Home > रचनाकर्म > विश्वविद्यालय में हुई साक्षात्कार की नौटंकी

विश्वविद्यालय में हुई साक्षात्कार की नौटंकी

media mirror
media mirror

 एडीटर अटैकः प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर

.. अभी 6 फरवरी को ही यानी 2 दिन पहले ही फरीदाबाद स्थित एक सरकारी विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के लिए साक्षात्कार देने गया था। पत्रकारिता विभाग में अध्यापन के लिए विज्ञापन निकाला था विश्वविद्यालय ने। अपन वही पढ़कर पहुंचे थे। वाक इन इंटरव्यू था। रिज्यूमे के साथ सभी दस्तावेज, अनुभव प्रमाण-पत्र, शोध पत्र की मूल प्रतियों के साथ बुलवाया गया था। 2 पासपोर्ट साइज तस्वीर भी मांगी थीं। विज्ञापन में ये भी लिखा था कि अगर आपका चयन किया गया तो आपको तत्काल ज्वाइन करना होगा। पद की संख्याओं का जिक्र नहीं था विज्ञापन में। हां योग्यता में नेट, पीएचडी अनिवार्य था। सैलरी वही यूजीसी नियमानुसार।

तो भाई अपन पहुंच गए। कागज-वागज लेकर। शर्ट-वर्ट दबाकर। वीसी सचिवालय का पता दे रखा था। हम निर्धारित समय में पहुंचे। उस समय कोई अन्य प्रतिभागी नहीं आया था। वीसी के सचिव से बात की तो उसने कहा कि सर बैठिए। अभी मैं बात करता हूं। बात की उसने। कहा की आप पीआरओ दफ्तर जाइए। अपन वहां पहुंचे। कुछ देर बैठे तो एक सुंदर सी मैडम जी ने कहा आप लोग रिज्यूमे लाए हैं तो दे दीजिए। तब तक एक अन्य साथी भी पहुंच गए थे। तो ऐसे हम दो हो गए। तो दोनों लोगों ने अपने रिज्यूमे दिए। दूसरा साथी भी सूट-बूट में ही था। हालांकि मेरा ब्लेजर लालकिला वाला था। उसका ओरिजनल रेमंड का। खैर रिज्यूमे देखने के बाद मैडम बोलीं कि हमारे विश्वविद्यालय का एक फॉर्मेट है। आप उसमे डिटेल भर दीजिए। थोड़ी देर में हमें वो फार्मेट दिया गया। वो भी एक तरह का रिज्यूम का ही फार्मेट समझिए। उसमें नाम, पता, बोर्ड परीक्षाओं से लेकर स्नातक, स्नातकोत्तर में कितने प्रतिशत नम्बर और कौन सी श्रेणी मिली। इसको भरना था। साथ ही अपना पेशेवर अनुभव। उस फार्म को मैंने भरा और दे दिया। उसके बाद हम दोनों लोगों को वही सुंदर वाली मैडम जी ने कहा कि चलिए वीसी बोर्ड रूम में साक्षात्कार होगा। हालांकि वो अंग्रेजी में भी खिटिर पिटिर कर रही थीं। वो आगे-आगे हम पीछे-पीछे चल दिए वीसी बोर्ड रूम। हम दोनों लोगों को एक जगह बैठने को कहा गया। मैं देख रहा था कि मेरे साथ वाला व्यक्ति जो कि मुझसे उम्र में काफी बड़ा था, काफी नर्वस था। दाढ़ी-वाढ़ी बकायदा क्लीन करके आय़ा था। एकदम प्रेस व्रेस लकालक कपड़े। मैं बगल में ही था। पर मुझसे कोई बात नहीं की उसने। जबकि मैंने ही नमस्कार करते हुए अपना नाम बताया तो बदले में उसने अपना नाम बताया। वो अब मुझे भूल गया। मैं समझ गया था कि ये इस मानसिकता का व्यक्ति है कि कम्पटीटर से ज्यादा खुलना नहीं है। मैंने पानी की बॉटल निकाली औऱ पानी पिया और फिर उसे भी पानी के लिए कहा। उसने मना कर दिया। तब तक सुंदर वाली मैडम आईं, कहा कोई एक चले। संयोग से वही गया जो नर्वस था। साक्षात्कार के लिए पहला कैंडीडेट कभी साक्षात्कार कर्ताओं की ओर से राहत भी पा सकता है और कभी मुश्किल में भी घिर सकता है। दोनों स्थितियों की संभावनाएं होती हैं। साक्षात्कार लेने वाला भी एक दो साक्षात्कार के बाद ही सेट हो पाता है कि आखिर पूछना क्या है, और कैंडीडेट का मिजाज क्या है। और कभी कभी पहले ही कैंडीडेट पर पूरा ज्ञान उतर जाता है। खैर वो जनाब गए औऱ बमुश्किल 15 मिनट में आ गए। मैं बस इतना पूछ पाया कि ठीक हुआ सब, जब तक प्रतिउत्तर में उसने मुंडी हिलाई मुझे बुलाने आ गईं वही…वाली मैडम।

हां रिज्यूमे मैडम ने हमे ही दे दिए थे, जिसमे सभी कागजात की फोटोकॉपी भी अटैच थे। वो मुझे खुद देने थे। गेट खोला मे आई कम इन बोला और घुस गए। वहां पांच लोग बैठे थे। पूरे ईडी दफ्तर टाइप, राउंडिंग टेबल में। जिनमें तीन महिलाएं और 2 पुरुष। सुंदर वाली मैडम समेत। अपन नर्वस बगैरह नहीं होते अब। ये सब पंगत देखना रोज का काम है। जितनी पत्रकारिता में नौकरी कर ली, मिलेट्री में होते तो रिटायर होने वाले होते तीन चार साल में। 2008 से सक्रिय पत्रकारिता में हैं अपन। सीना तानकर बैठे थे अपन पैनल के सामने। एक फार्म आय़ा कहा कि इसमे साइन कर दो। साइन कर दिया। उसके बाद एक सर थे उन्होंने अंग्रेजी में पूछा टेल मी समथिंग अबाउट योर सेल्फ..औऱ तुरंत ही उसका हिंदी करके बोला अपने बारे में कुछ बताइए और रिज्यूमें मेरा उनके हाथ में था। अपन शुरू हो गए आंखों में आंखे डालकर। फलां जगह काम किया, फलां जगह से शिक्षा ली। हिंदी में सब बता रहे थे हम। सब सुन रहे थे। फिर एक मैडम ने अंग्रेजी में पूछा पढ़ाई कहां से की। मैंने हिंदी में ही बताया कि फलां फलां जगह से। एक औऱ मैडम अंग्रेजी में बीच बीच में बोलती जातीं। इसी बीच एक मैडम अंग्रेजी में बोली आर यू कम्फरटबल इन इंग्लिश।

लो भइया मतलब लाल किला का ब्लेजर का काम तमाम हो गया यहां। समझ गया पैनल की ये ठोस हिंदी वाला है। तो पूछ ही लिया कि भैय्या अंग्रेजी नहीं आती क्या। जैसे ही पूछा मैने कहा नहीं मैं अंग्रेजी में सहज नहीं हूं। आगे मैने बोला कि मेरे घर में कोई अंग्रेजी नहीं बोलता, मैंने अपनी पूरी पढ़ाई हिंदी माध्यम से की है। सरकारी हिंदी स्कूलों से की है। बीए, एमए की परीक्षा भी हिंदी माध्यम से दी। 12 सालों से भले ही देश के शीर्ष अखबारों में काम किया, पर वो हिंदी के थे। दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी। और संयोग से अब पीएचडी भी हिंदी में ही लिखी। डिक्टो यही बोला अपन ने पैनल से फुल कान्फीडेंस में। तो भाई जब हर जगह हिंदी चलती आई है तो अंग्रेजी कहां से चढ़ जाए एकदम ज़बान में। मैंने साक्षात्कार करने वालों को बोला कि ऐसा नहीं है कि मैं अंग्रेजी समझता नहीं, अंग्रेजी पढ़ नहीं सकता औऱ बोल नहीं सकता। पर धाराप्रवाह नहीं है और कहीं ग्रामेटिकल गलती हो सकती है। लेकिन मैं सुधार लूंगा ये भी बोला मैंने उनसे। जब मैंने इतना बोला तो अंग्रेजी वाली मैडमे सब हिंदी में उतर आईं और मुझे पूरी तसल्ली से सुनने लगीं। भाई अपन ने कभी एकेडमिक इंटरव्यू तो दिए नहीं थे। इसलिए हमें तो यही लगने लगा कि अपन यहां लेक्चर देने आए हैं। क्योंकि लेक्चर का अपना पुराना अनुभव है कॉलेज औऱ विश्वविद्यालयों का। खैर तो बात सुनी तो मैडम बोलीं कि हिंदी की जानकारी होना डिसएडवांटेज नहीं है लेकिन अंग्रेजी जानना भी जरूरी है ताकि बच्चों को अंग्रेजी और हिंदी दोनो भाषाओं में आप समझा सकें। क्योंकि किताबें तो अंग्रेजी में ही हैं और यहां ज्यादातर छात्र अंग्रेजी माध्यम के हैं। उनके सुर में सुर दूसरी मैडम ने भी मिलाया। जो मुख्य सर थे वो बोले आपकी हिंदी का भी हमलोग लाभ लेंगे। मतलब औऱ किसी पहलू पर कोई बात नहीं कि आपका काम क्या है। पीएचडी का टॉपिक क्या है। अखबारों में क्या करते हैं। मतलब सारी जद्दोजहद अंग्रेजी में आकर अटक गई। फिर मुझे सर ने दो तीन पेज दिए औऱ कहा ये हमारे विषय हैं। आप देखिए किसे पढ़ा पाएंगे। तीन पेज थे, जिनमें तीन विषय और उनकी युनिट लिखी थीं अंग्रेजी में। पहला विषय मीडिया परफार्मेंस एंड कल्चर, दूसरा विषय फोटोग्राफ्री टेक्निक औऱ तीसरा सिनेमा।

सर बोले कि देख लो आराम से औऱ बताओ कि तुम क्या पढ़ा सकते हो। देखा मोटा मोटी और बताया कि मीडिया परफार्मेंस एंड कल्चर पढ़ा लूंगा सही से। क्योंकि उसमें कॉपी और एडीटिंग आदि के टॉपिक थे। सिनेमा पर अपना कोई ज्ञान नहीं, फोटोग्राफी की बात करें तो कभी कैमरा ही नहीं पकड़ा। मैंने बोला उनसे मीडिया परफार्मेंस तो एक मैडम बोली सिनेमा देखिए। सिनेमा पढ़ा लें तो। अरे हद है भाई। मैंने 10 साल जिस विधा में काम किया है। मैं उसको पढ़ा पाऊंगा कि हलुआ पूड़ी है कुछ भी। मतलब हद है पैनल। सिनेमा पढ़ा लीजिए। मैम बोली किताब में लिखा होगा आपको बस पढ़ाना है। उनकी बात खत्म होती दूसरी मैडम बोल पड़ीं कि फोटोग्राफी पढ़ा दीजिए। ये सुंदर वाली मैडम थीं। मैंने बड़ी गौर से देखा। मुझे ये बड़े हल्के लोग लगे अब। मुझे लग ही नहीं रहा था कि एक राज्य सरकार के विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए प्रोफेसर चयन के लिए ये पैनल बैठा है। मैंने बोला मैम मैं अखबारों में काम कर रहा हूं। रिपोर्टिंग की, अब 5 सालों से डेस्क पर कॉपी एडीटर हूं। कैमरा कभी छुआ नहीं। कैमरा तकनीक क्या पढ़ाऊंगा। वो फिर बोलीं वो व्हाइट बैलेंस आदि बता दीजिएगा। मैंने सोचा मतलब इनको कुछ जानकारी ही नहीं है फील्ड की। विश्वविद्यालय में मीडिया शिक्षकों के ये हाल हैं। मीडिया के शिक्षक की तलाश जारी है। रिपोर्टर से कह रहे हैं कि फोटोग्राफी सिखाओ। तो कोई कैमरामैन आएगा तो कहेंगे कि रिपोर्टिंग सिखाओ। तो भैय्या हो गया छात्रों का कल्याण। जै जै। मैं अबतक समझ चुका था कि यहां का भगवान मालिक है। और मेरे स्वभाव से पैनल भी समझ गया कि इसका साक्षात्कार ओवर कर दो। अपन बाहर आ गए। फिर वही नर्वस वाले भाइसाहब के बगल में जा बिराजे। अब वो बोले क्या हुआ। मैंने कहा क्या क्या हुआ। ठीक हुआ सब। इतना सुनकर वो और घबड़ा गया। फिर एक मैडम आईं बोली कि आप लोगों को कुलपति जी से भी मिलना है। वो भी साक्षात्कार लेंगे। बगल वाले भाई तो तन गए। ठीक है कुलपति का प्रोटोकाल है। अपन आदर करते हैं। पर अपन ने अबतक एडीएन बाजपेयी, मेजर जनरल एसएन मुखर्जी, कृष्ण बिहारी पांडेय, एनसी गौतम, केडी मिश्रा आदि कुलपतियों के सानिध्य में शिक्षा ली। तो कुलपतियों से नर्वस नहीं होते। कुलपित केडी मिश्र तो मीडिया मिरर के एडवाइजर पैनल के सदस्य भी हैं। कुलपति दरबार में भी पहले मेरे पड़ोसी गए.. वही नर्वसनेस। गए 10 मिनट में निकल आए। तुरंत अपन गए। फिर वही मे आई कम इन। इतनी ही अंग्रेजी अपन बोलते ही हैं तो फिर बोल ही दो। वहां एक मैम भी थी जो पैनल में भी थीं। वही बोली आ जाओ। अपन खड़े हो गए कुलपति के समक्ष नमस्ते करके। कुलपति बोले बैठ जाओ। बैठ गए। कुलपति जी बोले फ्रॉम वेयर। इतना धीमे बोले कि सिर्फ फ्राम सुनाई दिया। तुक्का लगाया कि यही है कि कहां से हो। अपन फिर हिंदी में शुरू हो गए कि दिल्ली से आए हैं। फिर कुलपति अंग्रेजी में बोले अवाउट योर सेल्फ। फिर अपन बताने लगे हिंदी में। वो सुनने लगे। समझ गए हिंदी वाला है। हिंदी में आ गए, बोले कहां काम कर रहे हो। बताया हमने। फिर बोले पीएचडी कहां से की। बताया। फिर वही चिरांद… अंग्रेजी में दिक्कत है। फिर वही जवाब हमारा। हां सर दिक्कत है। अंग्रेजों जैसी अंग्रेजी नहीं आती। हिंदी माध्यम के छात्र और अब हिंदी के ही कर्मचारी हैं। तो बोले कि लेक्चर तो दोनो भाषाओं में होंगे। मैंने कहा कि वो हो जाएगा। हालांकि कुलपति की गरिमा अलग होती है। कुलपति मैडम से बोले कि मैडम हिंदी में इनके लिए कुछ हो सकता है। मैडम बोलीं कि सर हो तो सकता है लेकिन जो अंग्रेजी वाले छात्र हैं वो रोएंगे दुखड़ा। शब्दशः यही शब्द थे मैडम के। कुलपति औऱ मेरे सामने। कुलपति ने मुझे देखा औऱ बोला कि कुछ बोलकर दिखाओ, प्रजेंटेशन टाइप। बोला हमने। 5 मिनट सुना होगा बोले ठीक है। जाइए, कुछ होगा तो कॉल करेंगे। मतलब कुलपति जी को भी न मेरे अनुभव से मतलब था, न मेरे शोध पत्रों से, न मेरी पीएचडी के टॉपिक से, न मेरे अतिरिक्त मीडिया गतिविधियों से। सब शून्य सब अंग्रेजी, अंग्रेजी औऱ अंग्रेजी। लगा मुझे ये कि कह दूं कि किसी कान्वेंट स्कूल के दसवी पास बच्चे को बुला लीजिए औऱ किताब देकर लेक्चर दिलवा लीजिएगा। पर मैंने सोचा ज्यादा हो जाएगा। कुलपति साइंस के प्रोफेसर थे। उन्हें कुछ ज्ञान नही था पत्रकारिता का। मतलब 5 लोगों के पैनल और एक कुलपति का कुलमिलाकर यही साक्षात्कार था। जिसमे केंद्र में अंग्रेजी थी। मतलब अब जबकि एक बड़े स्तर पर ये मांग की जा रही है कि खासतौर पर मीडिया अध्यापन के लिए फील्ड में काम कर चुका व्यक्ति ज्यादा कारगर होगा, एक ऐसे दौर में मैंने देखा कि उनको कोई ज्ञान ही नहीं है। आपके कितने भी शानदार कामकाजी अनुभव से उन्हें कोई लेना देना नहीं। गलती उनकी भी नहीं। क्योंकि ये सब किताबी कीड़ा हैं। नेट औऱ पीएचडी करके आने वाले। जब मैं इस विश्वविद्यालय के लिए चला था, उससे पहले ही यहां की सभी मीडिया फैकल्टी के रिज्यूमे खंगाल लिए थे। ये सुंदर वाली मैडम मुझे भले न जानती हों मैं इनका रिज्यूमे दो दिन पहले देख चुका था। एक रिसर्च पेपर पब्लिश था इनका और एक साल का टीचिंग एक्सपीरिएंस और 5 साल का फील्ड अनुभव। वो किन अखबारों या चैनलों का कोई जिक्र नहीं। इतने अनुभव वाले के लोगों के मैंने साक्षात्कार लिए हैं और वो मेरा ले रही थीं कि आप फोटोग्राफी पढ़ाइए।

चूंकि दुनियादारी है मुझसे एक शुभचिंतक ने कहा था कि सर आप साक्षात्कार दीजिए तो बताइएगा कुलपति हमारे मित्र हैं। आपके लिए कह देंगे। मैंने उनको बोला था कि ठीक है साक्षात्कार दे लें उसके बाद आपकी मदद लेंगे। पर मुझे लगा यहां सिफारिश करवाके क्यों किसी के एहसान तले दबना। जहां सिनेमा वाला प्रिंट मीडिया पढ़ाए औऱ प्रिंट मीडिया वाला सिनेमा।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और आकर्षण है। उसको भी जान ही लीजिए। दरअसल मुझे जब वीसी सचिवालय से पीआरओ रूम जाने को कहा गया, वहां नर्वस वाले भाईसाहब तो बैठे ही थे। वहीं एक लड़की भी फुदक रही थी। लेकिन न तो वो फैकल्टी की थी और न ही वो साक्षात्कार देने वाली लग रही थी। क्योंकि साक्षात्कार वाले तो हम दो ही थे। जो साथ बैठे थे। हां लेकिन उसकी गतिविधियां बता रही थीं कि वो भी साक्षात्कार देगी। वो जो हमने जिक्र किया न सुंदर वाली मैडम जी का। वो यहां फैकल्टी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। ये लड़की उनकी ही छात्रा या परिचित थी। ये लड़की रही हमारे इर्द-गिर्द ही रही, पास साथ नहीं बैठी। या कहें कि जानबूझकर ऐसा किया गया। उसे सुंदर वाली मैडम अलग जगह बैठाकर खुद ही बता रही थीं कि ऐसे भरो। रिज्यूमें में ये करो आदि आदि। मुझे तभी शक हुआ था। जब हम दोनों नर्वस औऱ मैं सुंदर मैंडम के पीछे पीछे साक्षात्कार के लिए चल रहे थे, तब ये लड़की हमारे साथ चल रही थी और इसने पूछा मुझसे आप इंटरव्यू देने आए हैं। मैंने कहा हां और इतना पूछकर किनारे गई, ताकि मैं कुछ न पूछ लूं। जब हम लोग साक्षात्कार के लिए अपने बारी का इंतजार कर रहे थे, तभी हम दोनों से पहले इसका इंटरव्यू कर लिया गया था। और हमें पता भी नहीं चला। पता जब चला जब साइन सीट देखी तो उसमें तीसरा नाम भी था। जबकि तीसरा एलीमेंट बिल्कुल अलग रखा गया औऱ उसका पक्ष खुद विश्वविद्यालय की फैकल्टी ले रही थी। ये किसी निजी विश्वविद्यालय शायद एमिटी की छात्रा थी, जिसने हाल ही में नेट बगैरह निकाला होगा। एकदम फ्रेशर, पर वही अंग्रेजी में खिटिर पिटिर सुंदर मैम के साथ चालू थी। मुझे एहसास तो था कि यही एलीमेंट है जिसका यहां पर होना है और ये वाक इन इंटरव्यू एक ढोंग है महज सरकारी रिकार्ड के लिए। ताकि कोई उंगली न उठाए कि ऐसे ही किसी को गेस्ट फैक्लटी में रख लिया। अब पूरी प्रक्रिया का रिकार्ड तो था ही। तो दरअसल जो नौटंकी यहां चल रही थी वो कोई नई बात नहीं थी। यही होता है विश्वविद्यालयों में। सब फिक्स होता है किसे रखना और रखवाना है। ऐसे ही एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हुआ था कि सभी बेचारे कैंडीडेट परेशान एक साथ लाइन में बैठे इंतजार कर रहे थे। एक महोदय कुलसचिव के दफ्तर में चाए पी रहे थे औऱ गप्पे हांक रहे थे। मालूम हुआ वो भी साक्षात्कार देने ही आए हैं। और बाद में उनका ही हुआ भी। तो यहां ये भी अनुभव हुआ। और मेरा दावा है कि वही लड़की जिसके लिए कुलपति से लेकर पूरा पैनल फील्डिंग कर रहा था, वही चयनित होगी। कुलपति का जिक्र इसलिए किया क्योंकि मैनें कुलपति दफ्तर से निकलते ये सुन लिया कुलपति को मैडम से बोलते कि मैडम वो आप जिस लड़की का बोल रही थीं वो हमारे लिए बेस्ट रहेगी। यानि दूसरी मैडम भी जानती थीं कि किसको लेना है।

मतलब लुब्बोलुआब..अच्छा लुब्बोलुआब थोड़ा कठिन शब्द है। मतलब निष्कर्ष ये है कि आपका काम क्या है, आपकी काबीलियत क्या है, आपके अनुभव क्या हैं। सब गया तेल लेने। अंग्रेजी सीख लो दबाके। कसम से नौकरी मिल जाएगी। या फिर सिफारिश हो तगड़ी वाली। सिफारिश से भी पहले अंग्रेजी। अब चूंकि पढ़ाना तो विश्वविद्यालय में ही है तो अपन तो अब सीखेंगे ही अंग्रेजी। काहे से अल्बर्ट आइंसटीन कहते हैं कि जब सब आता है और किसी एक चीज के चलते कमतर आंका जाए तो उसे घोंटकर पी जाना चाहिए। आओ अंग्रेजी अब तुम्हारी खैर नहीं……. और एक बात मुझे विश्वविद्यालय के अंदरूनी सूत्रों से मिली कि उन्हें रखना जिसको था वो तो तय था, बस किसी एक कमी के चलते टॉरगेट करना था दूसरे प्रतिभागियों को, वरना उस विश्वविद्यालय में जितनी भी फैकल्टी हैं सभी हिंदी में लेक्चर देती हैं। तो ये हाल हैं विश्वविद्यालयों के।

( एडीटर अटैर मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है)

 

 

 

 

 

 

Share this: