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पत्रकार का संस्मरणः मुझे जेल भेजकर मेरी आवाज़ मज़बूत की

किशोरचंद्र वांगखेम
किशोरचंद्र वांगखेम

मणिपुर में मुख्यमंत्री बीरेन सिंह पर विवादित टिप्पणी करने के बाद जेल भेजे गए पत्रकार किशोरचंद्र वांगखेम 133 दिन जेल में रहने के बाद बुधवार को रिहा हो गए.

मणिपुर हाई कोर्ट ने उन पर लगाए गए एनएसए और दर्ज किए गए मुक़दमे को ख़ारिज कर दिया है.

किशोरचंद्र पर मणिपुर सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून लगा दिया था. बुधवार को वो इंफाल की साजीवा जेल से बाहर आए.

अपनी फ़ेसबुक पोस्ट में उन्होंने बीरेन सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों की कठपुतली कहा था.

बीबीसी से बात करते हुए किशोरचंद्र ने कहा, “जेल जाकर मैं और मज़बूत हो गया हूं और आगे भी लोगों की आवाज़ उठाता रहूंगा.”

उन्होंने मदद करने वाले सभी संगठनों का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, “मैं भारत की न्याय व्यवस्था और मेरी रिहाई में मदद करने वाले सभी लोगों और समूहों का धन्यवाद करना चाहूंगा.”

“जो हुआ है वो मेरे लिए एक बड़ा सबक भी है. ये जनता और सरकार दोनों के लिए भी सबक है. मैं एक सकारात्मक बदलाव लाने में कामयाब रहा हूं क्योंकि मणिपुर और पूरे भारत में सरकार विरोधी आवाज़ों को दबाया जा रहा है. प्रजातंत्र में ये नहीं होना चाहिए. मुझे लगता है कि मेरे मामले ने सारी दुनिया को एक संदेश दिया है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज़ को दबाना नहीं चाहिए.”

“मेरी लड़ाई यहां ख़त्म नहीं होगी. मेरा संघर्ष तो अब शुरू हुआ है. सिर्फ़ मैं ही नहीं बल्कि और भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें प्रशासन ने गिरफ़्तार किया है. मैं उन लोगों के लिए भी आवाज़ उठाना चाहता हूं. जेल से निकलकर मेरी लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है बल्कि शुरू हुई है. बहुत से काम किए जाने अभी बाक़ी है.”

‘लोग खुलकर बोल नहीं पा रहे’

अपनी गिरफ़्तारी की वजह बताते हुए उन्होंने कहा, “भारत और मणिपुर में इस समय तानाशाही रवैये वाली सरकार है, यह मैं नहीं कह रहा हूं बल्कि सभी कह रहे हैं लेकिन लोग इस बारे में खुलकर बोल नहीं पा रहे हैं बल्कि भीतर ही भीतर सहते जा रहे हैं. मैंने जब अपनी बात कही तो सरकार को बर्दाश्त नहीं हुआ. मेरे ऊपर एनएसए लगाया गया. ये ऐसी ही कार्रवाई थी जैसी ब्रितानी काल में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को दबाने के लिए की जाती थी.”

उन्होंने कहा, “अपने ही देश के नागरिकों को एनएसए या देशद्रोह जैसे कठोर क़ानूनों में जेल में डाला जा रहा है. मैंने सरकार की आलोचना की तो तानाशाही नज़रिए वाली सरकार को ये बर्दाश्त नहीं हुआ.”

“हम कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. फिर हम एनएसए के तहत अपने नागरिकों को गिरफ़्तार करते हैं और लोकतंत्र की मूल भावना का उल्लंघन करते हैं. सिर्फ़ मेरे ही मामले में नहीं बल्कि कई और लोगों को इस काले क़ानून के तहत गिरफ़्तार करके जेल में डाला गया. लोकतंत्र में ऐसा काला क़ानून नहीं होना चाहिए. ये क़ानून लोकतंत्र पर काला धब्बा है.”

  • प्रदर्शनइमेज कॉपीरइटDILIP SHARMA/BBC

‘लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ता रहूंगा’

वो कहते हैं, “अगर हम इन क़ानूनों को हटा भी न पाएं तो कम से कम हमें इनकी समीक्षा करनी चाहिए. मैंने फ़ैसला किया है कि मैं आजीवन लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लड़ता रहूंगा.”

अपनी फ़ेसबुक पोस्ट के बारे में किशोरचंद्र कहते हैं, “मैं अपनी भाषा के लिए माफ़ी मांगता हूं लेकिन अपनी भावना के लिए नहीं. मैंने कुछ असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल किया. इसके अलावा मैं अपनी कही हर बात पर अडिग हूं.”

वो कहते हैं, “भावनात्मक आवेग में मैंने कुछ असंसदीय शब्द इस्तेमाल किए. मैं इसके लिए माफ़ी मांगता हूं. इसके अलावा मैंने जो भी कुछ कहा है, मैं उसके साथ हूं. और ये सिर्फ़ मेरे शब्द नहीं है बल्कि और भी बहुत से लोग हैं जो ऐसा सोचते हैं.”

आरएसएस या बीजेपी की विचारधारा मणिपुर के लिए ख़तरा

वो कहते हैं, “जो विचारधारा है, आरएसएस या बीजेपी की. हिंदू राष्ट्र उनके लिए अच्छा होगा. लेकिन मणिपुर जैसी जगह जहां अल्पसंख्यक समुदाय रहता है, उसके लिए ये विचारधारा एक बड़ा ख़तरा है. एक पत्रकार के तौर पर मैं देख पा रहा था कि सरकार ऐसी विचारधारा को थोपने जा रही है. मुझे लग रहा था कि कुछ होने वाला है. इस विषय पर मैंने लोगों को जागरूक करना शुरू किया. मैंने कहना शुरू किया कि हिंदू राष्ट्र पूर्वोत्तर के लिए ख़तरा है.”

“मेरी गिरफ़्तारी के क़रीब एक माह बाद ही नागरिकता संशोधन क़ानून पर पूर्वोत्तर में व्यापक प्रदर्शन हुए. यानी जो मैंने कहा वो यहां कि जनभावना है.”

वांगखेम ये भी मानते हैं कि उनकी गिरफ़्तारी के बाद मणिपुर के युवाओं में जागरूकता आई है और वो एक बदलाव महसूस कर पा रहे हैं.

उन्होंने कहा, “कई लोगों ने मुझसे कहा है कि वो मेरे साथ हैं. मेरी गिरफ़्तारी एक उदाहरण बन गई और कई युवा इसकी प्रेरणा से मुखर होकर ऐसे विषयों में बात कर रहे हैं.”

“पहले लोगों में एक डर सा था कि वो कुछ बोलेंगे तो पुलिस पकड़ लेगी लेकिन मेरी रिहाई के बाद ये डर ख़त्म हुआ है और लोग महसूस कर पा रहे हैं कि वो लोकतंत्र में खुल कर बोलने का अधिकार रखते हैं. लोकतंत्र में किसी के मन में कोई डर होना भी नहीं चाहिए. भविष्य में लोकतांत्रिक भावना और मज़बूत होगी.”

किशोरचंद्र कहते हैं कि राष्ट्रवाद के शोर में मूल मुद्दे दब रहे हैं. वो कहते हैं, “बाकी देश की तरह ही ग़रीबी, बेरोज़गारी और महंगाई यहां भी मुद्दा है. लेकिन यहां का सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि पूर्वोत्तर को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है.”

‘क्षेत्रीय दल ही कर सकते हैं पूर्वोत्तर की समस्याओं का समाधान’

वो कहते हैं, “पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अभी कोई विकास नहीं हुआ है. केंद्र सरकार की ओर से नज़रअंदाज़ किए जाने की वजह से यहां क्षेत्रवाद की भावना बढ़ रही है. मेरे कहने का मतलब ये नहीं है कि पूर्वोत्तर के लोग भारत से अलग होना चाहते हैं बल्कि मैं ये कहना चाह रहा हूं कि यहां के लोग केंद्रीय नेताओं से जुड़ नहीं पा रहे हैं. यहां के लोगों के अपने मुद्दे हैं जिन्हें समझा नहीं जा रहा है. यहां के मुद्दों का कोई सही मायने में समाधान नहीं निकाल रहा है. हम यहां के मुद्दे के समाधान के लिए केंद्रीय नेताओं पर निर्भर रहे लेकिन हमें कुछ नहीं मिला.”

“अब यहां के लोग प्रेशर ग्रुप या क्षेत्रीय प्रभाव वाले बल बनाकर अपने मुद्दे उठाना चाहते हैं ताकि यहां के मुद्दों को भी सुना और समझा जा सके. भारत की आज़ादी के बाद से अब तक इस क्षेत्र को नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है. सभी दलों ने इसे नज़रअंदाज़ किया है. अब यहां के लोगों को लगने लगा है कि स्थानीय दल ही उनका समाधान कर सकते हैं.”

किशोरचंद्र ये भी मानते हैं कि जेल जाने के बाद से उनकी आवाज़ और मज़बूत हुई है और वो अपनी बातों को ज़्यादा लोगों तक पहुंचा पा रहे हैं.

वो कहते हैं, “मेरे मामले ने ध्यान खींचा है. पहले यहां की बातों को राष्ट्रीय मीडिया में जगह नहीं मिलती थी. लेकिन अब राष्ट्रीय मीडिया ने भी यहां के मुद्दों को जगह दी है.”

‘जेल में शारीरिक नहीं, मानसिक प्रताड़ना दी गई’

वो कहते हैं, “मैं अब न रुकने वाला हूं और न चुप रहने वाला हूं. संविधान के दायरे में रहकर मैं मणिपुर के लोगों की आवाज़ उठाता रहूंगा. मेरे जेल जाने से मेरी आवाज़ और मज़बूत हो गई है, मेरा आत्मविश्वास और बढ़ गया है.”

किशोरचंद्र कहते हैं कि उन्हें जेल में किसी तरह से शारीरिक रूप से प्रताड़ित नहीं किया गया लेकिन उनके परिवार को मानसिक प्रताड़ना दी गई.

उन्होंने कहा कि सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उनके घर के पास आने जाने लगे. जेल जाने के बाद आसपास के लोग उनके चरमपंथी समूह से जुड़े होने की चर्चा भी करने लगे.

हालांकि इस सबका उन पर बहुत असर नहीं हुआ. वो कहते हैं, दिन तो अन्य क़ैदियों के साथ बात करके कट जाता था लेकिन जब रात होती थी तो उन्हें बहुत दिक़्क़त होती थी.

वो कहते हैं, “जैसे ही नौ बजे बत्ती बुझती है दिमाग़ में अलग-अलग तरह के विचार आने लगते हैं. मैं सोचता था कि कभी निकल पाऊंगा या नहीं. लेकिन कभी मैं हिम्मत नहीं हारता था. मैं बस यही सोचता था कि अगर मेरी जान बच गई तो मैं वही करूंगा जो मैं करना चाहता हूं. अब मैं जेल से बाहर हूं और मेरे पास एक बड़ा मक़सद है.”

साभारः बीबीसी

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