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प्रोफेसर कुठियाला ने क्या खोया-क्या पाया जग में…

कुलपति कुठियाला
मध्यप्रदेश से प्रकाशित अखबार में कुलपति कुठियाला
दैनिक भास्क
दैनिक भास्कर हरियाणा में प्रकाशित खबर

एडीटर अटैकः प्रशांत राजावत

अटल बिहारी वाजपेयी की एक बहुत सुंदर कविता है। क्या खोया-क्या पाया जग में…. इसको आवाज दी है सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने। कविता का ऑडियो यू ट्यूब पर उपलब्ध है। मैं इसी कविता की प्रथम पंक्ति को सुन रहा था तभी मुझे बीके कुठियाला याद आए।

हां माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के पूर्व कुलपति बीके कुठियाला, वर्तमान में हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद के प्रमुख हैं जो। जीवन क्या है। जीवन क्यों है। जीवन क्यों मिला है। ये सबको जानना जरूरी है।

अति हर जगह वर्जित है। पद, पैसा, प्रतिष्ठा के बावजूद प्रोफेसर कुठियाला के पास जीते जी क्या शेष रहा। कुछ तो नहीं। अभी तक तो लोग ही फुसफुसाते थे जिसमें कुठियाला के करतूतों की चर्चा होती थी। लेकिन अब देशभर की मीडिया, अखबार समेत उस राज्य के भी प्रमुख अखबार कुठियाला के खिलाफ खबरों से अटे पड़े हैं, जहां से कुठियाला आते हैं, जहां कुठियाला फिलवक्त उच्च शिक्षा परिषद के प्रमुख के तौर पर तैनात हैं।

कुठियाला कई विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता व जनसंचार विभाग के निदेशक रहे, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि में दो बार कुलपति रहे, आईआईएमसी में प्रोफेसर रहे और अब भी हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद के प्रमुख हैं। क्या कुछ नहीं है, उनके पास। वर्षों से शानदार पदों पर रहे, बेहतरीन सरकारी सुविधाएं भोगी, बंगला, गाड़ी सबकुछ। हजारों छात्र हैं उनके देशभर में अच्छे पदों पर , हजारों हजार चाहने वाले। कईयों का जीवन संवारा उन्होंने। परिश्रमी भी हैं वो। ऐसा कहा जाता रहा है कि कुलपति रहते भी वो कक्षाएं लेते रहे हैं।

कुलपति क्या सामान्य पद है। बिल्कुल नहीं। कुलपति मतलब एक शिक्षा के वैश्विक संस्थान का मुखिया।

लेकिन कुठियाला की अति ने सबकुछ झटके में डुबो दिया।

अब क्या शेष है, बस जेल जाना। प्रोफेसर कुठियाला की खाल लटक गई है, बाल पक गए हैं। एक फुलप्रूफ बुजुर्ग व्यक्ति की श्रेणी में आ चुके हैं। लेकिन आजकल देश के तमाम बड़े अखबारों में जो खबरें उनके लिए चल रही हैं, उनको देखने के बाद, वो खुद  क्सोा सोचते होंगे, क्या उनके चाहने वाले सोचते होंगे। फिलहाल मैं यही सोच रहा हूं। क्यों लोग ऐसा करते हैं। क्यों कुठियाला जी ने ऐसा किया होगा। क्यों इनको ये ख्याल नहीं आय़ा कि कभी खुलासा हुआ तो इज्जत तार-तार हो जाएगी।

अखबारों की क्या सुर्खियां हैं, पता है।

विश्वविद्यालय के खर्चे से कुठियाला गटक गए शराब

विश्वविद्यालय के ख्रर्चे से की विदेश यात्राएं और पत्नी को भी ले गए

कुठियाला पर आपराधिक मामला दर्ज

तमाम और अन्य शीर्षक। घर में वाइन स्टैंड बना रखा था, वो भी विश्वविद्यालय के खर्चे से। तमाम संगठनों को विश्वविद्यालय से बजट दिया, लोगों को अयोग्यता के बाद भी नियुक्तियां दीं, अनुभव न होने के बाद भी प्रोफेसर और रीडर बना दिया, जिसने पत्रकारिता का कोर्स ही नहीं किया, उसे पत्रकारिता के प्रोफेसर बना दिया। बीजेपी से जुड़े संगठनों को विश्वविद्यालय के कोष से पैसा दिया। ये मैं नहीं कर रहा हूं, तमाम बड़े अखबार अटे पड़े हैं इन खबरों से। नियुक्तियों में गड़बड़ झाला किया। क्या जरूरत थी इसकी उन्हें। क्यों लोग अति करते हैं।

कल की ही बात है। मैं भारत के पूर्व राष्ट्रपति की मीडिया सचिव से बात कर रहा था, बातों ही बातों में प्रोफेसर कुठियाला की चर्चा चली, तो मीडिया सुर्खियां उन्हें दिखाई गईं। तो मीडिया सचिव ने बोला कि कुठियाला तो मेरे शिक्षक रहे हैं, ये क्या हो गया। सोचिए जरा, कि क्या छवि रह गई। ऐसे ही लाखों लाख लोग जब मीडिया के मार्फत प्रोफेसर कुठियाला की अय्याशी और भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरें पढ़ते होंगे तो क्या सोचते होंगे। लोग कहें बेशक कुछ न उनके सामने, पर सोचते तो जरूर होंगे कि गजब का आदमी है, बीजेपी औऱ संघ के करीबी होने के चलते पदों पर तो रहा, पर जमकर पदों का दुरुपयोग किया। संघ भी ऐसे लोगों को शायद अब पास न फटकने दे।

सबकुछ होने के बाद भी, अति क्यों की जाती है।

बात वहीं आती है कि क्या खोया-क्या पाया जग में। प्रोफेसर कुठियाला ने सब पाकर भी आखिरकार सब खो दिया है। ये जीवन की सबसे बड़ी हार है। ऐसी भी खबरें हैं कि उनसे हरियाणा उच्च शिक्षा परिषद के प्रमुख का पद छिन सकता है। जेल जा सकते हैं।

और एक बात और मैं स्पष्ट कर दूं कि प्रोफेसर कुठियाला के भ्रष्टाचार, शराबखोरी, धोखाधड़ी आदि आदि की बातें उस जांच कमेटी की जांच के बाद सामने आई हैं जो मध्यप्रदेश शासन द्वारा हाल ही में गठित की गई थी, जिसमें तीन सदस्यीय प्रमुख लोग शामिल थे। इसलिए इसे कपोल कल्पित न समझें। हां भारतीय न्याय व्यवस्था में ये प्रावधान है कि आप कोर्ट जाकर अपनी अपील करें। मैं यही आशा करता हूं कि प्रोफेसर कुठियाला जांच कमेटी के आरोपों और की गई जांच के निष्कर्ष के खिलाफ कोर्ट जाएं और न सिर्फ खुद पाक साफ निकलें बल्कि कुलपति और शिक्षक नाम की संस्था को भी कलंकित होने से बचाएं।

  • मीडिया मिरर सम्पादक का नियमित स्तम्भ है एडीटर अटैक 
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