Home > खबरें > रवीश कुमार बोले मुझे कार्यक्रमों में न बुलाएं

रवीश कुमार बोले मुझे कार्यक्रमों में न बुलाएं

रवीश कुमार
एनडीटीवी के कार्यकारी सम्पादक रवीश कुमार

कृपया मुझे लिट फेस्ट और अन्य फेस्ट में बुलाने से परहेज़ करें

रवीश कुमार- कार्यकारी सम्पादक एनडीटीवी

मैं हर साल लिखता हूँ कि मुझे न बुलाया जाए। इसके बाद भी मेरे ये लेख बुलाने वालों तक क्यों नहीं पहुँच पाते हैं। पाँच दिनों तक सघन काम करने के बाद दो दिन अपने शरीर और परिवार के लिए ज़रूरी होते हैं। मैं समझता हूँ कि बुलाने और बोलवाने के इस उत्सव में कुछ ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो वाक़ई अच्छा काम करते हैं, पर उन्हें भी समझना चाहिए कि कोई कितना वक़्त दे सकता है। यह उचित भी नहीं है। कहीं जाने की तैयारी में कई दिन पढ़ने और लिखने में निकल जाते हैं। यह काम अपने काम से बचे थोड़े से समय और स्वास्थ्य की क़ीमत पर करता हूँ। मैं कहीं भी घूम टहल कर बोलने नहीं जाता। इन तैयारियों की क़ीमत परिवार भी चुकाता है। इतना बुलावा सामान्य नहीं है। मुंबई में बात हो रही थी टाइम्स लिट फेस्ट के लोगों से और चला गया टाटा लिट फेस्ट में। कोई सहायक सचिव तो है नहीं जो मेरी तारीख़ों का हिसाब रखे। अब जब टाइम्स का मेल आया तो चक्कर आने लगे। मुफ़्त के इस काम के लिए कहाँ से सहायक सचिव रख लूँ। वो भी अपनी जेब से लगाकर। अंत में टाइम्स के आयोजकों से ना कहना ही पड़ा क्योंकि उस दिन किसी और ये वादा कर चुका हूँ। ऐसा कहना भी ख़ुद के लिए तनाव मोल लेना होता है। ना कहने के साथ रिश्ते नाते ख़त्म होने की बात से चिन्ताएँ होने लगती है ।

आपसे विनती है कि मुझे बुलाना छोड़ दीजिए। टीवी पर पाँच दिन बोलता हूँ वो काफ़ी है। मैं समझता हूँ कि आप सभी मुझसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन इतना भी नहीं कीजिए कि प्यार ही तलवार बन जाए। मुझसे नहीं हो रहा है। अब मुझे और सख़्ती से ना कहना होगा। बेहतर तरीक़ा यही है कि फोन आते ही दो सेकेंड में हाँ कहूँगा, इससे मेरा काफ़ी समय बचेगा और फिर जाने के एक दिन पहले मेसेज कर ना कह दूँगा। इससे भी समय बचेगा और तेज़ी से मेरी बदनामी होगी। उसके बाद लोग बुलाना छोड़ देंगे। आप पाँच महीना पहले तारीख़ लें या पाँच साल पहले, थोड़ा मेरा भी ख़्याल रखें।

पूरा वीकेंड हवाई अड्डे के लिए निकलने और लौटने में चला जाता है। ऐसा लिखना अच्छा नहीं लगता लेकिन क्या करूँ। दिन भर में दस दस जगहों से बुलावा आएगा और ना कहने में भी घंटों व्यर्थ चला जाए तो इस व्यथा को और कैसे बयान करें। अपना ख़्याल रखें। प्लीज़ इस निवेदन को आयोजक नाम के प्राणीजनों को पहुँचा दें। मुझे ऐसा कोई संकट नहीं है कि कहीं जाएँ और बैनर के पास फ़ोटो खिंचा कर पोस्ट करें। मैं वाक़ई इससे मुक्त इंसान हूँ। तो आयोजक लोग सावधान ।

Share this: