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कुंभ, तकनीक, कैमरा और इतिहास रचते लोग

कुंभ
कुंभ
  • धनंजय चोपड़ा सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय

प्रयागराज में शुरू हुआ इस बार का कुंभ पहले से काफी अलग है। संगम पर हो रहा स्मार्टफोन युग का यह पहला कुंभ है। कुछ साल पहले हरिद्वार में हुए कुंभ के दौरान भी स्मार्टफोन प्रचलन में थे, लेकिन इनका जितना व्यापक प्रसार इस समय है, पहले नहीं था। संगम की रेती पर टेक्नोलॉजी का रोमांच कुछ अलग ही आभा देता है। यही वजह है कि इस रोमांच को हर कोई अपनी स्मृतियों में दर्ज कर लेना चाहता है और करे भी क्यों न, जब उसके हाथ में नई दुनिया का एक नायाब तोहफा ‘मोबाइल कैमरा’ हो।
इतिहास का यह पहला कुंभ मेला है, जिसमें लाखों या शायद करोड़ों कैमरे अपने समय के अद्भुत सच को दर्ज कर रहे हैं। बड़ा सच यह भी है कि ये केवल दर्ज नहीं कर रहे, बल्कि पूरी दुनिया के समक्ष अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत भी कर रहे हैं। कुछ उसे सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं, तो कुछ उसे तुरंत ही अपने दोस्तों-रिश्तेदारों के पास भेज रहे हैं। ये कैमरे सिर्फ फोटो ही नहीं खींच रहे, परिजनों को कुशलता के संदेश भी भेज रहे हैं। इन करोड़ों लोगों को यह एहसास शायद ही हो कि वे अनायास अपने समय के सबसे बडे़ सामाजिक उत्सव को आभासी दुनिया में भी अमर बना रहे हैं।
संगम की रेती पर लगने वाला कुंभ मेला दुनिया की सबसे बड़ी जन-जमघट का अप्रतिम दृश्य प्रस्तुत करता है। यह जन-जमघट ही है, जो धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और बाजार की सत्ता को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है और सब बिना किसी निमंत्रण के यहां भागे चले आते हैं। तमाम दुश्वारियों को धता बताते हुए अलमस्त-फक्कड़ साधुओं के संग कल्पवासियों की यह जमघट उस अजूबे को प्रस्तुत कर देती है, जिसे जानने और समझने के लिए दुनिया भर के शोधार्थी यहां पहुंचते हैं। वास्तविकता यह कि यहां गंगा-जमुना की लहरें संस्कृतियों का मेल-जोल बढ़ाती हैं। धर्म
आकाश के सभी चमकते सितारे सहजता से लोगों के समक्ष उपस्थित हो जाते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के गुर सीखने वालों में काया-कल्प की होड़ मच जाती है।
पग-पग पर रचनाओं का रेला सा लग जाता है। एक
ऐसा जन-समुद्र दिखने लगता है, जिसमें हर कोई
अपने को बार-बार खोकर फिर-फिर पाना चाहता है। यही वजह है कि हर किसी को यह मेला अपनी ब्रांडिंग का जरिया नजर आने लगता है।
वैसे इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पूरी दुनिया में लोग बरास्ते सोशल मीडिया अपने समय और समाज का इतिहास दर्ज करने में लगे हुए हैं। अबसे पहले न तो इतने अधिक लोग फोटो खींच रहे थे और न ही अपनी भावनाओं को शब्दों का रूप दे रहे थे। अपना परिवार, पारिवारिक और धार्मिक उत्सव, दफ्तर, यात्रा और बहुत कुछ लगातार आभासी दुनिया में दर्ज किया जा रहा है। कुछ फोटो, कुछ वीडियो, कुछ शब्द, कुछ इमोजी और सब कुछ यानी बहुत कुछ। यही तो है जनता द्वारा जन इतिहास का रचा जाना, यानी अपना इतिहास स्वयं रचते लोग। मोबाइल कैमरों के संग आभासी दुनिया का कैनवास लगातार बड़ा होता जा रहा है और उसमें हम, हमारा समय, हमारा समाज दर्ज होने को
आतुर सा है। तो फिर दुनिया की सबसे बड़ी जन-जमघट में क्लिक-क्लिक करते मोबाइल कैमरों की आतुरता कतई बेमानी नहीं है।
सच यह भी है कि इक्कीसवीं सदी के पहले बरस में ही प्रयाग में लगने वाले महाकुंभ मेले की रौनक ने यह जता दिया था कि अब हम हाईटेक होने जा रहे हैं। हमने तभी देखा था गंगा-यमुना की लहरों के संग अठखेलियां करती टेक्नोलॉजी को। अब तो उस दृश्य को बीते 18 बरस हो चुके हैं। तकनीक के कमाल ने हमें, हमारे
समय और हमारे टूल्स के संग हमारी सोच-समझ को
कुछ अधिक ही स्मार्ट कर दिया है। हम अधिक ‘शेयरिंग’ हो चुके हैं। जो हम देख रहे हैं, वह बिना किसी लाग-लपेट के सबको दिखा रहे हैं। यह पहला कुंभ मेला हो रहा है, जिसमें लगभग सबके हाथ में कैमरा है। तीर्थ यात्रियों के ही नहीं, साधुओं और संतों के हाथों में भी। लाखों कैमरे, लाखोंं सोच-समझ यानी लाखों दृश्य एक साथ दर्ज होते नजर आ रहे हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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