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टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा क्रमशः खण्डों में

टीवी 9 भारत वर्ष
टीवी 9 भारत वर्ष

लेखक हैं समरेंद्र सिंह- 

टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा – भाग एक
बाजार में नया चैनल आया है टीवी 9 भारतवर्ष. उसके दो कर्ताधर्ता हैं. एक हैं अजीत अंजुम और दूसरे विनोद कापड़ी. मुझे इन दोनों “महान” पत्रकारों के साथ काम करने का सौभाग्य मिला है. विनोद कापड़ी के साथ दो महीने और अजीत अंजुम के साथ दो साल. इन दोनों ने टीवी न्यूज की दुनिया को बहुत कुछ दिया है. अजीत अंजुम ने सनसनी दी है और विनोद कापड़ी ने खबरों को सनसनीखेज बनाने का तरीका दिया है.
जहां तक मुझे याद आता है इन दोनों ने टीवी 9 भारतवर्ष से पहले कभी भी एक साथ काम नहीं किया. इस लिहाज से ये ऐतिहासिक जोड़ी है. घातक जोड़ी है. इस जोड़ी पर खबरों की दुनिया में नई हलचल पैदा करने की जिम्मेदारी है. क्रांति करने की जिम्मेदारी है. टीवी 9 को देख कर लगता है कि वो ऐसा करने के लिए छटपटा रहे हैं. नया इतिहास रचना चाहते हैं. इसलिए नए-नए आइडियाज पर काम कर रहे हैं. लड़कियों को धाकड़ बना रहे हैं. जरूरी मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस कर रहे हैं. लेकिन बात बन नहीं रही. चर्चा जिस हिसाब से होनी चाहिए वैसी चर्चा हो नहीं रही.
आखिर इसकी क्या वजह है? आखिर इनका दांव क्लिक क्यों नहीं कर रहा? आखिर अजीत अंजुम की चर्चा रवीश कुमार या पुण्य प्रसून बाजपेयी जैसी क्यों नहीं हो रही? ये सोचने लायक सवाल हैं और मैंने तय किया है कि आने वाले कुछ दिनों में मैं इस चैनल को अपने जीवन का कुछ समय दूंगा और ऊपर लिखे सवालों पर विचार करूंगा. फिर अपने विचार आपसे साझा करूंगा. इस क्रम में अतीत के कुछ किस्से होंगे और टीवी न्यूज के मौजूदा क्रांतिकारी स्वरूप पर चर्चा होगी. आज हिंदी के खबरिया चैनल अच्छे-बुरे जैसे भी हैं उन्हें वैसा बनाने में इन दोनों का बड़ा “सनसनीखेज” योगदान है. इनके “सनसनीखेज योगदान” पर चर्चा जरूरी है.

 

टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा – भाग दो

वादे के मुताबिक बीते दो दिन में मैंने टीवी 9 भारतवर्ष को काफी समय दिया. अपने जीवन के कुछ घंटे इस चैनल को समर्पित किए. और इस नतीजे पर पहुंच सका हूं कि ये चैनल दो महान संपादकों अजीत अंजुम और विनोद कापड़ी की कुंठा का उत्पाद है. इसके सभी कर्मचारी इन दोनों की कुंठा को पोषित करने के लिए काम कर रहे हैं. यहां इससे अधिक कुछ नहीं. इस चैनल को आगे बढ़ना है तो उसके इन दोनों संपादकों को अपनी सोच का दायरा बड़ा करना होगा.

टीवी9 भारतवर्ष में कुछ भी नया नहीं है. ये आज भी उन्हीं घिसे-पिटे कार्यक्रमों से बूते कामयाबी की कथा लिखने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें दर्शक बहुत पहले खारिज कर चुके हैं. ये सनसनी और सनसनीखेज से ऊपर आज भी नहीं उठे हैं. इस मामले में ये राहुल गांधी से भी पीछे चल रहे हैं. उम्र के साथ राहुल गांधी में बहुत सुधार हुआ है, लेकिन इनमें कोई सुधार नहीं हुआ है. ये आज भी वही अजीत अंजुम और विनोद कापड़ी हैं जो दस साल पहले थे.

आपको अजीब लग रहा होगा. आप सोच रहे होंगे कि मैं एक अदना सा दर्शक देश के दो महान संपादकों की “कलाकृति” को कैसे खारिज कर सकता हूं? कोई भी न्यूज चैनल सैकड़ों कर्मचारियों का प्रोडक्ट होता है. मैं सैकड़ों लोगों के सामूहिक कर्म को इतनी बेदर्दी से कैसे नकार कर सकता हूं? यह तो एकदम निर्दयी होना है? चैनल में दर्जनों रिपोर्टर काम करते हैं. वहां एक भरीपूरी संपादकीय टीम होती है. फिर मैं इसे दो लोगों की कुंठा का उत्पाद कैसे कह रहा हूं? अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप अपनी जगह सही हैं. लेकिन यही तो पुराना दस्तूर है. यश और अपयश दोनों “लीडर” का होता है. सिपाहियों और सिपहसालारों की बात कभी-कभार ही होती है. इसलिए आज का टीवी 9 भारतवर्ष अजीत अंजुम और विनोद कापड़ी का उत्पाद है. और इन दोनों की छाप इस उत्पाद के हर पहलू पर नजर आती है.

किसी भी चैनल के कुछ फ्लैगशिप कार्यक्रम होते हैं. इस चैनल ने भी कुछ ऐसे कार्यक्रम लॉन्च किए हैं. इनमें एक है “राष्ट्रीय बहस”. इसका चेहरा भी अजीत अंजुम ही हैं. दूसरा शो है “धाकड़ लड़कियां”. अजीत अंजुम के शो की चर्चा बाद में करेंगे. शुरुआत “धाकड़ लड़कियां” से करते हैं. नाम से यह शो क्रांतिकारी लगता है. ऐसी उम्मीद जगती है कि इस शो के जरिए लड़कियां पुरुषों की बनाई इस स्त्री विरोधी व्यवस्था में बदलाव की बयार बहाएंगी. कुरीतियों को चुनौती देंगी. धर्म और समाज की बेड़ियों से स्त्री को आजाद करेंगी. स्त्री अधिकारों और हितों की बात करेंगी.

लेकिन जब उन्हें उत्तर प्रदेश में एक दो कौड़ी के नेता राजू पंडित के पीछे भागते देखा तो अहसास हुआ कि इस शो में ऐसा कुछ भी नहीं है. बस कहने को ये लड़कियां धाकड़ हैं. काम तो वही छिछोरे मर्द रिपोर्टरों वाला है. अजीत अंजुम और विनोद कापड़ी ने लड़कियों को बदनाम करने के लिए ये शो लॉन्च किया है. यह बताने के लिए कि लफंगे सिर्फ लड़के ही नहीं होते, लड़कियां भी हो सकती हैं. इनकी ये सोच शुरू से इतनी ही हल्की रही है.

इनकी सोच समझाने के लिए मैं आपको 16 साल पीछे 2003 में ले चलता हूं. उन दिनों में स्टार न्यूज़ में था. मुंबई में. उस दौर में टीआरपी का एक ऐतिहासिक फॉर्मूला विकसित हो रहा है। टीवी इंडस्ट्री के कुछ लफुआ किस्म के लड़कों को अलग अलग चैनलों और प्रोडक्शन हाउस की कमान मिल गई थी और ये सभी कामयाबी का ऐतिहासिक फॉर्मूला विकसित करने में जुटे थे. 3C1S फॉर्मूला. क्राइम (Crime), क्रिकेट (Cricket), सिनेमा (Cinema), और सेक्स (Sex) फॉर्मूला. ये फॉर्मूला करीब 6-7 साल कामयाब रहा. उस ऐतिहासिक फॉर्मूले के शुरुआती दौर में स्टार न्यूज पर एक क्राइम शो लॉन्च हुआ. उस शो का नाम था सनसनी. उसका प्रोडक्शन बीएजी फिल्म के पास था. और अजीत अंजुम घूम-घूम कर उसे अपना “बेबी” बताते थे. “बेबी” मतलब ब्रेन चाइल्ड. अपने उस ब्रेन चाइल्ड में इन्होंने दिल्ली में चल रहे सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ किया. इनके रिपोर्टर क्लाइंट बन कर अखबारों में दिए गए नंबर पर फोन करते और जब लड़कियां और दलाल तय जगह पर पहुंचते तो ये उन्हें कैमरे पर रिकॉर्ड करने लगते. लड़कियों को दौड़ाने लगते. और फिर अगले दिन इस पूरे घटनाक्रम को सिलसिलेवार तरीके से सनसनी में पेश करते. जैसे कितना बड़ा तोप चलाया हो. इस कॉन्सेप्ट में क्राइम और सेक्स दोनों था.

अब सनसनी के इस पूरे प्रकरण पर जरा गौर कीजिए. जिस्म का कारोबार मानव सभ्यता का सबसे क्रूर और पुराना धंधा है. अगर संवेदनशील शख्स को इस पर स्टोरी करनी हो तो वो क्या करेगा? यही न कि इस धंधे में लड़कियों को किस तरह घसीटा जाता है? उनकी स्थिति कितनी चिंताजनक है? वो किन-किन स्तरों पर शोषण की शिकार हो रही हैं? उनके घर परिवार और उनके संतान की क्या पीड़ा है? वो सभी किस तरह की जिंदगी जी रहे हैं? इस रैकेट के तार ताकतवर लोगों तक कैसे जुड़ते हैं? और वो ताकतवर लोग कौन हैं? कोई भी संवेदनशील शख्स इस धंधे के अमानवीय पहलुओं को सामने लाएगा और सेक्स वर्कर्स की स्थिति में कैसे सुधार हो इस पर रोशनी डालेगा. लेकिन अजीत अंजुम के कॉन्सेप्ट में ऐसा कुछ भी नहीं था. सिर्फ सनसनी थी.

आखिर इस सनसनी वाली सोच का आधार क्या है? इस सोच का आधार खुद को खुदा समझना है. “मैं दूसरों का भविष्य तय करूंगा”. “मैं महान पत्रकार हूं” और पत्रकारिता का मतलब तो दूसरों को “एक्सपोज” करना ही है. “मैं सबकी बजा दूंगा”. अब सत्ता के शीर्ष पर मौजूद भ्रष्ट अफसर, नेता, न्यायाधीश तक पहुंचने की हैसियत तो है नहीं. लेकिन नीचे मौजूद, क्लर्क और चपरासी को तो एक्सपोज किया जा सकता है. उन्हें एक्सपोज कर दूंगा. खुदा हूं इसलिए मुझे किसी के भी बेडरूम में घुसने का अधिकार है और किसी को भी कैमरे के सामने बुला कर दौड़ाने का अधिकार है.

धाकड़ लड़कियां के कॉन्सेप्ट में भी यही सोच है. लड़कियां हैं और इन्हें कैमरा देकर और इनके साथ चार-पांच कैमरामैन तैनात करके इन्हें कहीं भी घुसा दो. किसी के दफ्तर में, किसी के घर में, किसी की चुनावी सभा में… कहीं भी पहुंचा दो और फिर वहां की सारी घटना को कैमरे में रिकॉर्ड कर लो. सोच कि लड़कियां हैं तो कोई जल्दी हाथ उठाएगा नहीं और फुटेज भी बन जाएगा. अगर कोई हाथ उठाएगा या बद्तमीजी करेगा तो शो और भी हिट होगा. बड़ा मसाला मिल जाएगा. लेकिन क्या इस घटिया और ओछी सोच को पत्रकारिता कहेंगे? क्या इस दोयम दर्जे की पत्रकारिता से देश और समाज में किसी तरह का सकारात्मक बदलाव आएगा? (जारी…)

 

टीवी 9 भारतवर्ष की समीक्षा – भाग तीन

बात सिर्फ धाकड़ लड़कियों की ही नहीं है. लठैती वाली मानसिकता और दूसरों को निपटा देने की चाहत टीवी 9 भारतवर्ष के कई कार्यक्रमों में झलकती है. इस चैनल का सबसे बड़ा शो है राष्ट्रीय बहस. नाम से जाहिर है कि इसमें देश से जुड़े किसी न किसी बड़े मुद्दे पर बहस होती है. बहस को संचालित करते हैं अजीत अंजुम. हर आदमी के जीवन में कुछ सपने होते हैं. कुछ चाहत होती है. अधूरे सपने और अधूरी चाहतें इंसान में कुंठाओं को जन्म देती हैं. मेरे अंदर भी कई तरह की कुंठाएं हैं. गाना चाहता हूं लेकिन गला बहुत ही बेसुरा है. नाचना चाहता हूं, लेकिन सोच में अकड़न इतनी ज्यादा है कि कमर हिलती ही नहीं. पैर थिरकते ही नहीं. सोचता हूं कि गंगा किनारे घर होता, खेत खलिहान होता, खुली हवा में सांस लेता, लेकिन यहां दिल्ली के नर्क में झुलस रहा हूं. इसी तरह अजीत अंजुम में भी कई तरह की कुंठाएं हैं. जिन दिनों मैं बीएजी फिल्म में काम करता था, अजीत कहा करते थे कि अंग्रेजी नहीं आती वरना कमाल कर देता. अजीत अंजुम बड़ा बनना चाहते हैं. बहुत बड़ा बनना चाहते हैं. लेकिन बड़ा बनने के लिए बड़ी सोच होनी चाहिए, बड़ा दिल होना चाहिए. वो है नहीं इनके पास. सोच भी छोटी है. दिल भी छोटा है. इसलिए बड़ा नहीं बन पा रहे थे. इसकी वजह से कई तरह की कुंठाएं घर कर गईं हैं।

पिछले एक दशक में खबरिया चैनलों के चाल और चरित्र में कई तरह के बदलाव आए. पहले एंकर बनने की कुछ शर्तें होती थीं. हिंदी का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए. शक्ल-सूरत ठीक होनी चाहिए. चेहरा फोटोजेनिक होना चाहिए. आवाज में वजन होना चाहिए था. लेकिन जब से बहस का दौर शुरू हुआ तब से ये मापदंड बदल गए. हिंदी चैनलों की स्क्रीन पर बेतरतीब दिखने वाले मर्द कुकुरमुत्ते की तरह उग आए. एक वाक्य भी शुद्ध और पूरा बोलने में नाकाम पुण्य प्रसून बाजपेयी बड़े एंकर बन गए. र और ड़, श और स में फर्क करने में नाकाम मनोरंजन भारती एंकरिंग करने लगे. ठेठ बिहारी अंदाज में और रगिया-रगिया कर स्टोरी प्रस्तुत करने वाले रवीश कुमार तो सदी के सबसे महान पत्रकार बन गए. इन सबकी शोहरत ने अजीत अंजुम को प्रोत्साहित किया. उन्हें कामयाबी का मंत्र दिया. अजीत अंजुम को लगा कि बड़ा बनने के लिए अंग्रेजी क्या, हिंदी आने की भी जरूरत नहीं है. आप हकला-हकला कर हिंदी बोलते हों, अशुद्ध बोलते हों… तो भी बड़ा बन सकते हो. थोड़ा सा बेशर्म होने पर भारतीय समाज की कुंठा को कैश कर सकते हैं. यह संभावना देखने के बाद अजीत अंजुम टीवी के पर्दे पर उतर गए और उन्होंने अपने शो की शुरुआत न्यूज 24 से कर दी.

मगर यहां एक बुनियादी दिक्कत थी. पर्दे पर उतर तो गए, लेकिन रवीश कुमार जैसा खुला मंच नहीं मिला. प्रवचन देने का मंच नहीं मिला. वह स्पेस नहीं मिला जो स्पेस डॉ प्रणॉय रॉय ने रवीश कुमार को दिया है. इस दिक्कत से उबरने की जुगत लगाते कि उसी बीच एक हादसा हो गया. उन्हें न्यूज 24 छोड़ कर इंडिया टीवी जाना पड़ा और वहां वह स्पेस भी छिन गया, जो न्यूज 24 में मिला था. इसलिए बड़ा नहीं बन पा रहे थे. छटपटाहट बढ़ती जा रही थी. बेचैनी चरम पर थी. ताव तो खूब था, लेकिन ताव दिखाने की जगह नहीं थी. ताव इधर-उधर भटक रहा था. कभी इस गार्डन ताव तो कभी उस गार्डन ताव. खैर, उसी बीच टीवी 9 भारतवर्ष की लॉटरी लगी. इतिहास रचने का मौका लगा. पर्दे पर छा जाने का मौका मिला. रवीश कुमार ने जो फासला 8-10 साल में तय किया है उसे जल्द से जल्द पाटना था. इसलिए इन्होंने टीवी 9 भारतवर्ष में किसी स्टार एंकर को भर्ती नहीं किया. खुद की स्टार बन गए.

स्टार तो बन गए. लेकिन कहीं दूर टिमटिमा रहे थे. लोगों तक रोशनी कैसे पहुंचे इसका जुगत लगाना था. काफी सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि दो-चार बड़े विकेट गिरा दूंगा तो चर्चा होने लगेगी. इसलिए उन्होंने विकेट गिराना शुरू किया. एक के बाद एक नेताओं का शिकार करने लगे. रवि शंकर प्रसाद, प्रज्ञा ठाकुर, मुनमुन सेन, उदित राज जैसे कई नेताओं को माइक उतार कर जाने पर मजबूर कर दिया. हर शिकार के बाद इनकी टीम मैदान छोड़ कर जाने वाले सीन का प्रोमो बनाती और चलाने लगती कि अजीत अंजुम के सवाल सुन कर भाग खड़े हुए फलाना-ढिमकाना नेता. कमाल की पत्रकारिता है. सवाल से जवाब तलाशने की जगह गेस्ट को भगा देने की पत्रकारिता.

ये एक नया चलन शुरू हुआ है. टीवी स्क्रीन पर लठैती का चलन. जब से रिपोर्टरों की अहमियत खत्म हुई है और स्टार एंकरों का चलन बढ़ा है इस किस्म की पत्रकारिता होने लगी है. गेस्ट को बुलाने के लिए रिपोर्टर और गेस्ट कोऑर्डिनेशन में तैनात गुर्गे अपना सबकुछ दांव पर लगा देते हैं और अजीत अंजुम जैसे स्टार एंकर उन मेहमानों का शिकार करके उनकी सारी जमापूंजी एक झटके में उड़ा देते हैं. सुर्खियां बटोर लेते हैं. इसे आप परजीवी पत्रकारिता कह सकते हैं और अजीत अंजुम जैसे पत्रकारों को परजीवी पत्रकार का दर्जा दे सकते हैं. जमीन पर तैनात रिपोर्टरों की कीमत पर मोटे हुए परजीवी पत्रकार. अजीत अंजुम की परजीवी पत्रकारिता का अध्ययन करने के लिए यू-ट्यूब पर मैंने दर्जनों वीडियो क्लिप देखे. हर वीडियो क्लिप में एक भाव मौजूद था. बजा देने का भाव. रगड़ देने का भाव. आखिर किसी को भी रगड़ देने का यह भाव पत्रकारों में कहां से आया? किसी को भी रगड़ देने का अधिकार उसे किसने और क्यों दिया है? … (जारी)

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