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पुलवामा के बाद भड़काने वाली पत्रकारिता से किसका भला?

भारतीय टीवी मीडिया
इस कोलाज को अबतक हजारों लोग शेयर कर चुके हैं। औऱ कह रहे हैं ये मूर्ख बनाने वाले लोग हैं।

टीवी पत्रकार रहे मुकेश कुमार ने ये आलेख बीबीसी के लिए लिखा, महत्वपूर्ण है। इसलिए हम साभार प्रस्तुत कर रहे हैं। मिरर के पास इतना आर्थिक सम्बल नहीं कि हम बड़े पत्रकारों से सीधे तौर पर लिखवा सकें इसलिए हमे कोई आवश्यक सामग्री दिखती है तो उसमें हमें क्रेडिट के साथ जरूर आपको पढवाते हैं। 

भारत-पाकिस्तान के बीच जिस तरह के रिश्ते हैं उसमें मीडिया कवरेज कभी भी संतुलित और ऑब्जेक्टिव नहीं रहा. ये भी सही है कि जंग और युद्धोन्माद जैसा कुछ नहीं बिकता.

वह सुपरहिट मसाला होता है और दुनिया भर का मीडिया इसका इस्तेमाल अपनी लोकप्रियता और मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए करता रहा है. भारत और पाकिस्तान का मीडिया भी यही कर रहा है.

इसके बावजूद कहा जाना ज़रूरी है कि 14 फ़रवरी को पुलवामा में सीआरपीएफ़ के 40 से अधिक जवानों की मौत के बाद से अब तक का मीडिया कवरेज पत्रकारिता के नए गर्त को छूने वाला रहा है.

उसने पत्रकारिता की तमाम नियंत्रण रेखाओं का उल्लंघन करके ख़ूब बदनामी कमाई है. इसमें कोई संदेह नहीं, ये पत्रकारिता के लिए सबसे बुरा वक़्त है.

यही वज़ह है कि आज बड़बोले और भड़काऊ ऐंकरों को खलनायकों की तरह देखा जा रहा है. उनकी चहुँ ओर निंदा-भर्त्सना हो रही है.

उनके कर्मों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया की खिल्ली उड़वाई है. लेकिन ये बात केवल भारतीय मीडिया पर ही नहीं, पाकिस्तानी मीडिया के लिए भी उतनी ही सही है. कमोबेश उसका भी वही हाल रहा है.

टीवी पर चीखते, बदला लेने के लिए जनता को उकसाते और सरकार पर दबाव बनाते टीवी चैनल ख़ून के प्यासे हो गए हैं.

उन्हें शांति की हर बात नागवार गुज़र रही है. वे हर उस आवाज़ को तुरंत दबाने के लिए तैयार बैठे हैं जो अंधराष्ट्रवाद और युद्ध का विरोध करती दिखाई पड़ती है.

एकतरफ़ा कवरेज

पिछले एक पखवाड़े में मीडिया ने झूठ और अधकचरेपन के नए कीर्तिमान रच डाले हैं. उसने दिखाया है कि वह कितना ग़ैर ज़िम्मेदार हो सकता है और ऐसा करते हुए उसे किसी तरह की शर्म भी नहीं आती. एकतरफ़ा और फर्ज़ी कवरेज की उसने नई मिसालें कायम की हैं. उसने उन पत्रकारों को शर्मसार किया है जो पत्रकारिता को एक पवित्र पेशा समझते हैं और उसके लिए जीते-मरते हैं.

सच तो ये है कि इस दौरान वह मीडिया की तरह काम कर ही नहीं रहा था. वह एक प्रोपेगंडा मशीन में तब्दील हो गया था. वह सत्ता और उसकी विचारधारा के साथ खड़ा था, उसका प्रचार-प्रसार कर रहा था. बिना हिचक के देशभक्ति के नाम पर युद्धोन्माद फैला रहा था.

पत्रकारिता के सर्वमान्य उसूलों की उसने ज़रा भी परवाह नहीं की. उसने मनगढ़ंत और अपुष्ट ख़बरें इस तरह से प्रसारित कीं मानों वे ब्रह्म सत्य हों. पुलवामा हमले से जुड़े उसके अधिकांश ब्यौरे ग़लत साबित हुए. न तो वहाँ साढ़े तीन सौ किलो विस्फोटक इस्तेमाल हुआ था और न ही वह वाहन जिसका वह ढिंढोरा पीट रहा था.

इसके ठीक पाकिस्तानी मीडिया पुलवामा की आतंकवादी घटना की निंदा करने के लिए भी तैयार नहीं दिखा. जैश-ए-मोहम्मद द्वारा हमले की ज़िम्मेदारी ले लेने के बावजूद उसके लिए ये ख़ून-खराबा कश्मीरियों की आज़ादी की लड़ाई थी. यही नहीं, उसने इस तरह के संदेह भी ज़ाहिर करने शुरू कर दिए मानो भारत के सत्तारूढ़ दल ने ही चुनाव जीतने के मक़सद से ये कांड करवाया हो.

पुलवामाइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES

सवाल करना भूली मीडिया

पुलवामा हमले के बाद सिलसिला शुरू हुआ भावनाओं को उभारने का. भारतीय मीडिया ने ख़ास तौर पर जवानों के शवों और अंतिम संस्कार के दृश्यों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया.

ज़ाहिर है कि इसका लाभ सत्तारूढ़ दल को मिलना था क्योंकि उसके नेता अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुँच रहे थे. सैनिको के परिजनों से वे बदला लेने के बयान दिलवा रहे थे.

दुर्भाग्य ये रहा कि मीडिया सवाल करना बिल्कुल भूल गया जबकि उसका ये सबसे बड़ा काम है.

उसे याद नहीं रहा या फिर उसने ये भूल जाना ठीक समझा कि ज़रा ख़ुफ़िया एजंसियों की नाक़ामी के बारे में भी सवाल करे. सरकार से पूछे कि जवानों और सेना के कैंपों पर एक के बाद एक बड़े हमले हुए हैं मगर वह कुछ कर क्यों नहीं पा रही?

लेकिन ऐसा करने के बजाय वह उन लोगों को धमका रहा है जो इस तरह के सवाल करने की ज़ुर्रत कर रहे हैं. वह उन्हें सीधे या परोक्ष रूप से पाकिस्तान समर्थक और गद्दार तक ठहरा रहा है.

कई पत्रकारों के टेलीफोन नंबर सार्वजनिक कर दिए गए, जिन पर उन्हें धमकियाँ दी जाने लगीं. सोशल मीडिया में उन पर भद्दी गालियों की बारिश होने लगी.

हिंदी के ही नहीं, अँग्रेज़ी के चैनल भी इस घृणित अभियान में संलग्न हैं. रिपब्लिक टीवी इन सबमें बाज़ी मार रहा है. ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी, टाइम्स नाऊ, सबके सब राष्ट्रोन्माद फैलाने में लगे हुए हैं. प्रिंट मीडिया में थोड़ा संयम दिख रहा है, मगर दैनिक जागरण और कुछ क्षेत्रीय अख़बार भी उन्मादी तेवर अपनाए हुए हैं.

अख़बारों और चैनलों दोनों की भाषा एकदम से बदल गई है. वह बेहद सनसनीखेज़, उत्तेजना और उन्माद से भरी हुई है. कई ऐंकरों की भाषा तो गालियों की सीमा छूने वाली है. वे पाकिस्तान को शैतान, दोगला, जैसे शब्दों से संबोधित कर रहे हैं. पाकिस्तान में भी भारतीयों के लिए इसी तरह की ज़ुबान बोली जा रही है.

फर्जी ख़बरों ने तूल पकड़ा

पुलावामा हमले के बारह दिन बाद जब भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट पर हमला किया तो युद्धोन्मादी तेवरों का नया चरण शुरू हो गया.

भारतीय मीडिया मानो उत्साह से लबरेज हो गया. मानो उसे मुँहमाँगी मुराद मिल गई हो. ऐंकर स्टूडियो में ताल ठोंकने लगे, भुजाएं फड़काने लगे और गाल बजाने लगे. वे युद्ध-युद्ध की माँग तक करने लगे.

इस बार भी मीडिया ने तथ्यों और तर्कों की परवाह नहीं की. सेना ने मारे जाने वाले लोगों की संख्या नहीं बताई थी, मगर वे ‘350 आतंकवादियों’ के मारे जाने की ख़बर चलाने लगे.

हमले का कोई वीडियो तो था नहीं लिहाज़ा पुराने फुटेज का इस्तेमाल करने लगे. ग्राफिक्स के ज़रिए भ्रम पैदा करने लगे.

ये पूरा फर्ज़ीवाड़ा तब तक चलता रहा जब तक कि उनकी सचाई सामने नहीं आने लगी और अब तो अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजंसियों और मीडिया संस्थानों ने पुष्टि कर दी है कि न तो वहाँ कोई ट्रेनिंग कैंप था और न ही कोई मारा गया है. केवल एक कौए के मारे जाने की बात सामने आई है.

बहरहाल, भारतीय मीडिया ने अगर इस हमले का जश्न मानाया तो पाकिस्तानी मीडिया पाकिस्तानी हमले के बाद जश्न के मूड में आ गया. वहाँ भी टीवी स्टूडियो में उन्माद से भरी गरमागरम बातें होने लगीं. ऐंकर भारत को सबक सिखाने और ईंट का जवाब पत्थर से देने के जुमले दोहराने लगे.

भारतीय पायलट अभिनंदन की गिरफ्तारी और रिहाई इस सीरियल की अगली कड़ी थी. इसको भी भारतीय चैनलों नें उन्मादी अंदाज़ में ही पेश किया.

अभिनंदन वर्तमानइमेज कॉपीरइटPTV

अलबत्ता, पाकिस्तानी हुक्मरानों के बदले तेवरों ने वहाँ के मीडिया को किसी हद तक संयत कर दिया था. इमरान ख़ान के शांति के बयानों का ये असर था. वास्तव में इस पूरे दौर में पाकिस्तान के नेताओं और सेना दोनों ने अत्यधिक संयम दिखाया है. इसे केवल उनका भय कहकर खारिज़ कर देना ग़लता होगा.

चूँकि भारतीय मीडिया के सिर से युद्ध का भूत उतरा नहीं है और वह एक राजनीतिक एजेंडे पर भी काम कर रहा है इसलिए उसने इमरान के नरम रवैये को उनकी कमज़ोरी और भारत की जीत के रूप में ही पेश किया. आख़िर उसे तो सरकार द्वारा तय की गई ट्यून पर ही नाचना-गाना था.

बदला हुआ राजनीतिक माहौल

भारत सरकार ने जिस तरह का रवैया अख़्तियार कर रखा है उससे नहीं लगता कि दोनों देशों के संबंध कम से कम चुनाव होने तक सुधरेंगे. ज़ाहिर है कि मीडिया के सुधरने के आसार भी नहीं ही हैं.

सवाल उठता है कि मीडिया इस क़दर क्यों गिर गया? इसके कई कारण गिनाए जा सकते हैं. दो वज़हें तो ऊपर बताई ही जा चुकी हैं, मगर कुछ और फैक्टर हैं जिनको अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक माहौल.

पिछले पाँच साल में भारत में राजनीतिक माहौल तेज़ी से बदला है. बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने राष्ट्रवाद के नाम पर उन्माद का ऐसा वातावरण बनाया है कि उसमें सवाल करना, तर्क और तथ्यों की बात करना बहुत ही मुश्किल हो गया है.

उन्होंने सरकार, देश, सेना और देशभक्ति का आपस में घालमेल कर दिया है. इसका मतलब है कि अगर आप सरकार से सवाल करेंगे, तो माना जाएगा कि देश के विरूद्ध बात कर रहे हैं. आपको सरकार से सहमत होना ही होगा और जो ऐसा नहीं करेगा उसे पाकिस्तान का हिमायती घोषित कर दिया जाएगा.

इस नए माहौल में आतंक भी शामिल है. न केवल तर्कसंगत ढंग से बात करने वालों में खौफ़ फैल चुका है बल्कि मीडिया में काम करने वाले भी डरे हुए हैं. वे ऐसा कोई भी सवाल करने से घबराते हैं जिससे सत्ता पक्ष नाराज़ हो या उनकी देशभक्ति पर ही कोई सवाल खड़ा कर दे. उल्टे उनमें खुद को देशभक्त साबित करने की प्रवृत्ति इसीलिए बढ़ गई है.

सेना से जुड़े मसले तो और भी संवेदनशील बना दिए गए हैं. उसके बारे में नकारात्मक टिप्पणी तो दूर कोई टेढ़ा सवाल करना भी बहुत ही घातक साबित हो सकता है. आप वही रिपोर्ट कर सकते हैं जो सरकार या सेना कह रही है.

सोशल मीडिया का असर

दूसरा फैक्टर सोशल मीडिया है. सोशल मीडिया ज़बर्दस्त तरीक़े से मुख्यधारा के मीडिया को प्रभावित कर रहा है. अधिकांश फ़ेक कंटेंट इसी मीडिया (ख़ास तौर पर व्हाट्सऐप) की देन है और यहीं से वह दूसरे माध्यमों में पहुँच रहा है.

चूँकि सोशल मीडिया सबके लिए हर तरह से खुला है इसलिए वह उन्माद पैदा करने और फैलाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. पत्रकार भी इससे प्रभावित हो रहे हैं और उसका असर उनके काम पर दिख रहा है.

फिर बाज़ारजनित होड़ तो है ही. मीडिया में दोतरफा होड़ मची हुई है. एक तरफ तो वह सत्ताधारियों को खुश करना चाहता है ताकि उससे होने वाले लाभ लिए जा सकें. दूसरे, बाज़ार में अपनी हैसियत बढ़ाने की धुन भी उस पर सवार है.

एक प्रश्न पत्रकारिता के प्रशिक्षण और पेशे से जुड़ी प्रतिबद्धता का भी है. मीडिया कवरेज की आचार संहिता और मानकों की कोई बात ही नहीं कर रहा.

मीडिया संस्थान इनको लेकर कतई गंभीर नहीं हैं इसलिए उनमें कचरा भर गया है और वे कचरा ही उगल रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं )

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