Home > रचनाकर्म > पत्रकारिता को लेकर मैं सकारात्मक क्यों नहीं?

पत्रकारिता को लेकर मैं सकारात्मक क्यों नहीं?

बीबीसी
घटना पर व्यंग करता बीबीसी के कीर्तीश भट्ट का कार्टून

बीते सप्ताह नॉएडा में न्यूज़ चैनल की एंकर राधिका कौशिक आत्महत्या कर लेती हैं। बीते एक वर्ष में वैसे ये किसी महिला पत्रकार की तीसरी आत्म हत्या है। आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ। रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर की 2018 की अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आ गयी है, जिसमे कहा गया है की भारत पत्रकारों के लिए 5 वां ख़तरनाक देश है, पर आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ। etv हैदराबाद से एंकर रूमाना को सिर्फ इसलिए संस्थान ने निकाल दिया क्योंकि उसने अपने बॉस द्वारा किये जा रहे यौन उत्पीड़न का विरोध किया और शिकायत की थी। और आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ। रूमाना के पत्र पढ़िये। भड़ास में, मिरर में हर जगह है। कितनी उम्मीदें पालकर गयी थी जॉब करने। बहुत पुराना मामला नहीं है, पिछले माह की ही बात है। उसने किसे पत्र नहीं लिखे। राष्ट्रपति, महिला आयोग, प्रधानमंत्री, महिला बाल विकास मंत्रालय। क्या हुआ। वो बॉस जमा हुआ है और रूमाना हटा दी गयीं। आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ।
देश के सबसे बड़े अख़बार दैनिक भास्कर का प्रधान सम्पादक दफ़्तर में ही आत्महत्या कर लेता है। दूसरी ओर इसी मामले में महिला पत्रकार सलाखों के पीछे है। वजह अबतक अज्ञात है। आप को सब सामान्य लगता है। आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ।
हर तीसरे दिन एक मीडिया स्टूडेंट रुवासा होते हुए सन्देश भेजता है मुझे कि सर कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो गयी, नौकरी तो दूर इंटर्न शिप नहीं मिल रही और आप कहते हैं सकारात्मक रहूँ।
दिल्ली में बैठे उप सम्पादक स्तर के पत्रकार चतुर्थ क्लास सरकारी नौकरी के लालायित हैं और आप कहते हैं सब सामान्य है।
टेलीग्राफ, भास्कर जैसे ब्रांड अपने एडीशन खत्म कर रहे हैं। दिल्ली में प्रयुक्ति जैसे अख़बार कंगाल हो रहे हैं, मालिक भूमिगत है, समाचार प्लस का मालिक जेल में है। उत्तर भारत के पत्रकार को सरकार के खिलाफ बोलने पर जेल में ठूस दिया गया। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार खशोगी को तुर्की दूतावास के अंदर ही मार डाला गया।और आप कहते हैं। मैं पत्रकारिता को लेकर सकारात्मक रहूँ।
दिल्ली की मीडिया में हर 5वीं लड़की शोषित है। जब ज़बान खोलती है तो मीटू में अकबर, दुआ जैसे महारथी फंसते हैं। तहलका के सम्पादक यौन शोषण में जेल में है, अकबर सरकार से बर्खास्त हो गया। आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ।
सपनों को पूरा करने दिल्ली आये मीडिया छात्र वर्षों से 10 से 12 हजार की मजदूरी कर रहे हैं अख़बारों में, जो न्यूनतम मजदूरी भी नहीं है। और आप कहते हैं की सब ठीक है।
मजीठिया वेज में सरेआम पत्रकारों से संस्थान पहचान पत्र छीन लेता है, और बदले में अख़बार के पत्रकारों को वेबसाइट के पहचान पत्र थमाता है और मुँह न खोलने की धमकी देता है श्रम अधिकारियों के समक्ष। और आप कहते हैं सब सामान्य है।
बिहार में इसी वर्ष पत्रकार को गोलियों से भून दिया गया, भिण्ड में दिन दहाड़े कुचल दिया गया। पर आप कहते हैं सकारात्मक रहें।
मेरे दफ़्तर में डेस्क के साथियों के साथ लूटपाट हुई, चाकू मारे गए। बदले में क्या मिला? कुछ नहीं। सभी देर रात जाते थे इसलिए वारदातें हुईं। आप कहते हैं सकारात्मक क्यों नहीं हैं।
25-30 वर्ष की नौकरी कर चुके पत्रकार जब कहते हैं की ग़लती की इस क्षेत्र में आकर, और आप कहते हैं सकारात्मक रहें।
दक्षिण भारत के पत्रकारों का एकदल पिछले माह उपराष्ट्रपति से मिलता है और बताता है की 70 पत्रकार सिर्फ दिल की बीमारी से मर गए, क्यों। पत्रकारिता का तनाव और बिगड़ती जीवनशैली। और आप कहते हैं, सकारात्मक रहें।
एकदम ताजा मामला छत्तीसगढ़ में अभी इसी चुनाव में दूरदर्शन का पत्रकार मारा जाता है और आप कहते हैं…। वाह साब।
पत्रकार को अपनी इच्छा से अख़बार में एक शब्द भी लिखने की इजाज़त नहीं है, वो मालिक का दलाल बनकर रह गया है। और आप कहते हैं सकारात्मक रहें। आधी से ज्यादा मीडिया सरकार के चरण वंदन में लगा है। आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ।
साप्ताहिक और पाक्षिक अख़बार के प्रकट होने का कारण ही सिर्फ दलाली है। और आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ। प्रेस नॉट छापने के लिए आप 20-20 रूपये ले रहे हैं और आप कहते हैं मैं सकारात्मक रहूँ।
नंगी औरतों के तस्वीर से अख़बार और वेबसाइट भरने की होड़ में कब लाखों किसान, सरपंच, शिक्षक या आंदोलनकारी दिल्ली आकर चले जाते हैं पर आपके अख़बार में सिंगल कालम नहीं मिलता और आप कहते हैं की सब सामान्य है। आम आदमी की खबरें कहाँ हैं। जबकि फ़िल्म के लिए 2 से 4 पेज हैं। पर मैं सकारात्मक रहूँ।
सरकार के खिलाफ मात्र 2 खबरें इस साल हुईं। पहली द वायर से रोहिणी सिंह की जिसमे बीजेपी सदर के बेटे की कमाई का खुलासा था। रोहिणी सिंह के साथ क्या हुआ पता है? पूरी केंद्र सरकार की केबिनेट उतर आई, वो तो वरदराजन जैसे महारथी और जीवट पत्रकार वायर के सम्पादक हैं। वरना क्या होता पता नहीं। उसके बाद भी रोहिणी के खिलाफ केस हुआ, और अंत में रोहिणी की जीत हुई कोर्ट में। दूसरा मामला ऋचा खेड़ा द ट्रिब्यून। आधार मामले की खबर। क्या हुआ पता है। सीबीआई का शिकंजा अख़बार पर, सम्पादक पर और रिपोर्टर पर। सम्पादक को आखिरकार बर्खास्त किया गया।
ये हैं पत्रकारिता का ईनाम। पर आपको सब सामान्य लगता है। लगता है इन सबके बावजूद मैं सकारात्मक रहूँ। करीना कपूर का दमाद ढूढ़ निकाला आपने, पर दिल्ली की बुनियादी समस्याओं पर, कृषि, पर्यावरण, साहित्य की खबरों का टोटा है आपके पास। सच तो ये है इन मसलों को कवर करने के लिए रिपोर्टर ही नहीं है।
पर सब सामान्य लगता है आपको।
माफ़ कीजियेगा।
हम इतने भी सकारात्मक नहीं।
आपको सकारात्मकता मुबारक।

: सम्पादक, मीडिया मिरर

Share this: