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बीबीसी की महिला पत्रकार ने दी महिला नेताओं को नसीहत

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बीबीसी हिंदी की ओर से हाल ही में दिल्ली में महिला नेताओं का एक सम्मेलन आयोजित किया गया था। उस सम्मेलन के संदर्भ में बीबीसी की पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान की फेसबुक टिप्पणी। जो पब्लिक कार्यक्रमों में वक्ता के रूप में जाने वाले अतिथियों को जरूर पढ़ना चाहिए। 

 

पत्रकारिता में मैं नेताओं के इंटर्व्यू लेने के लिए नहीं आयी थी और ना ही उनसे संबंध बनाने. हाँ, एक विनम्रता का संबंध तो होता ही है. इसलिए ही मैं ये पोस्ट लिखने की जुर्रत कर रही हूँ.

हमारे समाज में या तो लड़कियाँ ख़ुद राजनीति में दिलचस्पी नहीं लेतीं या उन्हें इसके लायक समझा नहीं जाता. ये ज़ाहिर बात है. जो महिलाएँ राजनीति में हैं भी, उनके संघर्ष पुरुषों के अपेक्षा अलग होते हैं. चाहे मायावती हों, जयललिता हों या ममता बैनर्जी. ये तो फिर भी ऐसी मिसालें हैं जिन्होंने शुरू से शुरू किया. आज के वक़्त में बहुत सी राजनेत्रियाँ सिर्फ़ प्रतीक भर हैं अपनी पार्टी में.

ऐसे में जब हमने सोचा कि एक ऐसा इवेंट करते हैं जिसमें हम सिर्फ़ महिला राजनेताओं से उनकी यात्रा और चुनौतियों पर बात करेंगे तो मुझे काफ़ी उम्मीद थी हमारी नेताओं से. सरपंच से लेकर मुख्यमंत्रियों से पूछा गया. मुसलमान, दलित, राजनीतिक परिवार, ग़ैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि, हिंदी पट्टी के सभी राज्यों की कोई प्रतिनिधि, लड़ कर हार गयी नेताओं को बुलाने की कोशिश की.

हालाँकि ऐसा कोई भी इवेंट हो, उसको आयोजित करना और उसमें शिरकत करना एक ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए लेकिन फिर भी मुझे उन नेताओं से शिकायत नहीं जो किसी काम के चलते शुरू में ही मना कर गयीं.

मेरी शिकायत उनसे है जो पहले हां करके इवेंट से एक दिन पहले बिना किसी वजह के पीछे हट गयीं. अपने सेशन से एक घंटा पहले आतिशी मार्लेना कह रहीं हैं कि मैं नहीं आऊँगी क्योंकि मैं कुछ और काम कर रही हूँ. मीसा भारती को भी एक दिन पहले याद आया कि वो नहीं जाएँगी इवेंट में. उमा भारती जैसी वरिष्ठ नेता को भी एक दिन पहले ही ये ध्यान आया कि उन्हें कुछ और काम है. अगर हमने इवेंट में एक-एक घंटा सिर्फ़ आपसे बात करने को रखा हो तो फिर आपके ऐन मौक़े पर पीछे हट जाने पर हम क्या करें?

बेशक मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं और मैं चाहूँगी कि लोग आपको आपके काम के लिए ही जज करें. लेकिन जब आप किसी को आने के लिए हाँ करते हैं तो वो आपसे कांट्रैक्ट साइन नहीं करवाता बल्कि सिर्फ़ आपकी बात पर भरोसा करता है. आप चाहें तो एक हफ़्ता पहले भी मना कर सकती थीं ताकि आपकी जगह किसी और से पूछा जा सके लेकिन आपने सामने वाले को अपने सामने कुछ नहीं समझा. ना उनके वक़्त को और ना उनकी मेहनत को. कम से कम अपने वायदे की क़ीमत को बचाए रखिए. जैसे आपकी ऑफ़-रिकॉर्ड बातों को अपने तक रखने का एथिक हम बचाए रखते हैं.

मेरी लिस्ट में इन सभी नेताओं की पार्टियों के कार्यकर्ता दोस्त हैं. आप ज़रूर उन तक ये संदेश पहुँचा दें कि अगर आप महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं तो अपनी कमिटमेंट को समझिए. लीडर और निडर बनने का सफ़र लंबा है.

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