को किस करना ये आम है। एक बार मैं एक स्कूल में थी मैंने देखा कुछ छात्राएं ड्रेस की स्कर्ट बेहद छोटी पहनकर आ रही थीं, हमने मना किया कि आपके लिए स्कूल के हिसाब से उपयुक्त नहीं है। छात्राओं ने सीधे तौर पर हमारी बात को दरकिनार कर

दिया और कहा निजी जीवन में दखल क्यों। जबकि ये स्कर्ट बहुत ही आपत्तिजनक थीं।

हां मैं मास्टरनी हूं और मास्टरनी होना अब आसान नहीं रहा…

  • एक मास्टरनी
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