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आज भी कबीर की धार मौजूद हैं – दार्शनिक विनोद मल्ल

 

कबीर दत्ता की रिपोर्ट इंदौर से- 

पिछले दिनों इंदौर के जाल सभागार में स्वरागिनी जन विकास समिति के तत्वाधान में बुद्ध व कबीर नये संदर्भ में नये तथ्यों के साथ विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया |

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ आरम्भ हुआ सर्व प्रथम स्वरागिनी संगीत संस्था द्वारा उनके छात्रो द्वारा कबीर के पदों की प्रस्तुती की गयी , इसके बाद सेमीनार की शुरुआत वरिष्ठ पत्रकार – सीनियर फोटोजर्नलिस्ट सुनील दत्ता ”कबीर द्वारा किया गया , विषय प्रवर्तन करते हुए सुनील दत्ता कबीर ने कहा किकबीर की आवाज कामगारों की आवाज थी कबीर जिस युग में आये उस जमाने में उन्होंने देखा कि पूरी व्यवस्था एक विशेष तरह के मोर्चे के साथ जनशोषण कर रही है | जनशोषण के लिए उस समय के शक्तिशाली लोगो ने कानून से भी बड़ा कानून बना रखा था जिसे धर्म कहा जाता था | धर्म की आड़ में खड़े हो जाने के कारण शोषक वर्ग अपनी चालाकी को दैवी – विधान से जोड़ देता था | आकस्मिक नही था कि कबीर को इस चालाक लोक – वेद – समर्थित दैवी – विधान के खिलाफ आवाज उठानी पड़ी | जिन लोगो के पक्ष में पत्थर , पानी अर्थात मुर्तिया और तीर्थ खड़े थे उनके खिलाफ कबीर को कविता का शस्त्र खड़ा करना पडा ; जिन लोगो के पक्ष में किताबे , मंदिर – मस्जिद लैस थे उन लोगो के खिलाफ कबीर को साधू शब्दावली की सहायता से मुकाबला करने वाला संयम स्थिर करना था |
जिन लोगो ने अपने हितो की रक्षा के लिए पुरोहित , शेख और मुल्ले तैयार कर रखे थे उनके विपक्ष में कबीर ने अपने घर में जुलाहा , मजदुर का कार्य करते हुए श्रम की ताकत से लड़ाई शुरू की | मिथकीय स्तर पर यह लड़ाई राम – रावण की लड़ाई थी , रथी और विरथ की लड़ाई | शोषक वर्ग के शिक्षितों , साधन सम्पन्नो के खिलाफ यह एक गरीब कामगार की लड़ाई थी | सेमीनार आगे बढाते हुए दिल्ली से आये दार्शनिक -लेखक -सिनेमा निर्देश कृष्ण कल्कि जी ने कहा कि कृष्ण और कबीर को जोड़ते हुए कहा कि दोनों के माथे पर बँधी मोरपंखी पर मत जाइये, कृष्ण और कबीर दोनों में हमारी परम्परा और लोक-चेतना बे-ओर-छोर का अपार अन्तर मानती-आँकती आयी है. कहाँ कृष्ण, जो राजमहलों के अभिजात्य सोपानों से कभी नीचे न उतरे… जिनकी राजधानी भी अथाह सागर तक को चुनौती देती रही— और कहाँ कबीर, जिनकी झोपड़ी अपने ज़माने के आम लोगों से बदतर… और वह भी कसाइयों की शहर-बाहर की बस्ती में : खुद कहते हैं वह— “कबिरा तेरी झोपड़ी गलकट्टों के पास” ! जहाँ एक ओर कृष्ण अपने समय में राजाओं के भी राजा की भूमिका निभाते रहे, वहीं दूसरी ओर कबीर दबे-कुचले लोगों को साथ लेकर जीवन-भर जन-चेतना की ऐसी अलख जगाते रहे जो सदियों बाद तक राजसत्ता को अपनी निरंकुश राह में रोड़े की तरह चुभती रही. जहाँ एक ओर कृष्ण भगवत्ता को धरती पर उतारे जाने की प्रतिमा बनकर उभरते हैं, वहीं दूसरी ओर कबीर भगवत्ता की हर प्रतिमा को ताउम्र तोड़ते दिखायी पड़ते हैं. ज़ाहिरन, कृष्ण और कबीर एक नाव के मुसाफिर नहीं हैं; दोनों में दूरी बहुत है, अन्तर बहुत और विषमताएं भी बहुत. दोनों ने हालाँकि आत्मिक स्तर पर अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर को जिया, दोनों ने हालाँकि वैयक्तिक स्तर पर प्रेम के ढाई आखर को अपनी साँसों की गरमी दी— लेकिन लोक के स्तर पर, समाजी परिवेश के स्तर पर, दोनों की भूमिका में और दोनों के अभिगम्य में ज़मीन-आसमान का अन्तर था. इसीलिए हमारी परम्परा ने— जिनमें केवल दार्शनिक और विद्वान ही नहीं, बल्कि आम लोग भी शामिल हैं— उन सब ने कृष्ण और कबीर दोनों को एक-साथ याद करने से हमेशा परहेज़ किया है. मानते हालाँकि वे सब भी कृष्ण और कबीर दोनों को हैं, लेकिन चर्चा दोनों की अलग-अलग ही करते रहे हैं— गोया कि कबीर के साथ जुड़कर कृष्ण की भगवत्ता पर कोई धब्बा लग जायेगा, या फिर कृष्ण के साथ नाम जुड़ने से कबीर की कबीरीयत कुछ कमतर हो जायेगी !
लेकिन तर्कशीलता का वह अंकुर चूंकि तब तक मानव-सभ्यता के लिए नया-नया था, कोमल था, इसलिए उसकी रक्षा के लिए हालाँकि आगे चलकर स्वयं कृष्ण को पुरातनता की पिटी-पिटायी लकीरों के साथ थोड़े-बहुत समझौते भी करने पड़े, लेकिन फिर भी उन लकीरों में भी उन्होंने उस समय तक की तर्कशीलता का समावेश करते हुए उन्हें नया रूप ज़रूर दे दिया, जो कि तब तक के लिहाज से पाखण्ड-शून्य थे
वैज्ञानिक दृष्टि से लबरेज़ बुद्ध ने विश्व के जन-मानस पर भी बहुत गहरा असर डाला है. उनकी समता-मूलक, मध्यम-मार्गीय और तर्कनिष्ठ वैचारिकी ने दुनिया के तमाम देशों में सच को सच की तरह ही पहचानने और परखने की कुव्वत पैदा की है; ढोंग-ढकोसलों को परे हटाकर हताश आदमी को होशपूर्ण इंसान बनानेवालों की जमात तैयार की है— भले ही जिस भारत-भूमि पर उनका प्रादुर्भाव हुआ था, वहाँ से तो कालान्तर में उनके माननेवालों की जमातें उखड़ गयीं… या तमाम किस्म के छल-छद्म-कौशलों का इस्तेमाल करके साज़िशन उखाड़ दी गयीं, क्योंकि तर्कशीलता को आचरण की सभ्यता बनानेवाली उन जमातों का सामना यहाँ उन दकियानूस पोंगापंथियों से था जो अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए तब इसे उस कोटि का एक ऐसा युद्ध मानकर लड़ रहे थे, जिसकी नंगी सच्चाई को बयान करते हुए ‘रश्मिरथी’ में दिनकर ने कहा है कि— “सत्य ही युद्ध में जय के लिए नहीं केवल बल चाहिए; कुछ बुद्धि का भी घात, छल-छद्म-कौशल चाहिए”. ऐसी ही कायराना साजिशों पर अमल करके उस युद्धक मानसिकता के कर्णधारों ने बुद्ध की तर्कशील वैचारिकी के बल से संपन्न शान्तिपूर्ण जमातों का सालों-साल हर तरह से दमन किया; हज़ारों-हज़ार विहारों को जला डाला; अनगिनत भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया. लेकिन जैसा कि सूली पर चढ़ाये जाते वक़्त जीसस ने कहा था कि “हे पिता ! इन्हें क्षमा कर देना, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं”— मतलब यह कि जीसस के शरीर को मिटाने से जीसस की वैचारिकी नहीं मिटती, उसी तरह बुद्ध के माननेवालों के संगठित कत्लेआम से भी बुद्ध की आधारभूत तर्कशीलता मिट तो नहीं सकी… उल्टे, जन-जन के ज़ेहन में वह पैठ ज़रूर गयी. लोगों के दिल-दिमाग में तब स्वाभाविक रूप से तमाम ऐसे सवाल खदबदाने लगे, जो पीढ़ियों तक उनके मन को प्रतिरोध के जज़्बे से भरने का कारण बने. प्रतिरोध की यह आग सुलगती गयी तमाम तरह के पाखंडों के खिलाफ, विभेदकारी गैर-बराबरी के खिलाफ, कर्मकांडों के कांइयापन के खिलाफ, अंधविश्वासों की बे-दिमागी के खिलाफ, ऊँच-नीच व छुआ-छूत की बीमार भावना के खिलाफ, पाठ-पूजा व शिक्षा-दीक्षा पर कुछ लोगों के एकाधिकार के खिलाफ, सच्चे-झूठे आसमानी देवताओं के खिलाफ, ज़मीनी ओझाओं के खिलाफ, भय-प्रलोभनों पर टिकी धरम-पोथियों के खिलाफ, पुरोहितों के ज़ालिम जकड़जालों के खिलाफ, धर्म के नाम पर जारी शोषण के खिलाफ… गरज़ यह कि व्यवस्था और प्रतिष्ठान के हर उस तौर-तरीके के खिलाफ लोगों के मन में तब दिनों-दिन बढ़ता प्रतिरोध प्रज्जवलित होने लगा, जो हर बीतती पीढ़ी के साथ धमनियों के रक्त को कुछ और गरमाता भी गया. प्रतिरोध की यह ज्वाला, जो तर्कशील चेतना से उपजी थी, कबीर तक आते-आते प्रखर हो चुकी थी. चौदहवीं सदी के अंतिम वर्षों में जब कबीर का प्रादुर्भाव हुआ था, उस समय न केवल देश की सामाजिक व्यवस्था ही चरमरा-सी गयी थी बल्कि आस्था के सबरंगी फूल भी अपनी सुगंध से छीजने लगे थे. दक्षिण-भारत के कुछ हिस्सों में तो राज-व्यवस्था फिर भी स्थिति को सँभाले रखने के लिए सचेष्ट थी, लेकिन बाकी भारत में जन-जीवन की हालत चौतरफा बरबादी के साथ गोया होड़ कर रही थी. अनाचार उन दिनों अपने चरम पर था और सदाचार रसातल में. तंत्र के अत्याचारी शिकंजे में बेबस पड़ा लोक अपने हाल पर बिलख रहा था. व्यवस्था शीर्षासन कर रही थी. जनहितों की बलि दी जा रही थी. मुक्ति दिलाने का वायदा करनेवाला भगवान खुद मन्दिर में नज़रबंद था और बस मुट्ठी-भर लोगों को ही दर्शन देने पर मज़बूर भी. खुदाई सोयी पड़ी थी, अजानें भी उसे जगा नहीं पा रही थीं. पण्डितों और मुल्लाओं की तूती बोल रही थी. धर्म पर हावी था पाखण्ड. आडम्बर ही पूजा जा रहा था. मेहनतकशी निन्दित थी और विलास की मठाधीशी सम्मानित. योगी ढोंगी थे और सिद्ध नकली. पुजारी व्याभिचारी थे और संत मक्कार. वर्तमान संत्रस्त था और भविष्य अन्धकारपूर्ण.ज़माने की हालत देखकर अन्धकार उन दिनों हर आम आदमी की आँखों में भी छाने लगा था. अब चूंकि तर्कशील चेतना की जाग्रत् कसौटी थी | इस सेमीनार के क्रम को आगे बढाते हुए गुजरात पुलिस के ए.डी.जी दार्शनिक – च्निताक श्री विनोद मल्ल ने कहा कि जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हुए महानुभाव ने शिरकत की श्री कृष्ण कल्कि ने कबीर और बुद्ध के दार्शनिक पहलू पर बात करते हुए आज के समय में कबीर की प्रासंगिकता पर बात की आज के समय में जिस तरीके से समाज में कर्मकांड का फैलाव हो रहा है उसका विरोध करने की आवश्यकता है और यह प्रेरणा हमें कबीर से मिलती है श्री विनोद मल्ल आईपीएस जो बुद्ध से कभी तक संस्था के प्रमुख हैं उन्होंने भारत की दार्शनिक विरासत को विविधता और बहुलता बाद से परिपूर्ण बताएं हमारे देश की संस्कृति अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के सम्मिश्रण और विकास और अंतर प्रभाव से बनी हुई है और हमें उस पर गौरव करना चाहिए आज बुध का मध्यम वर्ग समाज को संवाद की तरफ ले जाने की प्रेरणा देता है और सारे आपसी मामले बातचीत से हल करने के लिए रास्ता दिखाता है कबीर का ब्रह्म सारे मानव की बराबरी पर जोर देता है और यह बताता है कि जात पात और धर्म पर आधारित भेदभाव आज के समाज के लिए अच्छे नहीं हैं और उनको दूर करने की आवश्यकता है | उन्होंने आगे कहा की अपने बात की शुरुआत विनोद मल्ल ने मालवा की गौरवपूर्ण इतिहास के साथ शुरू की जो की विविधता से भरी हुई है। उन्होंने इस प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों को भी श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राणों की आहुति दी थी ।मालवा पक्षेत्र में कबीर की एक अत्यंत समृद्ध परंपरा है और कबीर के गाने बजाने वाले लोग कबीर के संदेशों का प्रचार प्रसार जनमानस में करते रहते हैं। भारत एक विविधता पूर्ण देश है जिसका इतिहास विविधता से भरा हुआ है। हजारों वर्षों से भारत में अलग-अलग धर्म और संस्कृतियों के लोग एक दूसरे के साथ रहते हुए, एक दूसरे से सीखते हुए, एक समृद्ध साझा संस्कृत का निर्माण किए। हमारे महापुरुषों महावीर, बुद्ध, नागार्जुन शंकराचार्य ,कबीर ,तुलसी ,नामदेव गुरु नानक, विवेकानंद और गांधी ने हमारी परंपरा के तत्वों को जाना और पहचाना। इन्हीं तत्वों को लेकर स्वतंत्रता संग्राम में हम आगे बढ़ते रहे। महावीर और बुद्ध के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत को गांधी ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए अपनाया और इसीलिए हिंदुस्तान का स्वतंत्रता संग्राम दुनिया के दूसरी आजादी की लड़ाईयों से बिलकुल अलग सा दिखता है। अगर हम गांधी, नेहरू, पटेल, अंबेडकर, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जैसे लोगों के विचार सुने और देखें, वो विचार जो इंडियन नेशनल कांग्रेस के अधिवेशन में बार-बार रखे गए, तो हम पाएंगे कि भारत का इतिहास विविधता और बहुसंस्कृतिवादी परंपरा को लेकर के आगे बढ़ता है।
अगर हम भारत की धार्मिक परंपरा की बात करें तो हम पाएंगे कि भारतवर्ष में सभी धर्म के लोग मौजूद हैं और सभी धर्म एक दूसरे की इज्जत करते हैं । वे एक दूसरे से सीखते हुए आगे बढ़ते देखे जा सकते हैं ।इस्लाम का एकेश्वरवाद और वेदांत का अद्वैत ब्रह्म एक दूसरे से करीब दिखता है। इसीलिए भारत में जहां एक तरफ इस्लाम में सूफी परंपरा आगे बढ़ती है वहीं पर हिंदू धर्म में भक्तिकाल विकसित होता है। सूफी परंपरा दक्षिण एशिया की अनूठी परंपरा है। वेदांत की परंपरा में भी रामानुज के ईश्वर की हर व्यक्ति अपने तरीके से आराधना कर सकता है। सबसे खास बात यह है कि आराधना करने का कोई एक रास्ता नहीं होता । जो जिस तरीके से चाहे उस तरीके से ईश्वर की आराधना कर सकता है ।इसीलिए भारतीय परंपरा में धर्म के साथ संगीत, नृत्य और कविता बहुत ही बारीकी से जुड़े हुए हैं । ईश्वर के रूप को लेकर के दो परंपराएं भारत में मौजूद रही हैं – सगुण और निर्गुण। व्यक्ति की अपनी आजादी है कि वह सगुण परंपरा से ईश्वर की आराधना करना चाहता है या निर्गुण परंपरा से। जहां सूर और तुलसी, कृष्ण और राम को लेकर एक मजबूत सगुण परंपरा की रचना करते हैं और महाकाव्यों का निर्माण करते , हैं वहीं कबीर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करते हैं और अपने सीधे-साधे दोहों से समाज की कुरीतियों पर आक्रमण करते हैं। कबीर दास के निर्गुण हमारी संगीत परंपरा में जनमानस में गहरे तक प्रवेश कर चुके हैं। आज का यह कार्यक्रम उसी परंपरा की कड़ी को आगे बढ़ाता हुआ कार्यक्रम है जिसमें माननीय अंजना जी, बनारस से आए हुए ताना-बाना के कलाकार और मालवा प्रदेश के प्रतिष्ठित कलाकार आज आपके सामने संगीत प्रस्तुत करने वाले हैं।
मैं आपको बताना चाहता हूं कि विश्व में कहीं भी इतनी समृद्ध परंपरा कभी नहीं रही है। ज्यादातर धर्मों में ईश्वर एक पूजा गृह या एक किताब तक सीमित हो जाता है । जब कि भारतीय परंपरा में ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, सर्वत्र बिखरा हुआ है। अलग-अलग रूपों में है और संगीत, कविता ,नृत्य, मंदिर और कई बार जंगलों में नदियों में खुली जगहों में भी लोग ईश्वर की आराधना करते हुए देखे जा सकते हैं। बुद्ध से कबीर तक आंदोलन आज से करीब डेढ़ साल पहले शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य भारत की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को सहेजना तथा इसके विविधता पूर्ण , बहुसंस्कृतिवादी परंपरा को मजबूती प्रदान करना है जिससे हम अपने संविधान में लिखे हुए बराबरी, न्याय और आजादी के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचा सकें। आज का प्रयास उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है कार्यक्रम को आगे बढाते हुए स्वरागिनी संस्था के सचिव श्री महेश यादव इ नेतृत्व में कबीर सुर साधिका श्रीमती अंजना सक्सेना जी द्वारा कबीर के गाया गया , इसके बाद कबीर मठ से आये तानाबान के साथियो ने कबीर के पदों पर नये प्रयोग के संग प्रस्तुती दी जिसके चले साभागर में बैठे सारे श्रोता कुछ समय के लिए कबीर मय हो गए | कार्यक्रम में शहीद मेला के संयोजक इ राज त्रिपाठी को उनके इस कार्य के लिए सम्मानित किया गया , इसके साथ ही वरिष्ठ पत्रकार -सीनियर फोटो जर्नलिस्ट , एक्टिविस्ट सुनील दत्ता कबीर , दिल्ली से आये कृष्ण कल्कि जी के साथ दार्शनिक -चिन्तक श्री विनोद मल्ल को संस्था द्वारा सम्मानित किया गया | अंत में स्वरागिनी संस्था की अध्यक्षा श्रीमती अंजना सक्सेना द्वारा आभार व्यक्त किया गया |

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