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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट भाग-5

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

प्रशांत राजावत-सम्पादक मीडिया मिरर

पिछले तमाम हिस्सों को अगर आपने पढ़ा होगा तो निश्चित ही समझा औऱ जाना होगा कि मेरे पत्रकारिता की कहानी अभी ग्वालियर में ही घूम रही है। एक तरह से कहें तो ग्वालियर से ही मैंने पत्रकारिता की शुरूआत की। बहुत कम हिस्सा एक देहात में शुरू में बिताया। पर वो भी ग्वालियर जिले में ही पड़ता था।

पिछले हिस्से में मैंने बताया था कि कैसे एक दैनिक हिंदी अखबार के साथ मेरे नौकरी की शुरुआत हुई औऱ कैसे मेरी मेरे पहले अखबार से विदाई सुनिश्चत हुई। हम कहानीं में आगे बढ़ें उससे पहले बता दें कि जैसा कि मैंने पहले ही अखबार में काम करते जाना। वो ये था कि जूनून, क्रांति. समाजसेवा, मिशन, उद्देश्य, चौथा खम्बा आदि आदि, ये सब पत्रकारिता के संदर्भ में एकदम बकवास बातें हैं। मेरे अखबार का मालिक फर्जी आदमी था। चिटफंड का धंधा करता था। कई काले कारनामें थे। उसने अखबार को महज एक हथियार के रूप में प्रयोग किया। इतना ही नहीं मालिक ने अपने अखबार के संवाददाताओं का भी भरपूर उपयोग किया। राजनीतिक संवाददाता नेताओं से मीटिंग फिक्स कराने के लिए, जुगाड़-सुगाड़ के काम करवाने के लिए, अपराध संवाददाता पुलिस को कंट्रोल करने के लिए मालिक के काम आते थे। यहां तक कि क्रिकेट मैच के पास भी मालिकों को चाहिए तो संवाददाता को ही परेशान होना होता था। वहीं पत्रकारों की बात करें, तो वो भी पेट पाल रहे थे। जुनून औऱ मिशन मुझे तो कहीं नहीं दिखा। जिसका जैसा जुगाड़ लगता वो वसूली भी कर ही लेता होगा। जैसा कि मुझे भी कुछ ऑफर आए।

अब आगे बढ़ते हैं।

ग्वालियर

वर्ष 2009 ..

मैंने अपने पहले अखबार से नौकरी छोड़ दी और ग्वालियर से शुरू हो रहे नए अखबार में साढ़े 7 हजार रुपए में ज्वाइन कर लिया। साढ़े तीन हजार से सीधे साढ़े 7 हजार मिलना मेरी उन्नति और खुशी दोनो का ही संकेत था। अखबार भी बढ़िया था। इस अखबार की खासियत ये थी कि इसने ग्वालियर के तमाम बड़े अखबारों से बढ़िया बढ़िया पत्रकारों को तोड़ लिया था। उस समय ग्वालियर का सबसे बड़ा अखबार दैनिक भास्कर तो तकरीबन खाली ही हो गया था। उसके सभी पत्रकार इस अखबार में आ गए थे, इसका एक कारण इस अखबार के सम्पादक भी थे, जो स्वयं भास्कर छोड़कर आए थे और बहुत ही लोकप्रिय थे। कुल मिलाकर बड़े अखबार में और शहर के दिग्गज पत्रकारों के बीच मुझे काम करना था। घर में भी सूचना दे दी। तो भैय्या ने कहा कि तनख्वाह तो बढ़ ही गई है तुम्हारी, एक कोई पुरानी मोटरसाइकिल ले लो, पैदल चलकर रिपोर्टिंग कब तक करोगे। पैसा बढ़ा है तो काम भी बढ़ जाएगा, इसलिए बाइक जरूरी है। वो मुझे कायनेटिक चैलेंजर नाम की एक बाइक दे गए।

एक बात मैं पाठकों को स्पष्ट कर दूं कि यहां मेरा रिज्यूम जुगाड़ से ही गया था। इस अखबार के टॉप मैनेजमेंट का अधिकारी उसी कस्बे से था। जहां से मैंने पत्रकारिता शुरू की थी। जहां से पत्रकारिता शुरू की थी, उसी ब्यूरोचीफ ने मुझे बताया था कि फलां अखबार शुरू होने वाला है। मैं कह दूंगा। तुम्हारा हो जाएगा। तो यहां पहले मैं रिज्यूमे दे आया था। फिर सम्पादक ने औपचारिक साक्षात्कार लिया था औऱ मेरा हो गया था। मैं स्पष्ट इसलिए करता चल रहा हूं कि पत्रकारिता में नौकरियां बिना सम्पर्क के नहीं मिलतीं। पहली भी जुगाड़ और दूसरी ये भी जुगाड़ से मिली।

यहां मैं एकदम बच्चा था। देखने में भी औऱ काम में भी। पुराने अखबार में काम करते हुए जिन बड़े पत्रकारों का मैं नाम सुना करता था, वो सब यहां थे। सम्पादक, समाचार सम्पादक, उप समाचार सम्पादक, अपराध संवाददाता, फीचर डेस्क इंचार्ज सभी घोषित काबिल पत्रकार थे। शुरूआती दिनों में तो मैं बस थोड़ा स्तर बढ़ने का आनंद ले रहा था। दफ्तर से एक मोबाइल देने की भी बात हुई थी।

सर्दी के दिन थे। मेरे किराए के कमरे से दफ्तर दूर था। और यहां दफ्तर भी काफी बड़ा था। बाइक से ही आता जाता था दफ्तर। पर बाइक इतनी पुरानी थी कि क्या बताएं। ऐसा लगता था कि मैं बाइक में नहीं बल्कि बाइक मेरे ऊपर सवार है।

यहां सुबह 9 बजे सभी रिपोर्टरों की मीटिंग होती थी। मीटिंग लेते थे समाचार सम्पादक। सुबह की मीटिंग मेरे लिए नई थी। पुराने अखबार में नहीं होती थी। सुबह की मीटिंग में होता ये था कि प्रत्येक संवाददाता को खबर बतानी होती थी कि आज वो कौन सी खबर देगा, जो खबर वो बताता था। उस खबर को शाम को देना अनिवार्य़ था। यहां पर मैं बहुत डर डरकर रहता था। मुझे यहां पर परिवहन बीट दी गई। एक, दो शायद और हों। पर मुझे वो बीट याद नहीं। परिवहन एक बड़ी बीट है। खासतौर पर ग्वालियर के संदर्भ में, क्योंकि मध्यप्रदेश का परिवहन मुख्यालय ग्वालियर में है। सुबह मीटिंग में आने के चक्कर में मेरी दिनचर्य़ा पूरी तरह से प्रभावित हो गई। हालांकि मैं उस घर में पला बढ़ा लड़का हूं। जहां पानी की गिलास भी मुझे उठाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। ऐसे में खाना-पीना बनाना तो बहुत दूर की बात थी। तो जब मुझे अकेले रहने के लिए आना पड़ा। तो सबसे बड़ी समस्या मेरे खाने पीने की थी। बाहर का खाना मुझे पसंद नहीं आता। समोसा, चाट ये सब मैंने कभी खाए नहीं, इसलिए देखते ही मन खराब हो जाता। ऐसे में ग्वालियर में पहले दिन से ही खाने की समस्या से दो चार होता रहा। कभी खाना बनाने के लिए काम वाली रख लेता, कभी टिफिन लगवा लेता। कभी पीजी वाला विकल्प। पर कुछ न कुछ गड़बड़ी के बाद अंततः खुद ही उल्टा-पुल्टा बना लेता था। काम वाली बाई लगाई थी, जो बरतन भी धोती थीं और खाना भी बनाती थीं। मुझे उनके बनाए खाने में स्वाद तो कभी नहीं आया, पर सब चल रहा था, लेकिन एकदिन मैंने देखा कि वो जिस बर्तन में आटा माड़ रही हैं, उसको गीले आटे से एकदम पोछकर उन्होंने रख दिया। अगले दिन आईं और फिर उसी बर्तन में आटा माड़ना शुरू कर दिया। मैंने टोका कि आंटी उसे धो तो लीजिए, तो बोली कि कल साफ किया था। मैंने कहा कल कहां धोया था। आज उसमें कोई कीड़ा मकोड़ा चला हो तो। तो बोली हम तो इसे महीनों नहीं धोते, बस आटे से ही पोछ देते हैं। चूंकि जब आटा मड़ जाता है तो उसकी लुग्दी से आप बर्तन को एकदम साफ सा कर सकते हैं। वही हो रहा था।

मुझे तत्काल उसे बाहर करना पड़ा। टिफिन के खाने में भी तेल बहुत होता, तो कभी मिर्च। उसे भी बंद कर दिया था। मैं खुद रोटियां बनाता था सुबह के वक्त। और फिर वही रोटी दोनों टाइम खाता था। रोटियां गोल भी नहीं होती थीं औऱ थोड़ा जल जाती थीं। पर पेट भरने के लिए कोई विकल्प था नहीं। कम से कम शुद्धता तो थी। चावल मुझसे बनते नहीं थे औऱ सब्जी दाल भी नहीं। मैं रोटी के साथ गर्मी के दिनों में कच्चे आम का पना औऱ बाकी दिनों टमाटर और प्याज खाता था। औऱ ऐसे ही अपनी जिंदगी चल रही थी।

हां तो अब जब नए अखबार में आ गए। तो सुबह मीटिंग होती। इसलिए सुबह का खाना बनाना बंद। भयंकर सर्दी। नए नए लोग और नया नया कामकाज, नया दफ्तर। हालत बिगड़ने लगी। पैसा ज्यादा था यहां। तो काम भी ज्यादा था। बड़ी बीट दी गई थी। बाइक से ही मीटिंग जाता था। शुरू किया काम करना। सुबह खबरें लिखवा देता था औऱ शाम को खबरें देने की कोशिश करता। कुछ खबरें छूट जाती थीं। हालांकि मुझे यहां पर नम्बर ऑफ न्यूज की कोई प्रॉब्लम नहीं थी। स्टाफ बहुत था। 2 खबरें भी दे दो। तो पर्याप्त था। पर मेरी हालत खस्ता हुई जा रही थी। कमरे से बगैर कुछ खाए पिए मीटिंग आ जाता औऱ कई बार तो पूरे पूरे दिन खाने का कोई इंतजाम ही नहीं। इसके साथ ही जो बीट मुझे दी गई, मैं वहां भी कोई खबर नहीं निकाल पा रहा था। परिवहन विभाग में छोटे से लेकर बड़े किसी भी अधिकारी कर्मचारी से कोई जान पहचान थी नहीं।

आमतौर पर होता है कि रिपोर्टर जब अखबार की नौकरी बदलते हैं। तब भी बीट अपनी नहीं बदलते। क्योंकि उनके सारे पुराने सोर्स तो पुरानी बीटों में ही रहते हैं। रही मेरी बात तो मैंने धर्म,कला औऱ संस्कृति बीट देखी थी। यहां वो बीट किसी महिला रिपोर्टर को दे दी गई थी। ऐसे में मुझे नई बीट मिली। बीट में खबर निकालने का एक तरीका ये भी होता है कि आप सभी बड़े अखबारों की पुरानी फाइलें देख जाइए। जब आप तीन चार महीने के पुराने अखबार देखेंगे तो आपको अपनी बीट में होने वाले पूर्व के घटनाक्रमों की पूरी जानकारी हो जाएगी, औऱ उसी हिसाब से आप अपनी बीट में फॉलोअप करके खबरें करने लगेंगे।

लेकिन मैं सच बताऊं, बीट में बेहतर काम ये तरीका मुझे तब पता नहीं था। सच तो ये है मैं यहां बुरी तरह से फंस चुका था। भूखा प्यासा दिनभर भटकता। लेकिन मुझे समझ नहीं आता, कि वाकई करना क्या है। खबरें लाऊं कहां से। कुछ पल्ले ही नहीं पड़ रहा था। चूंकि सुबह मीटिंग में खबरें लिखवाना होती थीं। तो मैं फिलर खबरें लिखवाता था, जो बीट से अलग होती थीं। यहीं पर मुझे पता लगा कि सुबह जब सारे रिपोर्टर जुटते हैं, तो सभी अखबारों की एक फाइल दफ्तर में होती है, उस फाइल को सभी रिपोर्टर बारी बारी से पढ़ते हैं। जिससे उन्हें पता चलता है कि उनके बीट की खबरों को किस अखबार ने कैसा दिया है। उनसे अपने बीट की कोई खबर चूक तो नहीं गई। सीखने को मिल रहा था। कुछ मजा आ रहा था पर ज्यादा सजा।

मुझे ज्यादा कुछ ये लग रहा था कि जितना मैं दफ्तर के कामकाज से परेशान नहीं हूं उतना मैं अपनी अव्यवस्थित जीवन शैली से परेशान हो गया हूं। पांच से 10 दिन बीते। बड़ी मुश्किल से दफ्तर में एक एक दिन बीत रहा था। कुल मिलाकर कैसे भी कट रही थी। एक औऱ बात। चूंकि सैलरी काफी ज्यादा थी, तो घरवालों की भी उम्मीदें बढ़ जाती हैं। ऐसे में आप पर बोझ आ जाता है। दबाव बनता है। न चाहते हुए भी काम करने का। मुझपर वही दबाव था।

ये चूंकि बड़ा अखबार था, यहां के कामकाज की शैली की बात करें या न्यूजरूम की तो सबसे पहले तो ये कि सम्पादक रिपोर्टर से बात नहीं करते थे। रिपोर्टर से पूरी बात समाचार सम्पादक ही करते थे। सम्पादक पहला पेज देखने वाले से, फीचर डेस्क वाले से, समाचार सम्पादक औऱ उप समाचार सम्पादक से बात करते थे अक्सर। यहां मैं शाम को आता औऱ खबरें लिखना शुरू कर देता। यहां शब्दसीमा तय थी। सॉफ्टवेयर कुछ खास था। जिसमें खबर के इंट्रों के लिए अलग बॉक्स, वर्जन के लिए अलग, औऱ कुछ खास इनपुट खबर में डालना हो उसका अलग बॉक्स था। यहां आप जबरन कुछ भी खबर में नहीं लिख सकते। ठीक मेरे पुराने अखबार से उल्टा। वहां जबरन ही लिखना होता था। बढ़ा चढ़ाकर ताकि शब्द बढ़ जाए और अखबार का पन्ना भर जाए। पर यहां बिल्कुल उल्टा। एकदिन मैंने खबर लिखी। पीछे आकर समाचार सम्पादक खड़े हो गए। बोले खबर पूरी हो गई। मैंने कहां हां। मुश्किल से एक मिनट पीछे खड़े खड़े खबर देखी और माउस उठाया और झट में दो तीन जगहों से खबर को काट दिया। लगभग आधी खबर गायब। बोले रिपीट करने की जरूरत नहीं है। खबरें बांधकर लिखें। हमारे अखबार में फिजूल की जगह नहीं है। रिपोर्टर बहुत हैं। सबकी खबरों को स्थान देना है। पुराने अखबार में ठीक उल्टा कहा जाता था तानकर लिखो, खबरें कम हैं। अखबार कैसे भरेगा।

अगले दिन से अपन बांधकर खबरें लिखने लगे। मतलब जितना मुद्दा होता। सिर्फ उतनी खबर। अपनी ओर से कुछ नहीं। यहां कामकाज की शैली थोड़ा अलग थी। मेरी जो खबर होती, वो उप समाचार सम्पादक के पास जाती थी। वो उस खबर को पूरी पढ़ता था। सुधारता था। कोई कमी दिखती थी। तो बुलाता था। उसके बाद वो खबर डेस्क के पास जाती थी। यहां देखकर मुझे लग रहा था कि हां योग्य पत्रकार हैं। थोड़ा साफ सुथरे, यंग, बॉडी बिल्डर, गुड लुकिंग, स्टायलिश पत्रकार थे यहां। सब अपने अपने क्षेत्र के धुरंधर। खबरें तो मानों इनके पास चलकर आती थीं। सबसे छोटा और कम अनुभवी मैं ही था। पर मुझसे सब बड़े प्यार से बात करते थे। यहां एक औऱ बात थी कि अगर मुझे कोई दिक्कत आती तो डेस्क से लेकर रिपोर्टर पूरी मदद करते। ऊर्जावान संवाददाताओं की फौज थी। मैंने कहा न ग्वालियर की क्रीम यहां पर जमा की गई थी। और उस क्रीम में मैं भी शामिल था। ये जानकर खुशी होती थी। क्योंकि लोग कहते थे कि फलां सम्पादक ने चुनचुनकर लोगों को शामिल किया है।

लेकिन यहां मुझे पूरी तरह लगता था कि मैं कुछ हूं ही नहीं। यकीनन मुझे कुछ ज्यादा नहीं आता। खबरें कैसे निकालना है, बीट में कैसे काम करना है। सोर्स कैसे बनाएं। मुझे कुछ पता नहीं था। हालांकि मेरी पत्रकारिता का ये दूसरा ही वर्ष था। मैं नया ही था। मुझे सीखना ही था। और मैं यहां सीख ही रहा था। लेकिन दिनबदिन समय बढ़ता गया, मेरी खराब दिनचर्य़ा का असर मेरे स्वास्थ्य, दिमाग औऱ काम पर पड़ने लगा। इस बीच मैंने देखा कि समाचार सम्पादक का व्यवहार बहुत रूखा होने लगा। समाचार सम्पादक रिपोर्टरों पर चिल्लाने लगा। बहुत ही बुरे लहजे में। ये भी मेरे लिए नया था। एक दिन मैंने देखा कि एक मासूम सी लड़की जो धर्म बीट देखती थी, सुबह की मीटिंग में थोड़ी लेट हो गई। जैसे ही पहुंची, समाचार सम्पादक ने पूरे अड़ियल रवैय्ये के साथ उसको मीटिंग में शामिल होने से मना कर दिया और जमकर फटकारा। ऐसे ही एक दिन और किसी रिपोर्टर से भिड़ गया। ऐसा लोग कहते थे कि वहां कुछ रिपोर्टर उसके पक्ष में थे औऱ कुछ विपक्ष में। जैसे की वहां दो क्राइम रिपोर्टर थे। दोनों ही तेजतर्रार। एक को वो पसंद करता था, दूसरे को सम्पादक। ऐसे में वो सम्पादक वाले क्राइम रिपोर्टर को कम भाव देता। तो दोनों क्राइम रिपोर्टर भी भिड़ने लगे और एक दिन सुबह तो भयंकर गरमा गरमी हो गई। मुझे कुछ आभाष होने लगा और वो ये था कि ये अखबार के लिए शुभता के संकेत नहीं। अभी अखबार को शुरू हुए ही 15 दिन हुए थे और यहां तो गहमा गहमी स्टाफ में होने लगी।

दिन तो एक एक दिन करके बीत ही रहे थे। पर छन छन कर ये भी बात आने लगीं कि समाचार सम्पादक बदजबान हैं औऱ सम्पादक उतने ही सरल औऱ विनम्र। दोनों की भी आपस में नहीं पट रही। लोग कहने लगे कि ये अखबार तो गया भाई। हालांकि ये इन हाउस बातें थी। शहर में अखबार का रुतबा था। खबरें भी सही थीं। एकदिन अपन भी पल्ले पड़ गए समाचार सम्पादक के। फिर क्या ऊपर से लेकर नीचे तक झाड़ दिया उन्होंने मुझे। खबर क्यों नहीं मिली। क्या करते हो। काम करना है कि नहीं। आदि आदि। बस गाली नहीं दी। मुझे पहली बार ऐसे अनुभव हो रहे थे। उसने मुझे भयंकर डांटा। हालांकि वो मुझसे पहले भी कईयों को डांट चुका था। उसके डांटने के बाद मैं अपनी डेस्क पर खबर लिखने के लिए आय़ा। तो बगल में बैठे क्राइम रिपोर्टर ने मुझे ढांढस बंधाया। उन्होंने मुझे समझाया कि समाचार सम्पादक की बात का बुरा मत मानना। उनका स्वभाव ही है ये। मेरे तो गुरू जी हैं। मैं जो भी हूं आज उनकी बदौलत हूं। मुझे जब सिखाते थे, गाली छोड़कर बात नहीं करते थे। पर देखो आज मैं कहां हूं। यकीनन जो मुझे समझा रहा था वो ग्वालियर के अच्छे अपराध संवाददाताओं में से एक था। उन्होंने कहा कि तुम ज्यादा ध्यान मत दिया करो, जो कहें बस सुन लो औऱ निकल लो। उन्होंने मुझे काफी समझाया क्योंकि मेरा लटका चेहरा उन्हें बता रहा था कि मैं खासा दुखी हूं।

उसदिन ड्यूटी खत्म हुई। मैं घर आय़ा। बगैर कुछ खाए पिए तख्ता पर लेट गया। मुझे सुबह की घटना से नींद नहीं आ रही थी। फिर मुझे रिपोर्टर की सलाह भी याद आ रही थी कि इनकी सुनते जाओ एक दिन इंसान बन जाओगे। पर दरअसल मैं ऐसा व्यक्ति ही नहीं हूं। मेरी जिंदगी में सफलता या भविष्य के सुखद जीवन की खातिर इस तरह की बदजुबानियों से जूझना मुझे कतई मंजूर नहीं था। मेरी फिलॉसफी थोड़ा अलग है। मैं हमेशा से मानता आया हूं जो व्यक्ति आपसे अच्छा व्यवहार नहीं कर सकता, वो अच्छा कैसे हो सकता है। और हम भविष्य के सफल जीवन की कामना के फेर में अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान को बेच दें। मुझे ऐसी सफलता नहीं चाहिए। मेरे पुरखों ने ऐसा कभी सिखाया नहीं। मैंने तय किया कि मैं इस समाचार सम्पादक की गाली तो नहीं सुन सकता। संयोग ये बना कि अगले ही कुछ दिनों में मेरे घर में एक शादी थी और मुझे वहां जाने के लिए अवकाश चाहिए था। मैंने अगले ही दिन जाकर समाचार सम्पादक को ही अवकाश के लिए पत्र दिया। उसने कहा कि मिल जाएगा, पर केवल 2 दिन। हालांकि मैं पहले से ही तय कर चुका था कि मुझे कम से कम 5 दिन बाद आना है।

हालांकि इस बीच दफ्तर में सम्पादक और समाचार सम्पादक का मनमुटाव जग जाहिर होने लगा। मैंने भी यहां दो खबरें नाम से दीं। अपनी बीट की कोई खबर यहां मैं नहीं दे पाया। शादी के लिए निकलूं उससे पहले ही यहां पर एक हादसा मेरे साथ हुआ। एकदिन मुझे कोई समस्यात्मक खबर देनी थी। खबर मैंने दी और खबर में एक वर्जन दिया। दरअसल पुराने अखबार में किसी मुद्दे को लेकर परिचर्चा हो या वर्जन। लोग अपनी पॉकेट में 10 पासपोर्ट साइज फोटो रखे रहते थे परिचितों की। वहीं फोटो अखबार में लगवाकर वर्जन लिख देते थे। मैं भी पुराने अखबार में जनता के वर्जन (बयान) के रूप में वही दस नाम हमेशा लिखा करता था, जो मेरी लिस्ट में थे। अब नए अखबार में था। तो यहां मैंने फिर उसी लिस्ट से एक नाम लिख दिया और बयान अपनी ओर से लिखमारा। हालांकि ये गलत है। पर गलती करते थे हमलोग। इस अखबार में समाचार सम्पादक ने पकड़ लिया। बोला जो वर्जन है। जानते हो। मैंने कहां। कहां रहता है। मैंने कहां फलानी जगह। बोला बात की है। मैंने कहा हां। चलो मिलवाओगे। मैं डरता तो जा रहा था लेकिन कहता भी जा रहा था हां मिलवाऊंगा। पता नहीं अचानक क्या हुआ। वो समझ गया या नहीं। फिर बोला कुछ नहीं। पर सच तो ये था कि उस नाम का कोई व्यक्ति था ही नहीं। तो बात करने का मतलब ही नहीं। छदम नाम था वो। हालांकि फिर मैंने अखबार के संदर्भ में ये गलती नहीं दोहराई।

तो ऐसे शादी के लिए छुट्टी करीब आ गई। शादी के लिए रवाना हुए। घर पहुंचे। मम्मी ने देखा तो शरीर गोश्त छोड़ चुका था। पहले भी रितिक रोशन नहीं थे, पर अब तो हड्डियां ही बची थी। संयोग ऐसा बना कि भयंकर बुखार भी आ गया। घर में बहन की शादी वादी निपटी। फिर हम स्वाथ्य लाभ लेने लगे। मेल वेल का उतना जमाना नहीं था। फोन पर भी शायद हमने बताया नहीं दफ्तर। घर में भी दफ्तर के हाल चाल बताए कि मजा नहीं आ रहा है। मम्मी बोलीं कि छोड़ दो। कहीं और देख लेना। मन तो मेरा भी यही था कि छोड़ दूं। धीरे धीरे तबियत सुधरी तो फिर पहुंच गए ग्वालियर। मम्मी ने कुछ आटे वाटे के लड्डू बनाकर दिए थे, वही खाकर सुबह की मीटिंग के लिए निकल पड़े। संयोग ऐसा बना कि पैदल ही जा रहे थे दफ्तर कि रास्ते में समाचार सम्पादक टकरा गए। औऱ मैं पूरी रास्ते उसी को याद करते हुए जा रहा था कि पता नहीं आज क्या क्या कहेगा। लेकिन पहले ही मिल गए। जनाब सुबह सुबह जलेबी औऱ समोसा पेल रहे थे। अब सामने टकरा ही गए। तो हमने प्रणाम किया। नमस्ते तो किया उसने। काफी ऐंठते अकड़ते हुए बोला शादी हो गई। मैंने कहा हां। फिर बोला कि बड़े दिनों बाद आए हो। हमने बोला तबियत खराब हो गई थी। तो बोला कि गां… में दम नहीं है तो नौकरी कर क्यों रहे हो। यकीन मानिए हम उस खून की उपज हैं कि मेरे घर का कोई भी होता तो वो अबतक जमीन में पड़ा जूते की धूल चाट रहा होता। मेरे दादा जी ने सरकारी नौकरी में एडीओ के पद पर रहते हुए 1956 में बीडीओ और कलेक्टर जैसे अधिकारियों को पटक पटककर मारा था और मजाल क्या कि उन्हें कोई रोक भी दे। यहां तो एक बदतमीज इंसान था। खून तो मेरा खौल गया। मुझे लगा कि कितना बदतमीज इंसान है ये, मैं घर से आय़ा हूं, ये रास्ते में खड़ा है। मेरी तबियत खराब थी। न घर के हालचाल पूछे और न ही मेरी तबितयत के बारे में। सिर्फ अभद्र गाली। मैं उससे कुछ बोला नहीं और दफ्तर की ओर बढ़ गया। रास्ता चलता जा रहा था। मुझे घिन आ रही थी इस व्यक्ति पर जो मेरा अधिकारी था। एक बारगी मुझे लगा कि मैं बोलूं कि आप तमीज से बात करिए, पर मैं ऐसा नहीं कर सका। मैं अगर अपने पिताश्री या अपने किसी परिचित से ये बात बताता। तो इन समाचार सम्पादक की चड्ढी उसके घर पर जाकर ढीली (सबक सिखाना) कर सकते थे। पर मैंने ऐसा नहीं किया। चूंकि मैं भिण्ड का रहने वाला हूं। भिण्ड खुद में ही बड़ा बदनाम नाम है लड़ाई झगड़ों के लिए। ग्वालियर में भी मेरे पिताजी के मित्र अच्छे अच्छे पदों पर थे। मेरे रिलेटिव भी थे। जो किसी भी तरह से इसको सबक सिखा सकते थे। लेकिन पता नहीं क्यों मैंने किसी को बताया नहीं। पर मुझे उस रिपोर्टर पर गुस्सा आ रहा था, जो मुझे उस दिन समझाइश दे रहा था कि सर बोलते तो सख्त हैं पर पत्रकार बना देंगे। मुझे लगा भाड़ में जाए ऐसा पत्रकार। नहीं बनना मुझे ऐसे बदतमीज आदमी के नेतृत्व में पत्रकार। मेरे दादा जी तब थे। मैं सच कह रहा हूं। मैं जिस राजावत परिवार से आता हूं। मैंने जागीरदारी से लेकर, राजनीतिक लाव लश्कर रुतबे का पूरा जीवन देखा अपने घर में। मध्यप्रदेश शासन के कितने ही मंत्री मेरे घर दादा जी से, पिता से मिलने आते। थाने-वानेदार तो लगते ही कहां थे। ये लोग तो अपनी नोटशीट बनवाने के लिए हमलोगों से सिफारिश करवाते थे। क्षेत्र के सांसद हों या विधायक या कोई बड़ा अधिकारी हमारे घर आना जाना था। मैं ऐसे घर में पला बढ़ा और ये एक अदना सा बदजुबान आदमी मुझे गाली दे रहा है। खून खौल रहा था मेरा।

उसको लग रहा था कि ये कोई सामान्य घर का लड़का है, जैसे मैं सबसे बोलता हूं। इससे भी बोल ही लूंगा। इधर मैं दफ्तर में पहुंचा। एक कागज उठाया औऱ इस्तीफा लिख दिया। इस्तीफा वहीं टेबल पर रख वापस घर आ गया। मैं उस नालायक की सूरत नहीं देखना चाहता था, जो खुद को बड़ा पत्रकार मानता था। मैं शुरू से ये मानता रहा हूं कि अगर आप किसी के आत्मसम्मान से खेलते हैं। तो आपको इंसान कहलाने का कोई हक नहीं। यकीनन वो बदतमीज इंसान था। और मुझे ये आभाष हो गया था कि ये इंसान पूरे अखबार को ले डूबेगा और बाद में यही हुआ। पूरे अखबार को बंद कराके खुद भी चला गया था। खैर मैंने रिजाइन दिया तो अगले दिन सम्पादक ने बुलाया। दफ्तर पहुंचा तो पहले वही मिल गया। सामान्य तरीके से बोला कि रिजाइन दे दिया तो मैंने भी सामान्य तरीके से बोला कि जी। मैं काम नहीं कर सकता। बोला ठीक है। वो समझ तो गया था मेरा हावभाव। इसलिए ज्यादा बोला नहीं। अगर आज कुछ बोलता, तो विनम्रता मैं छोड़ देता और उन्हें इतना तो जता ही देता कि तुम दोबारा ऐसी गलती मत करना किसी के साथ। पर वो निकल लिया। अंदर सम्पादक जी ने बुलाया। बड़े प्यार से बोले कि इस्तीफा क्यों दे दिया। मैंने बोला कि सर ये समाचार सम्पादक बहुत उल्टा सीधा बोलते हैं। मैं जब उनसे ये बोल रहा था, वो बहुत मजबूर से लग रहे थे। ऐसा लग रहा था वो भी त्रस्त हैं। बस कुछ कर नहीं पा रहे हैं। कुलमिलाकर यहां से रवानगी हुई। छोड़ दिया। 15 दिन की तनख्वाह ली।

मतलब यही पत्रकारिता का स्वरूप है। जरूरी नहीं कि आपको किसी संस्थान में दोगुनी सैलरी मिले तो वहां का माहौल भी आपके अनुरूप हो। मैं सच कह रहा हूं यहां इस्तीफे के बाद मुझे लग रहा था कि मैं किसी जेल या कारावास से निकल कर आय़ा हूं। मैं उस दौर को याद करता हूं तो मुझे घोर निराशा होती है। वो 15 दिन मेरे जीवन के सबसे बुरे दिनों में से एक थे। आज भी मुझे नफरत हैं उस समाचार सम्पादक से। जो नशेबाज था और शुरूआती दौर में अपराध संवाददाता था, तो उसे अपने पुलिसिया संपर्कों का घमंड भी था। शर्ट की बाहों को कोहनी तक समेटे हमेशा गर्म ही रहता था। मैं अपने जीवन के तमाम घटिया इंसानों में से एक उसे मानता हूं। मुझे नहीं पता जिस इंसान को बात करने की तमीज न हो, किसी को आदर और प्रेम देने की तमीज न हो। वो क्या बेहतर पत्रकार होगा, और क्या ही इंसान होगा। मैंने वो समय भी देखा है कि जब हम पिता जी के साथ मंत्रियों के साथ बैठे रहते थे और एसपी, कलेक्टर बाहर खड़े खड़े इंतजार करते थे और फिर ये व्यक्ति मुझे ऐसे ट्रीट कर रहा था। मेरे दादा जी तो चमड़ी खींच लेते इसकी इसी दफ्तर में आकर। अगर उन्हें पता चलता। पर भैय्या यही पत्रकारिता का सुख है, जो मुझे मिल रहा था। यही पत्रकारिता के अनुभव हैं, जो मैं पा रहा था। आप क्या हैं। वो अलग बात है। दफ्तर की दुनिया को घर से दूर ही रखना चाहिए। पत्रकारिता की दुनिया के हालचाल कभी कभी सोचता था, दादाजी से बताऊं। पर मैं सोचता था कि मेरे दादा जी जो कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। विधायक और सांसदों को तो फटकार देते थे। अधिकारी उनसे राय लेने आते थे। मैं अगर उनसे बताता कि एक व्यक्ति ने मुझे गाली दी। तो उनके लिए शर्म की बात होती। वो शर्मिंदा होते। मैंने इसलिए कभी दफ्तर की दुनिया के बारे में उन्हें बताया नहीं।

मुझे याद आता है कि कैसे मैं स्कूल जाता था, और स्कूल के किसी कार्य़क्रम में विधायक जी मिल गए। मैं 7वीं कक्षा में होऊंगा। एकदम बच्चा। विधायक जी कार्यक्रम छोड़ मेरे पीछे पड़ गए पापा से मिलवा दो। दरअसल उनका टिकट कटने वाला था, पापा ही कुछ करवा सकते थे। मैं ऐसे माहौल में पला बढ़ा। मेरे प्रोफेसर बगैरह अक्सर ये कहते मिलते कि मेरा ट्रांसफर पापा से कहकर रुकवा दो। और एक तरफ मैं यहां कचरा सी नौकरी कर रहा था और दादा जी को लगता गणेश शंकर विद्यार्थी यही है। मुझे कई बार लगता है कि किसी मंत्री से कहलवाकर मुझे किसी सरकारी दफ्तर में क्लर्क हो जाना था। पर पत्रकारिता न करता। हुआ भी एक बार ये। पिता जी मिलने आए थे ग्वालियर। उस समय पापा के दोस्त वीरेंद्र सिंह राणा महारानी लक्ष्मीबाई फिजिकल यूनिवर्सिटी के बोर्ड में थे। पापा मुझे उनसे मिलवाने ले गए। राणा जी मिले तो बोले कि कुछ लड़के हों तो विश्वविद्यालय में क्लर्क के पद खाली हैं। पापा ने कहा ठीक है बताऊंगा। पर पापा को क्या पता कि हमारा बेटा क्या भुगत रहा है। मैं भी संकोच वश मीडिया की स्थिति बता नहीं सका। वरना वो वहीं खत्म करवा देते। लेकिन सच मुझे पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए थी। ये मेरे मिजाज की नहीं। मुझे अपने संपर्कों का लाभ लेना चाहिए था। पर कहते हैं न कि किस्मत में तो पत्रकार बनना ही लिखा था….

तो ऐसे इस अखबार से मुक्ति मिली।

अब कहां जाएंगे अपन अगली कड़ी में। मैं उस दौर को लिखते लिखते अब भी काफी खिन्न हो गया हूं। खैर मिलते हैं अगले सोमवार..। अगली कड़ी में बताएंगे कि कैसे रास्ता चलते दरोगा जी ने मुझे अपनी बेटी से शादी का प्रस्ताव दे दिया और कैसे मुझे अपने लिए पत्नी ढूढ़ने की हूक जागी और शादी डॉट कॉम से कनेक्शन किया। हालांकि रिपोर्टिंग में यहां जब ऐसी तैसी हो रही थी तो डेस्क में झड़े-पुछे बैठे उप सम्पादकों को देख जरूर थोड़ा मन होता कि यार रिपोर्टिंग से ये ठीक है…..हाहाहा

 

नोटः द डायरी आफ अ यंग जर्नलिस्ट मीडिया मिरर के सम्पादक की आत्मकथा के अंश हैं। जो प्रत्येक सोमवार को प्रकाशित होते हैं। ये अंश किताब के रूप में भी आपको पढ़ने को मिलेंगे विस्तार से। आप प्रतिक्रिया देने के लिए मेल कर सकते हैं।

 

 

 

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