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मैं संघी व एवीबीपी के गुंडों से कभी नहीं मिला

Narendra Modi
New Delhi: Prime Minister Narendra Modi pays tribute to Nanaji Deshmukh at his birth centenary celebration.file photo

-एडीटर अटैक-

15 दिन के अंतराल में चौथी बार में पढ़ने को मिल रहा है कि संघी गुंडे होते हैं और कहने वाले कोई अनपढ़ या जाहिल लोग नहीं हैं। देश के प्रबुद्धजन। पत्रकार और लेखक। मुझे दुख होता है ये सुनकर कि संघी गुंडे होते हैं। मैंने जिन संघियों को देखा, जाना और समझा। वो आदर्श व्यक्तियों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

संघियों (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) की जब बात होती है तो आज से 17-18 साल पीछे मेरा मन चला जाता है। मुझे याद पड़ता है कि मैं 8वीं कक्षा में होऊंगा। मेरे बड़े भैय्या बीजेपी की छात्रशाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एवीबीपी) के नगर मंत्री होते थे औऱ दीदी प्रदेश की पदाधिकारी। चूंकि नाना जी देशमुख की सरजमी चित्रकूट क्षेत्र में हमने परवरिश पाई, इसलिए उनके त्याग, समर्पण और समाजसेवा के प्रभाव के चलते भैय्या और दीदी एवीबीपी से जुड़े। संघ से जुड़े। मैं छोटा था तब। ये सब उतना नहीं समझता था। संघ के शीर्ष पुरुष नानाजी देशमुख चूंकि हमारे क्षेत्र से थे तो अटल जी हों, आडवाणी हों या संघ के शीर्ष नेतृत्व के पदाधिकारी हमारे क्षेत्र में आते रहते थे। दीदी और भैय्या उनकी सेवा में लीन रहते। एक बार भैय्या और दीदी ने केवल अपने अथक परिश्रम से राष्ट्रीय स्तर का एवीबीपी सम्मेलन आय़ोजित करवाया। जिसको बहुत सराहना मिली। आलम ये था कि दीदी और भैय्या ने एवीबीपी के इस सम्मेलन के लिए घर घर से चंदा मांगा था। मैं भी दोस्तों के साथ चंदा मांगने वाली टोली में था। आप सोच सकते हैं कि एक पार्टी के छात्र दल के लिए चंदा मांगने के पीछे कितनी बड़ी आदर्शवादिता छिपी होगी। वरना मेरे दादा जी कभी इजाजत न देते। सच तो ये है कि सम्मेलन में जब भैय्या ने एवीबीपी की नीतियां और घोषणा पत्र पढ़े तो हमें लगा कि समाजसेवा का इससे बेहतर मंच कोई हो नहीं सकता। भैय्या नगर मंत्री थे और अध्यक्ष औऱ उनकी पूरी टीम को मैं देखता था। वो कभी बीजेपी का प्रचार या राम का प्रचार या बीजेपी के लिए वोट जुटाते नहीं दिखे। कांग्रेसियों को गाली देते नहीं दिखे। मुझे याद है मेरे घर में उस समय महिन्द्रा कमांडर जीप होती थी। भैय्या 11 वीं या 12 वीं होंगे। दीदी कॉलेज में। हर दूसरे दिन जीप तैयार रहती। चूंकि मैं छोटा था, बस पूछता था भैय्या कहां जा रहे हो, तो बोलते पौधरोपण करने, नाले की सफाई करने पूरी एवीबीपी टीम मिलकर, कस्बे में ट्रेन रोकने के लिए स्टेशन मास्टर को ज्ञापन देने, स्टेशन में बेंच लगवाने के लिए ज्ञापन देने। और अगले दिन खबर छपती और मैं वो कटिंग काटकर भैय्या की फाइल बनाता। आप यकीन नहीं मानेंगे भैय्या तो डांटते थे लेकिन मैं उनके अध्यक्ष जी कामता भैय्या जो उस समय एवीबीपी के जिला प्रमुख थे, उनसे अक्सर कहता था जब भैय्या न हों कि मुझे भी संगठन में शामिल कर लो। मैं भी चलूंगा। वो हंसते थे कहते कि तुम तो हो ही न। वो थी एवीबीपी। मुझे याद है कामता भैय्या हों या उनकी पूरी टीम मैंने कभी भी किसी को अभद्रता से पेश आते नहीं देखा। मैं एक बात और स्पष्ट कर दूं कि गांव कस्बों में लड़कियों को उतनी स्वतंत्रता नहीं होती, लेकिन मेरी दीदी इकलौती पदाधिकारी थीं। राजपूत परिवार से हैं हमलोग। बावजूद दादा जी ने कभी उन्हें एवीबीपी के कार्यक्रमों में जाने से नहीं रोका। मुझे याद पड़ता सन्ध्या दीदी, बहन जी। बस ऐसे ही उन्हें सभी साथी संबोधित करते। मैं एवीबीपी को उस रूप में जानता हूं। कामता भैया और पूरी टीम तो मुझे ऐसी लगती कि वो अति विनम्र थे। सिर्फ याचना से वो काम करते थे। मैंने उस एवीबीपी को देखा है। मेरे घर में एवीबीपी और संघ के कार्यकर्ता और पदाधिकारी आते। इतने प्यार और विनम्रता से बोलते कि मैं उनका अनुसरण करता। नानाजी देशमुख की पुत्री नंदिता दीदी बोलतीं तो लगता फूल झड़ रहे हों। नाना जी के आश्रम में सभी संघ व एवीबीपी के वरिष्ठ व कनिष्ठ लोग हैं। मेरा जीवन बीता है वहां। मैंने कभी उनको गुंडई तो क्या तेज आवाज में बात करते नहीं सुना। उनकी शारीरिक भाषा से विनम्रता झलकती थी। मेरी दीदी चूंकि बड़ी थी हम सबसे। तो उन्हें प्रदेश में पदाधिकारी बनाया गया औऱ राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लिया गया। ऐसे में वो देशभर में हो रहे एवीबीपी के राष्ट्रीय सम्मेलनों में जाने लगीं। कन्याकुमारी, गुजरात और दिल्ली की मुझे याद है। दिल्ली आईं थी, तब जबलपुर से बीजेपी की महिला सांसद के घर पर रुकी थीं। पूरी तरह नाम याद नहीं शायद जयश्री बनर्जी टाइप। यहीं दीदी की मुलाकात कुशाभाऊ ठाकरे जी से हुई थी। बहुत दुलार से दीदी से उन्होंने बात की। जयश्री बनर्जी ने तो घर पर रखा और बेटी जैसा स्नेह दिया। दीदी जब घर लौटीं तो उन्होंने एवीबीपी की नीतियां, उद्देश्य और कार्य़कर्ताओं एवं पदाधिकारियों के आचार विचार से घर वालों को अवगत कराया। सुनकर लगता था कि कितने प्यारे लोग हैं। जयश्री बनर्जी के बारे में दीदी ने बताया था कि कहती थीं कि सभी लोग खाना खाए बगैर नहीं जाएंगे। सभी को उन्होंने अपने घर ठहराया था। उस दौर के प्रभाव में अगर मैं बना रहता तो निसंदेह एवीबीपी में होता। मैं उस एवीबीपी को जानता हूं।

मेरा घर, मेरे घर के 2 सदस्य और पूरे कस्बे में एकमात्र मेरी जीप संघ व एवीबीपी की सेवा में मानो 24 घंटे रहती। संघ के किसी पदाधिकारी को आना हो या कहीं जाना हो जीप तैयार रहती। भैय्या को कोई चुनाव नहीं लड़ना था और न किसी तरह का राजनैतिक लाभ चाहिए था। ये जुड़ाव सिर्फ समाजसेवा, जनसेवा और देशसेवा को लेकर था। ऐसा लगता था ये वही मंच है जहां से हम लोगों की सेवा कर सकते हैं। वैसे भी मैंने सुना है संघ में दीदी और भैय्या कहकर बड़े स्नेह से बोलते हैं। तो ये गुण्डागर्दी करने वाले कौन लोग हैं। क्या इतने वर्षों में संघ व एवीबीपी बदल गया।

मुझे याद है कि अशोक सिंघल जी को आना था। दीदी कहीं बाहर थीं। दिल्ली से जो ट्रेन आनी थी उसी में सिंघल थे। अपन बिना बताए स्टेशन आ धमके। चित्रकूट में संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन था। मैं 14 साल का था तब। आगवानी के लिए पुलिस के साथ संघ और बीजेपी के बड़े नेताओं का जमावड़ा था। पर संयोग ये बना कि जहां सब लोग खड़े थे वहां सिंघल जी का कोच लगा नहीं। उससे काफी दूर लगा। किस्मत से वहां सिर्फ मैं खड़ा था। सिंघल अपने भारी सुरक्षा के बीच उतरे तो मैंने पैर छुए और वो कुछ हल्का बैग लिए थे मैंने कहा दीजिए। मैंने बोल दिया था कि एवीबीपी से हूं। मुझे याद है उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए बोला था कि और सब लोग कहां हैं। मैंने कहा कि आगे हैं। तब तक सब दौड़ते भागते आ ही गए। सुदर्शन जी उस समय संघ प्रमुख थे। उनका चेहरा देखिए। कितने सज्जन व्यक्ति थे। आडवाणी, अटल, मुरली मनोहर, नाना जी देशमुख, दीनदयाल उपाध्याय क्या आपको गुंडे लगते हैं। एवीबीपी औऱ संघ को जितना मैंने जाना उस हिसाब से मैं कह सकता हूं कि सबसे पहले तो एक दूसरे का आदर करना वहां सबसे पहले सिखाया जाता है। मुझे याद है संघ के क्षेत्रीय प्रचारक मेरे घर आते थे। यहां तक हमारे तहसील में अगर संघ के किसी पदाधिकारी को आना हो तो भोजन हमारे घर ही होता था। उस समय महाकौशल प्रांत के प्रमुख कोई ताम्रकार और माहेश्वरी जी थे। अब दोनो ही और बड़े पदों पर होंगे। दोनों लोग हमारे घर आए। जो क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख थे। अक्सर घर आते। बहुत बहुत ही शालीन, विनम्र। मतलब मुझे भी पहले वो ही मुस्कुराते हुए प्रणाम करते। मुझसे बोलते शाखा आय़ा करो। कहते थे व्यायाम कराएंगे। मैं कुछ समय गया भी। फिर मुझे वो संघ के अभ्यास शिविरों में ले जाने की बात करते। उसमे कुछ क्रम बताते थे वो। पर मैं पढ़ाई में व्यस्तता के चलते नहीं जा पाया। पर संघ परिवार के सदस्यों के प्रति आदर सदैव बना रहा मन में।  संघ के जो तहसील प्रचारक थे सुरेंद्र त्रिपाठी जी उन्हें देखकर लगता कि जैसे वो किसी राजनैतिक दल के घटक दल का हिस्सा नहीं जबकि मिशन पर हों। सरल एवं सहज। अविवाहित थे। शिशु मंदिर में पढ़ाते भी थे। एक बार उनके कमरे गया। बिस्तर के अलावा वहां कुछ नहीं था। एवीबीपी को मैं अपने भैय्या औऱ दीदी के दौर की एवीबीपी के रूप में जानता रहा। मैं पत्रकारिता में आ गया। न संघ से वास्ता और न ही एवीबीपी से। पर इस दौरान भी मुझसे एवीबीपी व संघ से जुड़े कुछ युवा साथी संपर्क में बने रहे। कभी कभी उनके संदेश आते हैं। फोन आते हैं। मुझे कभी वो हिंसक नहीं लगे। मैं जितने भी संघ व एवीबीपी कार्यकर्ताओं को जानता हूं। इतनी विनम्रता से बात करते मैंने उनको पाया कि आप भी मुरीद हो जाएं। पर फिर ये गुंडागर्दी करने वाले एवीबीपी और संघ के लोग कौन हैं। आज मैंने प्रसिद्ध लेखक प्रभात रंजन को पढ़ा। उन्होंने लिखा कि संघी गुंडे होते हैं। 5 या 6 दिन पहले न्यूजलांड्री के सम्पादक अतुल चौरसिया ने पूरा आलेख लिखा कि किस तरह इंद्रा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एवीबीपी के गुंडों ने उन्हें घेर लिया और वो किसी तरह बचकर निकले। उन्होंने भी गुंडे शब्द उपयोग में लाया एवीबीपी के लिए। 2 दिन पहले सबरीमाला में पत्रकार शाजिला ने कहा कि संघ के लोगों ने उन्हें लात मारी। इसी तरह महीनेभर पहले भोपाल के एक युवा पत्रकार ने कहा कि एवीबीपी के लोगों ने प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से घेरने की कोशिश की। दबाव बनाने की कोशिश की एक खबर को लेकर। मैं एवीबीपी व संघ का सदस्य तो नहीं रहा और न हूं। पर मुझे इससे एक लगाव जरूर था। क्योंकि इन दोनों संगठनों को जिस रूप में मैंने बचपने में देखा व जाना व निश्चित ही आदर्श रूप था। अब इन संगठनों के प्रति ऐसी बातें सुनकर दुख होता है। एक के बाद एक आरोप इन संगठनों पर लग रहे हैं। हिंसक प्रदर्शनों के, गुंडागर्दी के, अब तो पत्रकार और लेखक भी लिखने लगे हैं कि संघ व एवीबीपी की गुंडागर्दी चरम पर है। मुझे नहीं मालूम सत्यता कितनी है पर अगर लेस मात्र भी इन दोनों संगठनों की गुणवत्ता में असर पड़ा है तो दुखद है और मैं दिल से चाहता हूं एवीबीपी व संघ अपनी वही आदर्शवादी छवि का पुनः अनुसरण करे जिसके बलबूते देश को नाना जी देशमुख, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे शिखर पुरुष दिए हैं। मैं फिर कहता हूं अटल, आडवाणी व नानाजी, मनमोहन सिंह जितने योग्य बेशक न हों और आमतौर पर कहा जाता है कि एवीबीपी व संघ से जुड़े लोग प्रबुद्ध नहीं होते अपेक्षाकृत वामियों के। लेकिन जब सभ्यता, आचरण, संस्कृति, आदर्श की बात होती है तो मैं सतत मानता आय़ा हूं कि संघियों और एवीबीपी से श्रेष्ठ कोई नहीं। इसलिए संघ व एवीबीपी से जुड़े लोगों के छविभंजन की बात को पढ़ना व सुनना दुख देता है। हो सकता है संघ व एवीबीपी की नई पीढ़ी पर जो आरोप लग रहे हैं उनमें सत्यता हो, ऐसी स्थिति में आत्मअवलोकन की नितांत आवश्यक्ता है। क्योंकि संघ का वजूद ही उसका अनुशासन और आदर है।

  • प्रशांत राजावत- सम्पादक मीडिया मिरर दिल्ली

(एडीटर अटैक मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है)

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