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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट भाग-6

मीडिया मिरर
प्रशांत राजावत. सम्पादक मीडिया मिरर

प्रशांत राजावत-सम्पादक मीडिया मिरर

सर्दी बहुत है दिल्ली में। मैं तो फिलहाल नौकरी से टर्मिनेट चल रहा हूं इसलिए घर पर ही हूं। हां भाई एक अखबार में नौकर हूं। अपन नौकरी ठीक वैसे नहीं करते जैसे सब करते हैं। 3 महीने की छुट्टी पर था वापसी की तो सम्पादक ने फिलहाल वापसी नहीं कराई। इस्तीफा नहीं लिया है और न मैंने दिया है। आशा है जल्द वापसी होगी। खैर ये सब चलता रहता है। इसी बहाने घर पर हूं और फिल्में देख रहा हूं ढेर सारी। और हां 3 महीने की छुट्टी हनीमून के लिए मीडिया रिसर्च के लिए  थी।

खैंर अपन चलते हैं 2009 में, क्या रखा 2019 में। डायरी के पिछले 5 हिस्से अगर आपने पढ़े होंगे तो आप आगे की कहानी समझ ही जाएंगे। करियर की दूसरी नौकरी जिस अखबार में की वहां से बड़े बेआबरू होकर निकले थे अपन। वो सब कहानी आपने पढ़ ही ली। जैसा मैंने पिछली बार आपसे कहा था कि कैसे राह चलते एक दरोगा जी मुझे अपनी बेटी से शादी के लिए बोला और कैसे अपन ने शादी के लिए एक लड़की खोजने की कोशिश की। ये दोनों दिलचस्प किस्से हो जाएं फिर मारामारी की कहानियां तो चलती ही रहेंगी।

हुआ कुछ यूं कि जैसा हमने बताया था आपको कि जब करियर की दूसरी नौकरी मिली तो अपन पैदल से बाइक में आ गए। ग्वालियर में रिपोर्टिंग बाइक से करने लगे। सर्दी के दिन थे एकदिन अपन फूलबाग इलाके से शिंदे की छावनी की ओर अपनी बसंती से चले जा रहे थे किसी खबर के लिए रास्ते में चेकिंग चालू। गाड़ी के तो कागज थे लेकिन हमारे पास ड्रायविंग लायसेंस नहीं था। वो अब भी नहीं है। एक दरोगा जी आए, आए क्या गाड़ी के सामने ही आ गए। बोले बाइक साइड में लगाओ। बाइक साइड में लगाई। बोले लायसेंस। मैंने कहा लायसेंस नहीं है। इसके साथ ही मैंने बोला कि मैं पत्रकार हूं और एक रिपोर्ट के लिए जा रहा हूं। दरोगा जी थोड़ा नरम हुए। बोले क्या नाम है। मैंने बोला प्रशांत राजावत। बोला राजावत? मैंने कहां हां। बोला कहां से हो, मैंने उसके चेहरे के हावभाव देखे मुझे कुछ दीनहीन लगने लगा वो दरोगा जो कुछ देर पहले अकड़ में था। मैंने कहा कि भिण्ड से। बोला बेटा कितना मिल जाता है पत्रकारिता में। मैंने कहा साढ़े 7 हजार। फिर बोला अरे तुम लोग तो ऊपर की खूब करते हो। मैं उसे कुछ बताता बोला बेटा अपनी एक लड़की है, हम भदौरिया ठाकुर हैं। लड़का ढूढ़ रहे हैं। मैं समझ गया कि ये दरोगा कुछ देर के लिए नहीं जिंदगी भर के लिए कैद करने के चक्कर में है। बोला पापा का नम्बर दे दो। अपन ने उसे एक नम्बर लिखवाया पर वो पापा का नहीं था। और नमस्ते कहकर चलते बने। तो ऐसे भी हो जाता है छोटे छोटे शहरों में। हालांकि बेटी का बाप बड़ा लाचार हो जाता है ऐसा सुनता आया हूं मैं। इसलिए अब जब सोचता हूं तो थोड़ा सहामुभूति होती है दरोगा के प्रति।  अब एक और कहानी। नौकरी जब ठीकठाक लग गई। पर हाल बेहाल थे मेरे। न समय पर खाना-पीना और न दिनचर्या। पता नहीं कौन सा कीड़ा दिमाग में घुसा। सोचा चलो बेटे कोई लड़की ढूढ़ते हैं। लड़की कहां ढूढ़ी जाए।

टाइम्स ऑफ इंडिया से, उस पेज को अपन रोज चाव से पढ़ने लगे जिसमें वर चाहिए और वधु चाहिए की जरूरत होती। अब मुद्दा ये था कि वधु चाहिए कैसी। क्योंकि वधुओं की तो तमाम कैटेगरी थीं। उम्र 23-24 ही थी अपनी। वधुओं के प्रकार में उम्र, गोरी, काली, मोटी, खूबसूरत, बहुत खूबसूरत आदि थे। एकदिन ऐसे ही देख रहा था। नजर गई पत्रकार लड़की जिसे वर चाहिए। हाहा। लड़की मुंबई में किसी चैनल में पत्रकार थी। चौहान ठाकुर। फिर क्या अपन ने उसके मेल में अपना स्व-विवरण भेज दिया। अब हर दिन बीतता और रात को बिस्तर में शादी का लड्डू फूटता। जाने वो कैसी होगी रे….। मतलब ये पूरी प्लानिंग अपनी थी। घर में किसी को कानो कान खबर नहीं। अगर होती तो मेरा देश निकाला पहले हो जाता। क्योंकि हमारे खानदान में अभी पेपर में खोजकर शादी करने की तो नौबत कम से कम नहीं आई। पर यहां तो खाने-पीने की समस्या से हम ही जूझ रहे थे। घरवालों को कौन बताए कि क्या हाल हो गया है। दिन पे दिन बीतते जा रहे थे। अपना रेडिफ वाला मेल भी चेक करता और मोबाइल को चिपकाए रहता। पता नहीं कब फोन आ जाए।

एकदिन बजी घंटी अपने मोटोरोला की। हेलो मैं मनोज सिंह बोल रहा हूं। आप प्रशांत.. मैंने कहा जी… आपने बायोडाटा भेजा था। मैंने कहा जी। साब बोले मेरी ही बहन है। मुंबई में आईबीएन-7 में फिल्म रिपोर्टर है। नाम है शिखा चौहान। सुनकर खुशी हुई कि बीबी बड़ी हाइप्रोफाइल जर्नलिस्ट होगी। सीधे मुंबई..। साब बोले आप कहां हैं मैंने बताया ग्वालियर। साब बोले कि आपको मैंने बहन की एक फोटो भेजी है और बायोडाटा देख लीजिए और फिर अपन बात करते हैं। नमस्ते के साथ फोन कट गया। वैसे तो दफ्तर हम 3 बजे तक निकलते थे। पर आज वो तस्वीर जो देखना था। चैन कहां था। कैसी होगी। कैसी होगी। मेल दफ्तर के कम्प्यूटर पर ही चेक हो सकता था। अपन तुरंत ही घर से निकल लिए। जल्दी जल्दी मेल खोला, मैसेज पड़ा था मनोज सिंह के नाम से। बड़े प्यार से ओपन किया कि कहीं भूल से डिलीट न हो जाए। मैसेज ओपन हुआ तो 2 अटैचमेंट थे। एक में तस्वीर और दूसरे में बायोडाटा। दिमाग में तो किसी की सूरत लगी हुई थी, इसलिए भाड़ में जाए बायोडाटा अपन ने तो फोटो वाले में क्लिक किया और फोटो भी कैसे खुली जैसे फिल्मों में खुलती है। आहिस्ता आहिस्ता। पहले सिर फिर थोड़ी आंखे, फिर आगे फिर आगे औऱ ऐसे शिखा जी पूरी मेरे सामने। अब चूंकि शादी के लिए ही फोटो भेजी थी, निसंदेह सबसे खूबसूरत ही भेजी होगी। पर शिखा जी सिम्पल नजर आईं। बहुत सुंदर नहीं पर बुरी भी नहीं। वैसे भी किसी लड़की को जज करने वाले हम होते ही कौन हैं। लेकिन ये भी तो है कि शादी के लिए तस्वीरे तो जज करने के लिए ही भेजी जाती हैं। उसके बाद बायोडाटा देखा। उदयपुर से थीं शायद शिखा। परिवार वाले तमाम बड़े अधिकारी। सब बढ़िया।

जब जानने के बाद दफ्तर से घर आए। रात हुई बिस्तर पहुंचे। कभी कभी दिन का नशा बिस्तर पर उतरता है। मेरा भी उतरने लगा। मुझे लगा कि न तो मैं ये शादी कर सकता और न ही मेरे घर वाले इजाजत देंगे। साथ ही ये ख्याल भी था कि वो लड़की मुझसे उम्र में बड़ी है 29 की थी वो औऱ मैं 23 का। साथ ही वो मुझसे बड़ी पत्रकार थी और ज्यादा पैसे कमाती थी। कहीं कुछ मेल नहीं था। खेल खेलते खेलते मैं खेल में फंस गया था। मैं थोड़ा तनाव में आ गया कि मैं क्या जवाब दूंगा मनोज जी को। यकीनन मुझे लगा कि मैंने एक खेल ही खेला था। एक लड़की को देखना था। शादी की बात से थोड़ा रोमांच लेना था पर वास्तव में शादी नहीं करना था। पर जब मैं खेल खेल रहा होऊंगा तब सामने वाला खेल नहीं खेल रहा होगा। ऐसा मुझे ख्याल ही नहीं आया। चूंकि मैंने उस दौर के बाद कभी अपनी उस बेवकूफी के बारे में ज्यादा सोचा नहीं। पर मैं शिखा के लिए खुद को दोषी पाता हूं। मैं क्षमाप्रार्थी हूं। शिखा अगर आज भी कहीं मुझे पढ़ रही हों तो हो सकता है उन्हें हंसी आए या फिर थोड़ा गुस्सा। मुझे दोनों स्वीकार है औऱ मैं आशा करता हूं आपको एक बेहतर जीवन साथी मिला होगा। वैसे मैं आज भी सिंगल हूं..हाहा।

खैर तो उस रात उसी चिंता में कि कुछ होना जाना नहीं है। अब कैसे मामले को हैंडल किया जाए। अगले दिन सुबह मनोज सिंह का फिर फोन आया। सर फोटो और बायोडाटा देखा आपने। मैंने कहा हां। मैंने आगे बोला बहुत अच्छा परिवार है आपका। तो बोले कि बताइए कहां आपसे मिलना हो सकता है। हम आपसे मिलना चाहते हैं। अब बजी खतरे की घंटी मन में। मैंने कहा सर समय दीजिए मैं बताऊंगा। पहले मैंने सोचा कि खेल को थोड़ा आगे बढ़ाएं और उन्हें मिलने बुलाएं। पर मुझे लगा कि किसी को बुलाकर आखिर न ही करना है। फिर मुझे लगा ये गलत होगा। और अंततः मैंने उनको एक मेल लिखा.. बस उसके बाद मनोज जी से संपर्क टूट गया। ये किस्सा तो खत्म हो गया पर शिखा चौहान मेरे जेहन में आज भी जीवित हैं। मुझे लगा कि उनसे व्यक्तिगत माफी मांगू। फेसबुक में खोजा, ट्वीटर में खोजा औऱ उस समय आरकुट चलता था। उसमें भी खोजा। पर शिखा मिली नहीं। हालांकि ये संयोग ही थी कि मैं पूरे इस घटनाक्रम के कुछ समय बाद ही टीवी देख रहा था और मुझे सुनाई दिया मुंबई से आईबीएन-7 के लिए शिखा चौहान की रिपोर्ट। अच्छा बोलती थी वो। मैंने लाइव देखा। हालांकि ये सच है कि जब से मैंने शिखा को जाना था तबसे मैं अगर न्यूज चैनल देखता तो आईबीएन-7 पर जाकर रुक जाता था। कारण शिखा को देखना था तो ऐसे मैंने उसको देख ही लिया। बहुत बड़ा गुनाह तो नहीं किया था मैंने पर हां पेपर में तलाशकर किसी लड़की वालों को यूं संदेश भेजना गलत ही है। क्योंकि लड़की वाले बड़े उम्मीद में जीते हैं…. तो फिलहाल आज की डायरी में इतना ही। अगले सोमवार को फिर मुलाकात होगी कुछ नए किस्सों के साथ। अगली बार चर्चा करेंगे नौकरी के बाद खाली घर में बैठने के क्या एहसास होते हैं और फिर अगली नौकरी के लिए कैसे जतन होते हैं। नौकरी मिल गई थी और वो भी फिर ग्वालियर में ही। ग्वालियर एक बार किसी को अपना लेता है तो मुश्किल से ही छोड़ता है..ख्याल रखिए सर्दी में अपना-अपना।

नमस्कार।

( द डायरी आफ अ यंग जर्नलिस्ट मीडिया मिरर सम्पादक के पत्रकारिता जीवन की सत्यकथाओं पर आधारित है)   

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