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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट-भाग-2

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

प्रशांत राजावत- सम्पादक मीडिया मिरर

डायरी के पहले भाग में हमने आपको बताया था कि कैसे हम गांव से दिलवालों के शहर दिल्ली आए और वहां मीडिया की पढ़ाई के नाम फर्जी कालेज के जाल में फंसे। डायरी की दूसरी कड़ी में हम आपको बताएंगे कि कैसे प्रशिक्षु पत्रकार यानि ट्रेनी जर्नलिस्ट बनने के लिए हमने एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन-तीन राज्यों की खाक छानी और मिला क्या शून्य बटे शून्य।

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        दिल्ली, मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ से लाइव..

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जनसंचार एवं पत्रकारिता से एमए (प्रथम वर्ष) पूरा करने के साथ ही हमें एहसास हो चला था कि भारत में पत्रकारिता एवं जनसंचार का जो पाठ्यक्रम है वो निहायत बकवास है। इसका प्रायोगिक पत्रकारिता से कोई लेना देना नहीं। किताबों में जो लिखा है पत्रकारिता दरअसल उससे ठीक विपरीत होती है। मैंने दूसरा साल नियमित नहीं किया और तय किया की नियमित कक्षा लेने से बेहतर है कि किसी अखबार में काम सीखा जाए। तो शुरू हुई अब इंटर्नशिप की दौड़। चूंकि दिल्ली में पढ़ रहे थे औऱ दिल्ली वैसे भी मीडिया का गढ़ है। तो सोचा कि सबसे पहले यहीं कुछ खोजा तलाशा जाए। बतौर छात्र मैंने जो महसूस किया और सहन किया वो पीड़दायक था। खासतौर पर तब जब आपके पास बहुत ज्यादा सिफारिश न हो औऱ आप बिहार से न हो। मुझे माफी के साथ कहना पड़ रहा है कि दिल्ली की मीडिया में प्रवेश के लिए बिहारी होना काफी उपयोगी साबित हो सकता है। मैंने अपनी आंखों के सामने कई उदाहरण देखे हैं। इसलिए कह पा रहा हूं।

बहरहाल मैं छात्र था। वो भी फर्जी कॉलेज का। पर जो भी है। फैकल्टी तो वहां आते ही थे। जो किसी से न किसी मीडिया संस्थान से खुद को सम्बद्ध बताते थे। बतौर छात्र सबसे पहले उसके लिए उसके शिक्षक ही सबसे बड़ा सोर्स होते हैं। तो मैंने भी क्रमशः अपने शिक्षकों को टटोला। बहुत विस्तार में नहीं जाऊंगा लेकिन कोई मुझे नौकरी तो दूर इंटर्नशिप के लिए भी आगे नहीं आया। चूंकि जब आप परेशानी से घिरे होते हैं तो हर चेहरे में आपको दाता ही नजर आता है। तो एक मैम मिलीं। जो कि कुछ समय के लिए हमारी फैकल्टी थीं। उनको अपनी पीड़ा बताई। तो उन्होंने बड़ी दयालुता का भाव प्रकट करते हुए एक नम्बर दिया जो कि उस समय लाइव इंडिया चैनल के किसी वीडियोग्राफर का था। बोलीं वहां चले जाना आपकी मदद करेंगे। जब हम छात्र होते हैं और हमें रोजगार की तलाश होती है। तो वो दौर ऐसा होता है कि कोई अवसर हम खोना नहीं चाहते। सो अगले ही दिन हम वहां पहुंच गए। स्वागत कक्ष में आगंतुक रजिस्टर में नाम दर्ज कराया औऱ कहा फलाने से मिलना है। तकरीबन आधे घंटे बाद वो साब आए। चैनल के अंदर ले गए। स्टूडियो दिखाया।

वहां जो बड़े-बड़े कैमरे चल रहे थे, उनके बारे में नाम-काम सहित बताया। ये सब हमारे लिए एकदम नया था। वो अभी सिर्फ विजिट ही करा रहे  थे। इधर हम सपने पालने लगे। हमने कहा न गांव के लोग सपने बहुत देखते हैं। कुछ खूबसूरत एंकरों से भी मिलवाया और हमनें बस लजाते लजाते उनके हाय के जवाब में हाथ जोड़ नमस्कार किया। फिर हम बाहर आ गए सर के साथ। बाहर आते ही सर बोले कि देखो हम आपको 2 से 3 महीने काम सिखाएंगे। शूट पर ले जाएंगे और उसके बाद कहीं काम मिल जाएगा। हमने कहा ठीक है। तो बोले कि 15 हजार रुपए प्रति महीना लगेगा। जैसे ही रुपए बोले हमे लगा कि ये हमसे नहीं हो पाएगा। हमें लगा कि सिखाने के नाम ये ठग टाइप का व्यक्ति है। हमनें कहा ठीक है सर। घरवालों से पूछकर बताते हैं। जब आप घर वालों पर आश्रित होते हैं तो निर्णय भी वही करते हैं। हालांकि ये निर्णय हम पहले ही कर चुके थे कि हम पैसे देकर कुछ नहीं सीखने वाले।

उसके बाद पिताश्री को बताया। वैसे तो हमारे घर में ठीकठाक राजनैतिक दखल था। कांग्रेस की सरकार थी। पिताश्री कांग्रेस के जिला अध्यक्ष रहे, फिर प्रदेश महामंत्री रहे। बहन केंद्रीय संचार मंत्रालय और परिवहन मंत्रालय के बोर्ड में थीं। पर कहते हैं न कि अपनो के लिए अपने किसी से काम को कहने के लिए संकोच करते हैं। ऐसा मेरे साथ ही नहीं है सबके साथ होता है। बावजूद पिता जी के मित्र थे जो कि बीजेपी कार्य़ालय अशोका रोड में मीडिया का कार्य़भार देखते थे। पिता जी ने कहा उनसे मिल लेना। एकदिन उनके पास पहुंच गए। बड़ा दिव्य व्यक्तित्व, बड़े बड़े पत्रकार माइक वाइक लिए उनके साथ बैठे थे। हमें लगा यहां कुछ बात बनेगी। उन्हें परिचय बताया बड़े प्यार से पेश आए। हमने बताया कि मीडिया की पढ़ाई कर रहे हैं। अब ट्रेनिंग करना है। उन्होंने नाश्ता वास्ता करवाया। काफी बात की। पर मीडिया पर काम के नाम पर नाक सिकोड़कर बोले बेटा बहुत शोषण है यहां। जिंदगी पूरी लग जाती है।

रोज सैकड़ों पत्रकार आते हैं। गिड़गिड़ाते हैं बाइट के लिए। कोई लाइफ नहीं है। दिनभर ये सब मुझसे अपना दुखड़ा रोते हैं। कुछ नहीं है इस लाइन में। चूंकि हम रंगरूट थे वो क्या कहते हैं अंग्रेजी में बडिंग जर्नलिस्ट। सो कहां मानने थे इतनी जल्दी। हमने उनसे राम राम की औऱ पिता श्री से कहा हम आ रहे हैं घर (मध्यप्रदेश)। वहीं कुछ देखेंगे। फिर क्या पहुंच गए दिल्ली से अलविदा कहकर। वक्त ये 2008 का है। 21-22 साल उम्र। घर पहुंचे तो पापा ने कहा जाओ भोपाल वहां कुछ मित्र हैं उनसे मिलो। बैग उठाया भोपाल रवाना। उस समय संयुक्त संचालक जनसम्पर्क विभाग मध्यप्रदेश शासन मेरे पिताश्री के मित्र के अनन्य मित्र थे। नाम लिखना उपयुक्त नहीं होगा। जानने वाले जान ही जाएंगे कि 2008 में कौन था संयुक्त संचालक। खैर पिता श्री के मित्र के साथ उनसे मिलने गया। पिता श्री के मित्र दतिया महाराजा वीर विक्रम सिंह के साढ़ू थे और निवाड़ी के रसूखदार लोगों में से एक। संयुक्त संचालक उन्ही के गांव के थे।

चूंकि जिनके साथ गया था वो राजा साब थे। तो जैसे ही संचालक जी के पास पहुंचे, संचालक जी कुर्सी छोड़ खड़े हो गए। राजा जी औऱ मैं संचालक जी के सरकारी निवास की सरकारी सोफों में धंस गए औऱ जूस बूस चलने लगा और राजा जी औऱ संचालक जी व्यस्त हो गए पुरानी यादों में। बातों बातों में राजा जी बोले ये बच्चा मेरे मित्र हैं अजाक्स के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उनके सुपुत्र हैं। दिल्ली से पढ़ाई की है। कहीं देख लीजिए इसका। राजा जी कहें और संचालक जी न सुनें। ऐसा हो ही नहीं सकता। क्योंकि राजा जी के सामने तब भी संचालक जी 90 अंश में झुककर हुकुम करके ही लगे थे। खैर हमे याद पड़ता है कि संचालक जी ने कहा बहुत प्यारा बच्चा है। कितनी चमक है इसमें। उनकी तारीफ से मुझे खुशी हुई। उसके बाद उन्होंने कहा कि अपना बायोडाटा दे दो। पत्रकार आते रहते हैं। कही न कहीं हो जाएगा। उनके घर में वो भुतहा टाइप सफेट बॉडी वाला कम्यूटर था, उसीसे तुरंत बायोडाटा निकलवाया औऱ प्रिंटर भी था, तुरंत प्रिंट हाथों में दे दिया। संचालक जी से विदा ली पूरी तरह से आश्वस्त होकर कि अब तो किसी बड़े अखबार या चैनल में पत्रकार बन ही गए।

फिर आ गए। उस समय हम रुकते भी बिधायक ब्रजेंद्र सिंह राठौर के यहां ही थे। वो राजा साब के मित्र थे। राठौर साब का भतीजा उस समय 12वीं का छात्र था जो बताया करता था हमसे भोपाल प्रवास के दौरान कि अपन तो लालबत्ती लगाकर स्कूल जाते हैं। फुल माहौल। फिर अगले दिन राजा साब बोले कि प्रशांत भैय्या एक दो जगह आपको औऱ मिलवा दें। हालांकि वो मुझे आश्वस्त करते जाते थे इन सारेन का मजाल हो जो हमाओ कहो रोक दें। उनकी वही बुंदेली टोन थी। उन्होंने कहा कि आल इंडिया रेडियो में कोई परिचित है। वहां चलते हैं। भोपाल कॉफी हाउस है, वहां मुलाकात तय हुई। रेडियो वाले साब से भी मिले, वो भी बड़े प्यार से मिले। राजा साब को देखते ही चाय नाश्ता और सम्मान भी दिया। फिर एक बायोडाटा दिया गया। रेडियो वाले साब बोले अरे चिंता मत करो हो जाएगा।

रेडियो वाले साब हमे मंगलू टाइप लगे पर हमने कहा चलो दाता तो ईश्वर रूप होता है। मेरी नजर का धोखा है। फिर अगले दिन एक और पत्रिका वाले से मिले। उन्हें भी एक बॉयोडाटा दिया। फिर एक दैनिक अखबार वाले से मिले। उन्हें भी एक बायोडाटा दिया और सब से बाए बाए कहकर घर आ गए। कि चलो कुछ दिन बाद कहीं न कहीं से बुलावा आएगा ही। हां एक खास बात ये जरूर थी भोपाल में जिससे भी मैं मिलता और जब वो मुझे नौकरी दिलवाने के प्रति आश्वस्त करता तो मेरी आंखों की चमक दो गुनी-तीन गुनी हो जाती। घर आय़ा तो पूरे आत्मविश्वास के साथ। घर में भी सब चकाचक कि अब बस किसी भी दिन फोन आने वाला है। पर होना कुछ और ही था, कहीं से कोई फोन नहीं आया। महीनों बीत गए। अब पिता जी ने कहा कि चलो कोई बात नहीं तुम दैनिक भास्कर के जिला कार्य़ालय में जाओ औऱ जो यहां से अखबार निकलते हैं दैनिक। चूंकि पिताश्री को ज्यादातर पत्रकार जानते थे औऱ जो नहीं जानते थे उनतक पहुंचा ही जा सकता था किसी सोर्स के माध्यम से।

तो अब स्थानीय समाचार पत्रों में भटकना शुरू। सबसे पहले गए दैनिक भास्कर। दैनिक भास्कर में एक वरिष्ठ संवाददाता से मीटिंग फिक्स हुई। पिताश्री के साथ हम उनसे मिले। बड़ा अच्छा रिस्पोंस दिया और बोले कि अरे करवा देंगे। उन्होंने कहा कि करवा देंगे इधर चमक फिर बढ़ गई। उम्मीदें जब धूमिल पड़ जाएं और वहां फिर जरा सी रोशनी दिखे तो चमक बढ़ ही जाती है। भास्कर के रिपोर्टर बोले (जिनका जिले में ठीक ठाक नाम था) कुछ दिन बाद मैं आपके बेटे को फोन करूंगा। घर आ गए और एक एक दिन मानो उनके फोन की प्रतीक्षा में ही बीत रहा था। वो प्रतीक्षा मानो प्रियतम की प्रतीक्षा से ज्यादा प्रासंगिक थी। ऐसे में एक दिन उनका फोन आय़ा। सर्दी के दिन थे। बोले आ जाओ औऱ शाम के वक्त आना। अखबार में रात के समय काम चलता है इसलिए रात में ही अधिकारी लोग आते हैं, तुम्हे सर से मिलवाना है। लो भइय़ा अब लगा कि सर से मिलवाना है मतलब कुछ अच्छा होने ही वाला है।

मेरी एक कमी मान लीजिए या अच्छाई मैं अपने जॉब या पढ़ाई से जुड़ी हरएक जानकारी माता-पिता को पल पल देता था। फोन की बात बताई तो मां बोली चलो अब ठीक हो जाएगा। अगले दिन ट्रेन पकड़ी। घर से 50 किलोमीटर दूरी पर ही हमारा जिला था। शाम के वक्त ही भास्कर दफ्तर पहुंचे। टीवी के दफ्तर तो दिल्ली में देख रखे थे, पर अखबारी दफ्तर देखना पहली मर्तबा था। बड़े डरते, सकुचाते, सबका अभिवादन करते मैं वहां खड़ा था, वही रिपोर्टर साब आए जिन्होंने बुलाया था। बोले चलो सर से मिलवाते हैं। उनके साथ गए, तो एक तकरीबन 55-60 साल के एक व्यक्ति मिले, मैंने पैर छुए और अपना परिचय दिया। सर्दी के दिन थे। बाकायदा वो कान वान बांधे थे। बोले चलो चाय वाय पीते हैं बाहर। वहीं बातचीत भी होगी। हम तीनों लोग बाहर चल दिए। एक गुमटी में पहुंचकर चाय पीने लगे। खड़े-खड़े ही वो मुझसे पूछने लगे मेरे बारे में। मैं भी आशाभरी नजरों से बताने लगा। बातचीत के अंतिम दौर में बोले कि ठीक है करवा देंगे कहीं। अभी तुम निकल जाओ। करवा देंगे हालांकि मैं पहले भी कई बार सुन ही चुका था, पर मेरे पास उम्मीद बांधने के सिवा था भी क्या। जब हम उस दौर में होते हैं, कि पढ़ाई हो गई, नौकरी चाहिए और घर वालों की उम्मीदें। तो आप समझ नहीं सकते क्या प्रेशर होता है। मतलब भूख प्यास, थकान, दिन रात मैंने ताक पर रख दिए थे। तो उनका करवा देंगे सुनकर घर आय़ा और बताया। दो से तीन दिन बाद भास्कर से ही रिपोर्टर का फोन आता है कि कुछ खर्चा करो। यहां तो चलता है। मैं समझ गया था।

मेरे दादा जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और प्रशासनिक अधिकारी पर घूस के नाम उन्हें सख्त चिढ़ थी। वो पूरा दिन एक अदने से कार्य़ के लिए सरकारी दफ्तर में सेवानिवृत्ति के बाद खड़े रहते थे पर चपरासी के लाख कहने के बाद भी उसे 10 रुपए भी नहीं देते थे। तो मैं भला कहां देने वाला था। तो ऐसे यहां कथा समाप्त हुई। जिन्हे कुछ खर्चा चाहिए था वो वही साब थे जिनसे रिपोर्टर ने मिलवाया था। वो समाचार सम्पादक थे वहां।

खैर फिर जिले के दूसरे बड़े अखबार नवभारत के सम्पादक के पास किसी सोर्स के जरिए पहुंचा। सम्पादक बहुत विनम्र और सरल थे जो कालांतर में मेरे पीएचडी के सहपाठी भी बने। उन्होंने कहा कि बेटे हम तनख्वाह नहीं देते। हमारे यहां जो वर्षों से काम कर रहे हैं उनको हम लोग दो सी 3 हजार देते हैं। मैंने भी तपाक से पूछ ही लिया कि सर इतने में कैसे होता है। तो बोले ये सब दाएं-बाएं से निकाल लेते हैं। वैसे स्थानीय पत्रकारिता में दाएं-बाएं आज भी खूब चलता है या कहें ये ही चलता है। सच में जिला स्तर पर पत्रकारों को तनख्वाह से वास्ता नहीं रहता। सम्पादक जी बोले रखने को रख लें पर कोई मतलब नहीं है। उनका चाल चलन लाग लपेट से मुक्त लगा। वहां से भी अपन चले आए। फिर जिले से शुरू होने जा रहे नए नवेले अखबार में साक्षात्कार देने पहुंचे। यहां भी अखबार का मालिक परिचित था। लगभग 10 दिन गए होंगे, चार चार घंटे बैठने के बाद नतीजा सिफर।

दरअसल इस दैनिक अखबार का मालिक न कह नहीं पा रहा था और रखना चाह नहीं रहा था, समस्या वही कि तनख्वाह यहां नहीं है। इसलिए यहां भी बात नहीं बनी। फिर यहीं ईटीवी संवाददाता से मुलाकात हुई, उनके पास गए तो बोले हमें अंग्रेजी वालों की जरूरत है। जबकि अंग्रेजी उनसे खुद नहीं आती थी। मतलब टरकाऊं लहजे में। अब सब जगह से हाथ खाली। मन में बुरे बुरे विचार आते। पत्रकारिता और पत्रकारों के हाल-बेहाल देखकर उसी वक्त दुख होने लगा था कि गलत जगह आ गए। कि जहां शुरूआत में ही दाएं-बाएं से ही काम चलाने की बात हो रही है, जहां इंटर्नशिप के लिए पैसे मांगे जा रहे हैं, जहां भास्कर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में नौकरी के लिए घूस मांगी जा रही है। घिन आ रही थी इस पेशे से। फिर लगता कि कोई साप्ताहिक अखबार ही खुद का शुरू किया जाए। पर ऐसा सोचने पर विफलता का डर विवश कर रहा था। कुछ समय अंतरात बाद फिर किसी अखबार में ईटीवी रायपुर में संवाददाताओं की जगह निकली। विज्ञापन के अनुसार उन्हें मध्यप्रदेश औऱ छत्तीसगढ़ के जिलों में संवाददाता नियुक्त करने थे जिसका साक्षात्कार उन्होंने रायपुर रखा था।

विज्ञापन में नम्बर भी दिए गए थे। हमने तुरंत काल किया। वहां से साब बोले कि रायपुर आइए। झोला तैयार, जनरल बोगी में बैठे और अगले ही दिन रायपुर। गर्मी का मौसम था। रायपुर शहर तो बड़ा था, पर अजनबी शहर के अजनबी रास्ते मेरी तन्हाइयों पर मुस्कुराते रहे औऱ मैं यूं चलता रहा…। पूछते जांचते उस पते पर पहुंचा जो विज्ञापन पर अंकित था। उस पते पर एक दो मंजिला ठीक ठाक इमारत थी पर वो कम से कम दफ्तर तो नहीं लग रहा थी। वो घरनुमा थी, रिहायशी इलाका। खैर हम पहुंचे। वहां तो कोई दिखा नहीं। गेट-वेट बंद। भाई चैनल के दफ्तर तो देख रहे थे, वैसा ही कुछ सोचा था। लेकिन यहां तो सब उल्टा पुल्टा। खैर दरवाजा खटखटाया तो एक सींकनुमा सज्जन निकले बोले क्या है, हमने कहा कि फलाने से मिलना है (जो नाम विज्ञापन पर अंकित था, शायद शैलेश था)। विज्ञापन देखा था। मध्यप्रदेश से आए हैं। इतना सुनकर मानों उसकी हलक सूख गई। घबराते हुए बोले रुकिए रुकिए।

पर हम रुकने वाले कहां थे। ये तो मंगलू लग रहा था। हमें लगा शैलेश जी कहीं वीआईपी नुमा एसी दफ्तर में बैठे होंगे। तो हम धड़धड़ा कर अंदर घुस गए। उसके रुको रुको के बावजूद। दरअसल वो रुको रुको करके खुद अंदर चला गया था। पर जब हम अंदर दाखिल हुए तो एक छोटे से कमरे में जिसे देखकर लग रहा था नए मकान का नया कमरा है। अभी अभी पुताई हुई है और फर्श की घिसाई भी। उसी कमरे में एक साधारण सी मेज पर कम्प्यूटर रखा था और जमीन पर एक चटाई पर चम्पक टाइप का तीस पैंतीस वर्षीय व्यक्ति लेटा हुआ है। सफेद रूपा फ्रंटलाइन वाली सैंडो बनियान और सफेद साफी लगाए। पंखा घनघना रहा था। हमे देखते ही उठ बैठा। मैंने अभिवादन किया और अपना परिचय दिया। तौलिया वाले साब बोले हां हां बैठिए बैठिए। हम आते हैं। ईटीवी के इस चम्पक की हालत देख हम तो समझ गए थे कि इनकी क्या सीमाएं हैं, पर चूंकि भयंकर गर्मी का वक्त था और आप हजारों किलोमीटर की यात्रा करके पहुंचे हों किसी उम्मीद के साथ, तो बैठना तो बनता ही था। पर मैं समझ गया था कि ऐसे चम्पक कुछ ठगी के लिए यहां बैठे हुए हैं।

दरअसल इस चम्पक ने इस दो मंजिला इमारत को किराए पर लिया था और वो डेकोरेट ही कर रहा था, ठगी के जाल के लिए पर हम हैं कि बगैर सूचना के ही समय से कुछ रोज पहले ही पहुंच गए और लूंगी में ही धर दबोचा। खैर वो अंदर से पैंट और शर्ट पहनकर निकला। पानी वानी खुद ही लाया ट्रे में। बोला बस सेटप जमा ही रहे हैं। ऑफिस का काम ही चल रहा है। एक दो दिन में हो जाएगा। हमने कहा कि क्या है विज्ञापन का मामला। बोला कि 30 हजार रुपए जमा करिए और फिर हम आपको ईटीवी की आईडी औऱ माइक दे देंगे। फिर आप अपने क्षेत्र से रिपोर्ट भेजते रहना और हां बोला कि आपके पास वीडियो कैमरा खुद का होना चाहिए। पर मुझे वो संदिग्ध लगा। मुझे पूरा एहसास था कि इसे मेरे जैसे पचास सौ लोग पैसे दे देंगे और ये दफ्तर बंद कर गायब हो जाएगा। मैं उसी समय उससे बोला कि आपने पैसे की बात तो लिखी नहीं थी और अब मांग रहे हैं। मैंने उसको काफी फटकारा भी। फिर बैग लिया स्टेशन आ गया। आज भी रायपुर शहर से मुझे नफरत है और मुझे लगता है वो नक्कालों का शहर है। मुझे असहनीय दर्द हुआ रायपुर के इस नालायक किस्म के व्यक्ति की वजह से। जो निहायत ठग किस्म का ही व्यक्ति था। निश्चित ही उसने कईयों को फंसाया होगा। एक बात तो एहसास हो चली कि ये बड़ी बिगड़ैल दुनिया है। नए नए अनुभव होने लगे। और एक बात और कि अदनी सी नौकरी मामूली से पैसों वाली वो भी बगैर सम्पर्क के संभव न थी और संपर्क के बाद भी सम्भव न थी। मैंने जो अनुभव पाए। उनको सोचकर मैं अब मीडिया के छात्रों को देखता हूं तो बहुत द्रवित होता हूं और मैं यही कहता हूं भैय्या कुछ भी कर लो पत्रकारिता मत करना यार….

खैर मैं लगभग निऱाश होने लगा था कि फिर राजा जी याद आए..जिन्होंने भोपाल में कई बायोडाटा बंटवाए थे। वो मुझे ग्वालियर लेकर पहुंचे और वहां एक जिला स्तरीय नए नवेले दैनिक अखबार में काम मिला, तनख्वाह शायद दो या ढाई हजार महीना.. आप सोचिए की 2 हजार महीने की नौकरी के लिए मैं उस व्यक्ति को लिए दर दर भटक रहा था जो काफी रसूखदार था। सच मानिए जितना इस नौकरी के लिए भटका उतने में तो कहीं शासकीय नौकरी मिल गई होती। जी हां सच। राजा साब मुझे तत्कालीन कैबिनेट मंत्री नरोत्तम मिश्रा के पास औपचारिक भेंट के लिए ले गए थे। नरोत्तम मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के बाद दूसरे ताकतवर मंत्री कहे जाते हैं अब भी। उनके बंगले में ही मैं, राजा साब औऱ मंत्री जी बैठे थे और मंत्री जी के अक्षरशः यही शब्द थे कि भैय्या राजा दतिया महाराज के हम पर बहुत अहसान हैं। बताइए मैं क्या कर सकता हूं। तब मेरे साथ बैठे भैय्या राजा बोला हम तो बस मिलने आए हैं।

क्या कहें कि सरकारी नौकरी नहीं पत्रकारिता की अगन लगी है। वरना वो बैठे बैठे किसी को भी फोन घुमाते और अपन किसी सरकारी दफ्तर में बाबू तो बन ही जाते। नरोत्तम मिश्रा का अंदाज मुझे आज भी याद है, हमारी बातचीत के बीच बीच में कुछ खास लोग और भी आ रहे थे। कोई डीएसपी आया और सैल्यूट करके बोला सर गृहनगर ट्रांसफर करवा दीजिए, तो नरोत्तम जी ने स्पीकर वाले फोन की बटन दबाई आऱाम कुर्सी में लेटे लेटे बोले डीजीपी मध्यप्रदेश शासन बात करें और आदेश निर्देश शुरू….

चूंकि संस्मरण काफी लम्बा हो रहा है। अगली कड़ी में चर्चा करेंगे ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत की। बहुत रोचक-बहुत ही रोचक सफर में बने रहिए मेरे साथ। अगली कड़ी अगले सोमवार को।

 

( द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट मीडिया मिरर के सम्पादक की आत्मकथा है, जिसकी प्रत्येक कड़ी हर सोमवार को प्रकाशित होती है, आपको आत्मकथा कैसी लगी आप 99583-77353 पर जाकर ह्वाट्सएप संदेश भेज सकते हैं।)

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