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पुस्तक समीक्षा ः किताब ‘द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर’

किताब 'द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर'
किताब ‘द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर’
(टीवी पत्रकार पुष्पेन्द्र वैद्य की ताज़ा किताब ‘द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर’ पर पाठकीय टीप)
भारतीय मीडिया के 25 सालों  का सफ़र कितना आगे, कितना पीछे
 एक पत्रकार की नज़र से
कविता वर्मा
भारत में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पिछले पच्चीस सालों  में लम्बा सफर तय किया है। आज यह मीडिया कहाँ पहुँचा यह बताना तो कठिन है लेकिन कैसे किस राह किस डगर पर चलते हुए पहुँचा और उन रास्तों की क्या कठिनाइयाँ क्या तनाव रहे यह जानना रोचक है। खबरों के पीछे का सच उनकी महत्ता उनकी उपेक्षा मीडिया हाउस की विचारधारा किसी रिपोर्टर को किस तरह प्रभावित प्रताड़ित करती है यह जानना भी कम रोचक नहीं है। यूँ तो गाहे बगाहे कुछ ख़बरें सामने आती हैं लेकिन इन ख़बरों का दस्तावेजीकरण करना कम जीवट का काम नहीं है वह भी तब जबकि आज कोई सच सुनना नहीं चाहता खुद मीडिया भी नहीं।
पुष्पेंद्र वैद्य की किताब द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के शैशवकाल से अब तक की ऐसी कई सच्चाई सामने लाती है जो कभी हैरान करती हैं कभी वितृष्णा पैदा करती हैं तो कभी एक सहानुभूति की लहर पैदा करती है। सबसे पहले बात करें इसके कवर पेज की जिसमे कैमरे के सामने एक तार इस मीडिया की बंदिशे बताता हुआ सशक्त चित्र है। आज सभी प्रकार के मीडिया ऐसी ही किसी तारबंदी के शिकार हैं कुछ मजबूरी में कुछ मर्जी से।
अपनी बात में पुष्पेंद्र वैद्य ने बदलते ट्रेंड की बात की है तो इस क्षेत्र की चुनौतियों की बात भी की है। मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता के फलक से गायब होने का दुःख व्यक्त किया है तो टी आर पी के लिए बिकने लायक खबरों की मंडी सजाने का क्षोभ भी उनकी बातों से झलकता है। लेकिन यह तो तय है कि जितने तेज़ी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छाया था उतनी ही तेज़ी से वह लोगों के दिलों से उतर भी गया है। अलग अलग समय में पत्रकारिता में आये बदलाव की बात है तो उनको बदलने के पीछे की कहानियां भी। किताब अलग अलग अध्यायों में अलग अलग ख़बरों से जुड़े किस्से उसके पीछे की मंशा मानसिकता जद्दोजहद को रोचक तरीके से पेश करती है।
 
गोफन और फायरिंग के बीच आधी रात का सफर यह उस समय की घटना है जब मैदानी रिपोर्टर का बहुत सम्मान हुआ करता था। उनके पास साधन नहीं थे लेकिन ख़बरों को कवर करने की जिजीविषा उन्हें जान जोखिम में डालने को प्रेरित करती थी। मीलों का सफर बगैर दिन रात देखे मोटर बाइक पर तय किया जाता था और खुद की जान की  जिम्मेदारी भी खुद ही उठाना पड़ती थी। जलेबी घाट के घुमावदार रास्तों पर आधी रात का सफर और प्रदेश को हिला देने वाले मेहन्दीखेड़ा हादसे की रिपोर्टिंग बेहद रोचक है और पाठक फिंगर क्रॉस किये सुकूनदायक खबर की आस में पढता चला जाता है।
भगोरिया में वायरलेस सेट पर केरीऑन 
उस समय जबकि न मोबाइल थे न हर हाथ में इंटरनेट सुदूर इलाके में एक भगोरिया में कवर करने को इतना कुछ था कि रिपोर्टर खुद को भूल जाये और ऐसे में जब पुलिस के वायरलेस सेट पर हेड ऑफिस से फोन आये तो वह भी काम रोमांचक तो नहीं है और उसके बाद क्या हुआ यह जानना भी।
गरीबों के हक़ के लिए लड़ने वाला मीडिया अपने नाम के अलावा रिपोर्टर की खुद की रूचि के सहारे भी आगे बढ़ता है तो कई दुखद हादसे में यही रिपोर्टर किस तरह बॉस ऑफिस और अप्रिय स्थिति की भावनाओं के बीच पिसते हैं और किस मनोदशा में काम करते हैं यह जहाँ द्रवित करता है वहीँ एक आक्रोश भी पैदा करता है लेकिन फिर भी इस सच को जानना बेहद जरूरी है।
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे  मीडिया सरकारी और राजनितिक लीपापोती को जब अपनी जिम्मेदारी से उजागर करता है तब वह जनता पर खुद का विश्वास ही पुख्ता करता है। मध्यप्रदेश का धाराजी हादसा कभी भुलाया नहीं जा सकता। बाँध से अचानक पानी छोड़ने से सैकड़ों लोग बह गए थे और इस हादसे की भयावहता छत्तीस घंटे बाद तक भी प्रशासन ने नहीं मानी थी।  ऐसे समय में अपने अनुभव और जानकारी के आधार पर एक बड़ा आँकड़ा ऑन एयर करवाना किसी भी पत्रकार के लिए बड़ा जोखिम है और जुझारू अनुभवी पत्रकार ही ऐसा जोखिम उठा सकते हैं। ‘मौत के आंकड़ों पर पर्दा पढ़ते हुए यही महसूस होता है कि अगर वहाँ ऐसे जिम्मेदार पत्रकार नहीं पहुँचते तो इस हादसे की भयावहता नर्मदा की अतल गहराइयों में सदा के लिए गुम हो जाती। एक आम आदमी कभी भी किसी प्रशासनिक तंत्र से लड़ने और अपनी बात साबित करने में शायद ही कभी सफल हो पाता।
सांप्रदायिक दंगे कर्फ्यू के समय तो मैदानी पत्रकारों की जान भी सूली पर टंगी होती है। उग्र आक्रोशित भीड़ के पास दिमाग नहीं होता वे सिर्फ हड़काये जाते हैं और उन्मादी हो जाते हैं। ऐसे समय का रोमांचपूर्ण वर्णन पढ़ना किसी मिस्त्री मूवी को देखने के सामान ही है। ग्राउंड रिपोर्टर के पास एक आवश्यक गुण होना चाहिए लोगों का विश्वास हासिल कर पाने का। पुष्पेंद्र जी के अनुभव पढ़ते हुए उनके इस गुण की दाद देना पड़ेगी। विपरीत और खतरनाक परिस्थितियों में भीड़ हो या एक अकेला व्यक्ति उसे विश्वास में लेकर जिस तरह जानकारी जुटाने का वर्णन है वह रोमांचित करता है।
चाहे मीडिया हो या कोई अन्य क्षेत्र कहीं स्वार्थ कहीं सम्बन्ध कहीं बंधन आड़े आते हैं क्योंकि सब एक ही सिस्टम में लगभग एक सी मानसिकता से काम करते हैं। किसी की मेहनत को नज़रअंदाज कर देना , तो कभी उसका क्रेडिट किसी और को दे देना या कि किसी छुपे अजेंडा के तहत किसी के काम को ही नकार देना भारतीय तंत्र की सबसे बड़ी खामी है और मीडिया भी इससे अछूता कैसे रह सकता है ? ‘क्रेडिट गोज तो व्यूवर ‘ मंत्री तंत्र मंत्र और खुलासा ‘ जैसी कुछ स्टोरीज एक क्षोभ उत्पन्न करती हैं तो एक प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करती हैं कि अगर ऐसा है तो फिर ईमानदारी बची कहाँ है ?
एक पत्रकार हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का रिपोर्टर अपने संस्थान के लिए रिपोर्ट बनाते हुए बहुत कुछ देखता और समझता है लेकिन कभी विचारधारा के चलते तो कभी किसी को बचाने के लिए तो कभी अपनी जिम्मेदारी को टी आर पी के हवाले कर देने के कारण बहुत कुछ अनकहा रह जाता है। यह अनकहा उस व्यक्ति के मन को कचोटता है नौकरी की मजबूरियां इसे बाहर आने देने की इजाजत नहीं देतीं लेकिन इससे वह बोझ कम नहीं होता। शायद इसीलिए आज जब सब इलेक्ट्रॉनिक हो रहा है एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पत्रकार कागज कलम से अपनी भावनाओं बंधनों की अभिव्यक्ति कर दुनिया को चमकते मीडिया और देश के पीछे का स्याह सच बताने को प्रतिबद्ध हुआ है। ऐसा सच जिसे जान कर पाठक भी छटपटाता है लेकिन कर कुछ नहीं पाता। लेकिन उम्मीद है एक दिन यह छटपटाहट बदलाव के द्वार खोलेगी। धरती और डरावना सन्नाटा जिस्मफरोशी के हाईवे जैसी स्टोरीज कुछ ऐसी ही छटपटाहट पाठक में भी भर देती हैं।
टी आर पी पाने के लिए झूठी स्टोरी करवाना खतरे उठाकर शूट की स्टोरी को यूं ही जाया होते देखना हाई प्रोफाइल लोगों की और उनके खिलाफ स्टोरी में होने वाले खतरे झूठे केस और मुकदमे में फँसना जैसी कई रोमांचक कहानियाँ किसी हॉलीवुड फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी लगती है। आसाराम की गिरफ़्तारी और उनके राज जानने वाले एक तांत्रिक से मिलाने वाली कहानी टी वी के चमकीले परदे पर प्रसारित होने वाली स्टोरी सबसे पहले के तनाव कई दिनों के अथक घंटों के काम तनाव बॉस का सहयोग तो उसके पीछे छुपे अव्यक्त आदेश की कहानी हैं जो हैरान करती हैं साथ ही सोच में डालती हैं कि यह सबसे पहले की जद्दोजेहद किसलिए लेकिन वहीँ कुछ कहानियों में यही भाव यही जुझारूपन कई अनकही कहानियों को सामने लाता है।
ऐसे ही 31 अध्यायों में लिखी गई एक रिपोर्टर की जिंदगी उसकी कठिनाइयाँ रोमांच और संतुष्टि जिन्हे पढ़ना रोचक है। महसूस होता है कि अगर ऐसे पत्रकार नहीं होते तो क्या यह भयावहता अपने असली स्वरुप में सामने आ पाती ? सभी कहानियों का उल्लेख करना तो पाठक के साथ अन्याय होगा लेकिन सच तो यह है कि इन कहानियों में इतना कुछ है जो चाह कर भी कहा नहीं जा सकता।  यह पुस्तक एक बैठक में पढ़े जाने को ललचाती है लेकिन मुझे हर कहानी पर ठहर कर उसके अनकहे को समझते दृश्य दर दृश्य देखते धीरे धीरे पढ़ना ठीक लगा। इन कहानियों की भाषा सहज और सरल है उकेरे गए दृश्य स्वाभाविक हैं जो चमके परदे पर भी हम जैसे किसी व्यक्ति के होने की तसल्ली देते हैं।
पुस्तक के अंत में टी वी मीडिया की शब्दावली अर्थ सहित दी गई है। इसमें पुष्पेंद्र जी ने कहीं खुद को महिमामंडित करने की कोशिश नहीं की है बल्कि हर मौके पर साथ देने वाले अपने ड्राइवर कैमरामैन स्टिंगर्स पुलिस प्रशासन खबरियों का भी हर संभव जिक्र किया है और इसलिए ये एक प्रामाणिक दस्तावेज बन जाता है। यह तो नहीं पता कि यह पुस्तक मीडिया जगत में कितनी हलचल मचाएगी क्योंकि ऐसे सच को शायद सुना ही नहीं जाता तो स्वीकारने और नकारने की जहमत भी कोई क्यों उठाएगा लेकिन यह तो तय है कि शांत सतह के नीचे यह कुछ हलचल तो जरूर पैदा करेगी और नई पीढ़ी के पत्रकारों को अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध होने को प्रेरित करेगी।
पुष्पेंद्र वैद्य जी को एक बेहतरीन पुस्तक के लिए बधाई। कलमकार मंच को ऐसी पुस्तक का चयन करने के लिए साधुवाद।
समीक्षक -कविता वर्मा
द ट्रुथ बिहाइंड ऑन एयर
लेखक पुष्पेंद्र वैद्य
प्रकाशक कलमकार मंच
मूल्य 120 रुपये
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