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विराट एवं पुरातन किस्सागोई का हिस्सा है मेरी पत्रकारिताः जयप्रकाश चौकसे

जयप्रकाश चौकसे
जयप्रकाश चौकसे, प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में इस बार हमारे विशेष अतिथि हैं प्रख्यात फिल्म पत्रकार जयप्रकाश चौकसे। हालांकि श्री चौकसे ने फिल्म निर्माण से लेकर फिल्म, रियलिटी शो आदि के लिए पटकथा लेखन भी किया। फिल्म वितरण व्यवसाय से भी जुड़े रहे। लेकिन उनकी मूल पहचान फिल्म पत्रकार के रूप में ही है। इसलिए हम उन्हें इसी रूप में जानते-समझते हैं। जयप्रकाश चौकसे जी का जन्म 1939 में मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में हुआ। अंग्रेजी औऱ हिंदी साहित्य से स्नातकोत्तर करने वाले चौकसे जी ने कुछ वर्ष अध्यापन कार्य भी किया। 5 दशक से ज्यादा समय से फिल्म पत्रकारिता में सक्रिय हैं। कह सकते हैं भारतीय फिल्म पत्रकारिता में सबसे उम्रदराज फिल्म पत्रकार फिलहाल चौकसे साब हैं। दराबा और ताज, दो उपन्यास लिखे हैं उन्होंने, एक कहानी संग्रह। लेकिन चौकसे साब कहते हैं कि पत्रकार मुझे अपनी बिरादरी में शामिल नहीं करते। उनका विचार है कि लेख में किस्से-कहानियां होती हैं। गोयाकि खाकसार किस्सागो है, पत्रकार नहीं। साहित्यकार पांच कहानियों और दो उपन्यासों के प्रकाशित होने के बावजूद मुझे अपनी बिरादरी का सदस्य नहीं मानते, क्योंकि इन रचनाओं में फिल्मों का विवरण है। चौकसे जी कहते हैं कि जनाब जावेद अख्तर साहब ने मुझसे एक बार कहा था कि अगर मैंने अंग्रेजी भाषा में लेखन किया होता तो देश-विदेश से मुझे भाषण देने के लिए निमंत्रित किया जाता, परंतु मेरा विश्वास रहा है कि मनुष्य को उस भाषा में लिखना चाहिए जिसे झाडू की तरह इस्तेमाल करके वह अवचेतन में जमा कचरे को बाहर कर सके। हालांकि मीडिया मिरर ये स्पष्ट करता है कि बेशक उन्हें बहुत ज्यादा देश-विदेश से निमंत्रण न मिले हों, बावजूद श्री चौकसे भारत में फिल्म पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष हैं। अपार लोकप्रियता उन्हें मिली है। देशभर में उनके चाहने वाले लोग हैं। दैनिक भास्कर में 24 वर्षों से लगातार प्रकाशित उनका स्तम्भ परदे के पीछे मील का पत्थर है फिल्म और सामाजिक ज्ञान के संदर्भ में।  

जयप्रकाश चौकसे जी ने सलमान खान अभिनीत बॉडीगार्ड फिल्म की पटकथा लिखी है। इसके साथ ही बिग बॉस औऱ पूर्व में प्रसारित दस का दम के लेखन समूह के अध्यक्ष रहे हैं। फिलहाल कैंसर जैसी भयावह बीमारी से जूझ रहे (हालांकि अब आराम है) श्री चौकसे ने मीडिया मिरर सम्पादक डॉ. प्रशांत राजावत से लम्बी बातचीत की।

यहा प्रस्तुत है बातचीत

प्र. सर सबसे पहले तो बहुत शुक्रिया आपका, जो आपने हमसे बातचीत के लिए सहमति दी। सबसे पहले हम यही जानना चाहेंगे की हिंदी और अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर करने बाद सिवाय किसी अन्य क्षेत्र में जाने की अपेक्षा आपका फिल्म पत्रकारिता में पदार्पण कैसे हुआ।

उ. मैंने सत्रह वर्ष की आय़ु में बुरहानपुर से संगम नामक पाक्षिक पत्र एक वर्ष तक चलाया। जिसका लेखक, संपादक, प्रकाशक एवम हॉकर मैं ही था। घर घर जाकर बेचा है। संगम फिल्म पत्रिका नहीं थी। उसमें तत्कालीन शहर की सामाजिक गतिविधियों का विवरण होता था। मेरे पड़ोस में रहने वाली सुधा गोविंदजीवाला महिला कॉलम लिखती थीं और अरुण कुमार जैन भी कॉलम लिखते थे। दरअसल किताबें पढ़ने के शौक के कारण ही लिखना संभव हुआ। मैंने देवकीनंदन खत्री का भूतनाथ, इब्ने सफी की जासूसी दुनिया से पढ़ना शुरू किया और जवाहर लाल नेहरू, बर्टेन्ड रसेल तथा टी.एस.इलियट तक पढ़ने की यात्रा की है।

प्र. तमाम पिताओं की तरह आपके पिता क्या चाहते थे, कि आप क्या बनें। किस क्षेत्र को रोजगार का जरिया बनाएं औऱ जब फिल्म पत्रकारिता में आ गए तो उनकी क्या प्रतिक्रिया थी।

उ. मेरे पिता श्री बसंतलाल चौकसे आठवीं फेल थे परंतु उन्होंने अपने चारों पुत्रों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। यहां तक कि उन्होंने अपने चारों पुत्रों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए। यहां तक कि उन्होंने हमें शराब पीने का ढंग भी समझाया और अपनी व्यक्तिगत महात्वाकांक्षा हम पर नहीं लादी। उनका निधन असमय हो गया।

जयप्रकाश च
जयप्रकाश चौकसे जी द्वारा लिखी किताब

प्र. 1939 में मध्यप्रदेश के बुरहानपुर में आपका जन्म हुआ। आप मध्यप्रदेश से हैं औऱ बम्बई कैसे जा पहुंचे। मध्यप्रदेश से बम्बई के सफर के बारे थोड़ा बताइए।

उ. बुरहानपुर में मेट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की। इंटरसाईन्स सागर विश्वविद्यालय से पास किया। एम.ए.होल्कर कॉलेज इंदौर से। गुजराती कॉलेज में तेरह वर्ष तक अध्यापन किया। बुरहानपुर से मुंबई कोई योजना के तहत नहीं आना हुआ। बारह वर्ष की उम्र में राजकपूर की आवारा से मंत्रमुग्ध हुआ और आज उम्र के 81वें वर्ष में भी सिनेमाघर जाकर फिल्म देखता हूं। सबकुछ संयोगवश हुआ। सही समय पर सही लोगों से मुलाकात होने को संयोग मानता हूं।

प्र. चौकसे सर 45 वर्षों से ज्यादा समय से आप फिल्म पत्रकारिता से जुड़े हैं। किस तरह से देखते हैं पूरी यात्रा को। विशेषतौर पर तब जब आप कहते हैं कि सिनेमा ने आपको अच्छा इंसान बनाया, जीवन दिया। मैं कहीं सुन रहा था आप कह रहे थे कि सिनेमा में न आते तो खुद को खत्म कर लेते।

उ. हर वर्ष बहुत ही घटिया फिल्में बनती हैं, साथ ही कुछ सामाजिक सोद्देश्यता की फिल्में बनती हैं। घटिया फिल्म में एक दृश्य या एक संवाद बड़ा गहरे अर्थ लिए होता है। मसलन शम्मीकपूर की बंडलबाज में एक शापित जिन कहता है कि आदमी बनकर जीना कितना कठिन है, यह उसने अपनी जिनी ताकतें छिन जाने के बाद जाना। दूसरी ओर गहन गंभीर प्यासा में सर जो तेरा चकराए जैसा गीत है, तो जन्म जन्मांतर की प्रेम कथा मधुमति में गीत है जंगल में मोर नाचा किसने देखा, हम थोड़ी सी पीके बहके सो सबने देखा। फिल्मों के सारे श्रेणीकरण अर्थहीन हैं। यह अफवाह है कि फिल्म देखने का शौक नहीं होता तो आत्महत्या कर लेता। जिंदगी से गहरा प्रेम है। मेरा पहला लेख शैलेंद्र पर अरविंद कुमार द्वारा संपादित माधुरी में सन 1965 में प्रकाशित हुआ। अतः यात्रा 45 नहीं 55 वर्ष की है।

प्र. आपने 4 दशकों की फिल्म पत्रकारिता देखी है या कहें उससे भी ज्यादा समय की। क्या परिवर्तन देखते हैं अपने शुरूआती दौर के फिल्म पत्रकारिता और आज की फिल्म पत्रकारिता में।

उ. भारत में सबसे अधिक फिल्में बनती हैं कि लेकिन फिल्म पत्रकारिता कभी एक विधा के रूप में विकसित नहीं हुई और ना ही इसका प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें सारे लोग एकलव्य की तरह ही हैं। आज फिल्म पत्रकार अच्छे लोकेशन को बढिया फोटोग्राफी कहते हैं। कथासार लिखने को फिल्म समीक्षा कहा जाता है परंतु असल मुद्दा यह है कि घटियापन हर क्षेत्र में विस्तार पा रहा है।

प्र. ऐसा मुझे किसी ने बताया कि आप किसी जटिल बीमारी की चपेट में हैं। शायद कैंसर। मैं और लोग भी जानना चाहते हैं कि उनके पसंदीदा लेखक इस बीमारी से कितना मुक्त हो पाए हैं। हम सब कामना करते हैं कि आप जल्द पूरी तरह से स्वस्थ हों।

उ. विगत चार वर्षों से केन्सर का इलाज डॉक्टर कर रहे हैं और लाभ हो रहा है।

प्र. चौकसे सर थोड़ा विषयांतर सवाल लग सकता है आपको, पर मैं जानना चाहता हूं कि जब लोग कैंसर जैसी भयावह बीमारी की चपेट में आते हैं। तो एक अज्ञात डर न सिर्फ पीड़ित में बल्कि उसके परिजनों, मित्रों में भी समा जाता है। इस भय से कैसे पार पाया जाए। दूसरी बात ये कि हमने देखा है कि ऐसे दौर में पीड़ित दार्शनिक हो जाता है, कुछ लिखने लग जाता है, उसे पुरानी बातें याद आती हैं, आत्म साक्षात्कार या कहें आत्मविश्लेषण की स्थिति में वो होता है। मनीषा कोईराला ने एक किताब लिखी, युवराज सिंह किसी प्रेरक किताब को पढ़ते थे, इरफान ने हाल ही में काफी दार्शनिक लिहाज का एक पत्र लिखा अपने चाहने वालों के लिए। आप अगर ऐसी स्थिति में थे, तो क्या करते थे।

उ. हर मनुष्य हमेशा दार्शनिक ही होता है। जीवन की आपाधापी और अन्याय तथा असमानता आधारित व्यवस्था में जीवित बने रहने के लिए विचारक बनना ही पड़ता है। शिक्षा व अवसरों से वंचित आम आदमी बिना किसी शस्त्र को लिए जीवन संग्राम में जुटा है। आम आदमी से बड़ा कोई विचारक नहीं। डर से मुक्ति आसान नहीं है। गांधी जी ने बनारस विश्वविद्यालय के उद्घाटन अवसर पर कहा था कि स्वतंत्रता संग्राम के लिए पहली आवश्यक्ता डर से मुक्ति का प्रयास है। डर वास्तविक नहीं मनोवैज्ञानिक बीमारी है।

प्र. सर आपने इतना लम्बा वक्त फिल्म पत्रकारिता को दिया है। इसके साथ साथ ही आपने फिल्म निर्माण, फिल्म वितरण, पटकथा लेखन आदि विविध क्षेत्रों में भी दखल दिया। चूंकि तमाम चीजें आपने कीं, हालांकि ये सब सिनेमा जगत से जुड़ी हैं लेकिन अपने आप में सभी बहुत विस्तृत विधाएं हैं। तो कुछ बिखराव सा नहीं हो गया। कैसे इन सारी चीजों को आप एक साथ करते रहे।

उ. यह बिखराव अवश्यमभावी है। रोज बिखरना और रोज सुधरना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। हम सुधरते सुधरते बिखर जाते हैं और बिखरते हुए सुधर जाते हैं। मैं स्वयं को प्रतिदिन बेहतर होने का प्रयास करता हुआ व्यक्ति मानता हूं।

प्र. जैसे इससे पहले वाले प्रश्न में हमने पूछा कि आप फिल्म वितरण, पटकथा लेखन, फिल्म निर्माण आदि से जुड़े रहे और फिल्म पत्रकारिता तो चल ही रही थी। तो वाकई चौकसे जी खुद को ज्यादा क्या मानते हैं। फिल्म पत्रकार, पटकथा लेखक, फिल्म निर्माता या फिल्म वितरक।

उ. पत्रकारिता में पटकथा के तत्व शामिल रहते हैं। विराट एवम पुरातन किस्सागोई का हिस्सा है मेरी पत्रकारिता।

जयप्रकाश चौकसे
एक समारोह के दौरान श्री चौकसे व अन्य गणमान्य

प्र. आप अपना पसंदीदा फिल्म पत्रकार बताइए, कोई दो। एक पुराने दौर का एक नए दौर का औऱ क्यों पसंद है।

उ. पुराने दौर के ख्वाजा अहमद अब्बास और अजीत बी मर्चेन्ट, जो फ्री प्रेस के लिए लिखते थे। टाइम्स के खालिद मोहम्मद मखौल उड़ाने में उस्ताद थे परंतु फिल्में डायरेक्ट करके वे समझ पाए कि फिल्मों का मखौल उड़ाना आसान है, फिल्म बनाना कठिन काम। आज के दौर में टाइम्स के साथ आए मिरर में त्रिशा गुप्ता और यूनिस डीसूजा बहुत गहन गंभीर लेखन करती हैं।

प्र. इतने लम्बे समय से आप फिल्म पत्रकारिता में हैं। फिलहाल लोग तो आपको दैनिक भास्कर के स्तम्भकार के रूप में जानते हैं। लेकिन आपकी पत्रकारिता की ये यात्रा शुरू किस संस्थान से हुई और फिर कैसे कैसे आगे बढ़ी, थोड़ा बताइए।

उ. मैं बता चुका हूं सन 1965-66 में माधुरी में शैलेंद्र और राजकपूर पर लेख प्रकाशित हुए थे। सन 1973 से नई दुनिया के फिल्म परिशिष्ट में कभी कभी लिखता था। श्रीराम ताम्रकर द्वारा संपादित नईदुनिया फिल्म विशेषांक में मेरे लेख प्रकाशित हुए। सन 1985 से भास्कर का इंदौर संस्करण प्रारंभ हुआ जिसमें साप्ताहिक लेख प्रकाशित हुए। दैनिक भास्कर के फिल्म सप्लीमेंट नवरंग का संपादन लेखन तीन वर्ष तक किया। 1995 से परदे के पीछे प्रारंभ हुआ और चौबीस वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसमें एकदिन भी चूका नहीं हूं। कई लेख अस्पताल से लिखे हैं।

प्र. सर पर्दे के पीछे स्तम्भ की शुरुआत कैसे हुई, इसकी कहानी थोड़ा बताएं। और क्या आपको लगा था शुरुआत में कि ये इस कदर लोकप्रिय होगा।

उ.  दैनिक भास्कर के मालिक सुधीर अग्रवाल के कहने पर परदे के पीछे स्तंभ प्रारंभ हुआ। उस दौर में किसी भी अन्य अखबार में फिल्म पर दिन प्रतिदिन प्रकाशित होने वाला कॉलम नहीं था। तत्कालीन संपादक श्रवण गर्ग ने परामर्श दिया कि कॉलम में इनलाइनमैंट, इन्फोरमेशन और इन्टरटैनमेन्ट के तत्व होना चाहिए।

प्र. मैं चूंकि खुद तकरीबन 10 वर्षों से पर्दे के पीछे पढ़ रहा हूं। चूंकि आप संस्मरण, मुलाकातों, घटना-परिघटना, संवाद आदि का जिक्र इसमें करते हैं। मैं देखता हूं कई बार आप नए लेखकों के नाम, कुछ साहित्य, कला संस्कृति से जुड़े लोगों के नाम किसी संदर्भ से जोड़कर अपने स्तम्भ में लिखते हैं। मुझे नहीं पता आपको जानकारी है या नहीं लेकिन आप जिस व्यक्ति का नाम जिस दिन अपने स्तम्भ में शामिल करते हैं, वो दिन संबंधित व्यक्ति व उसके परिचित के लिए उत्सव की भांति हो जाता है। मैंने कई बार देखा कि जिस व्यक्ति या संस्था का नाम उल्लेखित है पर्दे के पीछे में, उसके परिचित सोशल मीडिया में ये लिखते पाए जाते हैं कि वाह पर्दे के पीछे स्तम्भ में आपका जिक्र है। आप तो छा गए। किस तरह देखते हैं इस घटनाक्रम को, जब आपकी कलम से लिखा शब्द किसी की लोकप्रियता का कारण बन जाता है। जैसे आपने एक बार मध्यप्रदेश के रीवा में राजकपूर से जुड़े किसी संग्रहालय का जिक्र अपने स्तंभ में किया तो रीवा के तमाम पत्रकारों ने इसे प्रचार और उपलब्धि की तरह बताया था।

उ. रीवा में श्रीमती कृष्ण कपूर का जन्म हुआ था। मैंने लेख में यह लिखा था। रीवा विश्वविद्यालय से भाषण के लिए निमंत्रित किया गया। वहां के अधिकारियों ने श्रीमती कृष्णा कपूर की स्मृति में आडिटोरियम का निर्माण किया। उसका शिलान्यास रणधीर कपूर ने किया था। मात्र भवन बनाने से किसी संस्थान का निर्माण नहीं होता। गतिविधियां सतत जारी रहना चाहिए।

प्र. अच्छा आप चूंकि फिल्म पत्रकार तो हैं ही, फिल्म जगत में पेशेवर के रूप में भी जुड़े रहे। क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी फिल्म कलाकार ने कहा हो सर हमारे बारे में या हमारी फिल्म के बारे में लिखिए अपने स्तम्भ में।  

उ. कभी किसी सितारे या फिल्मकार ने इस तरह का आग्रह नहीं किया।

प्र. पर्दे के पीछे स्तम्भ को लेकर आम पाठकों की प्रतिक्रियाएं यकीनन आपको मिलती होंगी। लेकिन हम जानना चाहते हैं कि कभी सिने जगत के किसी बड़े नाम ने आपको व्यक्तिगत रूप से फोन पर या मुलाकात के दौरान कहा हो कि हां फलां तारीख का स्तम्भ पढ़ा था, बड़ा शानदार था।

उ. हिंदी में लिखने वालों को आज भी भारत महान में कमतर आंका जाता है। सुना है कि मुंबई के अखिल भारतीय ख्याति के अखबार फिल्म के विज्ञापन अच्छी समीक्षा का वादा करके प्राप्त करते हैं। मेरी आम राय है कि आम दर्शक पर समीक्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह स्वयं तय करता है उसे क्या देखना है।

 

प्र. सर फिर आपकी शुरूआती जिंदगी में चलते हैं, जयप्रकाश चौकसे वाकई क्या बनना चाहते थे। शायद पत्रकार तो नहीं बनना चाहते होंगे।

उ. मैंने कभी भविष्य की योजना नहीं बनाई। जब जो इच्छा हुई, वही काम किया। प्रायः सृजनधर्मी लोग साधनहीन वर्ग से आते हैं और अपने घनघोर संघर्ष की व्यथा कथा सुनाते हैं। मैं उच्च मध्यम आय वर्ग में जन्मा और पैसे के लिए कभी काम नहीं करना पड़ा। मुझे जीवन की चक्की ने नहीं पीसा, मैंने स्वयं अपनी जीवन चक्की चलाई है।

प्र. सर वर्तमान में फिल्म पत्रकारिता की दशा पर कुछ बताइए। मतलब आप मलाइका अरोरा के कांख के बालों पर खबर कर रहे हैं, किसी के लिप सर्जरी पर, किसी के हेयर ट्रांसप्लांट पर या किसी अभिनेत्री के ब्रेस्ट सर्जरी पर। कभी अभिनेताओं के अंडर एज बच्चों की निजी जिंदगी पर। तो कभी तैमूर पर। तैमूर हंसा, तैमूर रोया, तैमूर यहां दिखा, वहां दिखा। मेरा बड़ा सीधा सा सवाल है कि फिल्मी पत्रकारिता केवल पर्दे के आगे वालों तक क्यों सिमट गई है। ठीक है चकाचौंध भरी दुनिया है। आप तैमूर को भी दिखाइए और मलाइका औऱ अर्जुन की लव केमेस्ट्री पर भी, लेकिन फिल्मों की पटकथा पर कौन बात करेगा, बदलती तकनीक पर खबरें कौन करेगा, फिल्म मेकिंग की खबरें कौन करेगा, फिल्मों के सम्पादकों की कोई चर्चा नहीं होती, फिल्मों में किस तरह के आधुनिक कैमरों, उपकरणों का प्रयोग हो रहा है, ये कौन बताएगा। फिल्म जगत के अंतिम व्यक्ति स्पॉट ब्वाय या लाइटमैन की पीड़ा कौन बताएगा, वाजिब पारिश्रमिक की समस्या से जूझ रहे सिनेमा जगत के लोगों की बात किन खबरों में होगी। क्या सिनेमा जगत में बस उतना ही है जितना छप-दिख रहा है।  

उ. मैंने कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन पर कभी कुछ नहीं लिखा। मैं हमेशा फिल्म देखता रहा हूं क्योंकि वह मुझे पसंद है। गॉसिप पढ़ने वाले हैं, अतः बाजार की मांग है और पूर्ति की जा रही है। फिल्म बनाना एकमात्र कठिन कार्य़ नहीं है। किसान और मजदूर सतत परिश्रम करते हैं, सुंदर दिखने के लिए मध्यम वर्ग के लोग भी शल्य चिकित्सा कराते हैं। यह सब अब सामान्य हो चुका है। टेक्नोलॉजी केवल उपकरण नहीं बनाती ग्राहक की सोच भी बदल देती है।

प्र. सर कथक नर्तक पंडित बिरजू महाराज कह रहे थे कि आजकल की युवा पीढ़ी जो रियलिटी शो में नृत्य कर रही है वो नृत्य नहीं सर्कस है, लता मंगेशकर ने अपने हालिया जन्मदिन के अवसर पर उमेश उपाध्याय को दिए साक्षात्कार में फिल्म जगत में बेहतर नए गायकों से जुड़े सवाल में कहा कि श्रेया औऱ सुनिधि अच्छा गाती हैं और सोनू (निगम) भी गा लेता है। चौथे किसी के बारे में लता दीदी ने जिक्र नही किया। प्रसिद्ध कवि नरेश सक्सेना का एनबीटी को दिया हालिया साक्षात्कार मैं पढ़ रहा था तो वो कह रहे थे कि जो आजकल के कवि कविता के नाम  पर लिख रहे हैं, उसमें कविता जैसा कुछ है नहीं। इतने तमाम उदाहरणों के पीछे मेरा आशय बस इतना है कि क्यों नई पीढ़ी को पुराने औऱ स्थापित लोग नकार रहे हैं। वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रम्हात्मज भी फिल्म पत्रकारिता की नई पीढ़ी को नकार रहे हैं। कहां कमी रह जाती है नए लोगों में। आप फिल्म पत्रकारिता के संदर्भ में बताइए।

उ. रीएल्टी शो के नृत्य सरकस के करतब की तरह ही हैं। टेलीविजन ने अपने कार्य़क्रम के साथ अपने दर्शक भी गढ़े हैं।

प्र. आप तमाम अभिनेताओं-अभिनेत्रियों से मिले होंगे। कोई खास मुलाकात, कोई खास संस्मरण। जो सबसे यादगार हो।

उ. मैं राजकपूर, दिलीप कुमार, देवआनंद से लेकर सलमान खान और आमिर खान से भी मिल चुका हूं। एक बार शम्मीकपूर के घर नरगिस जी से भी भेंट हुई थी। सितारों से कभी प्रशंसक के रूप में नहीं मिला। ये मुलाकातें सामान्य थीं।

प्र. अमिताभ बच्चन के बारे में लोग तरह तरह की बातें करते हैं। जैसे इन्होंने अपने समकक्ष सितारों का काम हड़प लिया है।

उ. लता मंगेशकर, आशा भोंसले और अमिताभ बच्चन ने कभी किसी का अधिकार नहीं छीना। वे सब अपनी प्रतिभा के दम पर कायम हैं। लंबी पारी खेलने के लिए अनुशासन की आवश्यक्ता है।

प्र. सुना है आपके घर की दीवारों में फिल्म संबंधी पोस्टर लगे होते हैं।

उ. मेरे घर की दीवारों पर कोई फिल्म पोस्टर नहीं है। यहां तक कि घर के भीतर भी ऐसा कुछ नहीं है। कुछ ट्राफियां मिलीं परंतु घर में एक भी नहीं है। अपनी कुछ किताबें गुना के वाचनालय और इंदौर के अहिल्या वाचनालय को दे चुका हूं।

प्र. भविष्य की क्या योजना है। क्या करना चाहते हैं जो अबतक न कर पाए हों।

उ. भविष्य में मैं अपने रेडियो नाटक तीसरी धुन को फिल्म पटकथा के रूप में लिखने वाला हूं। मैंने शिवम नायर से इसका वादा किया है।

प्र. दैनिक भास्कर में एक दशक से ज्यादा समय से स्तम्भ लिख रहे हैं, कभी ऐसा नहीं चाहा कि किसी और संस्थान के लिए लिखें। क्या आप ने टीवी मीडिया के लिए फिल्म विशेषज्ञ के रूप में सेवाएं देने की कभी नहीं सोचा। जैसे कोमल नाहटा, भावना सोमय्या आदि। पर्दे का तो अपना एक अलग आकर्षण होता है।

उ. दैनिक भास्कर के अतिरिक्त कहीं और कुछ करने की इच्छा नहीं है। पाखी में पांच कहानियां प्रकाशित हुई हैं। दो उपन्यास मेघा प्रकाशन ने जारी किए और राजकमल प्रकाशन से राजकपूर सृजन प्रक्रिया प्रकाशित हुई।

प्र. काफी लम्बी बातचीत होती जा रही है। चूंकि आपका कई विधाओं में दखल है। पूछना तो फिल्म लेखन से जुड़ी बातें भी थीं औऱ फिल्म निर्माण से। पर काफी विस्तृत हो जाएगा। जैसे फिल्म संवाद को लेकर आपने क्लैप ट्रेप शब्द का जिक्र किया था कि सिर्फ तालियां बजवाने के लिहाज से जबरन फिल्मों में संवाद थोपे गए। और संभवतः भारतीय फिल्मों में ही संवाद लेखक अलग से होते हैं।

उ. आप फिल्मों में तालियां पीटे जाने वाले दृश्यों की बात कर रहे हैं। नेता भी अपने भाषणों में क्लैप ट्रेप रचते हैं। उनके घोस्ट राइटर भी हैं।

प्र. वैसे मैं आपको बता दूं कि हाल ही में पत्रकारिता से मैंने पीएचडी पूरी की है। जब मैं शोधकार्य के लिए विश्वविद्यालय में था, तो मेरे शोध निर्देशक शोध विषयों को लेकर एक गहन विमर्श कर रहे थे, तब वो बोले कि मैं चाहता हूं कोई प्रभाष जोशी की सम्पादकीय पर पीएचडी करे, जयप्रकाश चौकसे के स्तंभ पर्दे के पीछे पर पीएचडी करे। अमिताभ बच्चन की संचार शैली पर पीएचडी करे। उन्होंने आपके कई स्तंभों की सामग्री का शोध छात्रों के सामने जिक्र किया। किस तरह लेते हैं अपनी इस पहचान को।

उ. मेरे कॉलम पर उदयपुर की प्रोफेसर सीमा वर्मा जोधावत और इंदौर के हरीश गिड़वानी कार्य कर रहे हैं।

प्र. सर जीवन में काम तो सारी उम्र व्यक्ति करता है। लेकिन उस काम को जनस्वीकारोक्ति तब मिलती है जब काम सम्मानित हो। आप क्या पदमपुरस्कारों की अभिलाषा रखते हैं। या पत्रकारिता जगत के किसी बड़े पुरस्कार की।

उ. किसी सरकारी सम्मान या पुरस्कार की बात मैंने सोची ही नहीं। मेरे पाठकों की प्रतिक्रिया मेरा पुरस्कार है। कभी कभी फोन पर अपशब्द भी सुनता हूं। मैं जानता हूं यह सब प्रायोजित है। वे अपनी रोटी कमा रहे हैं और मैं भी यही कर रहा हूं।

प्र. कंगना रनौत पिछलों दिनों बहुत भड़की थीं, फिल्म पत्रकारों पर। काफी कुछ बोला। गैंग बनाकर चलते हैं, खाने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में आते हैं। किस तरह लेते हैं इस घटना को।

उ. कंगना रनौत अपनी शर्तों पर काम करती हैं और मैं उनका सम्मान करता हूं। संघर्ष के दिनों में वो फुटपाथ पर सोई हैं और आज कुल्लू मनाली में उनका बंगला है।

प्र. आप तो दुनिया का फिल्मी ज्ञान समृद्ध करते हैं लेकिन आप स्वयं अपने फिल्मी ज्ञान में वृद्धि करने के लिए किसका सहारा लेते हैं।

उ. किताबें पढ़ता हूं। फिल्म देखता हूं। मेरी विचार प्रक्रिया पर सबसे अधिक गहरा प्रभाव पंडित जवाहर लाल नेहरू और उनके कालखंड के प्रतिनिधि फिल्मकार राजकपूर का रहा।

ऑफ द रिकार्डः

मैं जयप्रकाश चौकसे जी के स्तम्भ परदे के पीछे को कई वर्षों से नियमित पढ़ रहा हूं। ये मुख्यतया फिल्मी पृष्ठभूमि पर है, पर इसमें सांसारिक ज्ञान, दर्शन, सामाजिकता आदि का समावेश है। कह सकते हैं कि दैनिक भास्कर को पढ़ने के पीछे की एक वजह ये स्तम्भ है। जब कभी मुझे कुछ अच्छा दिखता है इस कॉलम में तो मैं उसे साझा करता रहता हूं फेसबुक पर, तो यूं ही एक रोज चौकसे जी के आलेख के हिस्से को मैंने साझा किया। तो दैनिक भास्कर भोपाल में पदस्थ राजकुमार खैमरिया सर ने कहा कि तुम चौकसे जी को बहुत पढ़ते हो। तो मैंने उनसे साक्षात्कार करने की इच्छा प्रकट की और ऐसे इस साक्षात्कार की भूमिका बनी। उन्होंने हमारे और चौकसे साब के बीच मध्यस्थता की। दरअसल ये साक्षात्कार कई मायनों में विलक्षण है। चौकसे जी कैंसर जैसी बीमारी से उबर रहे हैं। इस स्थिति में भी उनका खासतौर पर मीडिया मिरर के लिए कुल 13 पन्नों में उत्तर लिखकर देना एक बड़ी बात है। हमने उन्हें मेल से सवाल भेजे थे। हां सच है कि तकरीबन आधे सवालों के जवाब उन्होंने नहीं दिए। और मिरर की परम्परा रही है कि सामने वाला जिन सवालों से बचता है या उनका जवाब नहीं देता। वो भी भी सवाल पाठकों के लिए साक्षात्कार के साथ उल्लेख किए जाते हैं। लेकिन मिरर जयप्रकाश चौकसे जी के विशेष आदर में इस प्रक्रिया से हट रहा है। दरअसल पहले हमारी योजना थी कि सवाल-जवाब फोन पर हो, पर जैसा कि मालूम हुआ कि कैंसर से 4 वर्षों से लड़ते लड़ते शारिरिक रूप से थोड़ा कमजोर चौकसे जी शायद लम्बी बातचीत करने में असहज महसूस करें। तो सवाल मेल से किए गए। हालांकि मुझे लगा कि सवालों की संख्या काफी ज्यादा है, कहीं ज्यादा वक्त न लें, लेकिन महज 24 घंटे के अंदर चौकसे जी ने सवालों के जवाब मुझे भेज दिए। श्री चौकसे अपने एक आलेख में कहते हैं कि मुझे टीएस इलियट की द वेस्ट लैंड महान लगी जबकि मैं उसे समझ नहीं पाया। क्योंकि एक आम धारणा महान व्यक्ति के बारे में होती है, फला ने किया है तो बेहतर ही किया होगा। इस साक्षात्कार को लेकर मेरे साथ भी कहीं कहीं ऐसा हुआ, मुझे लगा कि इस सवाल का जवाब शायद ये नहीं होना था, या इस सवाल का जवाब देने में कुछ कोताही की चौकसे जी ने, या वो सवाल जिनके जवाब दिए ही नहीं, वो सारे सवाल बेहद आवश्यक थे। या एक जगह ये कह देना कि फिल्में न देखता तो जीवन को नष्ट कर लेता, ये बात महज अफवाह है। जबकि ये बात रिकार्डेड है मेरे पास। बावजूद मैंने कहा न जब एक बड़ा आदमी सामने होता है तो हम ये मानकर चलते है। इसने गर किया है तो ठीक ही किया होगा। 3 हजार 971 शब्दों का ये साक्षात्कार है। जिसके लिए मैंने पूरी बातचीत से दो शीर्षक फाइनल किए थे। पहला फिल्म पत्रकारिता में सभी पत्रकार एकलव्य की तरह हैं और दूसरा विराट एवं पुरातन किस्सागोई का हिस्सा है मेरी पत्रकारिता। और अंततः जिसे चुना वो आपके समक्ष है। – प्रशांत राजावत के शब्दों में

नोटः मीडिया मिरर ऑफ द रिकार्ड में साक्षात्कार के पीछे कहानी बताता है। जो आम तौर पर अनकही-अनसुनी होती हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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