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नीलाभ फ्लर्ट थे या विनम्र, पता नहीः भूमिका व्दिवेदी

नीलाभ अश्क
मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती के घर पर नीलाभ अश्क और भूमिका

मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला में हमारी अतिथि हैं भूमिका व्दिवेदी। भूमिका कथाकार हैं, दिल्ली रहती हैं। मूलरूप से इलाहाबाद की रहने वाली हैं। भूमिका को भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार (उपन्यास बोहनी के लिए) , मीरा पुरस्कार (उपन्यास आसमानी चादर के लिए) मिल चुका है। हिंदी साहित्य जगत में युवा लेखकों की कतार में उनका नाम बड़े आदर से लिया जाता है। ये तो भूमिका की निजी पहचान औऱ कमाई है। इसके अलावा वो प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क की बहू और लेखक, अनुवादक नीलाभ अश्क की पत्नी हैं। दरअसल इस श्रृंखला के लिए मिरर ने कई विशिष्ठ लोगों से साक्षात्कार किए हैं। पर ये साक्षात्कार थोड़ा अलग है। ये बातचीत महज एक साक्षात्कार नहीं बल्कि दो बेमेल लोगों के बीच मेल-जोल की कहानी है, ये स्त्री स्वतंत्रता की विराट कथा का दर्शन करवाता वृतांत है। यहां किसी गैर को अपना बनाने और अपनो के गैर हो जाने की व्यथा है। प्रेम है, खुलापन है, सिद्धांत हैं, शालीनता है, सरलता है। इस साक्षात्कार में बहुत खूबसूरती है। साक्षात्कार का जो शीर्षक है, वो इस पूरी बातचीत की मजेदारी है। वाकई भूमिका अद्भुत भूमिकाएं अदा करती रहीं और जमाना उनपर लांछन लगाता रहा, बगैर उनको और नीलाभ को जाने बगैर। इस साक्षात्कार में भूमिका के साथ साथ कई किरदार आपके इर्द गिर्द मंडराते दिखेंगे। नीलाभ अश्क, नीलाभ अश्क की मां, कृष्णा सोबती, नामवर सिंह, रविंद्र कालिया। मतलब थोड़ा थोड़ा हर कोई मौजूदगी दर्ज कराता दिखेगा।

पढ़िए साक्षात्कार। बातचीत की है मीडिया मिरर के सम्पादक डॉ. प्रशांत राजावत ने।

 

अपने बारे में बताइए

इलाहाबाद में पैदा हुई, पली बढ़ी, शिक्षा पाई। फिर जेएनयू में एडमिशन हुआ। मेरे ग्रांडफादर रामशंकर दिवेदी इलाहाबाद विवि में संस्कृत पढ़ाया करते थे। फिर उन्होंने वकालत अपनाई। मार्कन्डेय काटजू, रामजेठ मलानी, केशरीनाथ त्रिपाठी बगैरह से उनका अच्छा दोस्ताना था। इलाहाबाद के प्रतिष्ठित परिवार से मैं आती हूं। बहुत सारे लोग मेरे परिवार को जानते हैं।

नीलाभ जी से जुड़ने की कहानी

नीलाभ जी का तो मैंने नाम भी नहीं सुना था, हां उनके पिता उपेन्द्रनाथ अश्क के बारे में जरूर सुना था। वो इंटर में हमारे सिलेबस में थे। जब हिंदी कम्पलसरी रही है, मैंने हिंदी पढ़ी है, हिंदी मेरा विषय कभी नहीं रहा। इंटर तक हिंदी कम्पलसरी थी, तो मैंने अश्क जी को पढ़ा था, हां पता नहीं था कि वो ससुर जी बनेंगे। हाहा। एम अंग्रेजी साहित्य से इलाहाबाद विवि से किया।

कहानी कविताएं लिखने की शुरूआत कैसे हुई

मैं बचपन से लिखने लगी थी। मैं बचपन से लिख रही हूं। अमृत प्रभात, जागरण, अमर उजाला आदि में मैं बचपन से लिखती थी। कभी कविता लिखती थी, कभी कोई रचना प्रतियोगिता होती स्कूल में तो उसमें हिस्सा लेती थी।

गंभीर लेखन की शुरूआत कहां से मानती हैं

रविन्द्र कालिया जी ने साक्षात्कार छापा था। दरअसल रविंद्र कालिया जहां रहते थे, उसके ठीक सामने पार्क में हम खेलने जाया करते थे। मैं उन्हें देखती थी, कि वो बालकनी में खड़े होकर सिगरेट पीते हैं औऱ फेंक कर चले जाते हैं। एक दिन उसी जिज्ञासा के साथ कि कौन आदमी है जो यहां खड़े होकर हमें घूरता है, सिगरेट पीता है और अन्दर चला जाता है। मैं रविंद्र कालिया के घर पहुंची। 1998 की बात है शायद, गेट पर ममता कालिया जी थीं, उनकी पत्नी। उन्होंने पूछा कि आपकी गेंद आ गई है क्या, आमतौर पर बच्चों की गेंद ही आती होगी उनके घर, इस घटना पर मैंने एक संस्मरण भी लिखा है मैं रायटर बनना चाहती हूं। सिगरेट वाले अंकल औऱ मैं नाम से लहक में भी संस्मरण छपा है। तो मैंने ममता कालिया से कहा कि मुझे उनसे मिलना हैं जो रायटर हैं। दरअसल रविंद्र कालिया रायटर हैं ये मुझे अपने साथ खेलने वाली सहेलियों से पता लग गया था। और कालिया नाम भी। दरअसल जब मैंने पूछा अपनी सहेलियों से कि सिगरेट वाले अंकल का नाम क्या है, तो सहेलियों ने कहा जो कृष्ण भगवान के साथ सांप था कालिया, वह नाम है। तो मैंने कहा था भला सांप का नाम भी कोई इंसान रखता है क्या। ममता जी ने कहा कि कालिया जी उधर हैं मिल लो, मैंने रविंद्र कालिया को देखते ही नमस्ते किया औऱ सीधे बोला कि मैं रायटर बनना चाहती हूं, इसपर उन्होंने कहा कि बड़े नेक खयालात हैं आपके। उसके बाद कालिया जी ने पूछा कि किस क्लास में पढ़ती हो, चूंकि मैं सातवीं में थी तो मुझे लगा अगर मैं इन्हें सच बताऊंगी तो ये टॉफी देकर रवाना कर देंगे इसलिए मैंने हाईस्कूल बताया। ताकि मैं उन्हें थोड़ी बड़ी लगूं। झूठ बोला। तो उन्होंने कहा कि तुम हाईस्कूल में हो और अभी से रायटर बनने का ख्वाब देख रही हो, ये तो बड़ी अच्छी बात है। इसके बाद उन्होंने रामस्वरूप जी का साक्षात्कार करने के लिए कहा औऱ बोले कि ये साक्षात्कार करके लाओ, फिर मैं पता करता हूं कि तुम रायटर बन पाओगी या नहीं। उसके बाद हम अपने घर गए और अम्मा को बताया कि रविंद्र कालिया जी ने एक साक्षात्कार करने के लिए कहा है, और मैंने बहुत स्टायल में बताया ताकि अम्मा को लगे कि मैं अब बड़े लेखकों की श्रेणी में आ गई हूं, तो अम्मा ने चटाक से एक थप्पड़ जड़ दिया और कहा कि ऐसे ही किसी के घर चली जाती हो।

क्या अम्मा का रुझान साहित्य में नहीं था

नहीं ऐसा नहीं है, बाद में साक्षात्कार के लिए सवाल उन्होंने ही तैयार करवाए। फिर मां ने भाई के साथ भेजा। साक्षात्कार किया मैंने, तो कह सकते हैं कि पहला मैच्योर मटेरियल ये छपा, जो कालिया जी ने फ्रंट पर छाप दिया। कालिया जी गंगा यमुना वीकली निकालते थे, ये साक्षात्कार उसी में छपा था। उसके बाद कालिया जी वागर्थ में कोलकाता चले गए। समय निकलता गया। मैं दिल्ली आ गई। 2011 में एक दिन कालिया जी का फोन आय़ा कि मैं ज्ञानपीठ में आ गया हूं। मैं एमफिल इंग्लिश से करने जेएनयू आई थी। कालिया जी मुझसे अंग्रेजी की स्पेलिंग बहुत पूछते थे, कहते थे कि उनकी पृष्ठभूमि अंग्रेजी की नहीं है।

कालिया जब तक ज्ञानपीठ में रहे तो एक आध ही चीज मेरी छपी होगी। उन्होंने मुझे छापा नहीं कि उनके शहर से आई हूं तो लगे छापने। कोई भी पक्षपात उन्होंने नहीं होने दिया।

दिल्ली में लेखन की शुरूआत की कहानी कहिए

2013 में मेरी एक कहानी जनसत्ता में छपी काला गुलाब, हालांकि ये मेरी पहली कहानी नहीं है। रेडलाइट वर्सेस रेडलाइट मैंने पहली कहानी लिखी थी दिल्ली आकर। जो मेरे किसी रिश्तेदार के व्यवहार पर थी।

काला गुलाब जरिया बनी नीलाभ से मुलाकात की

काला गुलाब जनसत्ता में प्रकाशित हुई तो नीलाभ जी ने जनसत्ता से मेरा नम्बर मांगा और सुबह सुबह ही फोन किया और तारीफ करते हुए कहा कि बहुत अच्छी कहानी लिखी है। ये तो उपन्यास भी बन सकती है। चूंकि कहानी इमरजेंसी पर थी, तो वो समझाने लगे औऱ कहानी की विषयवस्तु पर चर्चा करने लगे।

नीलाभ ने जब काला गुलाब की तारीफ के लिए फोन किया, तो क्या आप नीलाभ के बारे में कुछ जानती थीं

बिल्कुल नहीं। हां जनसत्ता से मुझे फोन आया कि कवि नीलाभ अश्क आपका नम्बर मांग रहे थे, तो मैंने कहा था दे दीजिए तो बस जनसत्ता के जरिए पता लगा कि ये उपेंद्रनाथ अश्क के बेटे हैं। चूंकि मैं हिंदी की विद्यार्थी रही नहीं तो इसिलए अश्क जी की कहानियों से भी बहुत ज्यादा जुड़ाव नहीं रहा। तो कह सकते हैं मैं बिल्कुल नहीं जानती थी नीलाभ के बारे में।

जेएनयू कल्चर के बारे में कुछ कहिए

जेएनयू बहुत ही रचनात्मक जगह है। इतनी रचनात्मक कि लोग अपने घर परिवार को भूल जाते हैं। जेएनयू के लोग होली दीवाली घर नहीं जाते, वो परिसर में ही रहते हैं। जेएनयू कि अपनी एक अलग ही संस्कृति व संस्कार हैं। हालांकि मैं उसमें कभी फिट नहीं हो पाई। जैसे मास मच्छी खाना और किसी धर्म विशेष को न मानना। मैंने जेएनयू में रहते हुए भी कभी मास नहीं खाया औऱ नियमित पूजा अर्चना की, सूर्य भगवान को जल चढ़ाया। इसी कारण जेएनयू के लोग कहते थे कि ये अभी जेएनयू की नहीं हो पाई है।

कैसे हुई मुलाकात नीलाभ जी से

ये फोन तो लगातार कर ही रहे थे, जब मैं इलाहाबाद में थी। तो मैंने सोचा कौन है ये आदमी जो परेशान किए हुए है। चूंकि मिलने मिलाने में मुझे कभी कोई दिक्कत नहीं होती। मैंने सोचा कि मिलकर पिंड छुड़ाया जाए। मजे की बात ये है कि इलाहाबाद से जैसे ही मैं दिल्ली स्टेशन पहुंची, ये स्टेशन में ही मुझसे मिलने आ गए। मैंने उन्हें जब पहली दफा स्टेशन में देखा तो पता लगा कि ये तो काफी बुजुर्ग हैं। तो उनका सम्मान करने लगी। लेकिन मैंने उनको सुनाया काफी स्टेशन में ही, कि ऐसा भी कोई पाठक होता है, सुबह सुबह स्टेशन ही चले आए। फोन पे फोन कर रहे हैं कई दिनों से। ऐसे पाठक हों तो जीना हराम हो जाए। और मैं चिल्लाने लगी। फिर नीलाभ बोले कि आप इतनी बड़ी रायटर हैं मैं आपके साथ कॉफी पीना चाहता हूं। तो मैंने कहा कि ब्रश वगैरह करके आऊंगी, तो बोले कि ब्रश मेरे ही घर में कर लेना

अच्छा ये बताइए आपको नहीं लगा कि एक व्यक्ति जिसे आप जानती तक नहीं, वो लगातार फोन कर रहा है, और स्टेशन आ धमका और अब आपसे अपने घर चलने की बात कर रहा है, ये कुछ ठीक नहीं..

हाहाहा हां लगा न, मैं चूंकि इनके बारे में जान तो चुकी ही थी, इसलिए ये तो था नहीं कि कोई लफंगा है, नया लड़का। आकर्षक औऱ काबिल व्यक्ति लगे थे। बस मैं ये चाहती थी कि एक बार मिल लो, जो कह रहा है मान लो औऱ उसके बाद इसका नम्बर ब्लॉक कर दूंगी। ये सब तो तय था।

एक बात तो है नीलाभ भी बिंदास आदमी थे, उनको फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या सोच बैठें, कि एक लड़की को फोन करते रहना और स्टेशन में ही पहुंच जाना

हां ये तो है। बिंदास थे और मैं भी बिंदास हूं। हम दोनों ही एक जैसे हैं। हाहा

हां आगे बताइए फिर

हां तो फिर नीलाभ जी ने मेरा बैग उठाया और स्टेशन से बाहर निकल आए। उनकी सबसे बड़ी खूबी उनकी विनम्रता है। वो कभी बातचीत के दौरान अहसास नहीं होने देते कि वो इतने बड़े आदमी है। जो लंदन बीबीसी में 4 साल काम करके आया है। औऱ एक शानदार लेखक व अनुवादक है। तो वो मुझे स्टेशन से घर लाए। मुझसे बोले मैं नहाकर आता हूं। फिर तुम्हारे लिए कॉफी बनाऊंगा। जब नहाकर लौटे तो मैंने कहा कि आपके घर में शांति बहुत है। तो वो तपाक से बोले यही रह जाओ। तो मैंने कहा कि ऐसे कैसे रह जाऊं, मेरा हॉस्टल तो है। तो बोले हॉस्टल तो हमेशा नहीं रहेगा। तो मैंने कहा ये तो है। बातचीत चलती रही। फिर मैं बोली हम ब्राम्हण लड़की हैं, दिल्ली भी मेरे माता पिता ने सगाई के बाद भेजा है। मेरी सगाई हो चुकी है। हालांकि मैंने कहा कि मुझे लड़का पसंद नहीं है। तो नीलाभ बोले क्यों। तो मैने कहा कि वो मंत्री का भतीजा है, घमंडी बहुत है। तो नीलाभ बोले कि तो तुम किसी औऱ से शादी कर लो, जेएनयू में बहुत लड़के हैं, कोई तो पसंद होगा। तो मैंने कहा हां एक लड़का है, पर वो मांस को इस तरीके से खींच खींचकर खाता है कि मुझे पसंद नहीं। तो नीलाभ बोले तो मुझसे शादी कर लो। तो मैंने कहा आपसे, आपतो बहुत बड़े हैं। तो नीलाभ मुझे दर्शन बताने लगे कि शादी जाति, धर्म, उम्र से नहीं होती। शादी स्त्री औऱ पुरुष की होती है। तो तुम स्त्री हो औऱ मैं पुरुष। तो मैंने कहा कि ठीक है। डन। तो मैंने नीलाभ से कहा कि मुझे हॉस्टल छोड़ दो। तो नीलाभ बोले हॉस्टल नहीं, आप ब्राम्हण लड़की हैं बात से पलटिए मत। हां बोला है तो शादी करने चलते हैं, तो मैंने कहा हां शादी तो करूंगी। इसके बाद तुरंत ही उन्होंने मुझे एक अंगूठी पहनाई औऱ बोले कि ये मेरे पिता ने मेरी मां को पहनाई थी, शादी तय होते समय। संयोग ऐसा कि वो अंगूठी मेरे एकदम फिट आई। तो नीलाभ बोले देखा तुम मेरे घर के लिए ही बनी हो। नीलाभ मुझसे बोले कहां मैं हिंदी का चूतिया आदमी और कहां तुम अंग्रेजी साहित्य से एमए। मुझे डर लगता है। तो मुझे लगा कि ये या तो विनम्र ज्यादा है या फ्लर्ट… हाहाहा। तो उसी दिन आर्यसमाज मंदिर में हम दोनों ने शादी कर ली।

तो ऐसे सिर्फ स्टेशन में पहली मुलाकात और चंद घंटों में शादी… ये शायद शादी के बारे में 2 अजनबियों का पहला ऐसा फैसला होगा जो इतनी जल्दी लिया गया

बिल्कुल। हाहाहा। हां। सही बात है। पहली मुलाकात और उसके बाद शादी।

शादी का विरोध किसी ने किया

हां सहेलियों ने बात करनी बंद कर दी। घर वालों से लगभग रिश्ता टूट गया।

नीलाभ जी के साथ के अनुभव

मैं ढाई साल नेट उनके साथ रही। हम लोग अच्छे दोस्त थे। नीलाभ जाहिर तौर मुझसे बहुत ज्यादा काबिल आदमी थे। पर वो कभी ऐसा जताते नहीं थे। वो बड़ा सामान्य होकर रहते थे। किसी बात का घमंड नहीं था।

नीलाभ के साथ रहने पर आपमें कोई बदलाव

और आजाद हो गए। आजादी हमे पसंद है। शादी से पहले हम दोनों ने कुछ सवाल एक दूसरे से पूछे थे। उन्होंने मुझसे पूछा था कि तुम्हारे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज क्या है। मैं कहा था आजादी। और मैंने उनसे पूछा था ऐसी कौन सी चीज है जिससे आप कभी समझौता नहीं कर सकते, तो उन्होंने कहा था मेरे सिद्धांत।

कैसे थे नीलाभ

बहुत बोलते थे, नाचते थे, गाते थे, झूमते थे। माउथ आर्गन बजाते थे बांसुरी बजाते थे। बहुत सारे वाद्य यंत्र बजाते थे। बाहर जो लोग उन्हें जानते हैं, वो आधे से भी कम जानते हैं।

दिल्ली के साहित्यकारों के बीच आपकी पहचान

हां बहुत प्यार से सभी बुलाते थे। मैं जाती थी। नामवर जी, सोबती जी। नामवर जी के घर तो अक्सर मैं चली जाती थी। वो कहते थे देखो नीलाभ की घरवाली आई है। कहते थे तुम ठीक आ गई।

कृष्णा सोबती से आपकी करीबी रही है। मैंने पढ़ा कहीं कि वो अपने मेहमान का स्वागत बियर, वाइन से करती थीं।

बिल्कुल सही सुना है। मैं तो पीती नहीं। लेकिन नीलाभ के लिए वो तुरंत टेबल सजा देती थीं। बियर सबको पूछती थीं। वाइन बहुत महंगी वाली पिलाती थीं। तोहफा जरूर देती थीं। मुझे बहू मानती थीं। मुझे सगुन में अंगूठी दी थी। नीलाभ को बच्चा मानती थीं। नीलाभ की मां और सोबती जी अच्छी सहेली थीं। सोबती जी इलाहाबाद अक्सर जाती थीं, रुकती थीं। नीलाभ की मां जब कहीं बाहर चली जाती थीं तो सोबती जी ही नीलाभ की देखभाल करती थीं।

आपने सोबती जी को पढ़ा है

नहीं मैं हिंदी की विद्यार्थी नहीं हूं इसलिए पढ़ा नहीं है। हां मैं लेखक हिंदी की हूं। हाहा

भूमिका
नामवर सिंह के साथ भूमिका

नीलाभ के जाने के बाद साहित्यकारों के व्यवहार में कोई बदलाव

लोग अब ज्यादा सम्मान करते हैं। लोग कहते हैं कि नीलाभ अब नहीं हैं, हम नीलाभ के रूप में आपको पाते हैं। हां कुछ लोगों ने किनारा भी कर लिया है। नीलाभ की खबर सुनकर नामवर सिंह रोने लगे थे। नामवर सिंह साहित्य की दुनिया के सबसे अच्छे आदमी थे।  बहुत भावुक और मार्मिक आदमी थे।

सोबती जी के जीवन के बारे में कुछ बताइए। अजीब पहनावा, अलग थलग क्यों रहती थीं वो

वो एक आईएएस ऑफिसर के साथ रहती थीं लिव इन में। ताउम्र लिव इन में रही हैं। खुद भी सरकारी नौकरी में थीं। पैसे की कोई कमी थी नहीं। काफी पैसा उन्होंने अशोक वाजपेयी के ट्रस्ट को दिया है। खुद अपना आलीशान घर भी अशोक वाजपेयी को देकर गई हैं। कहा ऐसा जा रहा है उस घर में दिल्ली आने वाले साहित्यकारों को ठहराया जाएगा। सिंधी पहनावा था उनका, पाकिस्तान से आई थीं। जो वो खुद पहनती थीं वैसी ड्रेस एक मुझे भी दी थी। पर वो जो उन्होंने बना रखा था, वो बहुत लोगों को प्रभावित भी करता था।

इलाहाबाद के नीलाभ प्रकाशन जो की बंद पड़ा है। उसे आपकी सासू मां दूसरा बेटा मानती थीं। क्या योजना है उसे लेकर, आपने कहीं बोला था कि उसे शुरू करेंगी

हां बोला था, शुरू करने की इच्छा भी है। लेकिन मेरे पास सहयोग नहीं है। अकेले हैं हम।

साहित्य जगत के लोगों से मदद लीजिए

कोई नहीं करेगा। नीलाभ की स्मृति सभा में जब लोगों ने एक घंटा खर्च नहीं किया तो वो मदद क्या करेंगे।

नीलाभ अश्क
नीलाभ प्रकाशन में साहिर लुधियानवी, उपेंद्रनाथ अश्क व नीलाभ । तस्वीर साभार भूमिका द्विवेदी

नीलाभ प्रकाशन का इतिहास बताइए

बहुत ही खास। स्वतंत्रता के बाद किसी महिला द्वारा स्थापित पहला प्रकाशन था। इस प्रकाशन ने सबको छापा है। कृष्णा जी, नामवर जी। ये सब हमारे यहां से ही स्टैबलिश हुए हैं। आठ सौ गज के शोरूम में प्रकाशन है। सिविल लाइन्स में कॉफी हाउस से लगा हुआ। बड़े बड़े साहित्यकारों का एक दौर में जमघट वहां लगता था। फैज, साहिर लुधियानवी वहां बैठे हैं। महादेवी वर्मा, सुमित्रा नंदन पंत, हरवंश राय बच्चन वहां जमीन पर बैठे हैं। ये अक्सर आते थे वहां। ऐतिहासिक जगह है वो। संगोष्ठियां होती थीं।

कोई विवाद भी है प्रकाशन को लेकर

हां नीलाभ के पिता जी ने दो शादियां की थीं। नीलाभ की सौतेली मां के नाती जो हैं वो अब चाभी नहीं देते। उन्होंने एक तरह से कब्जा कर लिया है।

नीलाभ के विवाद

बहुत सही किया आपने विवादों पर चर्चा करके। दरअसल मैं कुछ बताना चाहती हूं, समाज को, प्रेस को। ताकि लोग गलतफहमी से निकलें। दरअसल नीलाभ को लेकर लोगों में बहुत गलतफहमी रहीं, जिसका दंश मुझे झेलना पड़ा। आमतौर पर लोग ये कहते हैं कि नीलाभ की मैं तीसरी बीबी हूं। लेकिन ऐसा नहीं है। नीलाभ ने दो ही शादी की हैं। लेकिन इस समाज ने नीलाभ की काम वाली को भी उनकी बीबी गिन लिया। माजरा ये है कि नीलाभ जब ईस्ट ऑफ कैलाश के फ्लैट पर थे, तो उनके घर काम वाली लगी हुई थी। एक रोज कामवाली रात को भागते भागते नीलाभ के पास आई, उसके सिर से खून बह रहा था। कामवाली ने बताया कि उसके पति ने उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया है। वो अपने बच्चों को भी लाई थी। तो ऐसे में नीलाभ ने उसको अपने घर में पनाह दी। और लोगों ने उसे नीलाभ की बीबी बना दिया। हां ये सच है कि मरते दम तक वो नीलाभ के घर में रही, पर वो बीबी नहीं थी। नीलाभ इस बात पर बड़ा ताज्जुब करते थे कि लोग क्या क्या कहानियां गढ़ते हैं।

आपके भविष्य की योजना

अभी कुछ सोचा ही नहीं, लिखते हैं बस, लिखने में मन लगा रहा

लेकिन आप तो तुरंत सोचने वाली महिला हैं

नीलाभ दोबारा मिल जाएं, सोचना ही नहीं पड़ेगा।

आर्थिक समृद्धि के लिए क्या करेंगी

पापा पैसा भेज देते हैं। देखिए हिंदी साहित्य तो पैसा देता नहीं। नीलाभ हिंदी साहित्य के भरोसे जिंदा नहीं थे। नीलाभ अगर हिंदी साहित्य से जुड़े हैं तो दस परसेंट जुड़े हैं, वो 90 परसेंट दूसरी चीजों से जुड़े हैं।

नीलाभ के बारे में वो जो लोग नहीं जानते

वो बहुत ही बिंदास आदमी थे। सिगार पीते थे। लंदन जब रहते थे। जूते, कपड़े भारते से मंगवाते थे। नीलाभ ने 128 किताबों का अनुवाद किया है। अरुंधति रॉय की किताब के अनुवाद के लिए उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड देने की घोषणा हुई जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। नीलाभ की जिंदगी भी बड़ी ऊबड़ खाबड़ रही। लंदन में रहने वाले उस व्यक्ति के जीवन में एक दौर ऐसा भी आय़ा जब उनके पास बीड़ी पीने के भी पैसे नहीं बचे थे। एक बार उन्होंने बीड़ी वाले से भी रुपए उधार मांगे थे। उसी बीड़ी वाले को कभी वो दो हजार रुपए एडवांस में देकर रखते थे और सिगरेट लेते रहते थे। जीवन के अंतिम दौर में बहुत बीमार रहने लगे और हमारे पास बहुत पैसे नहीं थे। नीलाभ ने फिल्म बनाईं, लाइट एंड साउंड शो बनाए। हिंदुस्तान के जितने महत्वपूर्ण किले हैं, दिल्ली को छोड़ दीजिए। सबसे बड़ा किला है गोलकुंडा हैदराबाद का। सबसे वीभत्स और विलक्षण किला है अंडबार निकोबार का। नीलाभ ने दोनो के लिए लाइट एंड साउंड शो बनाया है।

लाइट एंड साउंड शो मैं उनकी क्या भूमिका है, थोड़ा समझाइए

नीलाभ ने उसकी स्क्रिप्टिंग की है। वो पिछले चालीस पचास सालों से अनवरत चल रहे हैं। नीलाभ ने बनाकर दिया है उनको। गोलकुंडा में अमिताभ बच्चन की आवाज है। अंडमान वाले में दो तीन चरित्र हैं। उसमें एक को नीलाभ ने भी आवाज दी है।

आप डाक्यूमेंट्री भी बनाती हैं

हां बनाती हूं। पर इन सबके लिए पैसा चाहिए।

नए हिंदी लेखकों में कौन पसंद है

मैं कम पढ़ पाती हूं, मैं अंग्रेजी साहित्य पढ़ती हूं। हालांकि असगर वजाहत, राजकमल चौधरी मुझे बेहद पसंद हैं।

अंग्रेजी में कुछ क्यों नहीं लिखा

मेरी पहली किताब अंग्रेजी में ही थी, द लास्ट ट्रुथ। लेकिन वो चली नहीं।

आजकल का चलन है लेखक अपनी मार्केटिंग खुद करते हैं, फेसबुक पर या कहीं औऱ।

मेरे लिए सबसे बड़ी बात ये है कि सुदूर कहीं बैठा मेरा पाठक मुझे पत्र लिख दे या फोन कर दे, कि उसे मेरी रचना पसंद आई। मैं आजकल वाली व्यवस्था पर यकीन नहीं रखती। प्रदर्शन पर भरोसा नहीं करती।

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