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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट भाग-4

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर
  • प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

 

डायरी के पुराने हिस्सों को आपने अगर पढ़ा होगा तो आपको पता ही चला होगा कि ग्वालियर के एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत हो चुकी थी। इसी अखबार में अपने कामकाज की चर्चा आज भी करेंगे।

जैसा की मैंने बताया था कि हमने दिल लगाकर काम किया। सिर्फ काम किया। जी तोड़ काम किया और नतीजा ये हुआ कि सम्पादक के करीब तो नहीं जा पाए पर मालिकों के प्रिय हो गए थे। हकीकत तो ये है कि एक दैनिक अखबार में एक सक्रिय रिपोर्टर ( सक्रिय रिपोर्टर से तात्पर्य सिटी का कम से कम आधा पेज मेरी खबरों से भरा जाता) होने के बावजूद लगभग डेढ़ वर्ष के पूरे करियर के दौरान मैं अपने पहले अखबार के सम्पादक से मिला ही नहीं। वो डेस्क में कभी आते नहीं। केबिन में मुझे बुलाते नहीं थे। हालांकि मैंने सोचा भी नहीं कि वो मुझसे नाराज हैं या मालिकों का करीब समझते हैं। इतना ज्ञान मुझमें था ही नहीं। मैंने तो पहली बार किसी सम्पादक को देखा था। तो मैं यही सोचता था कि सम्पादक ऐसे ही होते होंगे। कि वो छोटे मोटे रिपोर्टर से क्या मिलेंगे। इसलिए मैंने कभी इस मसले पर सोचा नहीं। हालांकि डायरी आगे बढ़ेगी, तब पता लगेगा कि सम्पादक मुझसे मिलते जरूर नहीं थे पर मुझे पसंद करते थे और मेरे हर काम पर उनकी नजर होती थी। हालांकि मेरे पहले सम्पादक को दफ्तर में कामकाज के दौरान तो मैं समझ नहीं पाया। क्योंकि कभी बातचीत नहीं हुई पर बाद में मालूम हुआ कि मध्यप्रदेश के गुणी सम्पादकों में से एक थे और बहुत दुलार जताते थे मुझसे।

खैर बात अभी प्रथम अखबार की ही। मेरे सम्पादक अपने बजाज खटारा से आते और आंखों में काला चश्मा, गले में मफलर और मदमस्त चाल। कुछ कुछ गुरुदत्त टाइप। मुझे तो उनमें कोई दोष नहीं लगता। बस मैं अखबार को देखता तो जरूर लगता कि इतने गुणी सम्पादक हैं तो इतना बकवास अखबार क्यों निकालते हैं। ग़लतियों को गौर क्यों नहीं करते। जैसे जैसे मैं मालिक का प्रिय होता गया। मालिकों के साथ मेरी बैठक होने लगी। एक बार मालिक मिले। मैंने कहा सर एकदम कचरा अखबार निकल रहा है। तो मालिक शुरू हो गए और दमभर के मेरे सामने ही सम्पादक को गाली देने लगे। कहने लगे पता नहीं कहां से आ गया है। नशेड़ी है। लगा के आ जाएगा औऱ केबिन में बैठा रहेगा। कामकाज से इसको कोई लेना देना नहीं है। वो धाराप्रवाह बोलते जा रहे थे और मैं सुनता जा रहा था और मुझे आश्चर्य भी हो रहा था कि वाकई अपना सम्पादक ( जो पुरानी फिल्मों के नायक सरीखा है) इतना निकम्मा है और अगर है तो मालिक रफा दफा क्यों नहीं करते। इतने में मालिक बोला इसका जल्दी हिसाब करना है। वैसे भी हम तो बात ही नहीं करते इससे। मालिकों की बातचीत से ये तो साफ हो गया था कि वो सम्पादक के नाम पर मजबूरी ढो रहे हैं। हालांकि मेरे पहले सम्पादक के किस्से भी मशहूर थे। एक वरिष्ठ साथी बता रहे थे कि सम्पादक जी चढ़ा के आते थे और काला चश्मा लगा के केबिन में लुढ़क जाते थे। एकदिन केबिन में मदमस्त थे और मालिक पहुंच गए। जैसे ही मालिक केबिन में घुसने को हुआ एक वरिष्ठ सहयोगी ने रोका सर अभी नहीं। मालिक ने घूरकर देखा औऱ बोला क्यों। तो सम्पादकीय सहयोगी बोला सर अभी कुछ गहन चिंतन कर रहे हैं। मालिक ने इतना सुनकर केबिन के अंदर शीशों से देखा तो सम्पादक काला चश्मा लगाए अपने डेस्कटॉप की ओर देख रहे थे। मालिक वापस चले गए। बाद में पता चला कि सम्पादक महोदय धुत्त थे। बस संयोग से उनका मुंह कम्प्यूटर सेट की तरफ था। हाहाहा।

इस अखबार की एक मासिक पत्रिका भी निकलती थी। अपन वहां भी आलेख लिखते थे। पत्रिका में काफी धीर गंभीर लोग लिखते थे। पर अपने आलेखों को विशेष जगह मिली औऱ एक बार कवर स्टोरी भी बनी। मालिक उससे भी प्रसन्न हुआ औऱ व्यक्तिगत बधाई दी। अखबार के लिए मैं पूरे ग्वालियर में पैदल बाग बागकर रिपोर्टिंग करता और फिर पत्रिका के लिए भी खबर लिखने लगा। जबकि पत्रिका में लिखने का पैसा नहीं मिलता था। ये सब मेरा जुनून था। मुझे किसी ने ऑफर भी नहीं दिया था लिखने का। मुझे तो पता लगा कि अखबार की पत्रिका निकलती है और मैं सीधे पत्रिका के सम्पादक मोटूराम से मिलने केबिन पहुंच गया। (मोटूराम गड़करी टाइप थे)  बताया सर लिखना चाहता हूं, सम्पादक बोले लिखो। लिखा, तो उनको पसंद आय़ा औऱ छप गया औऱ फिर क्रमशः लिखता। वो सम्पादक बहुत प्रेम करने लगे। 14वीं लोकसभा पर मैं एक लम्बी स्टोरी बनाकर ले गया। सम्पादक जी से मिला और उनकी टेबिल पर स्टोरी रखते हुए बोला, सर इसको देख लीजिएगा। सर बोले ठीक है। कल बताएंगे। अगले दिन हम फिर पहुंच गए। दरअसल उस समय चस्का ये था कि अखबार या पत्रिका में खबर के साथ जो नाम चमकता था, वो समझो जीवनदाता जैसा होता था। हालांकि बाद में ये मोह एकदम छूट गया। वो कहानी आगे बताएंगे। खैर अगले दिन पत्रिका सम्पादक के केबिन फिर पहुंचे। मैंने सम्पादक को प्रणाम किया औऱ बोला कि सर देखी स्टोरी। पत्रिका के सम्पादक बहुत गुणी औऱ अनुभवी थे। मुझे देखकर मुस्कुराए। बोले लग जाएगी। उसके बाद भी वो मुस्कुराते जा रहे थे और मुझे देखते जा रहे थे। फिर बोले बेटे तेरे चेहरे में सफेद दाढ़ी होती अगर तो तेरी स्टोरी आज कवर स्टोरी बनती। इतनी बढिया स्टोरी लिखी है तूने। पर पत्रकारिता में पकी दाढ़ी का बहुत दबाव होता है। पकी दाढ़ी वाले बहुत हैं हमारी पत्रिका में, अगर तुझे सबसे ऊपर कर दिया। तो उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचेगी। लेकिन कोई नहीं तू बहुत आगे जाएगा। मुझे पता है। उनके ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। उनके इस टिप्पणी पर लाखों लाख पुरस्कार न्यौछावर। मैं 22 साल का लड़का, 3 हजार की नौकरी करने वाला, गली गली पैदल बागने वाला, मानों खून एकदम डबल हो गया हो। निश्चित ही हर पत्रकार के जीवन में ऐसे कुछ क्षण आते हैं जब वो बेहद प्रसन्न होता है। मेरे लिए ये वही क्षण था।

हालांकि पत्रिका में मेरे लेख की चर्चाएं अखबार के साथी भी करते। हालांकि मुझे प्रोत्साहित करते कि अच्छा लिखा है। लेकिन बाद में मुझे अखबार के सम्पादक की ओर से एकदिन कहा गया कि आप ज्यादा पत्रिका की ओर न दौड़े, आप अखबार के कर्माचारी हैं। अब ऐसा क्यों कहा गया। मुझे आजतक पता नहीं चला। न मैंने पता किया। जबकि पत्रिका भी अखबार की ही थी। पर बुरा जरूर लगा। आहिस्ता आहिस्ता समय आगे बढ़ता गया, मैं पत्रकारिता में बड़ी तेजी से परिपक्व होता गया। मेरे साथी भी इस बात को और मेरी कलम को समझने लगे। पर रिपोर्टिंग कर करके मैं थकावट महसूस करने लगा। दिनभर रिपोर्टिंग करना, फिर सुबह व रात को खाना बनाना। बड़ा परेशानी भरा था। मैं घर से दूर किराए के घर में था। और दफ्तर से प्रतिदिन रात को 5-6 किलोमीटर पैदल चलकर घर जाता था। मुझे डेस्क का काम कुछ ठीक लगा। मैंने मालिक से बोला कि मुझे रिपोर्टिंग से हटाकर डेस्क में कर दो। मालिक ने तुरंत मुझे बिजनेस डेस्क में इंचार्ज बना दिया और मैं बिजनेस पेज देखने लगा।

मेरी देखरेख में ही बिजनेस पेज जाने लगा। मैंने बिजनेस खबरों का अध्ययन करना शुरू किया। कुछ ही दिनों में मैंने बिजनेस पेज पर प्रयोग करते हुए एक साप्ताहिक कॉलम लिखना शुरू किया, जो कि पहली बार एहसास हुआ कि सम्पादकीय साथी पचा नहीं पा रहे थे। अचानक से बिजनेस पेज की जिम्मेदारी। फिर नाम से पूरा कॉलम। मुझे अब लगने लगा कि लोग मुझे हैरत से देखते हैं। जो मुझे प्रोत्साहित करते थे, उनकी नजरें बदल गईं। किसी ने मेरे बिजनेस पेज के काम को प्रोत्साहित नहीं किया। पर कोई कह कुछ नहीं पाता था क्योंकि सबको पता था हाईकमान का आदमी है। एकदिन फिर मालिक ने बुलाया और कहा तुम्हारा कॉलम बहुत शानदार होता है, एक बिजनेस सम्मिट थी। उसमें मैंने तुम्हारे कालम पर जो लिखा था बोला। लोगों को बहुत पसंद आय़ा। मैं बहुत अध्ययन करके लिखता था और दिल से लिखता था। और मुझे आज भी इस बात का भरोसा है बिजनेस पर मेरे लिखे गए उस वक्त के स्तंभ मेरे सर्वश्रेष्ठ स्तंभ थे। कुछ कटिंग आज भी हैं मेरे पास। लेकिन अब मामला बिगड़ने लगा। मालिक क्या करे। काम तो मुझे सम्पादकीय साथियों के बीच करना है। धीरे धीरे मुझे घेरा जाने लगा अलग अलग तरीकों से। मालिकों से कानाफूसी करवाई जाने लगी। मैं बिजनेस पेज देखता था। इसलिए कुछ सम्पादकीय सहयोगियों ने अपने मित्रों से पाठक के रूप में मालिक को फोन करवाया कि आपका बिजनेस पेज कौन देख रहा है आजकल। बहुत खराब जा रहा है। मुझे पता लग गया। मालिक ने मुझे बुलाया और बोला पेज को लेकर शिकायती फोन आ रहे हैं। मैंने मालिक को समझाया नहीं, बस अंतर्मन में खुद से कहा कि प्रशांत तुम्हारा दाना पानी यहां से पूरा हुआ। हालांकि मुझे मेरे साथ राजनीति करने वालों से गिला कोई नहीं हुआ पर ये जरूर सोचा कि दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं। ये सब मेरे लिए नया था। मेरा जो पेज बनाता था पेजीनेटर। उसको भी भड़का दिया गया। वो भी मुझे कोपरेट नहीं करता। उस दौर में दरअसल बाजार भाव जाने का चलन था हर रोज। बाजार भाव आपको कुछ निश्चित कमोडिटी सेंटरों से मिलते। मेरे वरिष्ठ साथियों ने पहले ही ग्वालियर के सभी ऐसे सेंटरों को पहले ही बता दिया कि फला नाम से कोई आए तो भाव मत देना। मैं गया। कई दिन गया। मुझे वो टालमटोल करते रहे। बाद में मुझे अखबार के ही एक सज्जन से मालूम हुआ कि मैंने बिजनेस पेज की जिम्मेदारी ले ली, और मेरी वजह से जिसको इस जिम्मेदारी से हटना पड़ा। वो सब खेल खेल रहा है। मैं अब हारने लगा था। अकेला महसूस करने लगा था। मुझे यहां घुटन होने लगी थी। मालिकों को भी एक तरह से ये भर दिया गया था कि मैं बिजनेस पेज के योग्य नहीं। उनका व्यवहार कुछ बदलने लगा। मेरे स्तंभ के बारे में भी एकदिन एक साथी से कहते पाया कि ये इसका लिखा नहीं है, कहीं से कॉपी करता है। उसी समय एक नया अखबार आया। मैंने साक्षात्कार दिया और मेरा उसमें डबल सैलरी पर हो गया। ये अखबार ग्वालियर में दैनिक भास्कर का कंपटीटर बनकर आय़ा और ग्वालियर के दिग्गज सम्पादक और पत्रकार इससे जुड़े। यहां की कहानी अगली कड़ी में सुनाएंगे।

हालांकि पहले अखबार की रिपोर्टिंग से जुड़े कुछ छोटे छोटे किस्से बताते जाएं। उसको बताते चलें। दरअसल अपन हर क्षेत्र की रिपोर्टिंग कर देते थे। एकदिन प्रशासनिक अधिकारियों के एक कार्यक्रम में जा पहुंचे। वहां एक लड़की बड़ी गोरी थी। अपन को अच्छी लग गई। हम तो बस उसीको देखते रहे। चश्मा लगाए, सलीके से सलवार कुर्ता पहने जंच रही थी वो। कार्य़क्रम खत्म हुआ। अपन जा पहुंचे उसके पास। परिचय दिया और उसने नाम भी बताया। स्वाती मीणा। कार्य़क्रम से लौट आए। रातभर नींद नहीं आई। अगले दिन फोटोग्राफर से पूछा यार वो लड़की जो चश्मे वाली थी, तुम जानते हो। फोटोग्राफर बोला, जिससे आप लगे पड़े थे। मैंने बोला हां। बोला भैय्या ज्यादा मत चिपको उससे। अंडर ट्रेनिंग आईएएस है। बोले तो कलेक्टर। अरे रे रे रे… हमने कहा गई हाथ से। पर उसकी सुंदरता से मैं प्रभावित रहा। पर मैं दोबारा मिला नहीं कभी। न कोशिश की। हां एकदिन लगा कि नम्बर में संदेश भेजूं। पर नहीं भेजा। नम्बर कहीं से जुगाड़ कर लिया था।

दूसरी कहानी.. यहीं रहते एक बार क्या हुआ कि एक प्रेस कांफ्रेंस का पता लगा जिसमें फिल्म गायक अनु मलिक आ रहे हैं। जब कोई सेलिब्रिटी आता था। तो मैं संबंधित प्रेस कांफ्रेंस को कवर करने वाले रिपोर्टर से आग्रह करके उसके साथ चला जाता था। इस बार भी आग्रह किया और वो संवाददाता मुझे लेकर चल दिया। होटल में पीसी शुरू हुई। अनुमलिक से सवाल जवाब शुरू हुए। हमने भी एक सवाल दागा। मैंने कहा कि आप कितने पैसे लेकर यहां आएं हैं और मैंने एक सवाल और किया कि सुना है आपकी और आय़ोजकों की पैसे के लेनदेन को लेकर बहस हुई है। अनु मलिक सन्न बन्न। आयोजकों को काटो तो खून नहीं। सब पत्रकार मुझे देखने लगे। मेरे अखबार का रिपोर्टर मुझे अचरज भरी नजरों से देखने लगा। दरअसल सभी फिक्स थे यहां, रिपोर्टरों को गिफ्ट मिले थे औऱ उन्हें एंटी क्वेश्चन नहीं करने थे। पर मैं तो खैरात में आ पहुंचा था और मुझे कहीं क्लू मिला था कि अनु मलिक पैसों को लेकर आयोजकों से बहस कर रहे थे। हमने वही सवाल दे मारा। उसके बाद अनु मलिक चेयर से उठे और ग्वालियर मेले के आय़ोजक को गले लगाया और कहा अब देख लो कोई लड़ाई नहीं। मतलब सब गुड़ गोबर कर दिया। पीसी खत्म हुई तो मेरे अखबार का रिपोर्टर बोला तुम मरवाओगे हमे। कैसे सवाल पूछ रए तुम। पर हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था। बस जो मन हैं कह देना है।

एक औऱ वृतांत फिर आज की कड़ी खत्म करें।

हमारे पहले अखबार के ही अधबुढ़ नशेड़ी पत्रकारों ने एक पत्रकार संघ गठित किया। हम तो नए नए थे। हमें कहा गया तुम्हे भी कुछ पद देंगे। हम तो गद गद। कि भाई चलो पत्रकार संघ के पदाधिकारी बनेंगे। पत्रकार संघ पंजीकृत हुआ। एक बैठक भी हुई। हम भी शामिल हुए। लेकिन मजे की बात ये कि पत्रकार संगठन कहीं के हों लेकिन ठीकठाक पत्रकार उसका हिस्सा कभी नहीं बनता। उस बैठक में भी तमाम अखबारों के छटे छटाए नशेड़ी औऱ दलाल थे। एकदिन इसी संगठन के मुखिया जो हमारे अखबार के ही थे। मैंने सुनते पाया कि दीवाली आने वाली है अब निगम पार्षदों, महापौर, विधायकों से कुछ चंदा वंदा कर लिया जाए। साथ ही एक आयोजन के नाम पर कुछ चंदा जमा लिया जाए। फिर बाद में चस्के ले लेकर बोल रहे थे ये लोग कि कार्य़क्रम में मौज होगी और जो माल बचेगा शामें रंगीन होंगी। उसी समय से मुझे पत्रकार संघों का मूल उद्देश्य समझ आ गया था औऱ मुझे हमेशा पत्रकार संघों के नाम से चिढ़ होने लगी। यही हाल अब दिल्ली के पत्रकार संघों के हैं। सिर्फ औऱ सिर्फ चंदा वसूली। गैंगबाजी, अड्डेबाजी। उनका पत्रकार हितों से कोई लेना देना नहीं।

एक बहुत छोटा संस्मरण। मेरी पहली नौकरी में ही अनुभव लाजवाब मिले। यहां एक खास बात पता लगी। यहां जो रिपोर्टर होते थे। उनकी कोई खबर नाम से (बाईलाइन) लगती, तब वो अपने ही किसी आदमी से मालिक या सम्पादक को फोन करवा देते थे। कहलवा देते थे कि सर किसने ये खबर लिखी है। गरदा उड़ा दिया इस खबर ने, पूरे ग्वालियर में चर्चा है। खूब करते थे रिपोर्टर ऐसा। हाहाहा। मतलब दिमाग का काम है मार्केटिंग…..

मिलते फिर सोमवार को अगली कड़ी में नई कहानी के साथ।

प्रणाम।

नोटः ये डायरी मिरर सम्पादक प्रशांत राजावत के पत्रकारिता जीवन की सत्यकथाएं बताती है। आपको कैसी लगी। आप प्रतिक्रिया दे सकते हैं। ये संक्षिप्त रूप से इसका प्रिंट स्वरूप किताब बनकर भी आपके सामने आएगा।

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