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करण थापर साहब की किताब और मेरी बात

'डेविल्स ऐडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी

– दामिनी यादव, वरिष्ठ उप सम्पादक, गृहलक्ष्मी पत्रिका दिल्ली
‘मेरी अनसुनी कहानी- और मशहूर टीवी कार्यक्रम ‘डेविल्स एडवोकेट’ के दिलचस्प किस्से’ के बारे में मेरी ये बातें सिर्फ़ मेरे विचार हैं। इन्हें करण थापर साहब की इस किताब की समीक्षा हर्गिज़ न समझा जाए। मैं मानती हूं कि किसी भी किताब के बारे में जानने के इच्छुक लोगों को ख़ुद उस किताब को पढ़कर ही उसके बारे में कोई राय बनानी चाहिए। दूसरे के पढ़े के आधार पर कोई राय कायम करना, मुझे दूसरे के खाए के आधार पर अपना ज़ायक़ा तय करने जैसा लगता
है, जबकि असल में किसी को नमक तेज़ या कम पसंद होता है तो किसी की सोच तीखेपन के मामले में अलग होती है। यही बात समीक्षाओं के मामले में भी मैंने हमेशा ही महसूस की है, चाहे वह फिल्म की हो या किताब की। मेरे लिए ये समीक्षाएं उस फिल्म या किताब की ‘इंविटेशन कार्ड’ से ज़्यादा कुछ नहीं रही हैं। मेरी बात तो महज़ मेरे कुछ सवाल हैं। इन्हें इसी रूप में रहने दिया जाए।
बहरहाल, करण थापर साहब की किताब ‘मेरी अनसुनी कहानी’ ख़त्म किए कई रोज़ गुज़र चुके हैं। इस पर मुझे कुछ कहना ज़रूर है, ये फ़ैसला तो इस किताब के कुछ पन्ने पढ़ने के दौरान ही ले लिया था, उस कहने का मकसद बस कहना-भर न हो, यही इस देरी की वजह है। इस किताब के ज़रिये से इसके लेखन और वर्तमान प्रकाशन व्यवस्था, दोनों ही पर कहा तो बहुत कुछ जा सकता है, जो ज़रूरी भी है और जायज़ भी और वक़्त का तकाज़ा भी; फिर भी अतिरिक्त विस्तार में जाए बिना, जितने कम से कम में अपनी बात कह सकूं, यही मेरी कोशिश है।
विस्तार के लिए किताब मौजूद है ही बाज़ार में ख़रीदकर पढ़ने वालों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए। इसी क्रम को उल्टा करते हुए, अपनी बात को मैं दो हिस्सों में बांट रही हूं। पहली बात इस पुस्तक के प्रकाशित रूप के बारे में। करण थापर साहब की ये किताब उनकी मूल रूप से इंग्लिश में लिखी किताब ‘डेविल्स एडवोकेट- द अनटोल्ड स्टोरी’ का हिंदी अनुवाद है, जिसे मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने प्रकाशित किया है। बात की शुरुआत यहीं से करती हूं। आमतौर पर मैं किसी भी किताब के अनुवाद, ख़ासकर हिंदी में किये गए अनुवाद को पढ़ने से बचने की कोशिश करती हूं, क्योंकि एक अर्से से मैं इन अनुवादों का जो स्तर देख रही हूं, वह इतना सिर
चकरा देने वाला, अर्थ का अनर्थ होता है कि मूल किताब पढ़ने के बाद वाकई दोबारा कोई अनुवाद पढ़ने की तौबा करा देता है। ये अनुवाद किताब की मूल आत्मा का पूरी तरह से क़त्ल होते हैं और ऐसा छुटपुट प्रकाशनों के साथ ही नहीं है, बल्कि बदक़िस्मती से दिग्गज कहे जाने वाले प्रकाशनों तक पर यह बात लागू हो रही है । ये बात मैं एक पाठक और एक संपादक, दोनों की ही हैसियत से कह रही हूं। इनमें भाषा, व्याकरण की शुद्धियां और उसके नियम की बात तो छोड़ ही दीजिए, एक सीधा-सादा वाक्य भी ‘गूगल ट्रांसलेशन’ की मदद की बदौलत दम तोड़ चुका होता है, जबकि भाषा के सही स्वरूप में तो एक कौमे का भी इतना रोल होता है कि वह सही
जगह लग जाए तो एक अर्थ पैदा करता है, वर्ना अनर्थ तो हम देख ही रहे हैं। करण थापर साहब की ये किताब भी इस बात का अपवाद नहीं है, चाहे इसका प्रकाशन मंजुल पब्लिशिंग हाउस जैसे बड़े नाम ने ही क्यों न किया हो! इस किताब में छोटे-छोटे, साधारण से वाक्य भी पूरा करने में इतनी बेतरतीबी है कि किताब
पढ़ने का मज़ा बार-बार ख़राब होता है, जबकि किताब ‘द करण थापर’ की होने से अपना एक अलग ही दर्जे का सम्मोहन पैदा करने की क्षमता रखती है, जोकि ख़राब अनुवाद ने पैदा होने से पहले ही मार डाला। प्रूफ़-रीडिंग की ग़लतियों की भरमार, ग़लत वाक्य संरचना, ग़लत शब्द चयन, वाक्यों की तारतम्यता का अभाव, भाषागत जानकारी की भारी कमी इतनी अखरी है कि प्रकाशक, अनुवादक, संपादक और प्रूफरीडर, इन सभी को कटघरे में खड़े करने का हक़ हर उस व्यक्ति को जाता है, जिसने अपनी जेब से दाम चुकाकर ये किताब ख़रीदकर पढ़ी है, जैसे- मैं। क्यों ये सभी ऐसी किताबों को छूते हैं, जिसके साथ ये न्याय नहीं कर पाते? क्यों ये इस बात
को भूल जाते हैं कि कुछ अपवाद स्वरूप रचनाओं को छोड़कर, सभी किताबों का ट्रांसलेशन अपने-आप में एक क्रियेशन होता है। इस किताब जैसी किताबों का तो अनुवाद ऐसा होना चाहिए कि पढ़ते हुए पता ही न चले कि कोई अनुवाद पढ़ा जा रहा है। इसके लिए कोई ज़रूरी नहीं है कि भाषा का पंडित ही हुआ जाए। आज की सहज-सरल, बोलचाल की भाषा ही क्या बुरी है! हर भाषा का अपना एक सौंदर्य होता है, विन्यास होता, सहजता होती है, प्रवाह होता है, वाक्य- संरचना होती है, बोली-मुहावरे-लोकोक्तियां-कहावतें और व्यंग्य होते हैं, जिनकी समझ इस तरह की किताब के प्रकाशन और अनुवाद के पहले से होनी चाहिए, क्योंकि यहां अनुवाद शब्दों का
नहीं, ‘अर्थों’ का होता है। फिर जब शब्द किसी करण थापर सरीखी शख़्सियत के हों तो ये सावधानी और बढ़ जाती है, क्योंकि जो तीखापन, कटाक्ष, बताते-बताते छिपाना और छिपाए हुए को न कहकर भी कह देना इनकी शैली की ख़ासियत है, वह समझना ही अपने-आप में कम बड़ी चुनौती नहीं है। इसे साधारण सी किताब मानकर, गूगल ट्रांसलेशन की मदद से अनूदित कर देने का हश्र वही होता है, जो इस किताब और इसी जैसी दूसरी किताबों का आजकल हो रहा है।
छटांक भर अच्छा लिखने के लिए मन भर अच्छा पढ़ना पड़ता है, लेखन-प्रकाशन से जुड़े कितने लोग आज इस बात की अहमियत समझने के बावजूद इस पर अमल भी करते हैं? अंग्रेज़ी से हिंदी के कितने अनुवादक हिंदी की वर्णमाला भी उतनी ही सहजता से ज़बानी सुना सकते हैं, जैसे अंग्रेज़ी की एबीसीडी? कितने लोग हिंदी के किसी शब्द पर संदेह होने या उसका सही ढंग पता न होने पर शब्दकोश को देखने में अपने ‘दिग्गजपने’ की हेठी नहीं महसूस करते या ऐसा करते हुए उन्हें आलस नहीं आता? इन सवालों के ईमानदार जवाबों की कमी ही इस किताब के हिंदी अनुवाद का सच है। मैं जानती भी हूं और मानती भी हूं कि आज पुस्तक प्रकाशन भी महज़ एक धंधा है। इसमें बहुत ज़्यादा नैतिकता में पड़ना बेवकूफ़ी समझी जा रही है आजकल। धांधली चाहे किसी भी रूप में हो, जिससे, जितनी हो सकती है, कर रहा है। कुछ ही अर्सा तो हुआ इस बात को, जब दिल्ली के जाने-माने, दिग्गज प्रकाशक, मेरे एक मित्र ने ये बात कही थी कि- हमारे पिताजी ने पुस्तक प्रकाशन का काम शुरू किया था, इसलिए हम ये चला रहे हैं। अगर उन्होंने जूतों का शोरूम खोला होता तो हम वह चला रहे होते। बात तो ‘बेचने’ की ही है न। फिर धंधे में दिल
लगाना दिमाग़ को अंधा करना होता है।
मैं सलाम करती हूं अपने मित्र की इस ईमानदारी को। बेशक, कड़वे ढंग से ही कहा गया है, मगर है तो सच ही कि किताबें भी ‘धंधा’ करा सकती हैं। सो नामी-गिरामी रचनाकारों की किताबों के चाहे मूल प्रकाशन की बात हो या फिर चर्चित या ‘बिकाऊ’ लगने वाली किताबों के अनुवाद की बात, बस उसे छापने के अधिकार मिलने की देर है, दिखने-लुभाने लायक तरीके से छाप दो, भले ही भाषा के स्तर पर उसकी बदसूरती ख़ूबसूरत कलेवर भी न छिपा पा रहा हो। अब मैं आती हूं इस किताब से जुड़ी अपनी बात के दूसरे पहलू पर, यानी लेखन पर। मुझे ख़ूब अच्छी तरह से पता है कि ये करण थापर साहब की लिखी किताब है। करण थापर साहब अपने- आप में पत्रकारिता का एक इंस्टिट्यूट हैं। उनका कोई शो देख लेना, उनका लिखा एक पीस पढ़ लेना या उनसे कुछ पलों के लिए मिल लेना ही पत्रकारिता का एक पाठ पढ़ लेने के समान होता है। उनके लिखे को पढ़ने-समझने तक के लिए भी बहुत सलाहियत की ज़रूरत है। फिर उनके लिखे के बारे में समीक्षात्मक रूप से एक भी शब्द कहने से पहले सौ बार सोचने की ज़रूरत है। सो, मैंने सौ बार सोच लिया। अब एक सौ एकवीं बार में मुझे लगता है कि मुझे अपनी बात
ईमानदारी से कह देनी चाहिए।
ठोस डॉक्यूमेंटेशन होने के बावजूद एक किताब को क़ायदे से पूरा होने में अच्छा-ख़ासा अर्सा लग जाता है। ऐसे में सिर्फ़ यादों के सहारे महज़ पांच महीने की समय-सीमा में इस किताब को पूरा कर लेना ऐसा काम है, जिसे कोई करण थापर सरीखा ही कर सकता है। इसमें करण साहब के बचपन से लेकर, पत्रकारिता की दुनिया में दाख़िल होने और फिर इस दुनिया के तिलिस्म से जुड़े उनके निजी तजुर्बात की बात की गई है। बेशक, ये एक ऐसी किताब है, जो दोनों को ही पढ़नी चाहिए; पत्रकारिता करने वालों को भी और पत्रकारिता कराने वालों को भी। ये किताब इस बात को और मज़बूती से कहती है कि सलीक़ा काम करने का ही नहीं होता, काम कराने का भी होता है। ग़लतियां सिर्फ़ उसी से नहीं होती हैं, जो काम ही नहीं करते। जो काम करते हैं, वे ग़लतियां भी करेंगे, क्योंकि बिगाड़ना कुछ बनाने का, बना लेने की कोशिशों का
हिस्सा होता है। इस बात को करण थापर साहब के बॉस चार्ली के उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है। आज पत्रकारिता की दुनिया में अपने जूनियर्स की कॉपी का, उनकी राइटिंग का मज़ाक़ उड़ाने में, उनके आत्मविश्वास को ही नहीं, स्वाभिमान तक को कदम-कदम पर कुचलने वाले कितने एडिटर्स में चार्ली की ख़ूबियां होंगी, जिनकी नुक़्ताचीनी का मक़सद कुछ संवरना होता है, संवरने की सलाहियत रखने वाले को बिगाड़ना नहीं। शायद ही कोई विरला हो। कम से कम मेरे दो दशक के तजुर्बे का तो ऐसा होना ‘बाक़ी अरमान’ है। यही बात दूसरे पक्ष पर भी निर्भर करती है कि कितने नौसिखियों में ख़ुद को नौसिखिया मानकर
अपनी ग़लती के बारे में टोकने-बताने पर, बिना अपने सीनियर्स के बारे में नकारात्मक राय बनाए मान लेने, सुधार लेने की सलाहियत है, जैसाकि हमेशा करण थापर साहब करते रहे। ये भी विरले ही हैं। ये मेरे पिछले एक दशक से ज़्यादा का ‘सबक’ है। कम ही लोग होते हैं, जिन्हें करण थापर साहब की तरह शुरू में ही ये समझ आ जाता है कि उन्हें करना क्या है। आज के ज़्यादातर पत्रकारों का जीवन ‘कुछ करने’ की प्रयोगशाला सरीखा ही लगता है। कई जगहों पर करण थापर साहब ग़लत बोल देते हैं, ग़लत लिख देते हैं, लेकिन वे ख़ुद को सही करना जानते हैं। उन्हें है ख़ुद पर ये भरोसा कि वे आख़िरकार सब ठीक कर लेंगे।
शायद यही बात करण थापर को करण थापर बनाती है।
वैसे हिंदी में ख़ालिस अंग्रेज़ीदां करण थापर साहब को पढ़ना उन्हें मेरे पास कम, दूर ज़्यादा ले जाता है। हमें गरियाए जाने के बावजूद हिंदी के झोलाछाप पत्रकार ही अपने ज़्यादा क़रीब और ज़्यादा ‘मौलिक’ लगते हैं। ख़ुद करण साहब भी एक जगह इस बात को कहते हैं कि भारत में उनके टीवी शोज़ उन लोगों के बीच ज़्यादा पसंद किए गए, जिनके लिए अंग्रेज़ी की दुनिया बहुत ज़्यादा अपनी नहीं थी और इस दूरी को वे पाटना चाहते थे। इस बारे में करण साहब इस
किताब के पेज नंबर 90 पर कहते हैं- ‘भारत में अंग्रेज़ी बोलने वाले शहरी मध्यम वर्ग के लिए यह क्रांतिकारी था। हालांकि हमारी पत्रकारिता बहुत अच्छी नहीं थी और हमारे प्रॉडक्शन मूल्य भी कमज़ोर थे और कभी-कभी घटिया भी, लेकिन दर्शक समझते थे कि उन्हें वह मसाला मिल रहा है, पश्चिमी देश जिसके अभ्यस्त हैं। मैंने उन्हें फील गुड का एहसास कराया। उस वक़्त जो हम नहीं जानते थे, वह यह कि बड़ी मात्रा में दर्शक ऐसे भी हैं, जो आनंद के लिए देखते हैं। वे अंग्रेज़ी बोलना नहीं जानते थे, लेकिन बोलना चाहते थे। चूंकि भाषा एक ऐसे सपने का प्रतिनिधित्व कर रही होती थी, जिसे वे हासिल करना चाहते थे, इसलिए वे उसे समझना चाहते थे। आईविटनेस और न्यूज़ट्रैक उसका माध्यम बन गए।’ करण थापर साहब की आभिजात्य पृष्ठभूमि, उनकी नफ़ासत, देश-विदेश की जानी-मानी शख़्सियात के साथ उनका हमप्याला-हमनिवाला होना, संजय गांधी का उनके घर में बैठकर ख़राब रेडियो ठीक कर देना, बेनज़ीर भुट्टो के साथ कॉलेज कैंपस की यादें, आंग सान सू के साथ की घनिष्ठता जैसी बहुत सारी बातें किसी दूसरी दुनिया के ‘पत्रकार’ की बात लगती हैं।
शायद क्लासिक अंग्रेज़ी की समझ रखने वाले पत्रकारों तो क्या, पाठकों के लिए भी इसमें कुछ अनूठा न हो, हिंदी वालों के लिए तो है और उस शहरी मध्यम वर्गीय अंग्रेज़ी दां के लिए भी, जिनकी बदौलत करण थापर साहब के टीवी शोज़ हिट हुए थे। करण थापर साहब के शो के पहले इंटरव्यूज़ पर आधारित इस तरह के शोज़ का कलेवर बहुत ही अलग होता था। उनमें आत्मीयता की जगह औपचारिकता होती थी और छेड़छाड़ की जगहछद्म, नीरस विनम्रता। प्यार, विश्वास और आत्मीयता की इसी चाशनी में लपेटकर जब करण अपने सिलेब्रिटीज़ के जीवन के अनछुए पलों व पहलुओं को अपने दर्शकों के सामने रखते हैं तो
वह ढब बहुत नयापन लिये था।
अपने कार्यकाल में जब बहुत सारी जगहों पर करण थापर ‘सहजता’ से ग़लती करते हैं और फिर उतनी ही सहजता से ‘सुधार’ लेते हैं तो लगता है कि ऐसा वे ही कर सकते हैं, ऐसा अंग्रेज़ी में ही होता होगा, होता है। हिंदी वालों को तो लतियाके बाहरिया दिया जाता है इतने पर। कुछ जगहों पर करण थापर साहब को पढ़ते हुए ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ फिल्म के डॉक्टर अस्थाना बहुत शिद्दत से याद आते हैं; ख़ासकर कपिलदेव, लालकृष्ण आडवाणी, जयललिता, परवेज़ मुशर्रफ़ और नरेंद्र मोदी जैसे लोगों से उनके साक्षात्कारों के बारे में पढ़ते हुए। इस फिल्म में मेडिकल स्टूडेंट्स के फ्रैश बैच को संबोधित करते हुए डॉक्टर अस्थाना कहते हैं- ‘वी आर नॉट हियर टू मेक फ्रेंड्स। मैंने अपने पच्चीस सालों के करियर में कभी अपने किसी पेशेंट से दोस्ती नहीं की। किसी पेशेंट का दर्द महसूस नहीं किया। सिर्फ़ उस दर्द का इलाज किया। पेशेंट से दोस्ती, हमदर्दी, लगाव एक डॉक्टर की कमज़ोरी हैं।’ पत्रकारिता में भी कुछ ऐसा ही है। आप एक ही साथ बहुत अच्छे पत्रकार और किसी के बहुत अच्छे दोस्त नहीं बन सकते, कम से कम उन लोगों के तो बिल्कुल भी नहीं, जिनका आप इंटरव्यू भी लेना चाहते हैं। ये करण थापर साहब के साथ भी तब मुमकिन नहीं था और आज
भी मुमकिन नहीं है, जब पत्रकारिता अपनी निष्पक्षता के अग्निपरीक्षा-काल से गुज़र रही है और जल ही नहीं रही, बल्कि राख तक हो रही है। हालांकि करण थापर साहब के कई सिलेब्रिटीज़ से चर्चित इंटरव्यूज़ उनकी दोस्ती के कारण ही संभव हो सके, न कि मात्र पत्रकार होने के चलते। एक अच्छा पत्रकार अपने पाठकों-दर्शकों तक सही और सटीक ख़बर को तटस्थता से पहुंचाने का कोई मौका हाथ से शायद ही जाने दे, लेकिन कोई अच्छा दोस्त अपने दोस्त के ‘राज़’ को राज़ ही रखेगा, ‘बेचेगा’ नहीं, कम से कम तो उसके ‘आंसू’ तो बिल्कुल नहीं। फिर अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने की राह पर जो ‘दोस्त’ बिछड़ गए, उसका इतना अफ़सोस क्यों? वे दोस्त थे ही कब? ये तो संबंध ही एक सीढ़ी का था, जहां कभी आप उनके लिए बने, कभी वे आपके लिए बने। जो नहीं बने या बन पाए, उनसे शिकायत क्यों? आपने कौन सी राह चुनी थी, दोस्ती की या पत्रकारिता की?

फिर आपके सिद्धांत जगह-जगह, जगह के हिसाब से क्यों बदले? एक जगह पर आपसे मित्रता और आप पर विश्वास होने के चलते लालकृष्ण आडवानी ने अपने इंटरव्यू में कुछ ऐसा कह दिया, जो आपके दर्शकों के लिए तो मसाला था, मगर लालकृष्ण आडवानी के लिए बड़ी चूक, जबकि आप पर विश्वास के चलते उन्हें वह इंटरव्यू दोबारा शूट हो जाना कोई बड़ी बात नहीं लगा, लेकिन वहां आपका वर्क कमिटमेंट आड़े आ जाता है। अच्छी बात है। अगर लालकृष्ण आडवाणी का दोबारा इंटरव्यू शूट हो जाने का विश्वास ग़लत था, ग़ुस्से में दिए गए इंटरव्यू के बाद जयललिता का दोबारा इंटरव्यू करने के लिए कहलवाना ग़लत था तो नरेंद्र मोदी के महज़ तीन मिनट के इंटरव्यू को पूरा करवाने के लिए कोशिश की नाकामयाबी पर इतना मलाल क्यों? उन्हें दोबारा इंटरव्यू करने, पुरानी बातों को भुलाकर नए सिरे से शुरुआत करने के लिए प्रस्ताव
क्यों? क्या वह तीन मिनट का ‘अधूरा’ इंटरव्यू ही पूरा नहीं था, बल्कि जो आज तक भी उतना ही पूरा है, जितना अपने अधूरेपन में ख़बरों में बने रहने के चलते तब था? क्या अगर वह इंटरव्यू दोबारा होता तो करण थापर साहब के पूछे गए सवालों के, नरेंद्र मोदी के बदले जवाबों से कोई फ़र्क सिर्फ़ इसलिए नहीं पड़ता कि ज़्यादा ज़रूरी ‘सही इंटरव्यू’ नहीं, ‘इंटरव्यू की सही लंबाई’ है तो फिर बाकियों के साथ ये परहेज़ क्यों? और अगर इन बातों से तब कोई फ़र्क नहीं पड़ा तो उन कथित दोस्तियों के टूटने का आज अफ़सोस क्यों? करण थापर साहब से ये मेरे वे सवाल हैं, जिनके जवाब देने की बाध्यता उन्हें नहीं है, क्योंकि मैं भी अपने तजुर्बे से ये बात जानती हूं कि पत्रकारिता में तटस्थता जैसी चीज़ न कल थी, न आज है। इस पेशे में दोस्ती लोग हमसे नहीं, हमारे काम से, हमारे पद से करते हैं। इस सच को इस पेशे में आने वाले जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा; और इस प्रोफेशन से जाने वाले जितनी गहराई तक कभी न भूलें, उतना अच्छा।
बाकी किताब, चाहे वह ख़राब अनुवाद ही क्यों न हो, ऐसी बंद घड़ी होती है, जो दिन में दो बार तो सही समय देती ही है। सो करण थापर साहब की ये किताब सभी को एक बार तो ज़रूर पढ़नी चाहिए, क्योंकि करण थापर और पत्रकारिता में उनकी कार्यशैली एक तेवर का नाम है,
जिसकी ज़रूरत आज की पत्रकारिता में बहुत है…

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