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दामिनी यादव की 2 कविताएं

दामिनी यादव
दामिनी यादव
  1. बिकी हुई एक कलम…

बिकी हुई कलम के दाम बहुत होते हैं
पर बिकी हुई कलम के काम भी बहुत होते हैं
बिकी हुई कलम को कीचड़ को कमल कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को क़ातिल को सनम कहना पड़ता है
बिकी हुई कलम को मौक़े पर ख़ामोश रहना होता है
और बेमौक़े ‘सरकार की जय’ कहना होता है

बिकी हुई कलम एक खूंटे से बंधी होती है
बिकी हुई कलम की सियाही जमी होती है
बिकी हुई कलम रोती नहीं, सिर्फ़ गाती है
बिकी हुई कलम से सच की आवाज़ नहीं आती है
बिकी हुई कलम शाहों के तख़्त नहीं हिला पाती है
बिकी हुई कलम सिर्फ़ चरण-पादुका बन जाती है

बिकी हुई कलम से आंधियां नहीं उठती हैं
बिकी हुई कलम से सिर्फ़ लार टपकती है
बिकी हुई कलम एक वेश्या होती है
जो अनचाहे जिस्मों को हंसके अपने जिस्म पे सहती है
बिकी हुई कलम की कोख बंजर होती है
बिकी हुई कलम अपनों ही की पीठ में घुसाया हुआ ख़ंजर होती है

बिकी हुई कलम से लिखा इतिहास सिर्फ़ कालिख पुता कागज़-भर होता है
बिकी हुई कलम का कांधा सिर्फ़ अपने शब्दों का जनाज़ा ढोता है
बिकी हुई कलम और जो चाहे बन जाती है
पर बिकी हुई कलम सिर्फ़ कलम ही नहीं रह पाती है
बिकी हुई कलम सिर्फ़ कलम नहीं रह पाती है…

 

  1. ताज़ा ख़बरों का बासीपन

अचानक से मुझे सारी जानकारियां

बेमानी सी लगने लगी हैं,

सड़ांध, ऊब और बासीपन से भरी

लगने लगी हैं सारी ख़बरें,

चांद पर पानी मिलने से

क्या बदल जाएगा,

मेरी प्यास तो मोहल्ले के नल में आया

पानी ही बुझाएगा,

रौशन हों भले ही

और हज़ारों सूरज ही ब्रह्मांड में,

मेरे हिस्से में तो एक अदद बल्ब का

उजाला ही आ पाएगा,

क्या पता खेल में शामिल हो गई है राजनीति

या राजनीति में ही सारे खेल होते हैं,

विदेशी भाषाओं की हमारी जानकारी अब

विदेशियों तक को डराएगी,

तो क्या वह रिश्तों में फैलते

सन्नाटों को भी समझ जाएगी,

दुनिया ख़रीदेगी हमसे अब

तरक्की के साज़ोसामान

तब तो किसानों की लाशें भी अब

पेड़ों से लटकी नहीं नज़र आएंगी,

औरतें गाड़ देंगी अब कामयाबी के झंडे

फिर तो नज़र नहीं आएंगे उनके जिस्म के

रौंदे, कुचले, मसले दुपट्टे,

ऐसी ही जाने कितनी ही ख़बरों से

भरा पड़ा है ये अख़बार,

फिर भी मुझे लगने लगा है ये बेमानी-बेकार

बस एक ही जानकारी मेरे कुछ पल्ले पड़ी है कि

अख़बार और पानी से साफ़ करने पर

आईने चमक जाते हैं,

किरदारों की बात करना तो

मेरे बस में ही नहीं है,

आईनों से ही हटा देती हूं धूल थोड़ी

और ख़ुश हो लूंगी कि

अब आईने पर धूल नज़र नहीं आएगी

और कुछ और दिन

हमारे किरदारों की गंदगी छिपी रह जाएगी…

 

दामिनी यादव
दामिनी यादव

दामिनी फिलहाल गुड़गांव में एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह का हिस्सा हैं।

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