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पत्रकारिता में इंटर्नशिप औऱ बेहतर करियर की बातें

प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर
  • मीडिया के छात्र इंटर्नशिप के लिए क्या करें, कहां जाएं

प्रशांत राजावत- सम्पादक मिरर 

 

कुछ दिन पहले किसी का संदेश आया कि मैं अपनी बेटी को पत्रकारिता की पढ़ाई करवा रहा हूं। कितना उचित है ये। उनके इस प्रश्न पर मैंने मिरर पर एक आलेख लिखा और निश्चित रूप से आलेख में उन सब बातों का जिक्र किया कि पत्रकारिता में अब कुछ रहा नहीं। न बेहतर जीवन शैली है, न मिशन है और न ही सैलरी। मैं ही क्या किसी भी पत्रकार से आप बात करेंगे तो वो भी यही बताएगा। मैंने कुछ नया नहीं बताया।

मुझे पता है लाखों रुपए लगाकर जो बच्चे मीडिया की पढ़ाई कर रहे हैं वो मीडिया के बारे में नकारात्मक बातें पढ़कर व जानकर हतोत्साहित होते होंगे। पर झूठ बेचकर आपको प्रोत्साहित करना भी गलत ही तो है। मतलब वो तो यही होगा हम तो फंसे ही आपको भी फंसा देंगे। बहरहाल कुछ समय पहले भी मुझसे किसी मीडिया छात्र ने कहा था कि मीडिया में अच्छा क्या है। इसकी चर्चा की जाए। क्योंकि मुझे इसी में करियर बनाना है। मेरे पास कोई विकल्प नहीं है। कल भी एक किसी लड़की का संदेश आया कि सर मुझे पत्रकारिता ही करना है। मेरे पापा का सपना है। एक पिता ने भी बोला कि मेरा भी सपना है कि मेरी बेटियां पत्रकार बनें।

ऐसे में हमने अपने सीमित ज्ञान को सहेजकर यहां ये बताने की कोशिश की है कि आखिर जब कालकूट पी ही लिया है तो गले में रोककर जिया कैसे जाए।

देखिए पत्रकारिता कोई विरला क्षेत्र नहीं है जहां भ्रष्टाचार, शोषण, चापलूसी, राजनीति पतनशीलता आदि आदि हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है. जहां ये सब न हो। फिल्म जगत। हम जो रंगे चुने अभिनेता और अभिनेत्रियों के चेहरे देखते हैं मुस्कुराते हुए। दरअसल उस मुस्कुराहट के पहले कितने दुख देखें हैं। उनका एहसास भी नहीं होगा। कल ही अदिति राव हैदरी ने कहा है कि किसी के साथ सोने से मना कर दिया था तो 8 महीने कोई काम ही नहीं मिला। बहुत करप्शन है बॉलीवुड में। गैंगबाजी है। राजनीति है। सिंगर्स के बीच में भी राजनीति है। जो सिंगर्स कैंम्प से नहीं जुड़ा उसे कोई काम ही नहीं मिल रहा। सोनू निगम ने यही आरोप लगाए हैं।

क्रिकेट जगत। क्रिकेट में तो भरपूर राजनीति है। शोषण भी है। भ्रष्टाचार तो है ही। अजहर, जड़ेजा जैसे लोगों की कहानियां किसे नहीं पता। अच्छे अच्छे खिलाड़ी कब बाहर हो जाते हैं। पता नहीं चलता। वहीं जो बकवास खेल रहे हैं उन्हें मौका मिलता है। क्रिकेट पर समय समय पर बयानबाजी होती ही है। सिलेक्टर्स बहुत राजनीति करते हैं। नेताओं की भी खूब चलती हैे।

मेरा मतलब कोई फील्ड है ही नहीं जहां सब सामान्य हो। सेना में भी हद दर्जे तक कमीनापन औऱ भ्रष्टाचार है। अभी ही मैं किसी रिपोर्ट को पढ़ रहा था जिसमें पैरामिलेट्री के जवान कह रहे थे कि उनके अधिकारी बगैर गाली के तो बात ही नहीं करते। बहुत बुरा बर्ताव करते हैं। सेना में आम बात है कि बड़े अधिकारी कुत्तों जैसा बनाकर रखते हैं जवानों को। पर मजाल क्या आपने मुंह खोला। तुरंत कोर्ट मार्शल। चूंकि सेना देश की प्रहरी है और उनके खिलाफ जाना राष्ट्रवाद के खिलाफ जाना है। इसलिए उनकी रिपोर्टिंग कम ही होती है। वरना अफस्पा क्षेत्रों में सेना ने क्या गुल खिलाए किसे नहीं पता।

मेरा मतलब पत्रकारिता कोई अनोखा क्षेत्र नहीं। इंफोसिस, रिलायंस, अडानी, यहां तक कि गूगल औऱ फेसबुक जैसी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में भी शोषण, करप्शन और चापलूसी, राजनीति है। सही कह रहा हूं। गूगल ने पिछले दिनों ही अपने एक कर्मचारी को शोषण के आरोप में बर्खास्त किया था। हालांकि उसको एक्जिट अलाउंस दिया गया। फेसबुक के कैलीफोर्नियां दफ्तर से एक कर्मचारी ने बड़ा भावुक पत्र लिखा था कि यहां पैसा तो है पर उसके सिवा कुछ नहीं। 16-16 घंटे रोज काम, काम का दबाव, भयंकर राजनीति, ठीक से सोने के लिए भी वक्त नहीं है। इस कर्मचारी ने पत्र में लिखा था कि वो भारत लौटना चाहता है और कहीं कम पैसों की जॉब करना चाहता है जहां उसे कम पैसे मिलें पर जीने की आजादी हो। वो ठीक से सो सके, फिल्में देख सके औऱ जिम जा सके।

भारत में आप अक्सर देखते होंगे कि आईआईटीज के लड़कों का चयन बड़ी सैलरी पर होता है। अब उनसे जाकर पूछिए कि सैलरी तो है पर जीवनशैली क्या है। सबकुछ सामान्य नहीं होता। दिल्ली के एक बड़े बैंक में पीओ की जॉब करने वाली एक कर्मचारी ने मुझे बताया था कि दिल्ली के कनाट प्लेस मुख्यालय में जब हमारी बैठक होती है तो लेडी बॉस मां बहन की गालियां बैठक में देती हैं। सुनकर रोना आ जाता है। जबकि इन कर्मचारियों की लाइफ स्टाइल देखेंगे तो लगेगा वाह क्या जीवन है। उस कर्मचारी ने बताया कि एक बार मैं सही से काम नहीं कर पाई तो बैंक ने 6 करोड़ रुपए गिनने की सजा दी। हाथ से 6 करोड़ रुपए सुबह से रात तक गिनकर बुरा हाल हो गया था। जबकि बैंकों में पैसे मशीन से गिनने की प्रक्रिया है।

मैं वही कह रहा हूं कि हो सकता है बड़ी सैलरी, मुंबई या दिल्ली में जॉब, अच्छे कपड़े, महंगी गाड़ियों में घूमने वालों को देखकर आप सोचें वाह क्या जीवन है। पर उसके दिल से पूछिए क्या औऱ किस तरह ये जीवन मेंटेन हो रहा है।

खैर अपन काम की बात करते हैं। आखिर पत्रकारिता में कैसे कुछ सैटल किया जाए। शुरुआत पत्रकारिता के छात्रों से। देखो भाइय़ों मीडिया तो खत्म होने से रहा। जबतक पृथ्वी है तब तक मीडिया खत्म नहीं होगा। हां पहले रेडियो चलता था। अब रेडियो खत्म है लगभग। फिर अखबार आए। अब कहा जा रहा है कि अखबार खत्म हो जाएंगे। फिर टीवी चैनल आए। अब डिजिटल मीडिया का युग है। हालांकि अखबार अभी 25-30 वर्ष तो बंद होने वाले हैं नहीं। बाकी टीवी चैनल और डिजिटल चलते ही रहेंगे। अगर मीडिया के ये उपक्रम चलते रहेंगे तो रोजगार की संभावना बनी रहेगी।

अब आते हैं पहले मुद्दे पर।

इंटर्नशिप। पढ़ाई पूरी होने के बाद छात्र सबसे ज्यादा परेशान इंटर्नशिप के लिए होता है। जायज भी है। हालांकि कुछ मीडिया संस्थान इंटर्नशिप का जुगाड़ कर देते हैं। वैसे आजकल ज्यादा अखबार औऱ चैनलों के मीडिया कॉलेज भी हैं। तो कोशिश कीजिए कि यहां से पढ़ें। ऐसी स्थिति में इंटर्नशिप के लिए तो कम से कम नहीं भटकना पड़ेगा। इंटर्नशिप पाने का दूसरा जरिया हैं आपके कॉलेज के पूर्व छात्र या सीनियर छात्र। उनसे लगातार संपर्क बनाकर रखिए। ये आपके काम आएंगे। एक बात हमेशा याद रखिए मीडिया में संपर्क ही सबकुछ है। माना कि आप पहले वर्ष के छात्र हैं। आपका सीनियर जो कि फाइनल इयर का छात्र है। जब आप फाइनल में पहुंचेंगे वो 2 साल इंडस्ट्री में काम कर चुका होगा। अगर आपके उससे पहले के संबंध हैं। तो वो आपकी इंटर्नशिप में मदद कर सकता है।

दूसरी बात

इंटर्नशिप के लिए छात्र बेहद परेशान रहते हैं। जबकि इतना परेशान होने की जरूरत नहीं। एक सबसे आसान प्रक्रिया है। वो ये कि जिस संस्थान में इंटर्नशिप करना चाहते हैं उस संस्थान के सम्पादक के नाम प्रार्थना-पत्र लिखिए और पत्र को अपने कॉलेज या विश्वविद्यालय के एचओडी से फॉरवर्ड करवाइए। जो कि आपका कॉलेज रिकॉर्ड भी मेंशन करें। यही पत्र आप सम्पादक को देकर आइए। कई बार क्या होता है। छात्र बेचारे इंटर्नशिप के लिए मीडिया हाउसेस में जाते तो हैं पर बॉयोडाटा लेकर और वो बॉयोडाटा रिशेप्सन में देकर खानापूर्ती कर देते हैं। और जैसे ही छात्र रिशेप्सशन से मुड़ता है वो रिशेप्सनिस्ट आपके बॉयोडाटा को कचरे के डिब्बे में मोड़कर डाल देता है। क्योंकि आपका बॉयोडाटा उसके लिए कचरा ही है। उसे इंटर्नशिप क्या जंजाल है पता ही नहीं होता। इसलिए सिर्फ बायोडाटा न बनाएं। जैसे मैंने बताया एक प्रार्थना-पत्र बनाएं। उसमें आपके एचओडी की दस्तखत वाला आपके कॉलेज के रिकॉर्ड को बताता पत्र भी संलग्न हो। फिर आप मीडिया हाउसेस में जाकर सीधे सम्पादक से मिलने का समय मांगे। रिशेप्सनिस्ट ही वो समय दिलवाएगा। एक दिन में नहीं तो 10 दिन में समय जरूर मिलेगा। सम्पादक से मिलें। साफ सुथरे कपड़े। एक फाइल में बॉयोडाटा व प्रार्थना पत्र, एचओडी का पत्र। सम्पादक जी को पूरी बात बताएं औऱ अपनी फाइल से निकालकर बॉयोडाटा व प्रार्थना पत्र दें। साथ ही ये भी बताएं कि आपने उनके ही संस्थान को क्यों चुना है सीखने के लिए। उदाहरण के तौर पर भास्कर में जाएं। तो भास्कर का इतिहास खंगालकर जाएं। उपलब्धियों का जिक्र करें। ये एक बेहतर तरीका है। पर बहुत कम लोग ऐसा करते हैं।

इंटर्नशिप जब शुरू हो जाए तो क्या करें….

छात्र कॉलेज से निकलने के बाद भी अपनी बचकानी हरकतें वहां छोड़कर नहीं आते, ये एक बड़ी समस्या है। मुझसे अक्सर कई सम्पादक ये शिकायतें दर्ज कराते हैं कि इंटर्नशिप के लिए जो बच्चे आते हैं। वो गंभीर नहीं दिखते। उनमें कामकाज को लेकर बहुत उत्साह नहीं दिखता। ऐसा लगता है खानापूर्ति कर रहे हों। बैग उठाया आए और यहां इंटरनेट में यहां वहां की चीजें देखीं। कान में लीड लगाए घूमते रहते हैं। ये शिकायते आम हैं।

जबकि इंटर्नशिप वाले बच्चों को ध्यान रखना चाहिए कि इंटर्नशिप सिर्फ प्रशिक्षण नहीं है। हकीकत तो ये है कि इंटर्नशिप से ही नौकरी का बेस तैयार होता है। अगर आप बेहतर प्रशिक्षु साबित होते हैं तो अक्सर यही होता है कि आपको उसी संस्थान में काम मिल जाता है। जहां आप इंटर्नशिप कर रहे हों। बड़ी बड़ीं कंपनियों में जो अच्छे इंटर्न होते हैं। वो इसी बात को आधार बनाकर जाते हैं कि हमें इंटर्नशिप के बाद यहीं काम भी मिल जाए औऱ मिल भी जाता है। क्योंकि जरूरत तो हर संस्थान को अच्छे कर्मचारियों की होती है। आप अगर अच्छे इंटर्न हैं। व्यवहार अच्छा है। काम बढ़िया से सीख गए। तो कंपनी चाहती है और वरिष्ठ कर्मचारी भी कि ये इंटर्न ही यहां रुक जाए। जब आप किसी संस्थान में इंटर्नशिप करें तो कपड़ों का विशेष ध्यान रखें। फॉर्मल कपड़े पहनें। मस्तीजादे टाइप न लगें। व्यवहार बहुत अच्छा रखें। कंपनी के सभी कर्मचारियों से विनम्रता से बोलें। कंपनी में कोई भी आपको कुछ काम दे। कभी न मत बोलें। यही सब देखा जाता है। इंटर्नशिप में आपके पहनावे, व्यवहार से लेकर चाल चलन की परख होती है। काम तो सेकंड्री है। इंटर्नशिप के दौरान भूलकर भी दफ्तर में लेट न पहुंचे। औऱ जो समय आपको दिया गया है उससे ज्यादा काम करें। दफ्तर के शीर्ष अधिकारियों से प्रतिदिन बताकर ही दफ्तर से निकलें। उनसे जुड़ने की कोशिश करें। जो सबसे प्रमुख बात है वो ये कि दफ्तर के कम्प्यूटर सेट में जो आपको काम दिया गया है उसके सिवाय भूलकर भी कुछ न देखें। बिल्कुल नहीं। कानों में लीड लगाकर दफ्तर में न घुसें।

आमतौर पर इंटर्नशिप के लिए औऱ वो भी मीडिया में इंटर्नशिप के लिए बहुत विकल्प हैं। पर थोड़ा मेहनत कीजिए। मीडिया के जिस माध्यम में जाना है। जैसे टीवी, अखबार या डिजिटल। इंटर्नशिप भी उसी में कीजिए। चैनलों को लेकर थोड़ी बाध्यता जरूर है कि चैनल सभी दिल्ली एनसीआर में हैं। लेकिन रीजनल चैनलों में भी इंटर्नशिप की जा सकती है। जो राज्यों की राजधानियों में हैं। वहां आसानी से इंटर्नशिप मिल जाती है। अखबारों में इंटर्नशिप सबसे सरल है। और अखबारों में इंटर्न बनने के लिए जरूरी नहीं दिल्ली में सीखें। किसी भी बड़े अखबार के किसी जिला संस्करण में भी चाहें तो आप बेहतर सीख सकते हैं। अखबारों में सीखने के लिए कुछ ऐसा नहीं जो दिल्ली में हो और जिला स्तर पर न हो। पेज बनाना और हिंदी टायपिंग बस यही। बांकी जिला संस्करणों में भी एडीटर, न्यूज एडीटर, डिप्टी न्यूज एडीटर होते हैं। हर जगह आप काम सीख सकते हैं। हां जैसे मैंने वही कहा न कि आप जहां से इंटर्नशिप करते हैं वहां जॉब की संभावनाएं बनती हैं। तो कोशिश कीजिए कि किसी बड़े अखबार को ही चुनिए और कम से कम किसी राज्य की राजधानी का दफ्तर तो हो ही। राजधानियों के दफ्तरों का माहौल थोड़ा उत्साह तो बनाकर रखता ही है।

 

नोटः अगले चरण में मीडिया में नौकरी की बात करेंगे। इंटर्नशिप के लिए प्रार्थना-पत्र कैसे बनाएं इस पर भी किसी कड़ी में चर्चा करेंगे। और एक प्रमुख बात ये कि सोशल मीडिया में आपकी मौजूदगी का क्या फर्क पड़ता है नौकरी और इंटर्नशिप में। इस पर चर्चा जरूर करेंगे। सोशल मीडिया में आपको किस तरह रहना है इस पर चर्चा करेंगे। आप सिर्फ इतना जनिए कि आड़ा-तिरछा मुंह बनाकर खींची गई एक सेल्फी जो आपके ह्वाट्सएप डीपी में है। आपको इंटर्नशिप से बाहर करा सकती है।  फिलहाल आज इंटर्नशिप तक ही ठीक है। वरना आलेख लम्बा हो जाएगा। जल्द ही अगला हिस्सा। इस आलेख से जुड़ी कोई जिज्ञासा हो तो 99583-77353 पर ह्वाट्सएप संदेश भेज सकते हैं। 

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