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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट-भाग-3

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

प्रशांत राजावत-सम्पादक मीडिया मिरर

 

आज मैं चित्रा मुद्गल जी का साक्षात्कार पढ़ रहा था। उनसे पत्रकार प्रश्न करता है कि आप अपने बारे में कुछ कब लिखेंगी। चित्रा जी कहती हैं। लिखूंगी। थोड़ा ठहरकर। खुलासे करूंगी। निश्चित ही चित्रा जी अपनी आत्मकथा लिखने के बारे में बात कर रही थीं। अमूमन होता भी यही है कि लोग अपने जीवन के अंतिम चरण में आत्मकथा लिखते हैं। जिसमें जीवन की पूरी यात्रा आ जाती है। आत्मकथा किसी की भी देखिए उम्रदराज होकर ही लोगों ने लिखी हैं। दरअसल कम उम्र में कहने को ज्यादा कुछ होता कहां हैं। लेकिन मैंने चित्रा जी का फार्मूला नहीं अपनाया। मुझे लगता है मेरी 30 वर्ष की आय़ु में ही मेरे पास वो तमाम अनुभव हैं जो मैं लोगों के साथ बड़ी ही खूबसूरती से साझा कर सकता हूं। तो बढ़ते हैं डायरी के अगले हिस्से में। पिछले कड़ी में हमने आपको पत्रकारिता की नौकरी पाने के लिए जद्दोजहद और उठापटक से आपको रूबरू करवाया था। अब हम आपको ले चलते हैं सीधे ग्वालियर जिले की एक कस्बे में, जहां से अपनी पत्रकारिता की शुरूआत हुई।

 

डबरा। हां, ग्वालियर जिले का एक छोटा सा कस्बा। यहां एक किराना दुकानदार ने एक दैनिक अखबार की एजेंसी ले रखी थी और एक छोटा सा दफ्तर था। यहीं से शुरूआत हुई मेरी। ये अखबार जिला स्तर का ही अखबार था। केवल ग्वालियर से ही ये प्रकाशित होता था और डबरा में इसने एजेंसी दे ऱखी थी। जहां से इसको विज्ञापन ज्यादा खबरें कम मिलती थीं। हर जगह कमोवेश यही होता है। अखबार अपनी एजेंसी उसी को देते हैं। जहां से भरपूर विज्ञापन मिल सके। लेकिन एक बात आपको यहां स्पष्ट कर दें कि यहां भी हम एक जुगाड़ के मार्फत ही पहुंचे थे।

पहला दिन था, जिस व्यक्ति ने एजेंसी ले रखी थी, वही ब्यूरो चीफ था। मुझे उनसे मिलवाया गया। बहुत ही नेक औऱ सज्जन व्यक्ति। उन्होंने मुझसे कहा कि हमारे यहां जरूरत है तुम्हे रख लेंगे। लेकिन कुछ लिखकर दिखाओ। उन्होंने एक क्लू दिया औऱ कहा इस पर खबर बनाओ। हालांकि पहले ये पूछा कि कम्प्यूटर पर हिंदी टाइपिंग कर लेते हो। तो मुझे न कहना पड़ा। तो वो बोले कोई बात नहीं आप पेन से लिखो।

टाइपिंग हम करवा लेंगे। मैंने खबर लिखना शुरू की, मैं बहुत तो नहीं पर थोड़ा असहज था। वो असहजता इस बात को लेकर थी कि मेरी खबर ब्यूरोचीफ को पसंद आएगी की नहीं। क्योंकि ब्यूरोचीफ तो बहुत योग्य व्यक्ति होगा। हालांकि बमुश्किल कुछ रोज में ही मुझे ज्ञात हुआ कि ब्यूरोचीफ का ज्ञान पत्रकारिता जगत में शून्य था। मैंने खबर लिखी और दिखाई मुझे काम मिल गया। शायद ढाई या 3 हजार रुपए महीने में। वर्ष 2008 की ही बात है। इसी दफ्तर में एक वरिष्ठ सहयोगी थे। शाम के एक अध्धा चढ़ाकर वो आते और टाइपमैन को बैठाकर धाराप्रवाह बोलकर एक साथ कई खबरें लिखवा डालते। चूंकि मैं एकदम नया था इसलिए बीच बीच में मेरी ओर देखकर बोलते देखो इस तरह खबरें लिखी जाती हैं। मुझे उनको देखकर ठीक वैसा लग रहा था जैसे एमएफ हुसैन पान खाकर थूंके। तब भी वो पेंटिंग सुंदर ही कही जाएगी। मतलब ये व्यक्ति वरिष्ठ है। इसलिए इसकी कचरा स्टोरी भी बढ़िया कही जाएगी। वो बेशक अपने तौर तरीकों की तारीफ कर रहा था। पर मुझे उसकी स्टोरी में कई मीन मेख दिख रहे थे।

खैर मैंने काम शुरू किया। थोड़ा फील्ड में भी जाता था। हालांकि ग्वालियर शहर से डबरा मैं प्रतिदिन आता-जाता था। तो आते-जाते भी कई स्टोरी दिख जाती थीं। मैं उनको एक कागज पर लिखता और शाम को टाइपमैन टाइप कराके छापने भेज देता। अगले दिन छपती तो खुशी भी होती। मैं तकरीबन दस दिन पूरे ही कर रहा था कि ब्यूरोचीफ आए और बोले कि यार तुम हेडऑफिस से काम करो। तुम यहां के लायक नहीं हो। तुम अच्छी जगह जाकर काम करो। जिंदगी में मैंने तमाम खूबसूरत ह्दय के लोगों को पाया। उनमें से एक मेरे पहले बॉस थे। जिनसे आज भी रिश्ता बना हुआ है। बावजूद मैं पूरी निर्दयता से लिखना चाहता हूं कि उन्हें पत्रकारिता का ज्ञान बेहद कम था। मूलरूप से वो व्यापारी थे। गांव-कस्बों में ऐसे ही लोगों को एजेंसी दे दी जाती हैं। ताकि समाचार-पत्रों के प्रतिनिधि भी हो जाएं औऱ उन्हें कुछ विज्ञापन भी मिलता रहे। जो एजेंसी लेता है वो डिपोजिट जमा करता है। चूंकि जब ब्यूरोचीफ ने बोला तो मुझे खुशी हुई और उन्होंने कहा कि मैं हेड ऑफिस में आज ही बात करूंगा और तुम वहां मिल लेना। चूंकि मैं ग्वालियर शहर से ही आता था, इसलिए ग्वालियर में काम मिलना और वो भी इतने जल्दी मेरे लिए खुशी की बात थी। हालांकि यहां काम करने के दौरान स्थानीय पत्रकारों ने मुझे देखकर कहा कि इस लड़के में प्रभात झा और हरिमोहन शर्मा की झलक दिखती है। दोनों ही ग्वालियर के बड़े पत्रकार रहे हैं। प्रभात झा अब बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। वहीं हरिमोहन शर्मा वरिष्ठ सम्पादक रहे हैं कई बड़े समाचार पत्रों में। हालांकि कालांतर में मुझे हरिमोहन शर्मा के साथ लम्बे समय तक काम करने का अवसर मिला। इसे मैं सौभाग्य समझता हूं। यकीनन वो अद्भुत व्यक्तित्व हैं।

तो इस तरह कस्बाई पत्रकारिता से शहरी पत्रकारिता की ओर रुख हुआ औऱ ब्यूरोचीफ के बताए पते पर पहुंच गए साक्षात्कार देने। जाते ही सबसे पहले कहा गया कि हिंदी टाइपिंग आती है। मैंने कहा नहीं। तो अखबार का कोई बड़ा अधिकारी था, बोला टाइपिंग नहीं आती तो फिर कोई मतलब ही नहीं। लेकिन ब्यूरोचीफ ने अखबार के आईटी हेड के जरिए मुझे भेजा था, तो आईटी हेड ने कहा अरे लड़का तेज है। टाइपिंग दो तीन दिन में सीख लेगा। आईटी हेड मालिक के खास थे, बोले जाओ टाइपिंग सीखो। मैं अखबार की डेस्क में आ गया। उन्होंने ही मुझे एक फोटोकॉपी दी। जिसमें चानक्य फोनेटिक टाइपिंग के संकेत अंकित थे। मैंने दिनभर उनकी प्रेक्टिस की और शाम को जाते समय आईटी हेड से मिला। आई हेड बोले तुम आराम से काम करो। समझो तुम्हारा काम हो गया। हालांकि सुबह एक अधिकारी के कहने के बाद से मैं नौकरी को लेकर परेशान था। लेकिन आईटी हेड जो कि मालिक के करीब था, उनके कहने के बाद मुझे संतोष हुआ। आईटी हेड बोले जाओ और कल से थोड़ा जल्दी आ जाया करो और प्रेक्टिस करो। तो ऐसे मैंने शायद 3 दिन में टाइपिंग सीख ली और चौथे दिन मैंने कोई खबर भी लिखी। मुझे रिपोर्टिंग में लगाया गया। ये अखबारी दफ्तर चुक चुके अधबुढ़ पत्रकारों से भरा पड़ा था, जो नशेड़ी, अकर्मण्य और ठरकी किस्म के थे। ऐसा मैं नहीं समूचा ग्वालियर का मीडिया जगत कहता-मानता था। अधबुढ़ पत्रकारों की  ये फौज देर रात अपने कम्प्यूटर सेट्स में पोर्न देखने में व्यस्त पाई जाती थी अक्सर। पर। पर। जो सच है वो सच है। ये अखबारी दफ्तर ही मेरी प्रथम पाठशाला था और ताउम्र रहेगा। यहां का एक एक पत्रकार मेरा शिक्षक रहा और मैं ताउम्र उनका शुक्रगुजार हूं। उनकी कमियां उनकी अपनी हैं, एकदम निजी हैं। चूंकि ये आत्मकथा का प्रारूप है औऱ अगर मैं सत्यता से मुकरा या किसी खास हिस्से को लिखने से बचा तो आत्मकथानक की प्रासंगिकता ही क्या। इसलिए बताना ही पड़ रहा है। लेकिन मैं यहां के प्रत्येक पत्रकार का तहेदिल से सम्मान करता हूं। पोर्न देखा कोई गलत बात नहीं। मैं भी देखता हूं। पर दफ्तर के सेट में नहीं।

खैंर मेरे प्रथम संस्थान में शुरू शुरू में मुझे प्रेस नोट दिए गए। मैंने उनको खबरों के रूप में ढालना शुरू किया। यहीं सर्वप्रथम मुझे बताया गया कि नाम के आगे श्री या श्रीमती नहीं लगाना। या ये कहें श्री और श्रीमती किसी खबर में नाम के आगे नहीं लगेगा ये पत्रकारिता में मेरी पहली सीख थी और उसके बाद खबरों का सिलसिला चल निकला। मैं सबसे छोटा सदस्य था और सबसे कम अनुभवी। दो-चार-छः महीने बीते। बाइलाइन खबरें छपीं। मैं कला संस्कृति से जुड़ी खबरों को कवर करता था। दिन कट रहे थे। आहिस्ता-आहिस्ता मैं पत्रकारिता के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों को समझने लगा था। संस्थान में खुद को साबित कर चुका था। जो लोग हंसते थे या मुझे परख रहे थे, वो मानने लगे थे कि मैं ठीक ठाक लिख सकता हूं।

यहीं पर बिगड़े लोगों को देखा औऱ खुद को बिगड़ते हुए भी महसूस किया। हालांकि यहां पर मैंने क्या कहते हैं उसको दबाकर काम किया। पैदल नाप दिया पूरा ग्वालियर। जुनून की हद तक रिपोर्टिंग की और इसी संस्थान में एक दौर ऐसा आय़ा कि सम्पादक से ज्यादा प्राथमिकता मुझे प्रबंधन देने लगा। सच कहा रहा हूं। मैंने यहां लोगों का भरोसा जीता। अपनी मेहनत से अपने लिए एक जगह बनाई। यहां पर अचानक से जो मेरी छवि उभरी उससे कई खुश थे तो कई अप्रसन्न भी। एक वाकया इस संस्थान का मुझे याद आता है। देर शाम की बात थी। अचानक से न्यूज एडीटर आए औऱ बोले की कोई मिनिस्टर आय़ा है। मालिक के पास बैठा है। उनका साक्षात्कार करना है। हालांकि साक्षात्कार तो पत्रकार कर ही सकते थे। पर अखबार के मालिक के सामने बैठना ही बड़ी बात थी और फिर उनके सामने ही साक्षात्कार। कोई रिपोर्टर तैयार नही हुआ और अंत में मुझे कहा गया। शायद मुझे मोहरा बनाया जा रहा था। मुझसे जब कहा गया। तो मैंने पूछा कि किस विभाग के मंत्री हैं तो बताया गौ संवर्धन बोर्ड। तभी मेरे मन में गौ तस्करी समेत तमाम प्रश्न पैदा हुए और मैं पहुंच गया साक्षात्कार करने। अटैकिंग मोड में साक्षात्कार हुआ। मालिक मेरी उम्र और मेरे सवाल दोनों देखकर मुस्कुराते जा रहे थे। कई सवालों के दौरान तो उन्होंने टोका भी कि सर ये नया लड़का है। तो मंत्री जी बोले कोई बात नहीं पूछने दो औऱ अपन एक के बाद एक प्रश्न दागते गए। साक्षात्कार खत्म हुआ तो मंत्री जी बोले गजब के पत्रकार बनोगे। तो अखबार मालिक बोले जाओ। बहुत बढ़िया साक्षात्कार किया तुमने।

जब अपने साथियों के पास न्यूजरूम में आय़ा तो सबने पूछा हैरत में सब आराम से हो गया। मैंने कहा हां और साक्षात्कार छपा भी। अगले दिन मालिक ने बुलाया कहा कि मेरे सामने बैठने में भी यहां के पत्रकार हिचकते हैं औऱ तुमने तो कल कमाल कर दिया। उन्होंने कहा तुममे मुझे भविष्य का बहुत बड़ा पत्रकार दिखता है। तुम बहुत आगे जाओगे। प्रारम्भिक पत्रकारिता के शुरूआती 6 महीनों में आपको संस्थान का शीर्ष पुरुष ऐसे वचन कहे तो निश्चित मैं फूल के कुप्पा था। मेरा मनोबल जबरदस्त बढ़ा। मालिक से बढ़ती करीबी सम्पादक समेत अन्य डेस्क के साथियों को चुभने लगी थी। चूंकि तब मैं उस स्तर में था कि अंदरूनी राजनीति को समझने की स्थिति में ही नहीं था। पर बाद में पता लगा मेरे खिलाफ पूरा एक धड़ा लगा हुआ है। इसी संस्थान में एक दौर ऐसा आया कि मुखपृष्ठ पर जो त्वरित टिप्पणी सम्पादक को लिखने का अधिकार था वो मालिक ने मुझे दिया और मैंने लिखी भी। हालांकि मुझे ऐसा कभी एहसास नहीं होता था कि मेरे साथ मेरे सहकर्मी कोई राजनीति कर रहे हैं। मैं बस काम करता था। यहीं पर एक बार मुझे अखबार के ही एक कर्मचारी ने ऑफर दिया कि आप बिजनेस की खबरें सेट कर दिया करिए। एक खबर का 50 रुपए देंगे।

उस समय मैं इस संस्थान में बिजनेस पेज देख रहा था। मुझे लगा 50 रुपए के लिए बिक जाना भी कोई बिकना है। हालांकि मुझे ऐसा लगा कि जो व्यक्ति मुझे ऑफर दे रहा है। वो मुझसे पहले वाले बिजनेस पेज इंचार्ज को जरूर पेड न्यूज देता होगा। पर मैंने उसका ऑफर ठुकरा दिया। इसी संस्थान में रहते मेरी भी नियति दो बार बिगड़ी औऱ मैंने कुछ कमाने समाने की सोची। 22 साल का था। 3 हजार मिलते थे। सोचा कुछ कमाया जाए। एक कॉलम मैंने अखबार में शुरू किया। जिसका नाम था एक मुलाकात। उसमें मैं शहर में आने वाली सेलिब्रिटी का साक्षात्कार करता था या फिर शहर के किसी नामी गिरामी व्यक्ति से बात करता था। मैंने उसमें तमाम अच्छे लोगों के साक्षात्कार किए और उसके बाद पेड साक्षात्कार करने के लिए छपास रोगियों से सम्पर्क साधा। बहुत डरते डरते मैंने 2 लोगों से बात की थी। मुझे आज भी याद है। उन्हें एक हजार का ऑफर दिया था कि एक हजार दीजिए। आपका साक्षात्कार लगाएंगे। पर दोनों से डील नहीं हो पायीं। इसके बाद एक कोई कम्पटीशन की खबर थी, उसमें मैंने कुछ मैनीपुलेट करने की कोशिश की और कहा आयोजक से कुछ समझ लीजिए तो अच्छी कवरेज दे दूंगा। पर वहां बुरा फंसा। कार्य़क्रम के आयोजक स्वयं पत्रकार थे औऱ मेरे सम्पादक को अच्छे से जानते थे। उन्होंने मुझे बताया और कहा बेटा तुम अभी बच्चे हो। मैं आपके यहां सबको जानता हूं। तुम जो कर रहे हो वो गलत है। मुझे उनके कहे का आभाष हुआ और ऐसा हुआ कि उसके बाद पूरे पत्रकारिता जीवन में मैनें किसी पीसी में फोकट की चाय भी पीना उचित नहीं समझा।

उसकी कहानियां आगे की कड़ियों में आएंगी। जब चद्दर और तकियां उपहार में मिलते थे औऱ मैं उनको वहीं रखकर छोड़ आता था और खबर में जमकर घेरता था ऐसे उपहार वाले लोगों को। तो इस अखबार के बारे में बताता चलूं कि इसके मालिक चिटफंड कम्पनी चलाते थे औऱ अपने गोरखधंधों को बचाए रखने के लिए अखबार संचालित करते थे। ये अखबार अब अस्तित्व में नहीं है। अपने प्रकाशन के 4 या 5 साल बाद ही इस पर छापा पड़ गया। अखबार बंद हो गया। मालिक भूमिगत हो गए और शायद पकड़े भी गए हों। काफी लम्बा संस्मरण हो चला है लेकिन चलते चलते ये भी बता दें कि इस संस्थान में जब मैं पहुंचा तो कोई भी लड़की सम्पादकीय टीम में नहीं थी। ऐसा इसलिए कि यहां पर कोई लव सव का मामला हो गया था किसी सम्पादकीय साथी औऱ महिला साथी के बीच। तो हुआ यों कि मालिक के आदेश पर सभी महिला पत्रकारों को चलता किया गया। यहां एक औऱ बात थी कि डेस्क में काम करने वाले ज्यादातर लोग कहीं और भी काम करते थे। एक तो शासकीय शिक्षक थे औऱ एक विश्वविद्यालय में क्लर्क। यहां के मालिकों के लिए ये अखबार एक जरिया था नेताओं से, पुलिस अधिकारियों से सम्पर्क गांठने का।

एक बात मैं जो बहुत निर्लज्जता के साथ साझा करना चाहता हूं। वो ये कि न्यूजरूम में खबरों को लेकर, खबरों से जुड़े लोगों को लेकर कैसी बातचीत होती है। मैं हैरान था। खासतौर पर ऐसी चर्चाएं फोटोग्राफर काम से लौटकर करते थे। ये चर्चाएं बेहद अश्लील और घिनौनी होती थीं। ऐसी चर्चाएं सिर्फ महिलाओं के संदर्भ में होती हैं। जैसे किसी कॉलेज से लौटे तो टोन यही कि साली वो (प्रोफेसर या शिक्षिका) कैसे पीछे घूम रही थी। उसके ब्रेस्ट देखो कैसे हैवी हैं। साली लगता है चांस देना चाहती है। फलानी महिला नेत्री देखो साली के ….लटक रहे हैं। लगता है…दे ही देगी। बहुत अश्लील संवाद। बीजेपी की सन्यासिन नेता के बारे में मैंने एक बहुत ही अश्लील संवाद सुना था तभी। कि वो चोगा टाइप पहनती हैं और एक बार दूसरी मंजिल से गुजर रही थीं औऱ मैं जाल के नीचे खड़ा था। नीचे से देखा तो….। मैं यहां पर ऐसा इसलिए लिख रहा हूं कि जो शर्म और हया आंखों से मर चुकी है। वो शायद लौट आए। ये रेप, छेड़खानी होती ही है न देश में। आदमी ही तो करते हैं। पत्रकार भी आदमी ही होता है। ये शब्दों से रेप करके संतुष्ट हो जाते हैं। ये वीभत्सता मैंने देखी। यहां एक और बात उल्लेखित कर दूं कि मीडिया को लेकर खासतौर पर महिलाएं ( वो किसी भी पेशे से जुड़ी हों) बहुत उत्साहित दिखती हैं। पत्रकारों से नाम के लिए तो फोटोग्राफरों से तस्वीरों के लिए पीछे घूमती हैं। सम्पर्क बनाती हैं। मैंने देखा है। पर आपका यही अति उत्साह उन्हें कुछ और ही समझ आता है और वो किस्सागोई रचते हैं। तो कृपया बचिए इस अति उत्साह से।

एक औऱ दिलचस्प किस्सा फिर कहानी अगले कड़ी में।

एकदिन दोपहर को ही मुझे मालिक से कोई चर्चा करनी थी। मैं दोपहर को ही दफ्तर पहुंच गया। सीधे मालिक की केबिन की ओर बढ़ने लगा। आमतौर पर था ये कि मालिक के केबिन की ओर जो रास्ते जाते थे, वहां सीसीटीवी लगे थे और मालिक उनपर नजर रखता था। साथ ही मालिक के केबिन में जाने से पहले इजाजत लेनी होती थी। पर मैंने इजाजत नहीं ली और आवेग में सीधे चला गया। तो पाया कि अखबार के मालिक की गोद में एक 23-24 साल की खूबसूरत सी कन्या खेल रही है और मालिक उसके साथ व्यस्त हैं। गेट खोलते ही ये नजारा दिखा और न तो मैं नजरे मिला पाया और न वो। मैंने गेट बंद कर दिया और वापस मुड़ गया। हालांकि मुझे इतना जरूर लगा कि मुझे देखकर मालिक की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। और कई दिन वो मुझे मिलता उस घटना के बाद तो असहज हो जाता। हालांकि ये उनका बेहद निजी मामला था और उससे मुझे कोई एतराज या आपत्ति नहीं। चूंकि ये आत्मकथानक का हिस्सा था इसलिए बताना पड़ा। वो लड़की अखबार के ही मार्केटिंग विभाग से थी। जो बड़ी धौंस जमाकर रहती थी अखबार में।

इस अखबार की कहानी यहीं खत्म होती है। अगले कड़ी में चर्चा होगी कैसे खबर करते करते एक डिप्टी कलेक्टर और एक श्रीलंकन नृत्यांगना से मुझे प्यार हो गया.. औऱ कैसे इसी अखबार के न्यूजरूम में विवश कर दिया गया कि मैं नौकरी छोड़ दूं।

नोट- द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट मीडिया मिरर सम्पादक के पत्रकारिता जीवन की आत्मकथा है, जो प्रत्येक सोमवार को मीडिया मिरर से प्रकाशित होती है।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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