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क्या सिंधिया को साध पाएगी भाजपा ?

सिंधिया
सिंधिया ज्योतिर आदित्य

 

बीजेपी के तुदक्कड़, चोटीधारी, गमछाधारी, भगवाधारी नेताओं के बीच टू मच हैंडसम सिंधिया तालमेल कैसे बिठाते हैं ये देखने लायक होगा। मुझे तो सोचकर हंसी आती है कि गिरिराज सिंह बैठे हों और एक ओर सिंधिया। सिंधिया को जुंबा केसरी खाने टाइप फीलिंग होने वाली है। हाहाहा। 

 

राजनीति का मतलब ही यही है कि राज के लिए नीति बनती रहे, होती रहे। वरना राजनीति काहे की। जनादेश-वनादेश सब निरी बकवास बातें हैं। बीजेपी जो कर रही है। वाकई वही राजनीति है। अमित शाह जो कर रहे हैं वही राजनीति है। अब राजनेता तो राजनीति ही करेगा औऱ वही उसका धर्म है। बनी बनाई सरकार को पटकनी देना तो शीर्ष राजनीति है। बधाई के पात्र हैं ऐसी राजनीति को करने वाले राजनेता।

राजनीति में जय-पराजय, पाला बदली सब सामान्य बात है। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी लगभग जा ही चुके हैं भाजपा में। इसमें आश्चर्य कुछ नहीं। सत्ता की चाबी पाने के लिए अक्सर राजनेता पार्टियां बदलते हैं। पूरे मामले को मैं देख रहा हूं। भाजपा में ज्योतिरादित्य चले जाएं, हो सकता है मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन जाए या हो सकता है केंद्र में मंत्री बन जाएं। दोनों बाते हैं।

पर चूंकि मैं ग्वालियर से हूं। सिंधिया की राजनीति, शख्सिंयत, विरासत, प्रभाव को करीब से समझता हूं। इसलिए मैं इस बात को लेकर हैरत में हूं कि सिंधिया जैसे एक व्यक्तित्व को भाजपा कैसे साध पाएगी। ये मेरे लिए बड़ा सवाल है। उनका बीजेपी में आना एक बात, कोई पद मिल जाना एक औऱ बात। पर सिंधिया को साधना एक बहुत बड़ी बात है। जो मध्यप्रदेश की राजनीति और ग्वालियर के इस 5 फुट 5 इंच के राजनेता के वंश, सियासत, विरासत को समझते हैं। वो मेरी बात के संकेत समझ रहे होंगे। सिंधिया कोई शत्रुघन सिन्हा, चौधरी वीरेंद्र सिंह, कल्याण सिंह, पासवान टाइप पीस नहीं हैं। कि वो किसी पार्टी में शामिल हो गए, सदस्यता ले ली और ज्यादा हुआ तो उन्हें संतुष्ट करने के लिए कपड़ा मंत्रालय टाइप कोई पद देकर किनारा कर लिया गया। हाहाहा। बिल्कुल नहीं। बिल्कुल भी नहीं।

सिंधिया से ऐसे पार नहीं पाया जाएगा। सिंधिया का कद, प्रभाव, व्यक्तित्व, आकर्षण, इतिहास, विरासत, सियासत इतनी भारी पड़ने वाली हैं भाजपा पर कि आप समझ लीजिए कि मध्यप्रदेश भाजपा के दिग्गज नेताओं में शामिल कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, प्रभात झा, नरेंद्र सिंह तोमर औऱ खुद शिवराज सिंह चौहान की सियासी जमीन खतरे में पड़ जाएगी। बीजेपी के ये नेता जो कुंडली मारकर बैठे हुए थे औऱ तमाम अच्छे नेताओं को आगे बढ़ने से रोक रहे थे। चाहे कप्तान सिंह सोलंकी हों या यशोधरा राजे। इस कुंडली ने सबको रोका, जो उन्हें आगे बढ़ता दिखा। लेकिन सिंधिया अगर बीजेपी में शामिल होते हैं और कोई बड़ी जिम्मेदारी पाते हैं तो एक झटके में ये सब उनके द्वारपाल सदृश जान पड़ने वाले हैं।  और सिंधिया के भाजपा में आने का सबसे ज्यादा अगर किसी को नुकसान है तो वो केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को। अगर सिंधिया बीजेपी के हो गए तो समझो उनके प्रभाव के आगे ये सारे बड़े नाम निस्तेज हो जाएंगे। नरेंद्र सिंह तोमर जो लगातार मोदी कैबिनेट में केंद्रीय मंत्री हैं। सिंधिया के कद के आगे बौने पड़ जाएंगे। सिंधिया अगर बीजेपी के तमगे के साथ चंबल परिक्षेत्र में या मध्यप्रदेश के दंगल में कूदते हैं तो यकीन मानिए तोमर जैसे राजनेता का प्रभाव पानी मांगता नजर आएगा। क्योंकि सिंधिया औऱ तोमर दोनों चंबल से आते हैं और एक म्यान में दो तलवारें तो कभी रही रहीं। और सिंधिया राजा ही हैं औऱ तोमर प्रजा।

दूसरी बात जो मेरी चिंता है कि भाजपा की जो विचारधारा है, जो सोच है। जनता से सीधे जुड़ने वाली। भाजपा के बड़े से बड़े नेता या मंत्री के बंगले के दरवाजे हमेशा खाकी निक्कर वालों के लिए खुले होते हैं। समाज के अंतिम पंक्ति का व्यक्ति उनके पास जा सकता है मिल सकता है। पर सिंधिया भगवाधारी होकर भी क्या ऐसा कर पाएंगे। श्रीमंत महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया क्या संघ के चोटीधारियों को, धोती धारियों को, टीकाधारियों को स्वीकार पाएंगे। आज भी लंदन औऱ पेरिस में गोल्फ खेलने वाले सिंधिया, पेजथ्री पार्टियों के शौकीन महाराजा सिंधिया भाजपा की नीतियों में कैसे खुद को फिट करेंगे। ये देखने लायक होगा। वहीं भाजपा के लिए भी पशोपेश की स्थिति रहेगी। जैसा कि मैंने पहले कहा कि सिंधिया कोई स्मृति ईरानी टाइप फिल इन द ब्लैंक्स मटेरियल नहीं हैं। कि कुछ नहीं तो कपड़ा मंत्रालय ही देकर छुट्टी करो। या पासवान टाइप। सिंधिया को आप अगर केंद्रीय कैबिनेट में शामिल करते हैं तो बीजेपी के प्रथम पंक्ति के नेताओं के प्रभाव पर बन आएगी। प्रधानमंत्री, राजनाथ सिंह और अमित शाह को छोड़ दें तो सिंधिया बीजेपी में आते ही बीजेपी के तमाम आला नेताओं पर भारी पड़ सकते हैं। सिंधिया का जो आनुवंशिक आकर्षक है, वो इतना भारी है कि वो सिंधिया से ही शुरू होता है और सिंधिया पर ही खत्म होता है। सिंधिया को साधने के लिए भाजपा को हर्फ दर हर्फ मोहरे सेट करने पड़ेंगे। वरना उनके कद का प्रभाव तमाम बड़े नेताओं की सियासी बलि ले लेगा। चाहे वो स्टार प्रचारकों को सूची हो, चाहे वो राज्यों का प्रभार हो, मंत्रालय या संगठन में बड़ी भूमिका। भाजपा उन्हें दरकिनार कर नहीं सकती क्योंकि सिंधिया एक स्टेट की सत्ता को ध्वस्त करके सत्ता बीजेपी को सौंप रहे हैं। कद देखिए एक राजनेता का, कि एक मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता साथ लेकर बीजेपी के पास आए हैं। फिल इन द ब्लैंक्स मटेरियल नहीं हैं। आपको उन्हें क्य़ा जिम्मेदारी देना है। चुनौतीपूर्ण होगा। ये भी सच है कि सिंधिया बीजेपी में जाते ही मध्यप्रदेश बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे होंगे। तो ऐसे में मध्यप्रदेश के बड़े भाजपा नेताओं की बलि तो चढ़ ही गई समझो। सिंधिया को तवज्जो देना भाजपा की मजबूरी है लेकिन उस तवज्जो से भाजपा के जमीनी औऱ पुराने नेताओं के कद औऱ प्रभाव को जो झटका लगेगा और देखने लायक होगा। क्योंकि सिंधिया जैसे राजनेता को आप आम राजनेताओं सरीखा ट्रीट नहीं कर सकते। ये बीजेपी जानती है। न संसद के अंदर और न बाहर। सिंधिया अपने साथ एक लम्बी राजनैतिक और राजशाही विरासत लेकर चलते हैं। उसका प्रभाव दिखता है। सिंधिया को साधने के लिए बीजेपी को पैरलल पॉलिसी बनाकर चलना होगा। सिंधिया वही है जिनके आगे आज भी आधा झुककर और हुकुम, या श्रीमंत या महाराज कहकर कांग्रेस के तमाम मंत्री या विधायक सांसद, कार्य़कर्ता सामना करते हैं। अब वो सिंधिया इतने भी सपाट नहीं हो जाएंगे कि खाकी निक्कर वाले संघी के साथ महल में ध्वज प्रणाम करते दिखें या संघी महल में शाखा लगाए। मैं एक बार फिर कह रहा हूं सिंधिया की एंट्री भाजपा के तमाम बड़े नेताओं के लिए खतरे की घंटी है। खासतौर पर अनुराग ठाकुर, जितेंद्र सिंह इस श्रेणी के जो युवा नेता है। सिंधिया का चेहरा इन पर भारी पड़ने वाला है।

आमतौर पर हम सुनते हैं कि अमित शाह ने फलां मंत्री को तलब किया, मोदी ने फलां नेता को फटकार लगाई। सिंधिया जैसे व्यक्ति के साथ ये भी गुंजाइश बनने से रही। ये अमित शाह औऱ मोदी दोनो जानते हैं। क्योंकि सिंधिया परिवार का सियासी जड़ें मोदी औऱ शाह से गहरी हैं। सिंधिया राजा हैं, महाराजा हैं। भाजपा और सिंधिया फिलहाल दोनों एक दूसरे की मजबूरी हैं। पर ये सिंधिया को बीजेपी महाराज के तौर पर कबतक झेलती रहेगी ये बड़ी बात है। क्योंकि कोई भी सिंधिया राजनीति पृष्ठभूमि के बाहर या अंदर एरोगेंस किसी का नहीं झेल सका। बीजेपी कब उन्हें उनके तौर तरीकों के साथ झेले ये औऱ बात है।

 

डॉ. प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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