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माखनलाल विवि विवादः दोनों आरोपी प्रोफेसरों के बयान पढ़िए

माखनलाल पत्रकारिता वि.वि.
माखनलाल पत्रकारिता वि.वि.

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में भी हंगामा चल रहा है। मीडिया मिरर ने इस मुद्दे पर खबरें प्रसारित की हैं। आपने पढ़ी ही होंगी। अब इस मामले पर दोनोंआरोपी प्रोफेसरों के बयान आ गए हैं। उनको पढ़िए और राय बनाइए। दिलीप मंडल और मुकेश कुमार दोनों के वो बयान जो उन्होंने स्वयं लिखे हैं। इसके साथ ही बता दें कि इन दोनों प्रोफेसरों को 15 दिन के लिए विश्वविद्यालय प्रवेश पर बैन कर दिया गया है। इन पर छात्रों को लेकर जातिगत टिप्पणी के आरोप हैं। एक जांच कमेटी गठित की गई है जो 15 दिन में फैसला देगी, तब तक के लिए ये एडजंक्ट प्रोफेसर एक तरह से अस्थायी निलंबित ही हैं। इस पूरे मामले में 17 छात्रों पर भी एफआईआर की गई है। हालांकि दिलीप मंडल ने छात्रों पर दर्ज  एफआईआर कैंसल करने की मांग की है

 

 

दिलीप मंडल की टिप्प्णी

भोपाल के अपने विद्यार्थियों के प्रति,

आपका दोष नहीं है. मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है. आप एक बड़े षड्यंत्र के शिकार बन गए हैं. तोड़फोड़ गलत है. इसकी जगह विमर्श और बहस होनी चाहिए. आप मुझे बेहद प्रिय हैं.

विश्वविद्यालयों को दुनिया भर में विमर्श का केंद्र माना गया है. विश्वविद्यालय रट्टा सेंटर नहीं हैं. सहमत और असहमत विचारों के बीच विमर्श न हो तो विश्वविद्यालयों का होना ही निरर्थक है.

वाल्टेयर की वह बात तो आपने सुनी ही होगी कि – ”हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं, फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूँगा.”

मेरी बुद्ध-फुले-आंबेडकर विचारधारा से आपकी असहमति हो सकती है. लेकिन इसके लिए आपको अपनी विचारधारा के पक्ष में तर्क जुटाने चाहिए.

खैर, मैं जिस षड्यंत्र की ओर आपका इशारा कर रहा था, उसकी जड़ें भोपाल में नहीं, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हैं.

रायपुर के कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति यानी वाइस चांसलर का पद इन दिनों खाली है. उसके लिए आवेदन मंगाए गए हैं. आवेदनों के आधार पर सर्च कमेटी ने कुछ नाम चुने हैं.

मेरे खिलाफ खुलकर अभियान चला रहे जगदीश उपासने, जो आपके विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं, का नाम उस चुने हुए लोगों की लिस्ट में है.

अखबारों में छपा है कि मेरा नाम भी सलेक्टेड लोगों की लिस्ट में है. कई लोग कह रहे हैं कि मेरा नाम लिस्ट में सबसे ऊपर है.

उनमें से ही कोई वहां कुलपति बनेगा

यही है भोपाल में चल रहे विवाद का मूल कारण, जिसमें आप बिना किसी गलती के फंस गए हैं. आपको इस आग में तब झोंका गया है, जब आपकी परीक्षाएं करीब हैं.

षड्यंत्रकारियों ने ये भी नहीं सोचा कि आपका करियर इस तरह दांव पर लग जाएगा.

जगदीश उपासने एक औसत प्रतिभा के व्यक्ति हैं. उनकी ताकत उनकी संघी पृष्ठभूमि है. न उन्होंने कोई किताब लिखी है, न उन्हें कभी कोई राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है, न कोई शोध पत्र लिखा है, न किसी अंतरराष्ट्रीय पब्लिकेशन में उनका कोई चैप्टर छपा है. किसी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय ने उन्हें कभी बोलने के लिए नहीं बुलाया. उनका टीवी पत्रकारिता का अनूभव शून्य है और डिजिटल पत्रकारिता में वे अभी पैदा नहीं हुए हैं. जबकि पत्रकारिता का भविष्य टीवी और वेब में ही है. वे सिर्फ हिंदी में लेखन करते हैं. जबकि मैंने आपको बताया है कि बहुभाषी होना कितना जरूरी है.

उनके मुकाबले मेरे पास न सिर्फ डिग्रियां ज्यादा हैं, बल्कि मैंने चार महत्वपूर्ण किताबें लिखीं हैं जो देश के कई विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरी में हैं. कई रिसर्च पेपर और पीएचडी में मेरी किताबों को साइट किया गया है.

मुझे भारतेंदु हरिश्चंद्र राष्ट्रीय सम्मान मिल चुका है और राममोहन राय श्रेष्ठ पत्रकारिता सम्मान में मेरा विशेष उल्लेख है. मेरा एक चैप्टर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की मीडिया एथिक्स की किताब में शामिल है, जिसे पूरी दुनिया पढ़ती है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने मुझे बोलने के लिए बुलाया है.

मैंने प्रिंट के अलावा टीवी पत्रकारिता और वेब पत्रकारिता की है. टीवी पत्रकारिता मैंने स्टार नेटवर्क के अलावा CNBCऔर आज तक के साथ की है. टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में मैंने वेब पत्रकारिता में संपादक की जिम्मेदारी निभाई है. आज तक डॉट कॉम का मैं प्रभारी रह चुका हूं.

IIMC के मेरे पढ़ाए छात्र और छात्राएं सिविल सर्विस, स्टेट सिविल सर्विस के अलावा देश-विदेश में पत्रकारिता कर रहे हैं. वे सब मुझे बहुत प्रिय हैं.

मैरे सैकड़ों लेख इंग्लिश में और हजारों लेख हिंदी में छपे हैं. कथादेश की मीडिया वार्षिकी का मैंने संपादन किया है.

मैंने कई वेब पोर्टल लॉंच किए हैं और कई लोगों को यूट्यूब चैनल खोलने में सलाह दी है.

मैंने CNN से जुड़ेअंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट के साथ टीवी चैनल लॉन्च करने की ट्रेनिंग दी है.

और ये सब मैने जाति की ताकत और जाति के नेटवर्क के बिना किया है. मैंने अपनी विचारधारा छिपाई नहीं है और इसका खामियाजा भी भुगता है.

लेकिन मेरा प्रोफेशनल जीवन उससे अलग है.

जगदीश उपासने का जब इंडिया टुडे में कार्यकाल न बढ़ाकर मुझे संपादक बनाया गया तब पत्रिका तेजी से ढलान के रास्ते पर चल रही थी. मेरे समय् में पत्रिका फिर से खड़ी हो गई.

वहां विविधता का मैंने ध्यान रखा और जगदीश उपासने तक को वहां लिखने का मौका दिया, क्योंकि वे RSS की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं.

बहरहाल जगदीश उपासने वाइस चांसलर बन जाएं, मुझे शिकायत नहीं है.

लेकिन वे जिस तरह मेरे खिलाफ लिखकर छात्रों को भड़का रहे हैं, वह शर्मनाक है.

मेरे खिलाफ लड़ाई है, मुझसे लड़िए. छात्रों को उकसाइए मत. उनका करियर महत्वपूर्ण हैं.

अगर मेरी राय ली गई तो मैं कहूंगा कि मेरे विद्यार्थियों से FIR हटा ली जाए. सिर्फ जिन लोगों ने तोड़फोड़ की, उनके खिलाफ कानून अपना काम करे.

संघ विश्वविद्यालय से दूर रहे. संघी अनपढ़ और कुपढ़ लोग हैं. न पढ़ेंगे, न पढ़ने देंगे. उनसे बचिए.

मैं आपके सफल करियर की कामना करता हूं और चाहता हूं कि MOJO, PTC और ब्लाॉग की ट्रेनिंग के बाद मैं आपको एंकरिंग और टीवी रिपोर्टिंग सिखा पाऊं. यूट्यूब चैनले खोलकर पैसा कैसे कमाया जा सकता है, ये भी मुझे आपको सिखाना है.

इस बीच PTC का अभ्यास करते रहिए. मैं चेक करूंगा.

स्वस्थ रहिए, प्रसन्न रहिए, मजे कीजिए. नियमित सिनेमा देखिए और रिव्यू लिखिए. एक ही जिंदगी है, एक भी दिन बेकार नहीं होना चाहिए. कोई पुनर्जन्म नहीं होने वाला है. पुनर्जन्म की बात फ्रॉड है.

सद्गुरू कबीर ने लिखा है- बहुरि नहीं आवना.

आपका

दिलीप मंडल
दिल्ली
17/12/2019

नोट- बताइए तो कि मैंने इस पत्र में प्रूफ की कौन कौन सी गलतियां की हैं. सबसे ज्यादा गलतियां बताने वाला बाकी लोगों को कॉफी पिलाएगा.

 

मुकेश कुमार का बयान

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में जो बवाल चल रहा है, वह पूरी तरह से सुनियोजित है, इसमें मुझे रंच मात्र भी संदेह नहीं है। एक विचारधारा विशेष के लोग छात्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि विश्विद्यालय में चल रहे बदलाव को पटरी से उतारा जा सके। छात्रों का तो पता नहीं, मगर जो लोग उनके पीछे हैं, उन्हें गाँधी, अंबेडकर, नेहरू पसंद नहीं आ रहे, क्योंकि वे सावरकर, गोलवलकर के अनुयायी हैं। उन्हें संविधान और लोकतंत्र भी रास नहीं आ रहे, क्योंकि वे सामंती मानसिकता के लोग हैं।
ये तो सर्वविदित है कि पिछले पंद्रह साल में विवि. में क्या हुआ, उसे कैसे चलाया गया और एक विचारधारा विशेष के लोगों ने उसका कैसे बेजा इस्तेमाल किया। विवि एकेडेमिक गतिविधियों के बजाय एक राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा के अड्डे के तौर पर चर्चाओं में अधिक रहा। ज़ाहिर है कि अब जिनके हाथों में विवि की बागडोर नहीं है, वे किसी भी तरह के सकारात्मक परिवर्तन को नहीं पचा पा रहे हैं। इसलिए विवाद खड़े किए जा रहे हैं, निशाने साधे जा रहे हैं। ये सिलसिला चलेगा। एक मुद्दा ख़त्म होगा तो दूसरा ढूंढ़ लिया जाएगा।
छात्रों से तो यही कहा जा सकता है कि वे उस घटिया राजनीति के मोहरे न बनें और निहित स्वार्थों के उस मिथ्या प्रचार में न आएं जो अकसर ऐसे मौक़ों पर इस्तेमाल किया जाता है।

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