Home > बात-मुलाकात > मुंबई के फिल्म जर्नलिस्ट की जिंदगी उतनी ग्लैमरस ‌नहीं जितनी दिखती है

मुंबई के फिल्म जर्नलिस्ट की जिंदगी उतनी ग्लैमरस ‌नहीं जितनी दिखती है

एनबीटी
विमल मिश्र

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में इस बार हमारे विशेष अतिथि हैं मुंबई के वरिष्ठ पत्रकार विमल मिश्र।  विमल जी ने आज अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की और आजीवन नवभारत टाइम्स मुंबई में सेवाएं दीं। हाल ही में वो मुंबई एनबीटी से सेवानिवृत्त हुए हैं। बहुत ही सरल औऱ सहज मिश्र जी पत्रकारिता का ज्ञानकोष हैं। प्रस्तुत है मीडिया मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत के साथ उनकी बातचीत। 

 

प्र. नवभारत टाइम्स, मुंबई से आप हाल ही में सेवानिवृत्त हुए हैं। सबसे पहले पत्रकारिता जगत में एक खूबसूरत पारी के लिए बधाई। थोड़ा हमारे पाठकों को बताएं अपने बारे में। पत्रकारिता की शुरुआत कहां से की। कुछ घर-परिवार के बारे में बताएं। 
उ. मेरे दादाजी पं. वासुदेव मिश्र और उनके बड़े भाई पं. दुर्गाप्रसाद मिश्र और पं. छोटूलाल मिश्र कलकत्ते से निकलने वाले ‘भारत मित्र’ के संपादक और संस्थापक थे, जो भारत का पहला हिंदी राजनीतिक दैनिक माना जाता है। उनके अधीन बाबूराव विष्णु पराडकर जी जैसों ने अपना पत्रकारीय कॅरियर शुरू किया था। हिंदी पत्रकारिता की किताबों में आपको उनका उल्लेख मिलेगा। कभी बहुत समृद्ध रहे परिवार का अंग होने के बावजूद अभावों और संघर्ष में पलकर पला, पढ़ा और बढ़ा हूं और इसके लिए अपने माता-पिता चुन्नीलाल मिश्र और कृष्णा मिश्र (दोनों दिवंगत) का आभारी हूं। पत्नी कीर्ति म‌हिला उद्यमी हैं। बड़ा बेटा अनन्य एमबीए कर रहा है और छोटा अनामय ग्रेजुएशन।
प्र. पत्रकारिता में कैसे आना हुआ? 
उ. पत्रकार बनने की शुरू से ही दिली आकांक्षा थी। काशी हिंदू विश्व‌्‌विद्यालय (BHU) से एम. कॉम. किया, फिर बी. जे. और देश के उस जमाने के बड़े और प्रतिष्ठित दैनिक ‘आज’ में काम करने लगा।

 

विमल मिश्र
एक समारोह के दौरान विमल मिश्र को सम्मानित करते फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय

प्र. मुंबई की मीडिया में प्रवेश कब हुआ? मुंबई के मीडिया को किस तरह रेखांकित करना चाहेंगे? 
उ. 27 नवंबर, 1987 का वह दिन आज भी स्मृति में बिलकुल ताजा है, जब टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग के कांफ्रेंस रूम में राजेंद्र माथुर, एस. पी. स‌िंह, विश्वनाथ सचदेव और राम तरनेजा जैसे दिग्गजों के सामने मैं बैठा था और वे पूछ रहे थे, ‘मुंबई की पत्रकारिता अलग है, बनारस की अलग। यहां क्या सोचकर आए हो?’ मेरे मुंह से तपाक से निकला, ‘इंट्रोवर्ट से एक्स्टोवर्ट बनने।’ बाद में यही सवाल ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती जी ने भी पूछा। खैर, इंटरव्यू में जाने क्या देखकर उन्होंने नवभारत टाइम्स में मेरा चुनाव कर लिया।
बनारस के ‘आज’ में पांच वर्ष की पारी खेलकर नवभारत टाइम्स में आया था। जॉइन करने के तीसरे-चौथे महीने ही मुझे लोकल टेबल पर रिपोर्टर बना दिया गया। वह शर्मीला और चुप्पा सा लड़का जिसने बनारस जैसे छोटे शहर में भी कभी गली-कूचे तक भी रिपोर्टिंग नहीं की थी अब देश के सबसे बड़े महानगर के फाइव स्टार होटलों और चकाचौंध वाली फिल्मी पार्टियों तक में घूम रहा था। मुझे तब  सपने में भी यकीन नहीं था कि कि कुछ वर्ष बाद यहीं सिटी एडिटर भी बनूंगा।
प्र. आप बनारस से आते हैं। बनारस की ख्याति देश में ही नहीं, विदेशों में भी है। कभी हम केदारनाथ सिंह की कविता के माध्यम से बनारस को जानते हैं तो कभी किसी विदेशी लेखक की किताब से, कभी रघु राय की तस्वीरों से, तो कभी भारतीय सिनेमा की फिल्मों से। आप बनारस को किस रूप में याद करते हैं? 
उ. मुंबई मेरी सांसों में और बनारस मेरी धड़कनों में बसता है। जैसा कि विख्यात इंग्लिश लेखक मार्क ट्वेन ने लिखा है, ‘बनारस की उम्र इतिहास से बड़ी है, परंपरा से ज्यादा है और किंवदंती से अधिक। सब को मिला दो तब भी उससे भी दो गुना प्राचीन।’ और नोबेल प्राइज विनर लेखक रुडयार्ड किप्लिंग ने ‘बनारस, दुनिया का एकमात्र शहर, जहां तुम जो चाहे सो करो। कोई नहीं पूछेगा, कि क्या कर रहे हो।’ और हॉलिवुड स्टार ब्रैड पिट ने, ‘अवर्णनीय। अतुलनीय। असाधारण। मैने आज तक बनारस जैसी कोई जगह नहीं देखी है।’ मंदिर, घाट, गलियां, खान-पान और मासूम मस्तियां- क्या भूलूं और क्या याद करूं?
प्र. काशी किस हद क्योटो बन पाया है? 
उ. काशी को क्योटो बनने की जरूरत नहीं। न ही वह कभी बन पाएगा। सच कहें तो एक नहीं सौ क्योटो मिलकर भी काशी की महिमा का मुकाबला नहीं कर सकते।
प्र. मैंने बनारस के लोगों से सुना है कि गालियां बनारस की राष्ट्रभाषा है। क्या माजरा है यह? ‘मोहल्ला अस्सी’ में भी एक संवाद है ऐसा। 
उ. ‘मोहल्ला अस्सी’ में आपने जो देखा है, वह बनारसियों की जुबान पर चढ़ा तकिया कलाम है, गाली नहीं। फिल्म में थोड़ी अतिरंजना है। मसलन, महिलाओं द्वारा इन शब्दों का उच्चारण करना। बनारस देश की धार्मिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक राजधानी है। मुंह में पान की जुगाली, एक-दूसरे से ठिठोली करता हुआ, ठेठ भोजपुरी में बतियाता गमछाधारी अगले ही पल आपको अंतरराष्ट्रीय ज्ञान और संस्कृत के साथ अंग्रेजी संभाषण की कला से आपको आश्चर्यचकित कर सकता है। देश का कौन ऐसा शहर है जिसने छह ‘भारतरत्न’ द‌िए हों?
काशी दरअसल, सर्व विद्या की राजधानी है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के छात्रों और अध्यापकों ने देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री (मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीऔर नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री सहित), उपराष्ट्रपति, उपप्रधानमंत्री, शिक्षामंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, चीफ जस्टिस, जैसे पद संभाले हैं। साहित्यकार, उद्योगपति, उद्यमी, प्रशासक, अर्थशास्त्री, इतिहास‌विद संविधानविद, धर्मशास्त्री ऐक्टिविस्ट्स, मैगसायसाय, पद्म, ज्ञानपीठ, कालिदास, और दादा साहब फालके जैसे पुरस्कार विजेताओं की तो बहार है। याद रहे, यह सिर्फ BHU की उपल‌ब्धियां हैं। काशी की म‌हिमा तो अपरंपार है। आप भारत का दूसरा ऐसा नगर बताइए जिसकी देश‌-विदेश में इतनी ख्याति हो? मेरी अगली पुस्तक इसी विषय पर है।


प्र. मुंबई में बनारस की क्या चीज मिस करते हैं। 
उ. बनारस की  हर बात मिस करता हूं। एक गलियों की गंदगी से चिढ़ होती थी, सो उसमें भी अब काफी सुधार है।
प्र. दिल्ली की मीडिया राजनैतिक घरानों के दबाव में काम करती है। क्या मुंबई की मीडिया भाई लोगों (मुंबइया डॉन लोगों) के दबाव में काम करती है? अगर करती है तो कोई आपका निजी अनुभव? 
उ. डॉन लोगों के दबाव में मुंबई के मीडिया ने उस वक्त भी काम नहीं किया, जब यहां माफिया का खुला राज था। जे. डे. हत्याकांड जैसी घटनाएं अपवाद स्वरूप ही हुई हैं। यहां क्राइम बीट के दिग्गज पत्रकारों ने उनके सनसनीखेज एक्सक्लूसिव इंटरव्यूज किए हैं। एक अदृश्य लक्ष्मणरेखा है, जिसकी मर्यादा का पालन मुंबई के पत्रकार और गैंगस्टर-दोनों ही करते हैं।
प्र. हो सकता है आपको थोड़ा हैरानी हो, पर मुंबइया पत्रकारों का जब भी जिक्र होता है तो उनको लोग फिल्म पत्रकार के रूप में ही जानते हैं। मेरा मतलब मुंबई में पत्रकारिता के नाम पर फिल्म पत्रकारिता ही दिखती है। मुंबई में भी फिल्म से अलग कई विषय और क्षेत्र हैं उनपर खबरें क्यों नहीं होतीं? या होती हैं तो बेहद कम?
उ. मुंबई देश की आर्थिक राजधानी भी है। दरअसल, यहां की अखबारों या दूसरे मीडिया में फिल्मों से ज्यादा आर्थिक विषयों पर खबरें होती हैं। इसलिए यह धारणा गलत है। यहां का आम आदमी जागरूक और जानकार होते हुए राजनीति में उतनी दिलचस्पी नहीं लेता। कुछ मिलाकर मुंबई का मीडिया काफी प्रबुद्ध और संयत है। शायद देश में सबसे ज्यादा।
प्र. मुंबई में ठाकरे परिवार का बड़ा दबदबा है। कहा जाता है वे अखबारों पर भी अंकुश बनाकर रखते हैं। कितना सच है यह? 
उ. मुंबई के बारे में फैली बहुत सी खामखयालियों में एक यह भी है। आज से 25 वर्ष पहले इसमें सचाई का कुछ अंश हो सकता था, जब शिवसेना के किसी कदम से असंतुष्ट पत्रकारों पर हमले तक हुए। पर आज ठाकरे परिवार के पत्रकारों और अखबार मालिकों के बहुत सद्भावपूर्ण संबंध हैं। शिवसेना भवन और ‘मातोश्री’ स्थिति आवास पर मौजूदा शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के कई लंबे इंटरव्यू के बाद मैं यह बात भरोसे से कह सकता हूं। मुझे दिवंगत शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का एक नितांत दुर्लभ इंटरव्यू करने का अवसर प्राप्त है, और  शिवसेना से अलग हुए राज ठाकरे का भी। दरअसल, शिवसेना को अखबार वालों की दबाने की जरूरत ही नहीं। उनकी हर खबर अखबार वाले खुद ही प्रमुखता से छापते हैं,  क्योंकि मुंबई वाले उन्हें पढ़ना चाहते है। अंकुश बनाने के लिए शिवसेना को अखबारों की जरूरत नहीं। अपनी बात पहुंचाने के लिए उनके पास मराठी ‘सामना’, हिंदी ‘दोपहर का सामना’ और ‘मार्मिक’ जैसे बहु प्रसार संख्या वाले अखबार हैं।
प्र. फिल्म पत्रकारिता के नाम पर सतही खबरें जैसे फलानी अभिनेत्री वजन कम कर रहीं, रणवीर के साथ कैट दिखी बिकिनी में, सारा को नहीं अंग प्रदर्शन से परहेज, जैसी खबरें ही ज्यादा क्यों दिखती हैं? फिल्म जगत में भी काफी कुछ पठनीय हो सकता है जो गंभीर हो, मसखरेपन से अलग हो। जैसे, फिल्म स्टूडियो में काम करने वाले सबसे निचले स्तर के कर्मचारियों की मांगें, फिल्म स्टूडियो में नए प्रयोग व तकनीक, अभिनय को लेकर हो रहे प्रयोग, फिल्म निर्माण और सम्पादन से जुड़े अनछुए पहलू, भारतीय सिनेमा में तकनीक का प्रयोग, हम आज भी विदेशी तकनीक और लोगों को क्यों हायर कर रहे हैं,  भारतीय सिनेमा क्या बेहतर, और क्या कमतर कर रहा है, फिल्म निर्देशकों और निर्माताओं बनाम स्टार्स के बीच गैंगबाजी, आदि। फिल्म पत्रकारिता के नाम पर अब तो किसी रेस्त्रा के बाहर या एयरपोर्ट से निकलते सेलेब्स की तस्वीर छापना ही सबसे प्रमुख रह गया है। कैसे देखते हैं पूरे माजरे को? 
उ. सही है, पर आपने जिन मुद्दों की बात की, उनपर कौन लिखे और क्यों लिखे? सवाल है, अगर फिल्म पत्रकार यह सब लिखे भी तो क्या संपादक इसकी सहम‌ति देगा और मालिकान इन्हें छापने देंगे? दरअसल, बड़े पर्दे के पीछे की ये सचाइयां छिपाने में ही संबंधित लोगों का हित है। मुंबई में शुरुआती कुछ महीने शाम का फुरसतिया वक्त फिल्म पार्टीज व स्टूडियोज का चक्कर लगाते और बड़े फिल्मी सितारों के इंटरव्यू करते हुए मैने यहां जो जलालतें, विरोधाभास और बेशर्मियां देखी हैं उसके आधार पर कह सकता हूं कि आपको मुंबई के फिल्म जर्नलिस्ट की जिंदगी ऊपर से जितनी भी ग्लैमरस ‌दिखे, हकीकत में उससे बहुत ही दूर है। नाम और शोहरत हासिल करने वाले टॉप के बॉलिवुड पत्रकारों की दुनिया पपराजी फोटोग्राफर्स की उस दुनिया से बिलकुल अलग है, जिनके लिए अखबारों का वह कॉलम नियत है जिसे भरने के लिए फिल्मी सितारों की एक झलक के वास्ते एयरपोर्ट के बाहर उसे घंटों लाइन लगाना पड़ता है।
हां, कुछ हद तक पाठकों की रुचि भी इस विसंगति के लिए जिम्मेदार है। किसी भी युवा से आप पूछकर देख लें-वह अखबार का फिल्मी या ग्लैमर पेज ही पहले पढ़ता मिलेगा। आपको आश्चर्य होगा फिल्मनगरी मुंबई में यह ट्रेंड उस तरह का नहीं है। यहां लोगों को सीरियस चीजें पढ़ना और उनपर चर्चा करना ज्यादा पसंद है। दिल्ली, कोलकाता, बंगलुरू या दूसरे शहरों के अखबारों में आप फिल्म या ग्लैमर के नाम पर आज जो पढ़ते हैं वह दरअसल, मुंबई के अखबारों में एक दिन पहले ही छप चुका होता है। फिल्म के नाम पर गंभीर चीजें न छपने की एक वजह शोबिज़ पत्रकारिता में बगैर प्रशिक्षित युवाओं का आ जाना है। मुंबई की फिल्म पत्रकारिता फर्स्ट हैंड होने के कारण फिर भी बेहतर है। मैं जिस टाइम्स ग्रुप में था वहां ‘फिल्मफेयर’ और ‘फेमिना’ जैसी प‌त्रिकाएं निकलती हैं और गॉसिप छापने में भी एक मर्यादा का पालन जरूरी है।
प्र. फिल्म समीक्षा सब प्री प्लांड होती हैं। कितना सच है ये। 
उ. इसमें कुछ सचाई जरूर है। शायद, इसके पीछे आर्थिक कारण भी हों। अखबारी मालिकानों का कहना है कि अखबार विज्ञापन के लिए ही निकाले जाते हैं। अखबारों के पेज थ्री और ग्लैमर पेजेज पर ही नहीं, जब पहले पेज पर भी स्पांसर्ड आइटम छपने लगे हों फिल्म समीक्षा भी कमर्शल मेंटलिटी की भेंट चढ़ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
प्र. आप फीचर सम्पादक रहे हैं। बेहतर फीचर कैसे लिखा जाए, कुछ बताइए। ताकि भावी पत्रकारों को कुछ सीखने को मिले। 
उ. फीचर संपादक नहीं, नवभारत टाइम्स का रविवारीय प्रभारी रहा हूं। इससे पहले आठ वर्ष तक सिटी एडिटर, यानी रिपोर्टिग सेक्शन का इंचार्ज रहा। इतना जरूर है कि मुंबई के मीडिया में मुझे मेरे न्यूज फीचर के लिए ही ज्यादा जाना गया। इक्का-दुक्का अपवादों को छोड़कर पिछले छह वर्षों में मुंबई के ‘संडे एनबीटी’ में छपने वाला ‘वीकली संडे स्पेशल’ मेरा ही रहा। यूं कि यहां के मीडिया में मेरा नाम ही ‘संडे स्पेशल’ पड़ गया। हर मौजूं विषय पर लिखा। खासकर, मुंबई पर। मुझे अलग पहचान देने वाला मेरा रहा। नवभारत टाइम्स’ के संपादक विश्ननाथजी और राष्ट्रीय स्तर के दिग्गज संजय पुगलिया ने जिसे लिखा, वह रविवारीय स्तंभ ‘लोग’ 28 वर्ष लिखा। ‘हमसे है मुंबई’ नाम से एक अन्य कॉलम भी, जिसकी 260 से अधिक कड़ियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेनों पर मेरा अन्य कॉलम ‘स्टेशननामा’ अंततः रेलवे द्वारा प्रकाशित 400 पृष्ठों की मेरी कॉफी टेबल बुक ‘मुंबई लोकल’ का सबब बना। कलम चलाने वाला मैं इस किताब के ल‌िए देश भर के मीडिया में खुद इस किताब के ल‌िए खुद लेख की वस्तु सामग्री बन गया। टाइम्स ऑफ ‌‌इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, संडे मिडडे, जैसे अंग्रेजी दैनिकों ने मेरे इंटरव्यू किए और मुझपर लेख छापे। यह लेखन-मेरे कई पुरस्कार-सम्मानों का कारण बना। यह अवसर देने के लिए मैं अपने संपादकों, विश्वनाथ सचदेव, शचींद्र त्रिपाठी और सुंदरचंद ठाकुर का आभारी हूं।
आपने अच्छे फीचर लेखन की बात पूछी है। भाषा, शैली, रोचकता और कुछ मायने में रिसर्च और प्रांजलता को छोड़ दें तो दरअसल, मैं अच्छे रिपोर्टर और अच्छे फीचर रॉयटर में ज्यादा फर्क नहीं मानता। आपको कितना भी अच्छा लिखना क्यों न आता हो, पर अगर आपके फीचर में दमदार कांटेंट नहीं है, तो पाठक आपको किनारे कर देंगे। इसी तरह रिपोर्ट अगर अच्छी तरह लिखी नहीं गई है, तो पाठक ऊपरी कुछ लाइनें पढ़कर छोड़ देंगे। मेहनत का कोई शॉर्ट-कट नहीं होता और पत्रकारिता के मामले में भी यही सच है।
प्र. आपके समय के मीडिया और आज के मीडिया में कितना अंतर पाते हैं? यह कैसा अंतर है?
उ. फील्डवर्क कम हो रहा है। ‘गूगल बाबा’ पर अति निर्भरता है और बाइलाइन पर जोर ज्यादा। टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप जहां मैने काम किया वहां का रिफरेंस सेक्शन देश के अखबारों में समृद्धतम माना जाता है। मुझे याद है, नवभारत टाइम्स या ‘धर्मयुग’ के लेख लिखने के वास्ते संदर्भ सामग्री से सिलसिले में वहां जाना। पर, अब इस लाइब्रेरी के कर्मचारी भी किसी पत्रकार के आने की बाट जोहते रहते हैं। तकनीक ने पत्रकारों को ‘सर्वज्ञ’ बना दिया है। नए अखबारों के दफ्तरों में डिक्शनरियां रखा जाना बंद जैसा हो गया है। भाषा चटखारेदार भले रहे, पर भीतर के शब्द खोखले हो गए हैं। भाषा को सरल बनाने की होड़ में उसका स्वाभाविक सौंदर्य छीजता जा रहा है। शब्द सामर्थ्य कम होती जा रही है। अब न किसीको गलतियां कम करने की ‌फिक्र है, न ‌किसी को उसे सुधारने की। यह सब पढ़ने की आदत कम होने की वजह से हुआ है। आज के मीडिया में आपको ऐसे लोग छाए मिलेंगे, तो लिखते और बोलते तो बहुत है, पर पढ़ते बिलकुल कम। और जो सबसे ज्यादा पढ़ने के कारण लिखने में सबसे समर्थ हैं उनसे लिखवाने की किसीको पड़ी नहीं है।
तकनीकी रूप से अखबार जरूर ज्यादा उन्नत हुए हैं। दैनिकों के सामने अब पत्रिकाओं ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया से भी मुकाबले का बोझ है। ब्रैंड मैनेजरों ने पत्रकारों का काम संभाल लिया है और संपादकों ने मालिकों के नुमाइंदों का। वेज बोर्ड की आखिरी पीढ़ी अब रिटायरमेंट के मुहाने पर है। कांट्रेक्ट पर होने की बाध्यता के कारण अब कर्मचारियों का अखबारों से पहले जैसा लगाव या निष्ठा नहीं है। बेहतर सैलरी की चाह में बड़े से बड़े अखबार अब लांचिंग पैड बन गए हैं। आते-जाते रहने की बाध्यता ने से गुणवत्ता के लिए कोई भी परिवर्तन स्थायी नहीं बन पा रहा है। यह परिवर्तन केवल मीडिया के स्तर पर नहीं, पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों के स्तर पर भी है। बाजार की इस मांग को पूरा करने की मजबूरियों के पहले निशाने पर है पत्रकार। कुछ इससे समझौता कर रहे हैं, कुछ नहीं।
मेरी कही बात कुछ लोगों को नागवार गुजर सकती है। पर, यह सिर्फ नए-पुराने का द्वंद्व नहीं है। दरअसल, बाजार की यह मजबूरी हममें से हमारा सर्वश्रेष्ठ भी निकाल रही है। इस उर्जस्विता को उभरते मैने देखा है। जब मैने मुंबई में नवभारत टाइम्स जॉइन किया था तब के आज के नवभारत टाइम्स में जमीन आसमान का फर्क है।
प्र. आप नवभारत टाइम्स में रहे हैं इसलिए उसे छोड़कर आपकी दृष्टि में भारत में हिंदी का श्रेष्ठ अखबार कौन है और क्यों है।
उ. ‘प्रभात खबर’, ‘अमर उजाला’, ‘ह‌िंदुस्तान’ जैसे कई नाम हैं। पर, मैं सच कहूं कि छोटे शहरों से निकलने वाले हिंदी अखबार उनसे भी बेहतर निकल रहे हैं। इलाहाबाद और भागलपुर के निकलते अखबार तो दिल्ली-मुंबई से निकलने वाले अखबारों को भी मात देते हैं। यह सिर्फ न सिर्फ कांटेंट के मामले में नहीं है, गेटअप-मेकअप के मामले में भी है।
प्र. अखबारी नौकरी को आज के समय में कितनी सुरक्षित मानते हैं आप? नए लड़कों को मीडिया से जुड़ने को लेकर क्या सलाह देंगे, क्योंकि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से भागता हिंदी मीडिया सिर्फ शोषण और असुरक्षा के लिए ही चर्चा में है? 
उ. यह इस बात पर निर्भर है कि आप किस जगह काम करते हैं। बड़े नगरों और बड़े संस्थानों में जरूर बेहतर विकल्प और तनख्वाहें हैं, पर, वहां आपको काम का संतोष भी मिले जरूरी नहीं है। मसलन, आपको खबरें जुटाने के साथ उसी वेतन पर विज्ञापन बटोरने की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है। जहां तक वेतन-भत्तों का सवाल है नए लड़कों को दरअसल, उसी तरह पेशेवर बनने की जरूरत है, जैसा किसी और नौकरी में। जैसा कि मैने पहले कहा मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने वाली संभवतः आखिरी पीढ़ी इस समय नौकरी में है। कांट्रेक्ट जॉब में मिलने वाली वेतनवृद्धि बढ़ती महंगाई के अनुपात में नहीं है। दरअसल, मीडिया-चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक-आर्थिक लिहाज से इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। छंटनी के कारण पत्रकार भी बेरोजगार होकर सड़कों पर आने लगे हैं। मेरे विचार में रोजगार के लिए लिखने-पढ़ने की ही सही, पर आल्टरनेटिव स्किल भी विकसित करनी चाह‌िए, क्योंकि इस क्षेत्र में नौकरियों का जो संकट पैदा हुआ है उनकी भरपाई आप दूसरे क्षेत्रों से करने की काबिलियत हासिल कर अगर आप पहले से तैयारी रखें तो आपको वैसी कुंठा नहीं होगी।
प्र. आप तो पत्रकारिता से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपसे बेहतर कौन बता सकता है कि पत्रकारिता में सबसे जटिल क्या समस्याएं हैं? जैसे आजकल सुना जा रहा है कि देर रात आने के कारण, तनाव और वर्क लोड के चलते पत्रकार रिस्की जीवन जी रहे हैं। 
उ. बहुत रिस्की। नौकरी के घंटों के अलावा आने-जाने के तीन-चार घंटों को जोड़कर देख लें तो मुंबई जैसे बड़े शहरों में यह समस्या और बड़ी है। घड़ी की सुइयों की गुलामी के अलावा उनके पास अपनी सेहत पर ध्यान देने का भी वक्त नहीं है। मैं बड़े अखबारों में एक लाख रुपये या उससे ज्यादा तनख्वाह पाने वाले ऐसे कई पत्रकारों, खासकर रिपोर्टर्स को जानता हूं जो पेशेवर तनाव और अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण दिल और डाइबीटीज जैसी बीमारियों को चिपटा बैठे हैं। छोटे शहरों में दूरियां कम हैं, पर काम की जिम्मेदारियों के कारण उनके लिए घर और ऑफिस में फर्क ही नहीं बचा। सबसे बड़ी समस्या नौकरी की सुरक्षा की है। ‘हायर ऐंड फायर’ के कारण दूसरी नौकरियों और पत्रकारिता के नोबल प्रफेशन में फर्क ही नहीं बचा। मैं युवा पत्रकारों को सलाह दूंगा कि वे कितने भी व्यस्त हों, अपनी दिनचर्या में संतुलन साधकर अपने परिवार, खासकर बच्चों के लिए समय जरूर निकालें, क्योंकि नौकरी के इस मोर्चे पर सबसे ज्यादा प्रभावित उनका घर ही हो रहा है।
प्र. आपके जीवन में कोई एक पत्रकार जिससे आप खासा प्रभावित रहे हों। उनके साथ कोई संस्मरण।
उ. 1971 का भारत-पा‌किस्तान युद्ध था और ‘धर्मयुग’ के संपादक धर्मवीर भारती जाने-माने हिंदी साहित्यकार डॉ. विष्णुकांत शास्त्री के साथ बांग्लादेश में भारतीय सेना के साथ घूमते लाइव रिपोर्ताज छाप रहे थे। शास्त्रीजी-जो भाजपा के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य और बाद में उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बने-पत्रकारिता में मेरे प्रेरणा पुरुष थे। उनके संबंधित एक संस्मरण याद आता है। करीब 25 वर्ष पहले मुंबई के महालक्ष्मी रेसकोर्स में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन था। उसमें वाजपेयी, आडवाणी जैसे सभी बड़े नेताओं की तरह उन्हें मैदान में ही बने टेंट शिविर में ठहराया गया था। अपने साथी अनुरागजी के साथ मैं उनसे मिलने गया तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हमें साथ लेकर उनके पास गए और बीस मिनट के वार्तालाप के बाद गेट छोड़ने आने तक हमारे साथ ही खड़े रहे। वे थे श्री नरेंद्र मोदी-हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री। आज भी यह घटना याद आती है तो रोमांच हो आता है।
प्र. आपको कभी किसी पत्रकार या संस्थान ने शोषित किया? अगर हां। तो वो क्या घटना थी। 
उ. मैने टाइम्स ऑफ इंडिया के रूप में एक ऐसे संस्थान में काम किया, जहां तनख्वाहें ही नहीं, कार्य सुविधाएं भी देश के अखबारों में सबसे अच्छी थीं। विश्व ‌विरासत और देश की सबसे मशहूर इमारतों में एक छत्रपति शिवाजी टर्मिनस के ठीक सामने स्थित यह विशाल बिल्डिंग खुद एक हेरिटज बिल्डिंग है और ‘ओल्ड लेडी ऑफ बोरीबंदर’ कहलाती है। इसमें काम करना प्रिंट मीडिया में काम करने के इच्छुक किसी भी युवक के लिए अंतिम सपना होता था। देश में सबसे ज्यादा दैनिक और पत्रिकाएं निकालने वाला यह एकमात्र ऐसा संस्थान था, जो एक तरह से देश का पावर सेंटर भी था। जहां देश के सबसे दिग्गज संपादक काम करते थे और जाने-माने फिल्म स्टार व सिलेब्रिटीज रोज आया-जाया करते थे। काम की स्वतंत्रता सबको हासिल थी और संपादकीय नीति के मामले में एक ही ग्रुप के अखबार अलग-अलग स्टैंड ले सकते थे। मुझे ऐसी कोई घटना याद नहीं है। यदि कुछ मलाल रहे तो उन्हें मैने सृजनात्मकता पर हावी नहीं होने दिया। मुझे आज भी इस बात का गर्व है कि नवभारत टाइम्स में मेरा चुनाव करने वाले नवभारत टाइम्स के पुरोधा राजेंद्र माथुर और सुरेंद्र प्रताप सिंह थे। न्यूज डेस्क पर संजय खाती मेरे बॉस हुआ करते थे, जो अखबार के मौजूदा प्रधान संपादक हैं। संयोग से मैं उस फ्लैट में भी रहा हूं, जिसके पहले किराएदार हमारे पिछले प्रधान संपादक रामकृपाल सिंह थे। बनारस में ‘आज’ अखबार की पारी में मेरे साथ स्तंभ लिखने वाले शशि‌ शेखर और अजय उपाध्याय राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के संपादक भी बने।

Share this: