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कोरोनाः निर्दयी मीडिया मुगलों के ह्दय की तासीर समझिए

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एडीटर अटैक

मीडिया संस्थानों में कोरोना का भय लेकिन रोकथाम के लिए कुछ नहीं,  क्योंकि जिंदगी यहां बड़ी सस्ती है

सीधे मुद्दे पर आते हैं। ईश्वर लोगों को ताकत दे, धन दे, एश्वर्य दे लेकिन साथ साथ एक अच्छी सोच भी दे ताकि वो अपने दल-बल का उपयोग जनहित में कर सके। पर कहते हैं न इस देश में सारी शक्तियां और पैसा उल्लुओं को थमा दी गई हैं और गंवार नेताओं को। जिनको आम लोगों से मतलब ही क्या। फिर वो मीडिया संस्थानों के अरब खरबपति मालिक ही क्यों न हों।

एक ऐसे दौर में जब पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का खौफ है। सारा संसार चौकन्ना और डरा हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और तमाम अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने एडवाइजरी जारी की है। सैकड़ों देश दहशत में हैं। और अब तो कोरोना को महामारी घोषित कर दिया गया है। तब आप इन मूर्ख और निर्दयी मीडिया मुगलों के जटिल ह्दयों की तासीर को समझिए।

तकरीबन 10 दिन पहले ही केंद्र व दिल्ली सरकार ने आदेश जारी कर दिए थे कि एहतियातन एक महीने के लिए बॉयोमेट्रिक हाजरी बंद की जाती है। चूंकि कोरोना छूने से फैलने वाला रोग है और बायोमैट्रिक के चलते इसके फैलने की आशंका सबसे ज्यादा है। तो सरकार ने सबसे पहले इस पर पाबंदी लगाई। सरकारी संस्थानों में बायोमेट्रिक हाजिरी पूरी तरह से बंद है।  मीडिया ने ही इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया लेकिन अफसोस खुद अपने यहां ये आदेश लागू न करा सके। क्योंकि यहां काम कर रहे पत्रकार रूपी मजदूरों की जाने बड़ी सस्ती जो हैं। बेशक कोई मर जाए या कोरोना की चपेट में आ जाए पर बायोमेट्रिक हाजिरी चलती रहनी चाहिए क्योंकि मालिक को तो मजदूरों के कटने वाले पैसे से सुकून जो मिलता है, वो सुकून एक महीने क्यों कम किया जाए।

स्थिति देखिए कि बॉयोमेट्रिक हाजिरी सिस्टम को एक माह बंद करने के लिए दिल्ली के कई मीडिया संस्थानों के सम्पादकों ने अपने प्रबंधन को पत्र लिखा पर उस पत्र पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया। क्योंकि यहां जिंदगी बड़ी सस्ती है। अंग्रेजी शासन काल में हम सुनते थे। ज्यादती की बातें, तानाशाही औऱ अत्याचारों की बातें। तो ये क्या है। आप सोच रहे होंगे ये सामान्य बात है। एक अखबार का सम्पादक मालिक को पत्र लिखता है कि सर कोरोना चरम पर है। भारत सरकार ने निर्देश दिए हैं कि बायोमेट्रिक बंद किए जाएं। बावजूद मालिक ने कार्रवाई करना उचित नहीं समझा। ये क्या है। सीधा सा मतलब है कि लोगों की मौत से इन अमीरजादों को कोई असर नहीं पड़ता। मैं कभी कभी सोचता हूं हम कैसे समाज में, किन लोगों के बीच काम कर रहे हैं जो इंसान को इंसान नहीं समझते। जो इंसानी जीवन की कीमत नहीं समझते। हर कोई एक दूसरे को काटने में लगा है। अमीर गरीब को शोषित करने में लगा है। कितना दुखद है ये। मैं सोचता हूं अगर जरा भी जमीर जिंदा होता किसी का तो तत्काल बगैर एक क्षण गंवाए ऐसे आदेश पर अमल करता। पर दिल्ली के मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों की मांग के बाद भी कोई सुनवाई नही हुई।

मीजिठिया वेज बोर्ड लगा तो मीडिया मालिकों को सांप सूंघ गया, अंदरखाने सब हरामियों ने आपस में बैठकें कर रणनीति बनाई कि अपने अपने संस्थानों में किसी भी कीमत पर मजीठिया लागू मत करना। क्योंकि कोई एक करेगा तो दूसरे पर भी दबाव बनेगा। वैसे बेशक एक दूसरे की टांग खींचते हैं ये मीडिया संस्थानों के मालिक पर पत्रकारों का खून चूसने के मामले में एक हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पचा गए। क्या क्या जतन नहीं किए। ये क्या अपने अखबारों और चैनलों से क्रांति करेंगे। सब पेशेवर व्यापारी हैं। भूखा, नंगा पत्रकार ठीक ही है भ्रष्ट हो जाए….

  • डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर
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