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त्याग करोगे तो घर कैसे चलाओगे प्रसून जी, ये जनता मोदी को ही जिताएगी

पुण्य प्रसून बाजपेयी
पुण्य प्रसून बाजपेयी

एडीटर अटैक- प्रशांत राजावत

 

होली के दो दिन पहले ही मैं एक कार्यक्रम में गया था, जहां रवीश कुमार वक्ता के रूप में आकर्षण का केंद्र थे। उसके बाद मैंने मिरर पर अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ये रवीश के बहिष्कार का वक्त है। उनकी सुनेंगे, उनकी मानेंगे या उन्हें आदर्श मानेंगे, तो अगर आप पत्रकार हैं या पत्रकारिता के छात्र हैं, तो खतरा उठाना पड़ सकता है। मेरे इस आलेख के बाद मुझे जमकर गालियां मिलीं। खैर लोकतंत्र हैं गालियों से कोई महरूम नहीं। चूंकि होली का अवसर है। तो गालियां भी गुलाल सरीखा मानकर मैंने धो डाली।

आगे चलते हैं..

उसी के बाद खबर आई है पुण्य प्रसून बाजपेयी को तीसरी बार किसी चैनल ने बाहर कर दिया है। रवीश के लिए जब मैंने लिखा कि ये रवीश कुमार के बहिष्कार का वक्त है तो एक बड़ा तबका ये मान बैठा कि मैं रवीश का विरोधी हूं। लेकिन मैं स्पष्ट कर दूं कि मैं एक मीडिया समीक्षक के नाते अपने स्तम्भ को लिखता हूं न कि किसी  पत्रकार या मीडिया संस्थान के प्रशंसक या आलोचक के रूप में। इस बात में कोई शक नहीं है कि रवीश कुमार और कमोवेश एनडीटीवी आदर्श पत्रकारिता पर सौ फीसदी खरे हैं। पत्रकारिता का मूल ही यही है सरकार के खिलाफ खड़े रहना, वो भी सीना तानकर। वहीं कम से कम एक दर्शक के तौर हम ये भी जानते ही हैं कि एनडीटीवी में हम एंकरों की गलाफाड़ प्रतिस्पर्धा से बचे रहते हैं। मैं यहां रवीश कुमार या एनडीटीवी की कार्यशैली या गुणवत्ता का आंकलन नहीं कर रहा हूं। मेरा कहना बस इतना है कि रवीश कुमार कहते हैं कि सभी एंकर बेवकूफ हैं, सभी चैनल बकवास हैं, मीडिया के शिक्षक चूतियां हैं, भारत में मीडिया का पाठ्यक्रम बेकार है और मीडिया के कालेज लूट रहे हैं। सभी चैनलों को देखना बंद कर दो। आदि, आदि। ऐसे में मेरा सवाल ये है कि बेचारे वो छात्र क्या करेंगे मीडिया की शिक्षा ग्रहण करने के बाद जिन्हें पत्रकार बनना हैं। एनडीटीवी अच्छा चैनल है। ठीक बात है। पर देशभर के मीडिया छात्रों को नौकरी तो नहीं दे सकता न, तो मीडिया के छात्र क्या करेंगे। मीडिया की पढ़ाई तो बंद होने से रही। ऐसे में बेशक मीडिया छात्रों के आदर्श रवीश कुमार हों औऱ चैनलों में एनडीटीवी लेकिन नौकरी तो उन्हें उन चैनलों या अखबारों में करनी पड़ेगी जिन्हें रवीश कुमार बकवास करार दे चुके हैं। सवाल रोजगार का है। आदर्शवादिता तो है ही। लेकिन रोजगार कहां मिले।

अब देखिए देश के काबिल पत्रकारों में से एक पुण्य प्रसून वाजपेयी 4 महीने में तीसरी बार निकाले जा रहे हैं। क्रांतिकारी हैं। जनता के लिए सरकार से भिड़ जाते हैं और चैनल वाले निकाल देते हैं। आजतक, एवीपी और अब सूर्या चैनल से निकाल दिए गए। सवाल ये है कि लगभग सभी बड़े चैनलों में वो दागी हो गए हैं। अब उनका घर कैसे चले। दैनिक जरूरतें कैसे पूरी हों। त्याग तो कर दिया, क्रांति भी हो गई। केंद्र सरकार को लूट औऱ भ्रष्टाचार की सरकार मानने वाला तबका भी प्रसून से खुश, कि भाई पत्रकार हो तो ऐसा। पर क्रांति से घर नहीं चलता। क्रांति तो हो सकता है श्वेता सिंह, अंजना ओम कश्यप, रोहित सरदाना, रजत शर्मा को भी पसंद आती हो पर रोजगार ही छिन जाएगा तो क्रांति क्या करेगी। पुण्य प्रसून की हालत ये हो गई है कि अपने फेसबुक पेज पर अब अपने यू ट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करने की अपील कर रहे हैं। वरना पुण्य वो पत्रकार हैं वर्तमान टीवी पत्रकारिता में जिनके आगे अभी वाजिब तौर पर भारत में कोई टीवी पत्रकार नहीं टिकने वाले, चिकने चुपड़े गालों और लिपस्टिक वाली एंकरों की तो बात ही छोड़ दीजिए। और ये बात भारत के शीर्ष टीवी मीडिया के लोग भी जानते हैं कि प्रसून का कोई सानी नहीं। पर नौकरी नहीं मिल रही। कैसे चलेगा। एक नेशनल चैनल का प्राइम टाइम एंकर इस हालत में पहुंच जाए कि पहले तो सूर्या जैसा अदना चैनल ज्वाइन करना पड़े और फिर उससे उसे निकाला जाए और अंततः उसे आजीविका के लिए एक यू ट्यूब चैनल पर आश्रित होना पड़े। अच्छी बात है क्रांति, प्रसून क्रांति करते हैं मोदी विरोधियों का सीना फूलता है। अच्छी बात है। पर इस मामले को ठीक इस तरह समझिए कि आप किसी संस्थान में हों और आपको लगातार बाहर का रास्ता दिखाया जाए तो आपके ऊपर क्या बीतेगी।

मैं फिर कहता हूं क्रांति अच्छी चीज है, प्रसून दमदार पत्रकार हैं, रवीश काबिल पत्रकार हैं, सरकार से दो दो हाथ पत्रकारिता का मूल कर्तव्य है। पर आप पब्लिक हैं। सरकार से लोहा ले लेकर चुक जाएंगे ये पत्रकार लेकिन आप सेहरा मोदी के सिर ही सजाएंगे। अगर ऐसा न होता तो पहले भी पूर्ण बहुमत की सरकार में मोदी न आते। मैं भी कामना करता हूं कि प्रसून जैसे पत्रकारों की क्रांति बेजा न जाए.. पर एक पत्रकार के रूप में जब सोचना हूं तो क्रांति का प्रतिफल जो है वो आपमें तो जोश लाता है पर एक पत्रकार का चूल्हा जलने से रोक देता है।

अब या तो विचार केंद्रित मीडिया संस्थान ही खोल दिए जाएं। हालांकि ऐसा है भी। जनता भी जानती है। कौन मीडिया संस्थान किस दल को समर्थन करता है। लेकिन ये कितना खतरनाक है एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कि मीडिया संस्थान और पत्रकार विचारधारा से प्रभावित हैं। टेलीग्राफ, एनडीटीवी और बीबीसी, द वायर, कांरवां का नाम लीजिए तो फटाक से एक ग्रामीण आदमी भी कह देगा मोदी को गरियाने वाले लोग हैं इनमें। ऐसा ही मोदी भक्ति वाले मीडिया को भी लोग सामान्य रूप में चिन्हित कर लेते हैं। वरिश्ठ पत्रकार शम्भूनाथ शुक्ला कहते हैं कि पत्रकार वो है जिसकी विचारधारा का पता न लग सके। लेकिन भविष्य में तो वो दौर आता दिख रहा है जब मीडिया संस्थान वाले साक्षात्कार में ही पत्रकार से पूछ लिया करेंगे भैय्या किस राजनैतिक दल के समर्थक हो। उसके बाद नियुक्ति मिलेगी। फिलहाल ऐसा बड़े पत्रकारों के संदर्भ में तो चल रही रहा है। ऐसे समझें कि पुण्य प्रसून को नौकरी कहां मिल सकती हैं तो लोग कह रहे हैं एनडीटीवी, स्वराज चैनल अमृता राय वाला, द वायर और सरकार विरोधी मीडिया संस्थान।

दिशाहीन है सबकुछ.. आशा है कुछ बेहतरी होगी।

  • एडीटर अटैक मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है।

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