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मेरे पापा चाहते थे मैं टीचर बनूंः समीना अली सिद्दीकी

समीना
मशहूर एंकर समीना अली सिद्दीकी

29 वर्षों से रेडियो एवं टेलीविजन की दुनिया में अपना योगदान दे रहीं बेहद लोकप्रिय और काबिल पत्रकार, एंकर समीना अली सिद्दीकी से मीडिया मिरर सम्पादक डॉ प्रशांत राजावत ने लम्बी बातचीत की। समीना जी मूलतः भोपाल की हैं। उनकी आवाज में जो जादू है वो उन्हें विरासत में मिला। उनके वालिद भोपाल आकाशवाणी के लोकप्रिय उद्घोषक थे। जिन्हें गोल्डन वाइस के नाम से ख्याति मिली थी। हालांकि मजेदार बात ये है कि रेडियो की दुनिया में होने के बाद भी वालिद साब चाहते थे कि समीना शिक्षा के क्षेत्र में जाएं। यहां तक कि जब रेडियो में ऑडीशन दिया समीना जी ने, तो वो पिता को बिना बताए। लेकिन समीना जी ने एक एक करके उपलब्धियां अपने नाम कीं, रेडियो व टीवी जगत की एक सुनहरी आवाज के रूप में प्रसिद्ध हुईं तो एक दौर ऐसा भी आया जब उनके वालिद ने कहा मुझे तुम पर गर्व है। जो मैं नहीं कर सका आज तुम कर रही हो।  समीना जी के पति दिल्ली आकाशवाणी में शीर्ष अधिकारी हैं और साहित्य अकादमी से सम्मानित बाल साहित्यकार भी।  संयोग से विवाह का जरिया भी आकाशवाणी बना। मां शिक्षिका थीं।

दूरदर्शन, एफएम चैनल और तमाम चैनलों से समीना जी की यात्रा लोकसभा और राज्यसभा टीवी तक पहुंची। जहां मुकम्मल पहचान उन्हें राज्यसभा के बहुचर्चित शो शख्र्सियत से  मिली।

आप साक्षात्कार पढ़िए, बेहद सुंदर बातचीत। जिसके जरिए आप समीना जी के रियल और रील लाइफ के किरदार को और करीब से जान व समझ पाएंगे।

 

 

प्र. कोरोना जैसी भयावह महामारी का दौर चल रहा है। कहां हैं आजकल आप और कैसे समय बिताती हैं।

उ. भोपाल में हूँ आजकल और ज़्यादा वक़्त पढ़ने में गुज़र रहा है। बहुत सी अच्छी किताबें जो मसरूफ ज़िंदगी में बुक्शेल्फ़ की शोभा बनी थी, अब में उन्हें पढ़ रही हूँ और इस बीच कुछ समाजसेवा भी जारी है। उन लोगों तक खाना या राशन पहुँचा रहे हैं जो इन दिनों मुश्किल में हैं। मेरा मानना है की अगर एक परिवार किन्ही दो परिवारों का ज़िम्मा लेता है उनके खाने का इंतेजाम कर लेता है तो ये मुश्किल वक़्त गुज़र जाएगा और इस सेवा से तो रब भी राज़ी होता है।

प्र. खबरों को जानने के लिए क्या करती हैं आजकल। अखबार या चैनल। अखबार तो लोग मंगाना बंद कर चुके हैं। आप मंगा रही हैं।
उ. ज़रूरत नहीं क्यूँकि टीवी पर बहुत सी खबरें मिल जाती है
प्र. क्या आप मानती हैं तब्लीगी जमातियों की लापरवाही के चलते देश में कोरोना के मामले तेजी से बढ़े हैं। क्या संदेश देना चाहेंगी मुस्लिम कौम को इस समय।
उ. अकेले उन्हें ज़िम्मेदार ठहराना ग़लत होगा, पर हाँ कोताही हुई है। जब ये मामले बढ़ने का अंदेशा था तभी कुछ सख़्त कदम उठाए जाने चाहिए थे। किसी भी धार्मिक सम्मेलन पर रोक लगानी चाहिए थी। मुंबई में होने वाले सम्मेलन को हरी झंडी नहीं मिली महाराष्ट्र सरकार से तो फिर दिल्ली ने क्यू इजाज़त दी। बहुत सी अनदेखी की गयी उनका बखान ज़रूरी नहीं अब अब ये ज़रूरी है की कैसे इस पर विजय पायी जाए।
प्र. चूंकि ये दौर ऐसा है। एक तरफ जहां हर कोई संकट औऱ भय से गुजर रहा हैं तो वहीं जातिगत मतभेद चरम पर हैं। लगातार खबरें आती हैं मुस्लिम लॉक डाउन का पालन कराने वाले पुलिस वालों को पीट रहे हैं, जो कोरंटीन में हैं वो नर्सों के साथ अभद्र व्यवहार कर रहे हैं, ऐसी खबरें भी थीं कि मुस्लिम थूक लगाकर सब्जियां बेच रहे हैं। किस तरह लेती हैं इन खबरों को। क्या ये खबरें गलत हैं या वाकई मुस्लिमों को जागरुक और शिक्षित करने की आवश्यक्ता है।
उ. ये वक़्त जातिगत समीकरण और नफ़रत फैलाने वालों से अलग हटकर देशहित में सोचने और काम करने की कोशिश की ज़रूरत है और जो स्वास्थ्य कर्मियों पर ज़्यादती कर रहे हैं वो घोर निंदनीय है और ऐसे लोगों को मज़हब के चश्मे से देखना ग़लत है क्यूँकि कोई भी मज़हब ऐसी शिक्षा नहीं देता और अनपढ़ को शिक्षा देने का काम हर कोई कर सकता है कोशिश तो कीजिए। हिंदू मुस्लिम का राग अलापने से कुछ ना होगा जनाब अभी तो ज़िंदा रहें स्वस्थ रहें ये ज़रूरी है।
प्र. समीना जी आप भोपाल में जन्मीं हैं, वहीं पली बढ़ीं। आपके बचपन और युवावस्था के भोपाल और अब के भोपाल में कितना अंतर पाती हैं। ये अंतर आप स्वाथ्य, शिक्षा, महिला जागरूकता, विकास, पर्य़टन, मीडिया विस्तार, समस्या आदि किसी भी क्षेत्र से जोड़ते हुए बता सकती हैं जो आपको प्राथमिकता से बताना ठीक लगे। आज के भोपाल में कोई एक कमी जो आपको सबसे ज्यादा खलती हो। और कोई अच्छाई जो आपको सबसे ज्यादा पसंद आती  हो।
उ. भोपाल से पढ़ाई की और यहीं से टीवी और radio से शुरुआत की। फिर १९९३ में दिल्ली जाना हुआ। तक़रीबन २६ साल दिल्ली में गुज़ारे। बहुत से चैनल के साथ काम किया। जिस में DD NEWS,  ZEE NEWS,  ANI HISTORY, CHANNEL NATIONAL GEOGRAFIC, लोकसभा TV, राज्यसभा टीवी में काम किया। इसी के साथ देश के पहले एफ एम चैनल की कोर टीम का हिस्सा रही, जो १९९३ में AIR FM चैनल था, बाद में एफ एम रेन्बो के नाम से मशहूर हुआ।
जहां तक भोपाल की बात है यहां मेरी वापसी २०१८ में हुई कुछ वक़्त दिल्ली और कुछ वक़्त भोपाल में रहती हूँ। भोपाल मिलीजुली संस्कृति का शहर है। लोग प्रेम के साथ रहते हैं। यहाँ प्रगति की रफ़्तार दिल्ली जैसी नहीं है। संसाधन हैं लेकिन अभी फ़िलहाल बहुत ज़्यादा डिवेलप्मेंट नहीं हुआ है। वहीं इस प्रदेश का दूसरा शहर इंदौर में ग़ज़ब का काम हुआ है। भोपाल अभी पीछे है

समीना अली
समीना अली सिद्दीकी अपने परिवार के साथ।

प्र. अच्छा समीना जी आपके वालिद सैयद शाकिर अली साब भोपाल आकाशवाणी में मशहूर उद्घोषक रहे और आपकी मां हमीदिया कॉलेज में प्रोफेसर। तो घर का माहौल तो एकदम पढ़ाकूं टाइप रहता होगा। कुछ बताइए। अभिभावकों की ओर से किस तरह की बातें और हिदायतें आपको दी जाती थीं।
उ. हाँ पढ़ाई लिखाई के माहौल में पले बढ़े माँ पापा ने हमेशा काम करने, खुद मेहनत करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। हिम्मत बढ़ायी, हमेशा ये कहा कि मेहनत करना ज़रूरी है फल की चिंता नहीं करो। जब मेहनत करोगे तो फल मीठा होगा ही।
प्र. आपके करियर की शुरूआत भी आकाशवाणी भोपाल से हुई। इसके पीछे आपके वालिद साहब का हाथ था? उनकी प्रेरणा ? क्या वो कहते थे आपको इस क्षेत्र में जाना है ? मेरा मतलब आपका रुझान इस ओर कैसे हुआ ? क्या कभी उन्होंने आपकी सिफारिश की आकाशवाणी में काम के लिए।
उत्तर– अरे नहीं, बिलकुल नहीं। पिताजी चाहते थे की माँ का प्रफ़ेशन लूं यानी शिक्षा के क्षेत्र में जाऊँ लेकिन मेरा रुझान शुरू से radio में रहा क्यूँकि पिता को माइक पर बोलते देखती तो दिल ये कहता ये काम मुझे करना है और यू ये शौक़ कब प्रफ़ेशन में बदला नहीं पता लगा।
पिताजी ने मदद नहीं की क्यूँकि वो इस में यक़ीन नहीं रखते थे। उनका मानना था की माइक पर तो आपको ही बोलना है, नहीं बोल पाएगी तो करियर खतम। पहले लोग बहुत सच्चे और कड़क हुआ करते थे और राज की बात ये की जब मैंने radio पर audition दिया तो बिना बताए दिया। जब पास हो गयी तो उसकी सूचना telegram से दी जाती थी। वो telegram पिता के हाथ में आया। बस फिर क्या था बातचीत बंद। वो कहते थे शिक्षा का क्षेत्र लड़कियों के लिए बेहतर है । पर फिर मेरी ज़िद के आगे नरम पड़ गए और आख़िर में कहा बेटा ये साधना की मानिंद है इस में रमना पड़ता है shortcut नहीं है कोई। बस याद रखना मेरा नाम ख़राब ना करना। आपको बताऊँ मेरे पापा सैयद शाकिर अली को लोग golden voice के नाम से जानते थे। बेहद खूबसूरत आवाज़ के मलिक थे। मुझे याद है कई साल बाद जब मैं राज्यसभा टीवी से जुड़ी थी तब उन्होंने कहा था अब तुम मंझ गयी हो मुझे तुम पर नाज़ है और उनके ये अल्फ़ाज़ मेरे लिए दुनिया के सब से बड़े अवार्ड की मानिंद हैं।
प्र. समीना जी आपका निकाह आकाशवाणी दिल्ली के प्रोग्राम एग्जिक्यूटिव रईस सिद्दीकी साब के साथ हुआ। क्या उनसे निकाह की वजह आकाशवाणी रहा। रईस साब अच्छे साहित्यकार भी हैं। उन्हें उनके कहानी संग्रह बातूनी लड़की के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड भी शायद मिला है। आप भी हिंदी और अंग्रेजी साहित्य से एमए हैं। आप भी कुछ लिखती हैं?  कोई किताब, कहानी, कविताएं ? आपने बातूनी लड़की संग्रह पढ़ा है क्या? अगर हां तो क्या है उसमें ऐसा, आप बताएं हमारे पाठकों को ताकि वो इसे पढ़ने में रुचि दिखाएं। आपको क्या अच्छा लगा इस संग्रह में। रईस साब की रचनाओं की समीक्षा करती हैं कभी।
उत्तर. रईस साहिब से शादी आकाशवाणी के ज़रिए हुई। वो १९९३ में upsc के ज़रिए programme executive की हैसियत से आए। वहां पिता भी थे, लिहाज़ा उनको लगा की ये मेरी बेटी के लिए बेहतर होगा। सो हमारा रिश्ता हुआ और फिर एक साल के बाद शादी और फिर दिल्ली। ये ज़रूर कहना चाहूँगी रईस साहिब ने मेरे करीयर को आगे जारी रखने में पूरा सहयोग दिया और हमेशा अच्छे बुरे वक़्त में होंसला भी बढ़ाया। जो मेरे लिए ख़ुशक़िस्मती है। रईस साहिब जाने माने बालसाहित्यकार हैं और उनको बातूनी लड़की के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। जो हमारे लिए फक्र की बात है। बातूनी लड़की की कहानियाँ अपने आप में मिसाल हैं। ऐसी किताब बहुत कम लोग लिखने का होंसला कर पाते हैं। सलामत रहें रईस साहिब।
मेरी ज़िंदगी टीवी शोज़ में गुज़री। लिखने का वक़्त नहीं मिला लेकिन अब सोच रही हूँ कुछ लिखूँ जो मेरी २९ साल टीवी radio की ज़िंदगी रही है।

 

प्र. समीना जी राज्यसभा टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम शख्सियत के 250 एपिसोड आपने कर लिए हैं। एक से बढ़कर एक शख्सियतों से आपने लोगों को मिलवाया। पर कोई एक शख्सियत जिसने आपको बातचीत के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित किया हो।  एक और बात साक्षात्कार श्रृंखलाओं में अतिथियों का चुनाव किस आधार पर होना चाहिए। आप किस तरह चयन करती हैं अपने अतिथियों का कि इनको बुलाना चाहिए, ये बुलाने लायक हैं। वो पैमाना क्या है।  समीना जी कभी ऐसा हुआ है कि आपने किसी को अपने प्रोग्राम शख्सियत में बुलाया हो और बाद में आपको लगा हो कि नहीं इनका कद और काबिलियत अभी इतना नहीं था कि इनका साक्षात्कार किया जाए। आपसे गलती हुई। ऐसी शख्सियत जिसे आपने शख्सियत के लिए न्यौता दिया हो और उसने पहले दौर में ही साफ मना कर दिया हो।  250 एपिसोड करने के बाद, एक से एक दिग्गज अपने अपने क्षेत्रों के आने के बाद भी कोई ऐसा नाम आपकी नजर में है जिसे आपकी बहुत इच्छा हो कि वो शख्सियत प्रोग्राम में आपके सामने हो।   हालांकि शख्सियत पर कई सवाल हो गए। हाहाहा। पर शख्सियत है ही ऐसी चीज। इसलिए एक अंतिम सवाल इससे जुड़ा कि क्या आप मानती हैं कि आपकी जो भी ख्याति है उसमें शख्सियत प्रोग्राम को सबसे अधिक श्रेय जाता है।
उत्तर – शख़्सियत कार्यक्रम मील के पत्थर की मानिंद रहा। इसमें जानी मानी शख़्सियतें आयीं। जो इसे एक अनमोल ख़ज़ाना बना गयीं। जिन्हें हम टीवी या स्टेज पर देखते रहे थे उन्हें यूँ अपने सामने देखना रोमांच से कम ना था। इनसे मैंने सीखा की सहजता, सरलता, ज़मीन से जुड़े होना क्या होता होता है। जिनके सामने सैकड़ों लोग दीवानों की तरह उनको सुनने को बेताब होते हैं। वो जब शख़्सियत में आए तो बिलकुल ऐसे की वो मेरे परिवार का हिस्सा हैं। उनसे बहुत शफकत मोहब्बत मिली मुझे। हर कलाकार ने होंसला बढ़ाया। यही वजह रही की हम इतने एपिसोड कर पाए और शख़्सियत ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। हमारी fanmail में दुनियाभर के लोग शामिल रहे।
शख़्सियत में सभी कलाकार अपनी मिसाल आप रहे। उन सबसे सीखने का मौक़ा मिला। हाँ जगजीत सिंह जी और पंडित रविशंकर जी इसमें शामिल नहीं हो पाए हालाँकि उनसे बात हुई। समय निश्चित हुआ लेकिन उनकी ज़िंदगी ने मोहलत नहीं दी। इसका अफ़सोस रहेगा।
उस्ताद ज़ाकिर साहिब से समय नहीं मिल पाया, सो वो नहीं आ पाए। सबकी अपनी मसरूफ़ियत होती है।
शख़्सियत में कलाकारों ने वो बातें भी शेयर की जो अमूमन उन्होंने कभी नहीं की थीं। ऐसा खुद पंडित बिरजु महाराज जी, ग़ुलाम अली साहिब, आबिदा परवीन, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी जैसे कई महान कलाकारों ने कहा। जब हमने अपने २०० एपिसोड पूरे किए तो इन सब का आशीष मिला जो यूटूब पर मौजूद है।
और हाँ इस में दो राय नहीं कि शख़्सियत ने मेरी शख़्सियत को मुक्कमल किया और इसमें राज्यसभा टीवी के ceo रहे गुरदीप सिंह सप्पल का बड़ा योगदान रहा। जिन्होंने मुझे काम करने की पूरी आज़ादी दी उनका भी शुक्रिया।
शख़्सियत का कॉन्सेप्ट सबसे अलग था इसलिए इसकी तुलना किसी भी chat-show से नहीं की जा सकती।
जहां तक interview की तैय्यारी की बात है। कुछ टिप्स की बात है तो वो ये की -बहुत मेहनत है। मुझे याद है किसी भी कलाकार का इंटर्व्यू लेने से पहले मैं उनके सारे शोज़ देखती थी। उनके available इंटर्व्यूज़ पढ़ती थी। उनसे वक़्त लेकर उनसे एक दिन बात करती थी। उनके मित्रों से बात करती। उनके स्टूडेंट्स से मिलती। अपने सवाल बनती जाती। जब ये सब हो जाता तब जाकर अपने सवाल बनाती। बहुत मेहनत की इस पर और जब और ख़ुशी होती है जब भीड़ में कोई आपको रोक कर कहता है मैं शख़्सियत देखती हूँ आपका शुक्रिया। आज के दौर में इतना हसीन प्रोग्राम बनाने के लिए उस वक्त जो ख़ुशी मिलती है उसको लफ़्ज़ों में बयान कर पाना मुश्किल है। आप यक़ीन जानिए शख़्सियत जैसा कार्यक्रम चलता रहता तो अच्छा था।
नहीं किसी भी कलाकार ने ऐसा नहीं कहा बल्कि पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी तो चकित रह गए और उन्होंने on screen कहा भी अरे ये आपको कैसे मालूम, तो जनाब बहुत मेहनत है और ये आप पर है आप सिर्फ़ interview करना चाहते है या फिर उस इंटर्व्यू को अमर बनाना चाहते हैं choce is yours.
प्र. अच्छा आपके शौहर भी साहित्य जगत का एक बड़ा नाम हैं, क्या आपको नहीं लगता उन्हें भी आप शख्सियत में आने का अवसर दें।

समीना
पुरस्कार प्राप्त करते समीना जी

उत्तर– हाहाहा—हाँ आप सही कह रहे हैं। बुलाना चाहती थी पर जानते हैं परिवार हमेशा पीछे रह जाता है और वैसे भी रईस साहिब इसी क्षेत्र में थे। लिहाज़ा कुछ पाबंदियाँ भी होती हैं -मेरे माता पिता के बाद मेरे पति का सपोर्ट भरपूर रहा आपके माध्यम से भी मैं उनका शुक्रिया अदा करती हूँ।
प्र. फिर से भोपाल और वालिद साब से जुड़ी यादों में चलते हैं। आपके वालिद अब नहीं हैं। हाल ही में गुजर गए। किस तरह याद करती हैं उनको। एक बेटी के रूप में भी बताइए औऱ उनके आकाशवाणी के कार्य़काल के बारे में कुछ बताइए। जो यादगार हो। आप उनको रेडियो में सुनती रहीं होगी जब, उस दौर की कोई यादगार घटना।
उत्तर- मेरे पिता सैयद शाकिर अली Radio की दुनिया का जाना पहचान नाम रहे। बचपन से हमने उन्हें माइक के साथ देखा और जिस तरह वो अनाउन्स्मेंट करते लगता वो माइक से बातें कर रहे हैं और यही उनकी तरफ़ से मेरा पहला lesson था की माइक खेलने की चीज़ है अपना दोस्त मानो उसे जैसे की तुम उससे बात कर रहे हो। उन्होंने announcement  के साथ ड्रामा produce  भी किए जिस में एक series थी मानव श्रृंखला जिसका उर्दू में रूपान्तरण की ज़िम्मेदारी उनकी थी। इस काम में वो इतना डूबे की हम उन्हें कई दिनो तक नहीं देख पाते थे और जानते हैं उनके production को national लेवल पर सम्मानित किया गया। इस तरह उनको कई अवार्डस भी मिले। उनकी चंद बातों को एक सबक़ के तौर पर रखूँगी जैसे की आप सब जानते है मीडिया में ग़ज़ब का कम्पटीशन है। हर कोई आगे निकलने की होड़ में है। जब कभी मैं परेशान होती तो पापा मुझे कहते “देखो तुम जो कर रही हो दिल लगा कर करो। तुमको कई लोग निराश करेंगे, तुमको नीचा दिखायेंगे। तुम्हारे काम को कम आंकेंगे। तुम हारना मत बल्कि और मेहनत करना और यही मेहनत तुम्हें आगे ले जाएगी। तलफ़्फ़ुज़ उच्चारण और लफ़्ज़ों की अदायगी यानी voice-modulation में महारत थी उनकी। कभी ग़लत बोलने नहीं दिया। पापा फ़ोरन टोक देते थे ऐसे नहीं ऐसे। मुझे आज भी याद है जब मैंने भोपाल दूरदर्शन से समाचार पढ़ने शुरू किए तो जब पढ़कर लौटती तो मेरे टेबल पर मेरे performance का डिटेल होता। कब ग़लत पढ़ा, आवाज़ कहा ख़राब थी, कहा modulation ग़लत था और माँ मेरे appearance को लेकर टिप्पणियां करती। तो साहब इस तरह मुझे समीक्षक घर पर ही मिल गए। बहने भी खिंचाई करती रहती थीं। शायद यही वजह थी की मैं अपने को बेहतरी की तरफ़ ले जा पायी और फिर जब दूरदर्शन दिल्ली से पहला हिंदी समाचार पढ़ने का मौक़ा मिला। तो मम्मी पापा बहुत ख़ुश थे और कहते की परिवार की ज़िम्मेदारियों की वजह से जो मैं नहीं कर पाया। वो मौक़ा मेरे अल्लाह ने मेरी बेटी को दिया।
वो एक बात हमेशा कहते थे कि तुम मेरा ग़ुरूर हो और इसे कभी तोड़ना मत। १२ अक्टूबर २०१९ को हमने उन्हें खो दिया लेकिन वो हर पल मेरे साथ हैं क्यूँकि मेरा हर कदम उनकी यादों की छाँव में है जो हर पल मुझे जीने का होंसला देती है और फिर माँ भी है जो मेरी ज़िम्मेदारी है। जो मेरा ग़ुरूर है सलामत रहे वो।

प्र. आजकल ज्यादातर लोग न्यूज चैनलों को न देखने की बात कहते हैं। छोटे बड़े पत्रकार, यहां तक कि खुद टीवी पत्रकार भी अपील के लिहाज से कहते हैं कि न्यूज चैनल न देखें, सिरदर्दी के अलावा कुछ नहीं। रवीश कुमार अगुवा हैं इस अपील के। क्या कहेंगी इस संदर्भ में आप। आपका पसंदीदा एंकर कौन है।

उत्तर- -देखिए अब शोर ज़्यादा है मुद्दे ग़ायब हैं। रविश एक बेहतरीन पत्रकार हैं उनका कहना सही है। आप बहस करें लेकिन सामने वाले को अपनी बात कहने का मौक़ा तो दें।
अब anchor mannerism जो हमें सिखाया गया था कितने journalism से जुड़े institute में सिखाया जाता है। शायद नहीं के बराबर। कई बार जब देखती हूँ तो लगता है की चीख चीख कर बोलना, ज़बर्दस्ती शब्दों पर ज़ोर देना, चबा चबा के बोलना चलन बन गया है।
वो ये भी नहीं सोचते की वो इस तरह अपनी पहचान नहीं बना पाएँगे। कुछ वक़्त बाद वो भुला दिए जाएँगे।
वसीम बरेलवी साहिब का शेर शायद मेरी बात को समझा सके वो यूँ की

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है

मैं हमेशा उम्मीद करती हूँ की ऐसा वक़्त वापस आए जब बात कहने ,करने औरं उसको सुनने का लुत्फ़ मिले। जहां तक पसंद के ऐंकर की बात है तो वो कुछ इस तरह
वो लहजा जो क़ायल करे। उसका इंतेज़ार अभी बाक़ी है

समीना
पंडित जसराज जी के साथ समीना जी।

प्र. चूंकि आप पत्रकार हैं। जागरूक औऱ शिक्षित तबके से हैं इसलिए मैं जनता की ओर से जानना चाहता हूं कि तीन तलाक को लेकर जो बदलाव सरकार ने किया है, उसके बारे में क्या राय है। और दुख की बात ये है कि कानून बनने के बाद भी तीन तलाक के मामले आ रहे हैं।
उ. तीन तलाक़ पर सिर्फ़ इतना कहना चाहूँगी जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा इन मसलों का कोई समाधान नहीं। फिर वो दहेज प्रथा हो, वृंदावन में रह रही हज़ारों विधवाए हों, तांत्रिक द्वारा बतायी गई औरत को प्रेतात्मा बता के पत्थर से मारने की घटना हो। नेपाल और राजस्थान से पार कर के लायी गई पारो हो जो हरियाणा के गांवों में आपको मिलेंगी। चाहे बाल विवाह प्रथा हो, जो आज भी जारी है।
मैंने खुद इन विषयों पर documentaries  बनायी है जो यूटूब पर हैं देखिएगा। तो कहने का तात्पर्य ये की जहालत हर वर्ग में हैं। कही मुद्दे रोशनी में आ जाते हैं तो कहीं मुद्दों पर पड़ती रोशनी को अंधरे में गुम कर दिया जाता हैं।
प्र. मुस्लिम समुदाय से आप आती हैं, सरकार को कौन सा ऐसा कदम उठाना चाहिए जिससे इस समुदाय के समुचित विकास की रूपरेखा बन सके।
उ. बस इतना जानिए की हिंदू मुसलमान करना छोड़ दीजिए। ये मुल्क जितना हिंदुओ का है उतना मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, जैनियों सबका है। मुल्क या राष्ट्र किसी की बपौती नहीं होते हैं।
इस राष्ट्र को बनाने वालों में हर धर्म, हर जाति, हर व्यक्ति का योगदान रहा है। तो फिर हम क्यूं अपने वतन का क़ौम फ़िरक़ों धर्म के आधार पर बँटवारा करते हैं और हम होते कौन हैं ऐसा करने वाले। भेदभाव की सोच जिस दिन खतम हो जाएगी। उस दिन हिंदुस्तान का मुक़ाबला कोई देश नहीं कर पाएगा।
हिन्दुस्तान हम सबका है। अपने घर अपने मोहल्ले से शुरुआत कीजिए। बिना ये देखे की वो हिंदू है या मुसलमान उसको शिक्षित कीजिए, उसको तथ्य से अवगत कराइए, अगर वो आपकी बात दो लोगों तक भी पहुँचा पाता है तो आप कामयाब हैं की कम से कम आपने राष्ट्र के योगदान में सार्थक योगदान दिया। कम से कम एक या दो व्यक्तियों को सही शिक्षा दीजिए। देखिएगा फिर वो दिन दूर नहीं होगा जब नफ़रत के बादल छट जाएँगे और एक खूबसूरत सुबह हमारा मुस्ताबिल हमारा भविष्य होगा।
कोशिश सबको करनी होगी मैं कर रही हूँ और यही मेरा आजकल काम है की मैं नफ़रत की आँधियों के बीच मोहब्बतों के दिए से दिलों को रोशन करने का काम कर रही हूँ और मुझे ख़ुशी है की मैं बहुत हद तक कामयाब भी हुई हूँ।
बशीर बद्र का शेर है वो बहुत सही बैठता है आज के दौर पर वो यूं की

सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें 
आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत

प्र. कोरोना संबंध में कोई संदेश, कोई सलाह, कोई भी बात जो आप कहना चाहें। स्वागत है।


उ. मेरा मुल्क है, मेरे लोग हैं, मेरी दुआ है की जल्द हालात बेहतर हों।
हम सबको कोशिश करनी चाहिए सरकार द्वारा जारी दिशा निर्देशों का पालन करें। सोचिए उन हज़ारों डाक्टर्ज़ का, स्वास्थ्य कर्मियों का, सुरक्षा दलों का, जो हमारी ख़ातिर दिन रात मेहनत कर रहे हैं। उनको पूरा सपोर्ट कीजिए। उनका कहा मानिए। तबियत ख़राब होने पर तुरंत helpline से सम्पर्क कीजिए। साफ़ रहिए। अपने आस पास सफ़ाई का ख़्याल रखिए। खाने पीने में एहतियात बरतिए। हाथ, मुँह, नाक, पैर बराबर धोते रहिए। वैसे भी सफ़ाई आधा ईमान होती है तो फिर इस से परहेज़ कैसा और हाँ सब से अहम ज़रूर देखिए की आपके पड़ोस के घरों में कोई भूखा तो नहीं है। एक दूसरे की मदद ज़रूर करिए। दूरी बनाए रखिए लेकिन दिलों में दूरी ना बढ़ने दीजिएगा। राहत इंदौरी साहिब के शेर से अपनी बात खतम करती हूँ की —-

जिन चिराग़ों से तअस्सुब (साम्प्रदायिकता) का धुआं उठता है / उन चिराग़ों को बुझा दो तो उजाले होंगे

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