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द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट भाग-7

द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट
द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट

प्रशांत राजावत-सम्पादक मीडिया मिरर

दिल्ली में मौसमी सर्दी तो बरकरार है पर सियासी पारा बढ़ गया है। खैर अपन से क्या मतलब। अपन अंतिम हिस्से में ये बता चुके थे कि कैसे मेरी दूसरी नौकरी लगी और छूटी। उसके बाद अपन थोड़ा प्रेम व्रेम की बातें कर गए थे, भाग-6 में। तो अपन इस बार चर्चा करेंगे दूसरी नौकरी छूटने के बाद के समय की और उसके बाद कैसे मिली तीसरी नौकरी…

ग्वालियर में सब भुगतकर नौकरी वौकरी छोड़कर घर पहुंच गए। सर्दी के दिन थे। हमारा कस्बा पहाड़ी कस्बा था। चारो ओर से पहाड़ों से घिरा, एक छोटा सा हिल स्टेशन। स्वच्छ औऱ सुंदर वातावरण। पहाड़ी इलाके की वजह से मोबाइल और टीवी वहां बहुत बाद से पहुंचे। खैर घर में दिन बीतने लगे। बाहर रह रहकर स्वास्थ्य मटियामेट हो चुका था, हड्डियां शरीर से बाहर झांकने लगी थीं। तो मां ने देशी घी के लड्डू वड्डू बनाए और दूध लगवाया मेरे लिए। शरीर पर भी ध्यान देने लगा। लेकिन कहते हैं न कि पैसा एक बार कोई कमा ले न, तो नशा जैसा हो जाता है। वो क्या कहते हैं मुंह में खून लग गया… पैसा भी नशा है। पैसा सिर्फ जरूरतें हीं पूरा नहीं करता, बल्कि आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है। आपके व्यक्तित्व में बदलाव लाता है। आपके मानसिक स्तर को सुधारता है। मैं इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मैंने महसूस किया है ऐसा। औऱ जब पैसे से इतनी सारी चीजें एक साथ होती हैं तो उसका होना आवश्यक हो जाता है। खासतौर पर तब जब आप पैसा कमाने लगे हों और फिर बेकार हो जाएं। तो जब नौकरी छोड़ घर बैठे 2 महीने होने को हुए तो थोड़ा बुरा सा महसूस होने लगा। पहली बार खाली बैठ रहा था। पहला अनुभव था बेकारी का…। कहते हैं पत्रकारिता में कभी भी कोई भी किसी भी समय बेकार हो सकता है। पर उस फेज को कैसे जीते हैं, वही बता रहा हूं। ऐसा नहीं था कि घर वाले मेरे पैसे पर आश्रित थे, पर उनको भी महसूस होता कि मैं बेकार होकर तनाव में हूं। पिता जी तो कुछ नहीं कहते, वो दरअसल कभी ऐसा कुछ कहते भी नहीं हैं। जब मैं घर में फालतू होता हूं तो वो यही कहते हैं कि खाली हो तो जमकर खाओ औऱ सेहत बनाओ। पर मां तो सबकी एक जैसी होती हैं। वो जातीं मेरे पास और बोलती कि बेटा कहीं कुछ बात –वात हुई नौकरी की। मैं कह देता हां मां कोशिश कर रहा हूं।

साथ ही वो ये भी जोड़ देती तुम कमाने लगो तो फलां काम करवा लेंगे, ये सामान ले लेंगे आदि आदि। तो मुझपर और दबाव बनता। खैर तीन महीने बीतने को आए, गर्मी शुरू हो गई औऱ मैं एकदिन अखबार पढ़ रहा था, अचानक से नजर पड़ी कि ग्वालियर में एक नया अखबार खुलने वाला है और वहां जगह हैं। चूंकि मैं ग्वालियर में काम कर चुका था इसलिए पत्रकार तो जानते ही थे। तो तुरंत ग्वालियर के अपने मित्रों को फोन लगाया और इस नए अखबार के संबंध में चर्चा की। पता लगा कि स्थानीय डेरी उद्योग के व्यवसायी हैं जो अखबार लांच कर रहे हैं अपने काले कारनामों को ढ़कने के लिए। ऐसा ही होता है। क्षेत्रीय स्तर पर अगर कोई अखबार लांच हो रहा है तो आश्वस्त रहिए वो पत्रकारिता, मिशन-विशन, समाजसेवा के लिए नहीं खुल रहा। ऐसे अखबारों के मालिक व्यवसायी होते हैं। काले धंधे करते हैं और पुलिस से बचे रहें इसलिए अखबार खोलकर नेताओं से सांठगांठ करते हैं। पूरा चिट्ठा इस अखबार का भी ऐसा ही है। अगले खंडों में चर्चा होगी। तो इस अखबार का मालिक अस्पताल, होटल, डेयरी प्रोडक्ट आदि का मालिक भी था। चिटफंड का काम भी था। खैर पत्रकार को तो नौकरी चाहिए।

साथी से सुखद सूचना ये मिली कि यहां पर जो सम्पादक बनाए गए हैं वो मेरे पहले नौकरी वाले सम्पादक थे। साथी ने ये भी कहा कि तुम बायोडाटा भेजो। तुम्हारा होना ही है। जब आप बेकारी में बैठे बेहद निराश हों, तो ऐसी स्थिति में आपको कोई ऐसे शब्द बोले कि आपकी नौकरी पक्की है तो थोड़ा ढाढस बंधता है। विश्वास जगता है। चेहरे की चमक बढ़ती है। साथी से फोन पर बात खत्म हुई तो उत्साह में जाकर मां को बताया कि मां नौकरी के लिए बात हुई है, फिर दादी औऱ दादा को। मेरी आदत है। मैं अपनी कोई भी खुशी परिवार में तुरंत साझा करता हूं। पापा को भी कहा। सभी खुश थे। बॉयोडाटा भेज दिया। और दिन बीतने लगे एक एक करके… हां पर अब पहले की तरह निराशा नहीं थी..जरा सी उम्मीद  भी आपको निराश नहीं होने देती.. मैं उस उम्मीद के सहारे ही हंसता था, खेलता था, खुश रहने लगा। मैं ये सब इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि ऐसा समय बड़ा अवसाद पूर्ण होता है, जब आपकी नौकरी छूट जाए। और उस अवसाद से जितने जल्दी हो सके निकलना चाहिए। हालांकि मैं सोचता बहुत हूं, उस समय कविताएं तो नहीं लिखता था, पर पेंटिंग बनाया करता था। तो ऐसे समय बीत जाता था। एकदिन फोन आ गया और कहा गया कि साक्षात्कार के लिए फलां डेट पर पहुंचिए।

अब फिर उसी शहर जाना था जहां से जलील होकर लौटना पड़ा था। घर में सबको बताया। सब खुश थे। पर मैं अब चिंतित था। साक्षात्कार में क्या पूंछेंगे। हो तो जाएगा न। कहीं लौटना न पड़े खाली हाथ। सम्पादक वही पहले वाले हैं। जिनका व्यवहार मेरे लिए बहुत सकारात्मक नहीं था, सकारात्मक क्या मेरी उनसे पूरे डेढ़ साल कोई बात और मुलाकात ही नहीं हुई थी। इसलिए मैं उन्हें जानता ही नहीं था। उल्टा मालिकों के करीबी होने के चलते शीतयुद्ध ही चलता रहा। पिछले भाग आपने पढ़ें होंगे तो सब पता ही होगा। तो ऐसे बड़ा डर था मन में.. कि ये सम्पादक क्या करेगा। कोई विकल्प तो था नहीं। तो जाना ही था। पहुंचे ग्वालियर। अगले दिन ही साक्षात्कार था। बायोडाटा और खबरों की कुछ कटिंग एक फाइल में लगाकर पहुंचे उस पते पर जो बताया गया था। धुकधुकी लगी थी। अंदर घुसे तो जान परिचय वाले एक नहीं कई पत्रकार मिले। हाय हेलो हुआ। बोले अरे राजावत कहां चले गए थे। मैंने बताया कि पुराना अखबार छोड़ दिया था, तबसे घर में थे। तो परिचित पत्रकार जो वहां साक्षात्कार देने आए थे, बोले बढ़िया है। यहीं करेंगे अब। बढ़िया अखबार है।

जितने लोग परिचित थे। सभी बोले चिंता मत करो तुम्हारा हो जाएगा। आप सक्षात्कार या किसी परीक्षा में बैठें तो ये लफ्ज बड़े कीमती हो जाते हैं कि तुम्हारा हो जाएगा। यहां जितने लोग भी साक्षात्कार देने आए थे। अधिकांश मेरे पहली नौकरी वाले सहयोगी ही थे। ऐसा इसलिए कि सम्पादक पहली नौकरी जहां करता था वही वाले थे। पत्रकारिता में यही परम्परा है। सम्पादक अपनी टीम को लेकर चलता है। कुछ नए चेहरे भी दिख रहे थे। मैं भी एक तरह से उनकी टीम का ही हिस्सा था। बस मैं उनको अपनी टीम का नहीं मानता था। रिशेप्शन में बैठा था। खूबसूरत सी रिशेप्सनिस्ट ने नाम पुकारा कि प्रशांत राजावत कौन हैं। मैंने कहा जी..बोली अंदर जाइए। रिशेप्सनिस्ट बहुत ही सुंदर थी। उतनी सुंदर रिशेप्सनिस्ट मैंने अबतक नहीं देखी। हालांकि बाद में उसकी रुचि रिपोर्टिंग में जागी और कुछ रिपोर्ट भी लिखती थी। वो कुछ कुछ एयरहोस्टेस जैसी शारीरिक भाषा रखती थी और परिधान भी। मुझे उसका चेहरा याद है। वैसे भी सुंदर चेहरे मुझे आसानी से नही भूलते। खैर मैं अंदर गया। अंदर मेरे पहले सम्पादक बैठे थे। मैंने नमस्कार किया और चरण स्पर्श किए। इसबार भी उनके बैठने का अंदाज लाजवाब ही था। ढीली ढाली शर्ट, आंखों पर काला चश्मा..इतना काला की आंख न दिखे। अभिनेता सरीखे लगते थे। हैंडसम तो थे ही.. हालांकि बाद में मालूम हुआ था कि वाकई थियेटर आर्टिस्ट थे। देखते ही बोले आओ प्रशांत राजावत, तुम्हारा ही इंतजार था। वो बोलते ही जा रहे थे एक एक्टरनुमा औऱ मैं सुन रहा था। बोले कि बॉयोडाटा आने से पहले ही मुझे पता था तुम आओगे। दरअसल मैं तुम्हारा ही इंतजार बेसब्री से कर रहा था। एक  मुख्य सम्पादक वो भी फिलहाल एक साक्षात्कार कर्ता की भूमिका में हो यानि ईश्वर या कहें दाता के रूप में और वो आपके बारे (एक अदने से लड़के) में ऐसा धाराप्रवाह बोलता जाए।

मैं सोच नहीं पा रहा था कि क्या जवाब दूं। फिर बोले एक सामने बैठे सलीकेदार कपड़े पहने हुए व्यक्ति से परिचय करवाते हुए सर ये प्रशांत राजावत हैं, मेरे साथ रह चुके हैं। शानदार आदमी हैं। जिससे परिचय करवाया वो एचआर हेड था और दूसरे थुलथुले व्यक्ति से परिचय करवाया वो मालिक था। निश्चित ही मालिक और एचआर को सम्पादक की बातें सुनकर थोड़ा तो आश्चर्य हुआ ही होगा इस लड़के में ऐसा क्या है। अब मैं ऐसा सोचता हूं। फिर बोले मालिक से कि सर इनको रखेंगे। सैलरी में ही बात बस बन जाए। बोले कितना लोगे। मैंने कहा जितना इससे पहले वाले अखबार में मिलता था, साढ़े 7 हजार। वही दे दीजिए। बोले कि वहां के हाल दूसरे थे, यहां के दूसरे हैं। अब तो आप घर बैठे हैं। कर लो यार 6 दे देंगे। फिर बढ़ जाएगी। करना तो था ही। मैंने कहा ठीक है सर। बोले ठीक है जाओ। अभी अखबार तो छपेगा नहीं। पर हम लोग प्लानिंग पर काम करेंगे और कल से आइए। सैलरी पूरी मिलेगी। मैंने प्रणाम किया और पैर छुए बाहर आ गया। सम्पादक थे धांसू आदमी। 60 पार थे। पर रवैय्या मालिकों के आगे न झुकने वाला। मालिकों के सामने बैठकर साक्षात्कार मेरा ले रहे थे तो ऐसे बैठे थे। जैसे हिलने डुलने वाली आराम कुर्सी में प्राण बगैरह बैठते थे। पैर के ऊपर पैर लादकर। क्या मालिक क्या मैनेजर। फर्क नहीं पड़ता। मैं उनकी केबिन से बाहर आ गया। मेरी नौकरी लग चुकी थी। खुश था औऱ सम्पादक को एक नए रूप में देख रहा था। नए रूप में क्या, पहली बार ही सुन और समझ रहा था। सोच रहा था कि नौकरी भी दे दी और पॉजिटिव ही बोले। पर मेरा ही इंतजार कर रहे थे। उन्हें पता था कि मैं आऊंगा। ये तमाम बातें मेरे कानों में बार बार गूंज रही थीं। कि आखिर ऐसा उन्होंने किस आधार पर कहा होगा। हालांकि वो काला चश्मा लगाकर साक्षात्कार ले रहे थे। इसलिए उनको होठों पर तैरती हल्की मुस्कुराहट तो महसूस हो रही थी पर वाकई वो किस मनोदशा में हैं समझ से परे था। क्योंकि आंखें काफी कुछ कहती हैं। पर उनकी आंखें तो पर्दानशी थीं। घर बताया कि नौकरी मिल गयी और सर ने बड़े प्यार से बात की। साक्षात्कार के बाद बाहर कुछ देर बैठा। मेरे जो पूर्व सहयोगी थे, उनमें से ज्यादातर की भी नौकरी लग गई। उसके बाद मैं चला गया। फिर दफ्तर के पास कमरे की तलाश में लग गया। और एक बात औऱ बता दूं कि यहां मैं मन बना चुका था कि इस अखबार में मैं रिपोर्टिंग नहीं करूंगा। परेशान हो चुका था मैं रिपोर्टिंग करके, पैदल भाग भागकर। धूल चाट चाटकर। अब तो वातानकूलित दफ्तर में बैठकर आराम से उप सम्पादक बनने की इच्छा थी। चूंकि अभी तो साक्षात्कार ही दिया था।

लेकिन बन बना लिया था पहले दिन ही कि जिस दिन काम की बात आएगी मैं डेस्क जॉब की मांग करूंगा। रिपोर्टिंग से ऊब गया था। अगले दिन फिर दफ्तर गया। संयोग से सम्पादक जी बाहर बैठे मिल गए। कुछ और पुराने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ। मैंने प्रणाम किया। बोले आओ प्रशांत। कुर्सी पड़ी थी बैठ गए हम। वो फिर शुरू हो गए। दूसरे लोगों को बताते हुए कि इस लड़के का मैं इंतजार कर रहा था। साक्षात्कार तो मैं रोज ही ले रहा था, पर मुझे पता था ये जरूर आएगा। फिर थोड़ा मैं मुस्कुराया और वो भी। सहज हुआ मैं थोड़ा। बोले मालिक के करीबी थे तुम तो वहां। मालिकों के साथ बैठते थे। थोड़ी उलाहना भरी मुद्रा में बोलते गए। हमसे तो बातचीत ही नहीं करते थे। पर सुनो ऐसा नहीं है कि तुम्हारे काम पर हमारी नजर नहीं थी। तुम कहां जाते हो, क्या करते हो, क्या लिख रहे हो। कौन सी खबर लिखी। हर एक दिन पर नजर थी मेरी। और इतना ही नहीं तुमपर मेरी खास नजर होती थी। मैं हतप्रभ था। भयंकर आश्चर्य़चकित था उनको सुनकर कि एक वो व्यक्ति जिससे पूरे डेढ़ साल के कार्य़काल के दौरान मेरी कोई मीटिंग नहीं हुई, बात नहीं हुई। कोई सीख समझाइश नहीं दी उन्होंने। मैं तो सोचता था ये मुझे जानते भी नहीं। शायद नाम भी न जानते हों। पर यहां तो कुछ और ही कहानी सुन रहा था। बोले कि तुम अच्छा लिखते हो। बहुत बढ़िया लिखते थे। बस एक कमी है तुममे, महात्वाकांक्षी बहुत हो। उनके ये शब्द आज भी मेरे कानों में अक्सर गूंजते हैं कि और तो सब ठीक है पर तुम महात्वाकांक्षी बहुत हो। फिर बोले महात्वाकांक्षी होना बुरी बात नहीं। मुस्कुराने लगे और बोले कि मस्त होकर काम करो। खुश रहो। जाओ। जब मैं जाने लगा तो बोले लिखते तो बढ़िया थे मैं पढ़ता भी था पर कभी कभी पीलीभीत से मेनका गांधी को हरवा देते हो….. पीलीभीत से मेनका को हरवा देते हो…उनका ये कथन उनका अंतिम और पुख्ता प्रमाण था, मानो वो जानबूझकर देना चाह रहे हों कि देखो मेरी नजर थी या नहीं तुम्हारे लेखन पर। उन्होंने जब ये बोला पीलीभीत वाली लाइन तो वहां बैठे लोग चक्कर में पड़ गए सिर्फ मैं ही समझ पाया और एक बार फिर दंग था कि लगभग 2 साल बाद भी एक इतने बड़े सम्पादक को मुझे जैसे छोटे औऱ छोटे क्या प्रशिक्षु पत्रकार की किसी खबर या लेख की पंक्तियां तक याद हैं। मैं मानो नतमस्तक हो गया उनके सामने। प्रशंसक हो गया उनका। पुरानी सारी गलतफहमियां, मालिक द्वारा उनके बारे में की गई नकारात्मक बातें, आरोप-प्रत्यारोप सब एकदम बकवास लगने लगे। मुझे लगा एक श्रेष्ठ सम्पादक के साथ जो खूबसूरत समय मैं बिता सकता था।मैंने गंवा दिया अन्जाने में।

मुझे लगने लगा क्या कमाल के व्यक्ति हैं कि सालों पहले कोई आर्टिकल निकला। उसकी लाइनें याद हैं। जबकि जो लिखता है उसे नहीं रहतीं। उनके मुख से ताऱीफ भी अपनी अच्छी ही लगी थी। यहां से समय घूम गया और मुझे लगा कि मैं किसी बरगद की छांव में हूं अब, जहां मैं सुरक्षित हूं। स्नेह औऱ सम्मान दोनों तरीकों से। बाद में मैंने सम्पादक जी के बारे में लोगों से जानने में दिलचस्पी ली। तो पता लगा कि ग्वालियर के नहीं बल्कि मध्यप्रदेश के वरिष्ठ और काबिल सम्पादकों में से एक हैं ये। मूलरूप से कानपुर निवासी। भयंकर पढ़ांकू। थियेटर आर्टिस्ट मजे हुए। सम्पादकीय लेखन में मानो कोई तोड़ ही नहीं। इनके सिखाए कई लोग बड़े संस्थानों में सम्पादक बने हुए हैं। आहिस्ता-आहिस्ता जानकारी मिलती रहीं। ज्यादातर सकारात्मक। पीने के शौकीन थे। वो निजी मामला था। पर धीर-गंभीर व्यक्ति। छोटा कर्मचारी हो या बड़ा पूरी अदब औऱ आदर से बातचीत। अच्छा लगने लगा उनकी संगति में आकर। उनको जानकर। झूमते झूमते दफ्तर में आते थे, कई लोग कहते मजाक में कि लगाए हुए हैं। पर मुझे फर्क नहीं पड़ता। हालांकि बाद में उन्हें यानि सम्पादक को इस संस्थान से बहुत गंभीर आरोप की जद में आकर नौकरी छोड़नी पड़ी या निकाला गया था शायद। ये यौनशोषण के आरोप थे। एक नहीं बल्कि दो महिला कर्मचारियों द्वारा। उनका इसी संस्थान में रहते भयंकर रोड एक्सीडेंट भी हुआ। बचते बचते जान बची। उनको अस्पताल में पाकर मैं बहुत भावुक हो गया था औऱ उन्होंने जब बोला तुम जाओ बेटा..तब मैं आया। लगभग रुआंसा होता हुआ। ये सब आगे की घटनाएं हैं। इन पर आगे के हिस्सों में चर्चा करेंगे। कैसे एक शानदार अखबार शुरू किया, बढ़िया टीम खड़ी की। पर कैसे औऱ क्यों सम्पादक पर आरोप लगे, उनका जाना औऱ नए सम्पादक का आना। दफ्तर में पोर्न देखने के कारण मेमोरी फुल हो जाना और आईटी वाले का आकर खुलासा करना कि कौन पोर्न देख रहा है। तमाम मजेदार घटनाएं हैं। आगे बताएंगे।

 

नोटः प्रिय पाठकों जैसा कि मैंने मिरर के फेसबुक पेज पर भी सूचित किया था। यहां पुनः सूचित कर दूं कि मेरी पत्रकारिता जीवन पर केंद्रित आत्मकथा द डायरी आफ अ यंग जर्नलिस्ट की ये सातवी कड़ी है। इससे पूर्व 6 कड़ियां मीडिया मिरर की वेबसाइट के जरा हटके कालम में प्रकाशित हो चुकी हैं। लेकिन अब डायरी की अगली कड़ी प्रकाशित नहीं होगी बेवसाइट में। दरअसल ईश्वर की कृपा से इस आत्मकथा के प्रकाशन अधिकार एक प्रकाशन संस्था ने लेने के लिए दिलचस्पी दिखाई है और उन्होंने निर्देशित किया है कि मैं इसको डिजिटल में प्रकाशित करना रोक दूं। प्रकाशकों की ये परम्परा है कि वो पूर्व प्रकाशित सामग्री को उचित नहीं मानते। तो ऐसे में आप लोग फिलहाल जैसा कि प्रत्येक सोमवार  द डायरी ऑफ अ यंग जर्नलिस्ट पढ़ते थे, अब नहीं पढ़ सकेंगे। मुझे इसी सप्ताह इस डायरी की सिनोप्सिस प्रकाशक को भेजनी है। उनको सब ठीक लगा तो एक सुंदर किताब के रूप में मेरी ये डायरी आपको पढ़ने को मिलेगी। अभी तक आपने अगर मेरी डायरी की कोई भी कड़ी पढ़ी होगी तो आपको पता ही होगा कि मेरे लिखने का संदर्भ क्या है। फिर भी मैं बता दूं कि मैं अपने दस वर्ष के पत्रकारिता जीवन को केंद्र में रखकर ये डायरी लिख रहा हूं। जिसमें पत्रकारिता की चर्चा है। प्रिंट मीडिया और डिजिटल मीडिया के हर अच्छे बुरे पहलू जानने को मिलेंगे। कुछ आम जीवन के रोचक किस्से हैं। आम जीवन है। एक युवा पत्रकार क्या क्या झेलता है। वो सब है। मूलरूप से पत्रकारिता के छात्रों के लिए और नए पत्रकारों के लिए ये डायरी बेहतर साबित हो सकती है। मैं कोई बेस्ट-वेस्ट सेलर बनने सनने के लिए नहीं लिखने वाला। बस कुछ काम की बातें हो तो मजा आ जाएगा।

आप कोई भी प्रतिक्रिया देना चाहें संदेश भेजे ह्वाट्सएप पर 99583-77353

किताब के संदर्भ में भी सुझाव दें तो स्वागत है।

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