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किताबें करीब लाती हैं- दामिनी यादव

किताबें
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सरेराह, मैट्रो या दूसरे पब्लिक ट्रांसपोर्ट में, किसी पब्लिक प्लेस पर भीड़ में या अकेले बैठे हुए, आज हम जहां भी नज़र दौड़ाते हैं, हर दूसरे व्यक्ति को नहीं, बल्कि लगभग-लगभग सभी को ही सर झुकाए, फोन की दुनिया में गुमशुदा देखते हैं। इसी के चलते ये घोषणाएं भी ज़ोर-शोर से सुनाई पड़ती हैं कि पूरी दुनिया पर तकनीक इस कदर हावी है कि किताबों की दुनिया महज़ कुछ रोज़ की मेहमान है और आख़िरी सांसें गिन रही है। वाक़ई!

मैं सच से नहीं भाग रही, मगर मुझे ऐसा नहीं लगता। मुझे नहीं लगता कि इस दुनिया से किताबों का वजूद मिटने वाला है। मैं ये नहीं कह रही कि ऐसा हो ही नहीं सकता, लेकिन साथ ही मैं ये ज़रूर कह रही हूं कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि किताबों की दुनिया के मुरीद जब 9 अगस्त को ‘बुक लवर्स डे’ के रूप में चुन चुके हैं तो ये इस भूली अहमियत को सभी के लिए यादगार बनाने की कोशिश है।

जो किताबें पढ़ते हैं, वे जानते हैं कि किताबों में एक अनूठी ख़ुशबू होती है, किताबें एक नशा हैं और जो किताबें देखते हैं, घर में एक ख़ूबसूरत सी, छोटी सी लाइब्रेरी सजा लेने की ख़ूबसूरती वे भी जानते हैं। ख़ुद भले ही पढ़ पाते हों या नहीं, लेकिन अगर उनके बच्चे किताबों में खोए दिख जाते हैं तो उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ पा लिया है।

हो सकता है कि अपनी बात कहते हुए मैं इसकी सही तारतम्यता भूल जाऊं, लेकिन मक़सद सही शब्द नहीं, बल्कि शब्दों के सही अर्थ इस संक्षिप्त कहानी के माध्यम से आप तक पहुंचाना है। इस एक लंबी कहानी का सार ये है कि दो व्यक्तियों में एक बड़ी धनराशि को लेकर शर्त लगती है, जिसके चलते उनमें से एक व्यक्ति को एक कमरे में बेसिक ज़रूरत की चीज़ों के साथ एक तयशुदा समयसीमा अकेले काटनी होती है। तब वह व्यकित किताबों का साथ मांगता है। सामान्य मनोरंजक किताबों से शुरू करके धीरे-धीरे वह गंभीर साहित्य की ओर बढ़ता जाता है। उसकी ज़िंदगी, उसका नज़रिया सब कुछ उन किताबों की बदौलत इस तरह से बदलने लगा कि अपनी जीत से केवल एक दिन पहले वह व्यक्ति उस कमरे से बाहर आकर शर्त तोड़ देता है, क्योंकि अब जो धन उसने पा लिया था, उसके सामने दुनिया भर की दौलत बेमानी है, बेकार है।

किताबें, यानी काग़ज़ के कुछ टुकड़े, जिन पर महज़ कुछ शब्द छपे रहते हैं, क्या वाकई इनमें इतनी ताकत होती है कि ये किसी की पूरी ज़िंदगी ही बदलकर रख दें? तो इसका जवाब क्या हो सकता है, ये हमें आपको बताने की ज़रूरत नहीं है। इन शब्दों को पढ़ते हुए इनमें कहीं न कहीं कोई समानता या फिर इस सवाल का जवाब ही ढ़ूंढ़ रहे हैं। जी हां, यही इस सवाल का जवाब भी है। ये बात दुनिया की हर किताब पर लागू होती है। उनके भले ही आप चार पन्ने ही क्यों न पलट लें, आज़माकर देख लीजिएगा, कहीं न कहीं उसकी उपयोगिता साबित हो ही जाती है।

किताबों में सिर्फ़ ज्ञान ही नहीं होता, बल्कि एक ऐसी रोशनी होती है, जो जहां भी पड़े, वहां का थोड़ा अंधेरा तो कम करती ही करती है। ज़िंदगी को और कोई भी रिश्ता, कोई भी जगह अकेला कर सकती है, लेकिन किताबों से जुड़ा रिश्ता न कभी अकेला पड़ने देता है, न ही भटकने। चाहे तो अपने आस-पास ही नज़र डालकर देखिए, भीड़ में अकेले पड़े लोगों की कोई कमी नहीं मिलेगी, लेकिन उन्हीं में कोई ऐसा भी होगा, जिसके हाथों में थमी किताब उसे जज़्बात की एक दूसरी दुनिया से ही जोड़े रखती है। वह भीड़ में तो क्या, कभी भी, कहीं भी अकेला नहीं पड़ सकता।

कभी आप अपने किसी ऐसे परिचित या दोस्त के घर गए होंगे, जिसे किताबें पढ़ने का इतना शौक है कि उसने अपने घर में छोटी-मोटी लाइब्रेरी ही बना रखी होगी। उन किताबों को वह अपनी बेशकीमत चीज़ की तरह, किसी अनमोल दौलत की तरह संभालकर रखता होगा। उन किताबों में उसकी जान इस तरह बसती होगी कि वह वे किताबें किसी को देने को तैयार ही नहीं होता होगा। कभी आप ख़ुद उस जुनून को महसूस करके तो देखिए, किसी और वजह की ज़रूरतें ख़ुद व ख़ुद कम पड़ती चली जाएंगी।

तकनीक का विकास किताबों को आपके हाथ में थमे फोन तक भले ही समेट दे, लेकिन बैटरी फोन की ख़त्म हो सकती है, हाथ में थमी किताब की नहीं। एक्सपर्ट के अनुसार कुछ दूरी बनाने की ज़रूरत फोन के साथ तो पड़ सकती है, किताब के साथ नहीं। यक़ीन कीजिए, किताब आपके दिल की धड़कनों को ख़तरनाक ढंग से बढ़ाएगी नहीं, बल्कि तनाव से बढ़ी हुई धड़कनों को काबू में करने की कुव्वत ज़रूर रखती है। हाथों में थमी किताब हर अकेले पड़ चुके शख़्स का साथ दे सकती है, बिना वजह, बिना शर्त।

किताब की प्रासंगिकता क्या हो सकती है, इसके लिए सिर्फ़ यही एक घटना बता देना काफ़ी होगी इस बात को पूरी करने के लिए। जब जर्मनी में हिटलर वहां के विद्वानों को गैस चैंबर में मरवा रहा था, उनकी किताबें जलवा रहा था, तब एक लेखक, जिसकी किताब उसकी आंखों के सामने जलाई जा रही थी, उसने कहा था- जिस देश में आज किताबें जलाई जा रही हैं, क्या गारंटी है इस बात की कल इस देश में आदमी नहीं जलाए जाएंगे…

ख़ामोश किताबों में इतना शोर होता है कि बहरी सत्ता तक को उसकी आवाज़ सुननी पड़ती है, उससे डरना पड़ता है…जो काम हज़ार तलवारें मिलकर नहीं कर पाती हैं, वह काम एक कलम बड़ी आसानी से कर देती है और उस कलम की ताकत को पहचानने की शक्ति भी किताबों से ही मिलती है।

क्या अब भी आपको लगता है कि किताबों की प्रासंगिकता कभी कम हो सकती है? अगर हां तो कोई एक किताब उठाइए और कुछ देर के लिए ईमानदारी से उसमें खो जाइए। आपका जवाब वहीं छिपा है…

(लेखिका गृहलक्ष्मी पत्रिका दिल्ली में वरिष्ठ उप सम्पादक हैं) 

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