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आपकी खबरों में मेरी बहुत तरफदारी नहीं होनी चाहिए”, बोले थे अटल जी

हेमंत शर्मा
अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ पत्रकार हेमंत शर्मा
  • हेमंत शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार 

अटल जी भारतीय राजनीति के ऋषि थे। उनकी लोकप्रियता कभी किसी सीमा की मोहताज नही रही। देश और विदेश की बात तो दूर रही, दुश्मन देश में भी उस लोकप्रियता का कोई मुकाबला नही था। मैने अटल जी को काफी करीब से जाना। उनका स्नेह भाजन रहा। उनसे हमेशा एक अनौपचारिक सा रिश्ता रहा जिसमें कुछ भी कहने या पूछने में कभी हिचक नही महसूस हुई। अटल जी ने भी इस रिश्ते को हमेशा निभाया। कभी कोई औपचारिकता नही आने दी। जो सवाल असहज करने वाले लगे, उनका जवाब चुटकियां लेकर या फिर मुस्कुराहट भरे मौन से दिया और जिन पर बोलना चाहा, कुछ भी शेष नही रखा। मैने अपनी पहली विदेश यात्रा उनके साथ की। पाकिस्तान के इस दौरे में मैने दुश्मन देश में अटल जी की लोकप्रियता का पारावार देखा। वो भी तब जब कारगिल की लड़ाई हो चुकी थी। लोग रास्तों में खड़े होकर उनका अभिवादन कर रहे थे। मैंने उनसे कहा “यहां तो मामला ठीक है। अगर आप पाकिस्तान से भी चुनाव लड़े तो जीत जाएंगे”। अटल जी मुस्कराए और कहा “आप मेरे हितैषी हैं मुझे पाकिस्तान से चुनाव लड़वाना चाहते हैं”।“ हिंदुस्तान के एक नेता की पाकिस्तान की जमीन पर ऐसी लोकप्रियता वाकई अकल्पनीय सी थी।

मैने अटल जी के मिजाज के कई रंग देखे और उन्हें हर रंग में बेजोड़ पाया। ये बात 1999 की है। तब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और अटल जी देश के प्रधानमंत्री। कल्याण सिंह ने किन्हीं विशेष कारणों से पार्टी नेतृत्व के खिलाफ झंडा उठा लिया था। वे अटल जी के भी खिलाफ हो गए। बाद में उन्हें मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ा और रामप्रकाश गुप्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। जब यह विवाद चरम पर था, वाजपेयी जी लखनऊ आए। वे राजभवन में रूके। दोनों में आपकी कटुता इस हद तक बढ़ चुकी थी कि लखनऊ के अखबारों में उस रोज ये कयास भरी खबरें भी छपीं थी कि कल्याण सिंह राजभवन में प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगे या नहीं। अपनी पिछली यात्रा में अटल जी ने मेरी नन्ही बिटिया से मिलने की इच्छा जताई थी। मैं अपनी बेटी को अटल जी से मिलवाने राजभवन पहुंचा। मुलाकात के इंतजार के दौरान ही मैंने देखा कल्याण सिंह अटल जी मिलकर बाहर आ रहे हैं। मेरे लिए ये ‘स्कूप’ था। मैने सोचा कि अब अटल जी मिलूंगा तो खबर पता चलेगी। जैसे ही मैं उनके कमरे में दाखिल हुआ, अटल जी ईशानी को देखकर खुश हो गए। वे उसके साथ खेलने लगे। मैंने उनसे पूछा कल्याण सिंह आए थे। उन्होंने सिर हिलाकर ‘हां’ कहा। क्या बात हुई? मेरे सवाल को उन्होंने अनसुना कर दिया। मैंने दुबारा पूछा अटल जी ने फिर अनसुना किया। दाहिने कान से उन्हें सुनने में कुछ परेशानी थी। वे ‘हियरिंग एड’ लगाते थे। मैंने दूसरी तरफ जाकर जोर देकर पूछा क्या बात हुई, कल्याण सिंह से? आपसे क्या शिकायत है उन्हें? अटल जी ने अपनी सदरी की जेब में हाथ डाला और ‘हियरिंग एड’ निकाल कर मुझे दिखाते हुए बोले- “मैंने तो कुछ सुना ही नहीं। मेरी मशीन जेब में थी।“ अप्रिय बात न सुनने की यह भी एक अटल शैली थी।

अटल जी कभी कभी ऐसी बातें कर जाते थे जो राजनेताओं के लिए हमेशा से अकल्पनीय रही हैं। ये उस वक्त की बात है जब लखनऊ से फिल्मकार मुजफ्फर अली, अटल जी के खिलाफ चुनाव लड़ रहे थे। उनके लिए कई फिल्मी हस्तियां प्रचार कर रही थीं। खूब जनता जुटती थी। भीड़ को देखकर अटल जी के कैंप में चिंता की लकीरें उठने लगी थी। मैंने इस बीच एक रिपोर्ट लिखी। रिपोर्ट में साल 1950 में हुए लखनऊ के मेयर चुनाव का हवाला दिया गया था। उस वक्त लखनऊ के मशहूर हकीम शमशुद्दीन मेयर पद के प्रत्याशी थे। उनका बड़ा रसूख था। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए कुछ मजा लेने वाले तत्वों ने जिनमें कुछ समाजवादी भी थे, उनके खिलाफ दिलरूबा नाम की एक तवायफ को खड़ा कर दिया। प्रचार में ठुमके लगने लगे। युवाओं की भीड़ उमड़ने लगी। लगा हकीम साहब चुनाव हार जाएंगे। तभी लखनऊ के प्रमुख शहरियों ने अमृत लाल नागर के नेतृत्व में नारा दिया ‘दिल दीजिए दिलरूबा को वोट शमशुद्दीन को’। मामला पलटा, हकीम साहब चुनाव जीत गए। मेरे जमीनी सोर्स लगातार मुझे रिपोर्ट दे रहे थे कि कुछ ऐसी ही स्थितियां अटल जी के सामने भी थीं। खबर पढ़कर अटल जी ने मुझे फोन किया। कहने लगे- “गजब, आपने यह कहानी ढूंढकर हमारे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा दिया है। जो भीड़ से परेशान हो रहे थे। बहुत धन्यवाद।“ मैंने कहा- अटल जी इसमें धन्यवाद कैसा? जो पाया, वही लिखा। इसके बाद मैंने एक और रिपोर्ट लिखी जिसमें तमाम समीकरणों और जमीनी स्थितियों के मद्देनजर अटल जी की जीत को पक्की बताया गया था। एक रोज अटल जी ने मुझे बुलाया और कहा- “दिल्ली में आपकी विश्वनीयता बहुत है। कहीं ऐसा ना हो मेरे पक्ष में छपने वाली इन रिपोर्ट से आपकी निष्पक्षता खतरे में पड़े। आप उसका ध्यान रखें। चुनाव आते जाते रहेंगे। मैं आपमें बहुत संभावना देखता हूं। आपकी खबरों में मेरी बहुत तरफदारी नहीं होनी चाहिए”। मैं सन्न और आवाक था। पहली बार कोई राजनेता ऐसा मिला जो कह रहा है आप मेरे हक में ज्यादा न लिखें। आज तो किसी के खिलाफ लिखें तो सामने वाला दुश्मनी मान लेता है।

हाजिरजवाबी में वाजपेयी जी का कोई सानी नहीं था। कई बार मुश्किल से मुश्किल सवाल को वे अपनी वाकपटुता से उड़ा देते थे। संसद के अंदर हो या बाहर उनकी वाकपटुता की रपटीली राह पर न जाने कितने फिसल कर गिरे। भारतीय जनता पार्टी में हमेशा वाजपेयी को उदार चेहरा माना जाता था। मंदिर आंदोलन को लेकर पार्टी में दो धड़े थे। मंदिर को लेकर तो सहमति थी पर आंदोलन के तरीके को लेकर दो राय थी। इसी मुद्दे पर वाजपेयी जी से एक बार यह सवाल पूछा गया कि भाजपा में एक नरम दल है और एक गरम दल। एक के नेता आप हैं दूसरे के आडवाणी जी। वाजपेयी जी ने फौरन जवाब दिया- मैं किसी दलदल में नहीं हूं। मैं तो औरों के दलदल में अपना कमल खिलाऊंगा। सवाल हवा में उड़ गया।

मुश्किल मुद्दों के ऐसे जाने कितने अवसर आए जब वाजपेयी जी अपनी हाजिरजवाबी से उससे निकल लिए। शादी न करने पर वाजपेयी जी का जवाब बड़ा चर्चित है। उन्होंने एक बार कहा मैं अविवाहित जरूर हूं पर (पॉज़ लेकर) कुवांरा नहीं हूं। एक महिला पत्रकार उनके कुंवारे रहने के रहस्य को लेकर बेहद उत्सुक थीं। कई बार के प्रयास के बाद उन्होंने अटल जी से सीधा सवाल पूछ ही लिया- “वाजपेयी जी, आप अब तक कुंवारे क्यों हैं”? वाजपेयी जी रूके, उन्हें घूरा। फिर बोले… “आदर्श पत्नी की खोज में।” महिला पत्रकार वहीं नहीं रूकीं। उन्होंने दुबारा सवाल किया, क्या वह मिलीं? वाजपेयी ने अपने अंदाज में फिर थोड़ा रूककर जवाब दिया- “मिली तो थीं पर उन्हें भी आदर्श पति की तलाश थी”। असहज करने वाला यह सवाल ठहाकों की बलि चढ़ गया।

1993 में हिमाचल प्रदेश में चुनाव थे। कानपुर के जेके सिंघानिया कंपनी के एक छोटे जहाज से वाजपेयी जी का दौरा था। साथ में बलबीर पुंज और एकाध लोग और थे। जहाज को धर्मशाला पहुंचना था। वाजपेयी जी जहाज में बैठते ही सो जाते थे। तभी विमान के को-पायलट कॉकपिट से बाहर निकले और पुंज जी से पूछा- “क्या आप पहले धर्मशाला आए हैं”। बलबीर पुंज ने पूछा लेकिन आप यह सब क्यों पूछ रहे हैं। पायलट ने थोड़ी लाचारी बताते हुए कहाकि हमारे पास दूसरे विश्वयुद्ध का नक्शा है। ए.टी.सी से संपर्क नहीं हो पा रहा है और धर्मशाला ऊपर से दिख नहीं रहा है। पुंज जी घबरा गए, कहा- ध्यान रखिए कहीं गलती से हम चीन की सीमा में ना पहुंच जाएं। तभी वाजपेयी जी की नींद खुली, पूछा- “सभा का समय हो रहा है। हम कब उतरेंगे? सहयोगी ने तात्कालिक समस्या बताई। वाजपेयी जी ने चुटकी ली। यह तो बहुत बढ़िया रहेगा। खबर छपेगी। ‘वाजपेयी डेड’। गन कैरेज में जाएंगे। हालांकि उनकी इच्छा के अनुसार उनकी अंतिम यात्रा ‘गनकैरेज’ में ही हुई। घबराए पुंज जी बोले, “आपके लिए तो ठीक है मेरा क्या होगा”। वाजपेयी जी ने मजे लेते हुए कहा “यहां तक आए हैं तो वहां भी साथ चलेंगे”। माहौल को हल्का करने के लिए वे फिर बोले जागते हुए अगर ‘क्रैश’ हुआ तो बहुत तकलीफ होगी। इतना कह कर वे दुबारा सो गए। सभी साथी सदमे में थे। बाद में एक दूसरे जहाज से संपर्क हुआ। और अटल जी का जहाज जहाज सकुशल कुल्लू में उतरा।

अटल जी सोलह वर्ष तक लखनऊ में सांसद रहे और मैं उस दौरान वहां जनसत्ता का राज्य संवाददाता। तब जनसत्ता खूब पढ़ा जाने वाला अखबार था। देश में उसका असर और रसूख था। 24 घंटे वाले समाचार चैनल शुरू नहीं हुए थे। वाजपेयी जब लखनऊ में होते तो मुझसे जरूर बात करते। मैं उनका मुंहलगा था। 1991 का चुनाव था। मैं वाजपेयी जी के साथ पूर्वी उत्तर प्रदेश के दौरे पर था। लखनऊ से सुल्तानपुर, गाजीपुर, गोरखपुर में सभाएं करते हुए बनारस पहुंचना था। हमारे पास पुराना डकोटा जहाज था और जहां जहां उतरना था सब जगह दूसरे विश्वयुद्ध की बनी निष्क्रिय हवाई पट्टियां थीं। लखनऊ से उड़ते ही वाजपेयी जी से अखबार के लिए बातचीत शुरू हुई। मंदिर आंदोलन का माहौल था। वाजपेयी जी उसके तरीके से खुश नहीं थे। मैंने पूछा- आपको नहीं लगता कि पार्टी में आपको ‘मार्जिनिलाइज’ करने की कोशिश हो रही है। हंसते हुए बोले- कभी कभी ‘करेक्शन’ के लिए ‘मार्जिन’ का इस्तेमाल करना पड़ता है। मेरी एक बुरी आदत है। सबसे साथ आनंद लेने की। वाजपेयी जी मुझे इसकी छूट देते थे। वे मेरी बातों से आनंदित भी होते थे। हमारी बातचीत चल ही रही थी कि जहाज के कॉकपिट से पायलट महोदय आए और एक ‘ट्रे’ हमारे सामने की, जिसमें लौंग, इलायची और कुछ चॉकलेट रखी थी। मैं पायलट महोदय को कुछ बोलने ही वाला था कि वो इस बातचीत में रसभंग ना करें तभी अटल जी ताड़ गए। उन्होंने बीच में ही रोका, ‘इन्हें पहचानते हैं आप’ मैंने कहा- नहीं (हालांकि मैंने मन में सोचा पायलट होंगे)। वाजपेयी जी ने परिचय कराते हुए बताया “ये विजयपत सिंघानिया हैं”। मैं सकते में आ गया। मशहूर उद्योगपति विजयपत सिंघानिया। वह जहाज भी जे.के. समूह का ही था। और उसके मालिक विजयपत जी उसे खुद ही चला रहे थे। मैंने उनका अभिवादन किया और मन ही मन वाजपेयी जी का आभार कि उन्होंने बचा लिया। अटल जी की यही खूबी थी कि वे परिस्थितियों को तुरंत भाप लेते थे।

भीड़ से तुरंत संवाद स्थापित करना कोई उनसे सीखे। सभा में उनकी वाकपटुता तो थी ही वे भीड़ से तुरंत संवाद कायम कर लेते थे। 2004 में पटना में उनकी एक चुनाव सभा थी। भाषण का शुरूआती वाक्य ही था-“मैं अटल भी हूं और बिहारी भी हूं” इस एक वाक्य से उन्होंने मजमा लूट लिया था। उनके कुछ ऐसे भी किस्से हैं जिससे उनके विनोदी स्वभाव का पता चलता है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में दलित अत्याचार की घटनाएं हो गई थीं। वाजपेयी इन घटनाओं के खिलाफ राज्य में पदयात्रा पर निकले थे। अप्पा घटाटे वाजपेयी जी के मित्र थे। पेशे से वकील घटाटे ही वाजपेयी के नामांकन से लेकर उनके सारे विधिक कार्य करते थे। अप्पा घटाटे ने वाजपेयी जी से पूछा, यह पदयात्रा कब तक चलेगी। वाजपेयी जी ने मजाकिया लहजे में कहा जब तक पद नहीं मिलता यात्रा चलती रहेगी। यह था उनका ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’। वाजपेयी जी के धुर विरोधी भी अक्सर उनकी तारीफ में कहते थे कि वाजपेयी जी तो अच्छे आदमी हैं पर गलत पार्टी में हैं। इसके जवाब में वाजपेयी जी कहते- “अगर मैं अच्छा आदमी हूं तो गलत पार्टी में कैसे रह सकता हूं और अगर गलत पार्टी में हूं तो अच्छा आदमी कैसे हो सकता हूं। अगर फल अच्छा है तो पेड़ खराब नहीं हो सकता”।

अटल जी के भीतर भवितव्यता का अनुमान कर लेने वाली सहज बुद्धि मौजूद थी। इसका भी मुझे परिचय मिला। यह बात जुलाई 1995 की है। भाजपा में इस बात को लेकर पसोपेश था कि अटल जी के नेतृत्व में चुनाव हो या आडवाणी को आगे कर। पुणे में हुई कार्यसमिति की बैठक में अटल जी पार्टी के अध्यक्ष तो चुने गए। पर पार्टी किसके चेहरे पर चुनाव लड़े इस बात पर भीतर भीतर बहस चल रही थी। अटल जी को इस बहस का अहसास था कि कुछ लोग आडवाणी को नेता बनाना चाहते हैं। तब तक आडवाणी मंदिर आंदोलन के हीरो हो चुके थे। उसी दिन शाम की रेसकोर्स की सार्वजनिक सभा में वाजयेपी अपने चुंबकीय व्यक्तित्व के साथ मंच पर थे। उनकी आवाज का संगीत सभा पर छाया था। आरोह-अवरोह। दो शब्दों के बीच नाटकीय विराम के साथ आंख मूंदना और फिर चीरने वाली नजरों से देखना। शायद इन्हीं वजहों से वाजपेयी जी का भाषण सुना नहीं, देखा जाता था। एक झटके में वाजपेयी ने कहा “कुछ लोगों को लग रहा है मैं थक गया हूं। कुछ समझते हैं कि मैं रिटायर हूंगा। मैं ना ‘टायर्ड’ हूं ना ‘रिटायर’ होने जा रहा हूं। चलिए आडवाणी जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा। हम आगे बढ़ेगे”। यह अटल जी का अपनी बात कहने का अंदाज था। विवाद खत्म हो चुका था। मगर असर ये था कि शाम को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आडवाणी जी को कहना पड़ा कि चुनाव अटल जी के नेतृत्व में होगा। 1996 में चुनाव अटल जी के नेतृत्व में हुआ। अटल जी प्रधानमंत्री बने।

अटल जी से जुड़ी यादें, किस्से सब जीवन दर्शन की तरह हैं। राजनीति में रहते हुए भी इतना सुलभ, सरल और सहज रह पाना उनके ही जीवन शिल्प का हिस्सा था। अपने सिद्धांतों पर अड़िग रहना और फिर भी कटु न होना, द्वेष न पालना, प्रतिद्वंदिता के युद्ध न करना, ये सब उनकी ही विरासत के अवशेष हैं जो उनके बाद अब दुर्लभ हो चले हैं। उनकी हाज़िर जवाबी गुदगुदाती थी। बांध लेती थी। जो एक बार उनसे मिलता था, उनका होकर रह जाता था। वे रिश्ते कमाते थे। मानवीय सम्बन्धों का अर्जन करते थे। इन नातों का कोई ओर छोर नही था। जितने अपनी विचारधारा के संगी साथ थे, उतने ही गैर सोच वाले भी हमराह थे। अटल जी अपने आप मे एक विलक्षण राजनीतिक संस्कृति थे। ऐसी संस्कृति समय के पटल पर हमेशा अविस्मरणीय रहेगी

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