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ये रवीश कुमार के बहिष्कार का वक्त है..

यादों में आलोक
दिल्ली में आयोजित यादों में आलोक कार्यक्रम।

प्रशांत राजावत की रिपोर्ट-

कल दिल्ली में पत्रकार आलोक तोमर की याद में प्रतिवर्ष की तरह इस बार भी यादों में आलोक कार्यक्रम आय़ोजित किया गया था। वक्ताओं में टीवी पत्रकार रवीश कुमार, साहित्यकार अशोक वाजपेयी, कुर्बान अली, जगदीश उपासने थे। हालांकि जगदीश उपासने आए नहीं। क्यों नहीं आए ये अलग विषय है। मंच का संचालन कर रहे थे आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलपति रमाशंकर सिंह। मैं यहां पर संक्षेप में बता दूं कि किसने क्या बोला औऱ उसके बाद शीर्षक से संबंधित बात करेंगे।

कार्य़क्रम का विषय था। क्या ये हिंदी पत्रकारिता का दब्बू युग है। जब मैं पहुंचा अशोक वाजपेयी खड़े ही हुए थे बोलने के लिए। अशोक वाजपेयी ने कहा कि मैं पत्रकार नहीं हूं, मैं एक दर्शक या पाठक होने के नाते मीडिया की निंदा करने आया हूं। उन्होंने कहा कि वो प्रतिदिन 6 अखबार पढ़ते हैं। जिनमें 5 अंग्रेजी के औऱ एक हिंदी का। उन्होंने कहा कि हिंदी का सबसे पहले पढ़ता हूं क्योंकि उसे पढ़ने में केवल 2 मिनट लगते हैं क्योंकि उसमे कुछ होता नहीं है। वाजपेयी क्रमशः हिंदी पत्रकारिता की बखिया उधेड़ रहे थे और मंच के सामने मौजूद हिंदी पत्रकार खीसें निपोर रहे थे। खैर आगे वाजपेयी कहते हैं कि मैंने 4 साल से ज्यादा वक्त हो गया न्यूज चैनल देखना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि मैं तो आता हूं न्यूज चैनलों पर कभी कभार पर मैं न्यूज चैनल कभी कभार भी नहीं देखता। वाजपेयी ने कहा कि जरूरी नहीं कि आप टीवी पर दिखें तो टीवी देखें भी। सभागार ठहाकों से गूंज उठा। वाजपेयी अपनी चिरपरिचित शैली में ही बोल रहे थे। मानो संवाद कर रहे हों। उन्होंने कहा कि आज के हिंदी अखबारों में साहित्य है नहीं, संवाद है नहीं, सम्पादक के नाम पत्र है नहीं, जन समस्याएं हैं नहीं, कला-संस्कृति है नहीं और अंततः खबरें भी नहीं हैं। तो आखिर है क्या। उन्होंने अपनी विद्यार्थी जीवन को याद करते हुए कहा कि उस दौर में जब वो सेंट स्टीफन के छात्र हुआ करते थे किसी अखबार में सम्पादक के नाम पत्र छपना भी बढ़ी बात होती थी। मेरा एक पत्र स्टेट्समैन में छपा था औऱ मैं अपने सहपाठियों के बीच हीरो बन गया था। पहले कहा जाता था कि फलां अखबार पढ़ो आपकी भाषा में सुधार होगा। अब ऐसा कौन सा हिंदी अखबार है जो आपकी भाषा में सुधार कर सकता है। लुब्बोलुआब श्री वाजपेयी का यही रहा कि हिंदी मीडिया है कूड़ा मीडिया।

उसके बाद संचालन कर रहे रमाशंकर सिंह ने रवीश कुमार की ओर इशार करते हुए उद्बोधन शुरू किया कि रवीश को इस कार्य़क्रम में बुलाने के लिए हमने काफी जुगत लगाई तो विचार करना पड़ा कि रवीश किसके कहने पर आ सकते हैं, तो पता लगा कि ओम थानवी की बात नहीं टालेंगे और अंततः रवीश आए। दरअसल ऐसी बातें इसलिए उठ रही हैं क्योंकि रवीश कुमार ने सार्वजनिक घोषणा कर रखी है कि मुझे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में वक्तव्य के लिए न बुलाएं।

खैर रवीश कुमार ने माइक सम्हाला। निसंदेह श्रोताओं का बड़ा वर्ग उन्हें ही सुनने आया था। रवीश कुमार की शुरूआत ही भाजपा से हुई और समापन भी भाजपा से। रवीश कुमार की पहली लाइन थी देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने मेरा बहिष्कार कर रखा है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी पार्टी ने मेरा बहिष्कार कर रखा है। रवीश कुमार का बहिष्कार कर रखा है। दरअसल ये भाजपा की हार है। महज एक व्यक्ति औऱ सामने इतनी बड़ी पार्टी। ये हार है बीजेपी की।

रवीश इतना कहने के बाद आगे बढ़ते हैं। लम्बी ऊंची कद काठी, चमकते कपड़े-दमकता चेहरा। रईसी का तेज भी। ऐसे हैं वास्तविक रवीश कुमार। बड़े सधे हुए लहजे में उन्होंने बोलना शुरू किया और एक एक करके बोलते गए। रवीश कुमार ने कहा कि ये वो समय है जब आपको नाम लेकर पत्रकारों और पत्रकारिता संस्थानों के नकारेपन की चर्चा करनी होगी। उन्होंने कहा कि वो किसी से नहीं डरते। गाली तो पड़ती ही हैं, थोड़ी और पड़ जाएंगी। रवीश ने कहा कि दैनिक जागरण जैसे देश के बड़े अखबार ये लिखकर बच निकलते हैं कि कठुआ में नहीं हुआ था बलात्कार और जनता चुप रहती है। ये अखबार हमें क्या परोस रहे हैं। उन्होंने एवीबी न्यूज, आजतक, हिंदुस्तान समूहों का नाम लेकर चिल्ला चिल्लाकर कहा कि ये सत्ता के गुलाम हैं। इनके एंकर ड्रामेबाज औऱ खबरों के नाम पर सरकार का चरणवंदन। उन्होंने कहा कि ये हिंदी अखबार पाठकों की हत्या कर रहे हैं। जो सूचना है वो बता नहीं रहे और जो खबर नहीं है उसे खबर बनाकर बता रहे हैं। रवीश कुमार ने कहा कि हमें तो पता ही नहीं था कि 2014 के बाद ललनवा के होने पर सोहर गाना है 2019 तक। उनका सीधा इशारा प्रधानमंत्री की ओर था। उन्होंने कहा कि मीडिया की स्थिति इससे ज्यादा दयनीय कभी नहीं थी जब मीडिया को कुछ बोलने की आजादी न हो। रवीश ने कहा कि आज कोई भी मीडिया समूह ये बताने की हिम्मत नहीं रखता कि प्रधानमंत्री जिन योजनाओं का शिलान्यास या लोकार्पण कर रहे हैं, उनकी सच्चाई क्या है। हिंदुस्तान समाचार पत्र के प्रधान सम्पादक शशि शेखर का नाम लेते हुए रवीश कुमार ने कहा कि सुना है बहुत बड़े अखबार के बहुत बड़े सम्पादक हैं। लेकिन उनके अखबार में मुझे खबरें नहीं दिखतीं। रवीश ने कहा कि मैंने इस अखबार का विश्लेषण किया और एकदिन में 70 से 80 खबरों का चयन किया तो पाया कि सब गोलमाल है। राफेलडील से संबंधित खबर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान जैसे अखबार में राफेल डील से संबंधित खबर को इतना बेहूदे तरीके से प्रस्तुत किया गया कि शर्म की बात है ये मीडिया के लिए। ये सब प्रायोजित खबरें चला रहे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा कुछ पत्रकारों को ट्वीटर पर टैग किए जाने के मामले में रवीश ने चुटकी लेते हुए कहा कि इन पत्रकारों के लिए यही बड़ी बात है कि प्रधानमंत्री टैग कर रहे हैं। पर ये टैगी पत्रकार ये भी जान लें कि जनता भी जान रही हैं कि ये टैगिया वाले पत्रकार हैं। भांट पत्रकार हैं। ये पब्लिक है सब जानती है। रवीश ने कहा कि बोलने की औऱ लिखने की आजादी छीन ली गई है। ये चैनल जो 24 घंटे चल रहे हैं अगर सरकार के खिलाफ शुरू हो जाएंगे तो शिखर सम्मेलन, फलाने सम्मेलन, कांन्क्लेव आदि में नेता जी फिर कैसे आएंगे। हालांकि रवीश कुछ नया नहीं बोले, जो लोग उनसे फेसबुक के जरिए जुड़े हैं वो जानते हैं कि रवीश ऐसा बोलते रहते हैं। जबकि कार्य़क्रम के चतुर संचालक रमाशंकर सिंह ने रवीश को उद्बोधन के लिए बुलाने से पूर्व ये आग्रह किया था कि वो आज खुलकर बोलें, वो भी बोलें जो बोलना चाहते हैं और अबतक न बोल पाए हों। बावजूद रवीश ने कुछ नया नहीं बोला।

निष्कर्षः

कार्यक्रम की आयोजिका और आलोक तोमर जी की पत्नी सुप्रिया रॉय जी का संदेश मिला तो पहुंचना ही था। औऱ निसंदेह पत्रकारिता के संदर्भ में प्रतिवर्ष ये एक विशेष आय़ोजन की तरह ही है। इसीलिए यहां कुर्सियां खाली नहीं रहतीं बल्कि पूरे कार्यक्रम के दौरान कुर्सियां आती रहती हैं, लोग बैठते रहते हैं, कुर्सियां आती रहती हैं।

आमतौर पर मैं खबरें टाइप का नहीं लिखता। इसलिए मैंने तय किया था कि आज रवीश पर कुछ लिखना है। मैंने एक बार पहले भी लिखा था अपने स्तम्भ एडीटर अटैक में कि रवीश कुमार जहर है और जहर से अंततः मृत्यु होती है। औऱ मृत्यु भला किसे पसंद है। जीना आखिर कौन नहीं चाहता बेशक घुट घुटकर ही। रवीश क्या बोलते हैं, वो कितना सच है, कितना झूठ हैं। मैं ये सब नहीं बताना चाहता। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि रवीश ने मीडिया को गाली देना पिछले 5 सालों से या 10 सालों से शुरू किया होगा। लेकिन मीडिया उससे पहले कैसा था। ये जानने की जरूरत है। मीडिया कब ऐसा था कि उसे गाली न पड़े। मीडिया कब पाक साफ था। रवीश कुमार ने अभी गाली देना और कोसना शुरू किया है। लेकिन जरा सोचिए कि गणेश शंकर विद्यार्थी स्वयं आज से कई कई वर्षों पहले पत्रकारिता को चरित्रहीन और बिकी हुई कह चुके थे। गूगल कर लीजिए और पता कर लीजिए कि गणेश शंकर विद्यार्थी किस दौर में थे। अब अगर उस दौर में ही पत्रकारिता बिक चुकी थी और अपना वजूद खो चुकी थी। तो अब तो अब है ही। कलयुग का पूर्ण प्राकट्य समय है ये।

आजकल सबूत के साथ लिखने का चलन है। तो देखिए वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक पत्रकारिता इतिहास औऱ प्रश्न, जिसके लेखर कृष्ण बिहारी मिश्र हैं। इसमें आठवें पृष्ठ में गणेश शंकर विद्यार्थी की चिंता व्यक्त की गई है। पेज का शीर्षक ही चिंता है। उसमें जो लिखा है हूबहू मैं लिख रहा हूं।

यहां भी अब बहुत से समाचार पत्र सर्व-साधारण के कल्याण के लिए नहीं रहे, सर्वसाधारण उनके प्रयोग की वस्तु बनते जा रहे हैं। एक समय था, इस देश में साधारण आदमी सर्व-साधारण के हितार्थ एक ऊंचा भाव लेकर पत्र निकालता था, और उस पत्र को जीवन क्षेत्र में स्थान मिल जाया करता थ। आज वैसा नहीं हो सकता। इस देश में भी समाचार पत्रों का आधार धन हो रहा है। धन से ही वे निकलते हैं, धन के ही आधार पर वे चलते हैं और बड़ी वेदना के साथ कहना पड़ रहा है उनमें काम करने वाले बहुत से पत्रकार भी धन की ही अभ्यर्थना करते हैं। अभी यहां पूरा अंधकार नही हुआ है, किंतु लक्षण वैसे ही हैं। कुछ ही समय पश्चात यहां के समाचार पत्र भी मशीन के सदृश हो जाएंगे और उनमें काम करने वाले पत्रकार केवल मशीन के पुरजे। व्यक्तित्व न रहेगा, सत्य-असत्य का अंतर न रहेगा, अन्याय के विरुद्ध डट जाने औऱ न्याय के आफतों को बुलाने की चाह न रहेगी, रह जाएगा केवल खिची हुई लकीर पर चलना।

  • गणेश शंकर विद्यार्थी
  • ( विष्णुदत्त शुक्ल की पुस्तक पत्रकार कला की भूमिका से साभार उद्धृत)

 

सवाल ये है कि गणेश शंकर विद्यार्थी 1890 के जन्मे थे और 1931 को चल बसे थे। तो इतना तय है कि ये बात भारत के आजाद होने से भी बहुत पहले कही गई होगी। ये भी हम जानते ही हैं कि गणेश शंकर विद्यार्थी भारतीय पत्रकारिता के पुरखा हैं। मुद्दा ये है कि जब आज से 80 या 90 साल पहले गणेश शंकर विद्यार्थी कह गए कि कुछ नहीं है पत्रकारिता में, सबकुछ खत्म है। ऊपर पढ़िए न। कुछ शेष छोड़ा क्या उन्होंने। रवीश से ज्यादा ही वो लिख गए आज से कई दशकों पहले। मेरे कहने का मतलब बस इतना है कि आलोचना, निंदा, बुराई ये सब एक पक्ष है। विश्व का कोई मीडिया समूह ऐसा नहीं जो निष्पक्ष हो या आरोप मुक्त हो। न्यूयार्क टाइम्स हो या द डॉन या अल जजीरा या सीएनएन। सभी पर पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग के आऱोप हैं। इतिहास गवाह है कि क्रांति करने वाले सिर्फ शहीद हुए हैं और मलाई सिंधियाओं ने खाई है और अबतक खा रहे हैं। झांसी की रानी पर सिर्फ उनके बलिदान दिवस पर माला चढ़ती हैं।

मैं फिर कहता हूं मीडिया में क्या सच है और क्या झूठ है भूल जाइए। क्योंकि आपके याद रखने से भी कुछ होने वाला है नहीं। मीडिया कोई आज ऐसी नहीं हो गई। ये तो गणेशशंकर विद्यार्थी के कथन से जान गए आप। जब गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी चिंता प्रकट की उसके बाद भारतीय मीडिया ने बुलंदियों के झंडे गाड़े। लाखों लाख लोगों को रोजगार दिया। मीडिया स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय के अधिकृत पाठ्यक्रम व विभाग मीडिया पर घोषित हुए। विशेषतौर पर पत्रकारिता के अध्ययन को संचालित करने के लिए ही आईआईएमसी समेत तमाम पत्रकारिता विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। सैकड़ों न्यूज चैनल खुले। कई अरबों का भारतीय मीडिया जगत निर्मित हुआ। एक घंटे के स्लॉट में निकलकर प्रोडक्शन हाउस 24 घंटे के न्यूज चैनलों में तब्दील हुए। अखबार बहुत उन्नत हुए।

ये सब चलता रहेगा। कुछ खत्म होने वाला नहीं है। और पाक साफ तो अब पत्नी नहीं है तो मीडिया की तो छोड़ ही दीजिए। रवीश कुमार को पत्रकारिता के छात्र बिल्कुल न सुनें। क्यों। क्योंकि आपको क्रांति नहीं करनी। आप एक कोर्स कर रहे हैं, जिसके एवज में आपको एक नौकरी चाहिए। और उस नौकरी का नाम पत्रकारिता है। रवीश की सुनेंगे फ्रस्टेड हो जाएंगे। हजारों मीडिया संस्थान हैं, वहां लाखों लोग रोजी रोटी के लिए 8 घंटे की नौकरी करते हैं। और यही सच है। पत्रकारिता अब उद्योग है, पत्रकारिता की पढ़ाई आप क्रांति के लिए नहीं कर रहे, करते हैं तो सिर्फ कुछ पैसे कमाने के लिए। और क्रांति इन संस्थानों में बैठकर होगी नहीं। रवीश कुमार क्या कहते हैं औऱ वास्तव में हैं क्या। ये जाने दीजिए। उनकी बैठकी किन लोगों के साथ है, उनकी हर बात बीजेपी से शुरू होकर बीजेपी पर ही खत्म होती है क्यों। ये भी जाने दीजिए। जाने दीजिए कि लाखों रुपए की सैलरी प्रति माह पाने वाले रवीश क्रांति की बातें कर रहे हैं ठीक है। अगर आपकी जगह वो खड़ें हो जाएं तब क्रांति हो तो बात बनें। जब एक अदद नौकरी की आश हो-तलाश हो।

मस्त रहिए। पढ़ाई करिए। नौकरी करिए। ऐश करिए।

देश चल रहा है, चलता रहेगा। आपके बचाने से बचेगा नहीं। बस आपके बचाने से आप जरूर चुक जाएंगे। रवीश कहते हैं कि मीडिया की पढ़ाई बेकार है, मीडिया के कॉलेज और स्कूल बेकार हैं,  मीडिया के शिक्षक बेकार हैं, सभी अखबार औऱ चैनल बेकार हैं। अरे भैय्या बेकार तो हैं पर कभी ये तो सोचो कि जितने लोगों को इनसे रोजगार मिल रहा है आप एनडीटीवी में देंगे या बस गरियाते रहेंगे। और हां अंत में ये कि पूर्ण स्वतंत्रता आपसे कोई छीन नहीं सकता। आप उसका उपयोग मीडिया में करिए और अपने स्तर पर अपनी भूमिका औऱ अधिकार के स्तर पर खबरों के साथ न्याय करिए। बाकी क्रांति व्रांति गई तेल लेने। नौकरी करिए, तनख्वाह लीजिए। वीकेंड में फिल्म देखिए और घर चलाइए।

रवीश बोलते रहेंगे। सब चलता रहेगा। हर साल रिपोर्ट आती है इतने प्रतिशत सांसद क्रिमिनल हैं। क्या हुआ। वंशवाद चल रहा है। क्या हुआ। प्रदूषण बढ़ रहा है। क्या हुआ। मी टू चल रहा है। क्या हुआ।

सब हो रहा है। सब होता रहेगा।

नमस्कार।

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