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” मीडिया मालिक इतने अक्षम नहीं कि लॉकडाउन में पत्रकारों को सैलरी न दे सकें”

पत्रकार
उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

आकाशवाणी में सलाहकार एवं दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी जी इस बार मीडिया मिरर की साक्षात्कार श्रृंखला बात-मुलाकात में हमारे अतिथि हैं। उमेश जी मूलरूप से बलिया उत्तरप्रदेश से आते हैं। लेकिन लम्बे समय से दिल्ली ही उनका कर्मक्षेत्र है। देश के प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों (प्रिंट व इलैक्ट्रॉनिक) में लम्बा कार्यअनुभव है। प्रसिद्ध स्तम्भकार हैं। फिलहाल दिल्ली पत्रकार संघ के उपाध्यक्ष भी हैं।

मीडिया मिरर सम्पादक डॉ प्रशांत राजावत ने उमेश चतुर्वेदी जी से पत्रकार संगठनों की दशा, दिशा औऱ भूमिका पर केन्द्रित लम्बी बातचीत की है। प्रस्तुत है।

 

 

प्र. कोरोना महामारी का प्रकोप चल रहा है। लोग घरों में कैद हैं। कैसे समय व्यतीत कर रहे हैं आप इनदिनों

उत्तर – कई किताबें बरसों से, कुछ महीनों से हर्फ-दर-हर्फ गुजरने का इंतजार कर रही थीं…कोरोना काल में उनसे गुजरा..इस बीच डॉक्टर अंबेडकर पर समाजवादी नेता स्वर्गीय मोहन सिंह की लिखी किताब के साथ ही डॉक्टर सूर्यनारायण रणसुभे की लिखी अंबेडकर की जीवनी पढ़ी…अजीत भट्टाचार्य जी ने जयप्रकाश नारायण की जीवनी लिखी है, जेपी: एक जीवनी, उसे भी पढ़ा..इंटरनेट पर फुटकर खूब पढ़ा…घर में बंदी के चलते कई बार उबन भी हुई..इस उबन को फेसबुक-ट्वीटर के सहारे जब-तब दूर करने की कोशिश हुई..अपनी अब तक की जिंदगी भागते-भागते गुजरी है..लगातार सक्रिय जीवन..जब से जिंदगी की जंग में उतरा हूं..सिर्फ एक बार बीस दिन की छुट्टी ली थी..अन्यथा लगातार सक्रिय रहा हूं..इसलिए इस बार की घर कैद ने कई बार उदास भी किया..कई बार हताश भी..इस हताशा में कई बार आजादी के दीवानों और आपात्काल के सेनानियों के बंदी जीवन को याद किया..सोचा कि उन्हें तो एक कमरे में रहना पड़ता था…उनकी तुलना में अपनी स्थिति का अध्ययन किया..तो लगा कि अपनी जिंदगी तो कम से कम ढाई कमरे तक फैली हुई है..इसके बावजूद कई बार लगा कि एक तरह से बंदी जीवन ही जी रहे हैं..भले ही सरकारी व्यवस्था के नहीं हों..इस सोच के संदर्भ में कई बार लगा कि दिमाग खाली हो गया..कुछ विचार नहीं आ रहे हैं..फिर खुद को संयत किया…कुछ इस तरह कट रही है महाबंदी की जिंदगी..इसी बीच कुछ दफ्तरी कामकाज भी निबटाया..हां, एक काम और हुआ, मित्रों से फोन पर लंबी बातचीत हुई..गप्पबाजी अक्सर मेरी ऊर्जा का स्रोत रही है..इस तरह से महाबंदी की जिंदगी गुजर रही है..खट्टी भी मीठी भी..बच्चों के साथ..बच्चों के बीच ..

प्र. कोरोना के चलते उद्योग जगत में हाहाकार मचा हुआ है। मंदी का दौर चल निकला है। इसका असर मीडिया उद्योग में किस तरह से देखते हैं आप। कई मीडिया संस्थानों से खबरें मिल रही हैं कि कर्मचारियों को निकाला जा रहा है। उनके वेतन में कटौती की जा रही है। मीडिया संस्थानों की ये कार्रवाई क्या आप सही मानते हैं। क्योंकि कहीं न कहीं कार्पोरेट(कारपोरेट) व सरकारी विज्ञापन में आय़ी भारी कमी के चलते आर्थिक प्रभाव तो मीडिया संस्थानों पर भी पड़ ही रहा है। मैं सिर्फ इतना जानना चाहता हूं क्या उपाय हैं जिससे मीडिया संस्थान ऐसा न करें।

उत्तर – उपाय आप बताइए…पच्चीस साल की अपनी पत्रकारीय यात्रा में हार गया इस सवाल का जवाब खोजते-खोजते..यह दरअसल मीडिया हाउसों की नीयत केंद्रित मामला है..अगर उनकी नीयत अच्छी है..वे मानें कि उनका मीडिया का जो साम्राज्य है, जिसके जरिए वे देश की सरकार, मंत्री आदि पर दबाव बना सकते हैं..रूतबा हासिल करते हैं..उसकी बुनियाद उसके कर्मचारी हैं..पत्रकार हैं..तो वे अपने कर्मियों-पत्रकारों को अपना परिवार मानेंगे और फिर उनके दुख-सुख की चिंता भी करेंगे…लेकिन दुर्भाग्यवश यह सोच उदारीकरण के साथ ही तिरोहित होती गई है…बड़ा से बड़ा मीडिया हाउस नैतिक होने का दावा करता है…उसके यहां काम करने वाले लोग भी गाहे-बगाहे नसीहतों और नैतिकता की फेहरिश्त जारी करते रहते हैं..लेकिन हकीकत यह है कि उनकी नैतिकता ढोल की पोल जैसी है..ढोल बजती तो खूब है..लेकिन वह अंदर से खोखली होती है..दुर्भाग्यवश मीडिया हाउसों की कम से कम अपनी नैतिकता भी वैसी ही है..इसलिए इसका उपाय बताना आसान नहीं… हमें स्वीकार करना होगा कि ऐसा होना हमारे प्रोफेशन का अभिशाप है…हमें ध्यान देना होगा कि उदारीकरण के बाद हमारी पूरी व्यवस्था सिर्फ मुनाफा केंद्रित हो गई है… समावेशी ढंग से सोचने की नैतिकता इस व्यवस्था में पीछे छूट गई है..इसलिए सामर्थ्यवान संस्था में भी कभी वेतन कटौती तो कभी बिना वजह नौकरी खोने का दर्द झेलना मौजूदा व्यवस्था में मजबूरी है..

प्र. आप लम्बे समय से विभिन्न पत्रकार संगठनों में पदाधिकारी रहे हैं। अभी भी दिल्ली पत्रकार संघ से शायद जुड़े हैं। मैंने पिछले दिनों देखा कि पत्रकार संगठनों ने सरकार के नाम पत्र लिखा है कि सरकार सुनिश्चित करे कि मीडिया संस्थानों से पत्रकारों का न निकाला जाए और साथ ही मेडिकल बीमा की भी मांग थी। आपको क्या लगता है सरकार सुनेगी पत्रकार संघों की बात। क्योंकि लगातार संस्थानों से पत्रकारों की छंटनी का दौर अभी भी जारी ही है।

उत्तर- आप के सवाल से लगता है, जैसे सारा दोष पत्रकारों और पत्रकार संगठनों का ही है…और आपने शायद शब्द का इस्तेमाल किया है..लगता है कि आपने होमवर्क ठीक से नहीं किया….मैं दिल्ली पत्रकार संघ का उपाध्यक्ष हूं..और उसके राष्ट्रीय संघ नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स –इंडिया का कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुआ हूं…जब तक इसका प्रभार लिया जाता..तब तक महाबंदी का दौर आ गया..आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि एनयूजे इंडिया अरसे से केंद्र और राज्य सरकारों से पत्रकारों के लिए पेंशन, बीमा और पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग करता रहा है। एनयूजे इंडिया की ही मांग पर महाराष्ट्र पहला राज्य बना, जहां पत्रकार सुरक्षा कानून को पिछली फड़नवीस सरकार ने विधानमंडल से 2017 में पारित कराया। हमारी ही मांग की देन है कि हरियाणा में पत्रकारों को दस हजार और बिहार में छह हजार रूपए की पेंशन योजना को सरकारों ने स्वीकार किया है…दुर्भाग्यवश हमारी यह दिल्ली में मांग पूरी नहीं हो पाई है..हमारी यूनिटों ने अलग-अलग अपने-अपने राज्यों में लगातार ये मांगे करती रही हैं…हमें कुछ में सफलता मिली है…और कुछ में नहीं..फिर भी हम प्रयासरत हैं.. पत्रकारिता में सरकारी स्तर पर कुछ सहूलियतें पत्रकारों को मिलती भी हैं तो उनके दायरे में सिर्फ मान्यता प्राप्त पत्रकार ही आते हैं..लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बहुत सारे लोगों को मान्यता मिल नहीं पाती..हमारी कोशिश है कि डेस्क पर जो पत्रकार हैं, उन्हें भी सहूलियतें मिलें…कुछ राज्यों मसलन हरियाणा ने कोरोना काल में पत्रकारों के लिए जो बीमा का ऐलान किया है..उसकी भी कोशिश और मांग हमारे हरियाणा जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने की थी..रही बात मीडिया संस्थानों की घटती आय की..तो निश्चित रूप से महाबंदी में उनकी आय में कमी हुई है..लेकिन मैं नहीं मानता कि इससे उनकी इतनी हालत खराब हो गई कि वे अपने बेहतर दिनों के साथी रहे कर्मचारियों-पत्रकारों का साथ ना दे सकें…मीडिया हाउस समंदर की तरह हैं..उनके लिए अपने कर्मचारियों-पत्रकारों को एक-दो महीने सहयोग देना कोई कठिन बात नहीं है.. इससे उनकी सेहत पर खास असर नहीं पड़ना है। इसके ठीक उलट पत्रकार और कर्मचारी के लिए एक-दो महीना भी बिना वेतन के गुजार पाना कठिन होता है.. मीडिया हाउसों को सोचना चाहिए कि उनके अच्छे दिनों में जिन्होंने साथ दिया, उनका कम से कम बुरे दिनों में उन्हें साथ देना चाहिए…मैं तो गांव का हूं..हमारे यहां फसल अच्छी हो या न हो..पुश्तैनी हलवाहे का, घर में काम करने वाले चरवाहे का साथ दिया जाता था…उसे अपनी समृद्धि की बुनियाद माना जाता था…उसे अपने परिवार का हिस्सा माना जाता था..इसलिए उन्हें उतनी आसानी से हायर या फायर नहीं किया जाता था…मुझे लगता है कि मीडिया हाउसों को भी इसी तरह से सोचना चाहिए…संकट के दिनों में वे साथ नहीं देंगे तो पत्रकारों-कर्मियों का साथ कौन देगा..

प्र. मैं आपसे ज्यादातर बातें पत्रकार संघों के बारे में करूंगा। क्योंकि मेरे साथ ये पहली बार है कि पत्रकार संघों पर बातचीत करने के लिए कोई जायज व्यक्ति मिला हो। मैं ये जानना चाहता हूं कि नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन समेत देशभर में कई पत्रकार संघ हैं। प्रदेशों में हर प्रदेश के अलग पत्रकार संघ हैं। बावजूद इन संघों की कोई सुनता क्यों नहीं। कोई से आशय सरकारें और पत्रकारों का शोषण करने वाले मीडिया संस्थानों के मालिक। मैं अतीत में नहीं जाऊंगा ज्यादा। लेकिन मजीठिया वेज बोर्ड को ही देख लें। पत्रकार संघों की क्या भूमिका रही। कुछ नहीं। कहीं लागू नहीं हो सका। चाहते तो सरकार की नाक में दम कर देते सभी संघठन एकजुट होकर। इतना ही नहीं मजीठिया की लड़ाई जिन पत्रकारों ने लड़ी भी, उन्हें संस्थानों ने निकाल दिया। उनके लिए भी पत्रकार संघ कुछ न कर सके। तो फिर किस मतलब के हैं ये पत्रकार संघ। प्रकाश डालिए। आपसे बेहतर कौन हो सकता है इन मुद्दों पर बात करने के लिए।

उत्तर – निश्चित तौर पर इसका एक मात्र जवाब है कि पत्रकार संगठनों में एकता नहीं है…वैसे तो अब देखिए, विचारधारा के नाम पर समाज ही बंटा हुआ है। पत्रकार भी उसी समाज के अंग हैं…अपने यहां शास्त्रार्थ की परंपरा रही है। लेकिन शास्त्रार्थ कभी लड़ाई का जरिया नहीं बना..लेकिन हम तो अपनी-अपनी विचारधाराओं के खोल में आज लड़ रहे हैं..पत्रकार भी इस सोच के अपवाद नहीं हैं। इस मामले में मैं वकीलों की दाद देता हूं। ऐसा नहीं कि उनके बीच वैचारिक खेमे नहीं हैं..लेकिन जब वकालत पर संकट आता है तो वे खुद को पहले वकील मानते – सोचते हैं..बाद में किसी विचारधारा या खेमे के सदस्य। इसलिए उनके सामने प्रशासन भी झुकता है और सरकारें भी…एक दौर में पत्रकार संगठनों के बीच भी ऐसी ही सोच थी..अस्सी के दशक में उत्तर प्रदेश में शायद पांच दिनों तक अखबारों की हड़ताल चली थी…उसमें हमारी उत्तर प्रदेश की इकाई उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट एसोसिएशन और वामपंथी यूनियनों ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी थी..अस्सी के ही दशक में जब बिहार की जगन्नाथ मिश्र सरकार प्रेस बिल लेकर आई थी तो सभी पत्रकार संगठनों ने उसका विरोध किया था..चूंकि विरोध संगठित था तो आज से भी कहीं ज्यादा बहुमत से जीत कर आई केंद्र की तत्कालीन राजीव सरकार को अपनी ही बिहार सरकार को यह बिल वापस लेने का आदेश देना पड़ा था..लेकिन अब ऐसा नहीं है..एक खेमे में ही कई खेमे है..अखबारों के पत्रकारों से टीवी वाले अपने को बेहतर मानते हैं तो अखबार वाले टीवी वालों से दूर रहते हैं..यानी बिखराव सिर्फ विचार के आधार पर ही नहीं, कमाई और कैरियर की बुनियाद पर भी है…दरअसल नैतिकता की बात करने वाले पत्रकारों के बीच भी अहं, ताकत और भावी फायदे को लेकर विवाद बढ़ने लगा है…आत्म त्याग की नैतिकता का लोप हुआ है..निजी फायदे ज्यादा देखे जाने लगे हैं..इसलिए पत्रकार संगठनों को ना तो मीडिया हाउस तवज्जो देते हैं और ना ही सरकार…इसके लिए पत्रकार संगठनों, उनके नेताओं को आत्म मंथन करना होगा..उन्हें सोचना होगा कि उनकी आपसी फूट का क्या असर हो रहा है.. मजीठिया का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी गया..वहां से फैसला भी आया..लेकिन त्वरित और आखिरी न्याय नहीं हो पाया..अब इसे क्या कहेंगे..इस पर भी हमें देखना होगा..

प्र. सवाल एक तरफा भी नहीं होने चाहिए। आप संक्षेप में ये भी बताइए कि आपके संज्ञान में या बतौर पत्रकार संघ पदाधिकारी के तौर पर आपके सामने वो कौन से बड़े कार्य पत्रकारों के पक्ष में हो सके जिनमें पत्रकार संगठनों की महती भूमिक रही हो।

उत्तरः आपके उपरोक्त दोनों सवालों का जवाब इनसे पहले वाले प्रश्नों के जवाब में दे दिया है…बस इतना जोड़ना चाहूंगा कि वेतन बोर्ड को लागू ना करने के पीछे हमारा बिखराव बड़ी वजह है..अगर हम एक होंगे तो अपनी बात मजबूती से कह सकेंगे और उसे वाजिब ढंग से मनवा भी सकेंगे..

प्र. पत्रकार संगठनों को लोग गंभीरता से क्यों नहीं लेते। लोगों की छोड़िए स्वयं पत्रकार भी गंभीरता से क्यों नहीं लेते। जब भी पत्रकार संगठनों का कोई मांग पत्र जारी होता है, पत्रकार ही कहते हैं सब नौटंकी है। इनसे कुछ नहीं होगा। ये दलाल हैं। आदि आदि।

उत्तर – इस सवाल का जवाब आप उन पत्रकारों से पूछिए, जो नौटंकी बताते हैं.. अपनी छब्बीस साल की पत्रकारीय यात्रा में मैंने कम से कम अब तक ना तो ऐसी टिप्पणी की है या सुनी है…इसलिए यह कहना मुश्किल है..रही बात गंभीरता की तो इसकी बड़ी वजह संगठनों का अंदरूनी बिखराव है..उनके बीच अहं का टकराव है…पत्रकार संघों के अगुआ जानते हैं कि बिखराव किसी भी व्यवस्था को मजबूत चुनौती नहीं दे सकता। इसके बावजूद वे सुधरने को तैयार नजर नहीं आते..लेकिन मुझे भरोसा है कि नई पीढ़ी में ऐसे लोग आ रहे हैं, जिन्हें इन मूल्यों का भान है..हमारे संगठन की उम्मीद भी ऐसे ही लोग हैं..

प्र. आप कैसे लोगों को या पत्रकारों को भरोसे में लाएं कि पत्रकार संघ भरोसे लायक हैं। और हमने आपके लिए बेहतर काम किया है।  मैं पत्रकारिता में अब 12 साल तो पूरे कर ही रहा हूं। मुझे याद आता है कि इस बीच मैं दो पत्रकार संगठनों से जुड़ा। दोनों मध्यप्रदेश के थे। मेरे अनुभव बेहद खराब रहे। एक के हाल तो ये थे कि कार्यक्रम कराने के बहाने पार्षद, महापौर या किसी नेता से चंदा जुटाते औऱ कार्य़क्रम के बाद जो राशि बचती वो दारू पार्टी में जाती। दूसरी प्रमुख बात जो मैंने देशभर के प्रमुख पत्रकार संगठनों में देखी 90 प्रतिशत लोग जो इनसे जुड़े हैं वो मुख्यधारा के पत्रकार या कहें बड़े संस्थानों के पत्रकार नहीं हैं। ऐसा क्यों। क्यों पत्रकार संगठनों से बड़े संस्थानों के पत्रकार नहीं जुड़ते। और जुड़ते हैं तो वो संख्या बेहद कम है। आप मानें या न मानें पर पत्रकार संगठनों की विश्वसनीयता हाशिए पर है। क्या होना चाहिए जिससे संघों के प्रति लोग विश्वास करें, इनसे जुड़ें।

उत्तर– जब आपने मान ही लिया है कि विश्वसनीय नहीं हैं तो उसकी क्या वजह है, इसे लेकर आपके भी कुछ विचार होंगे…..बाकी तो मैं आपके सवालों के जवाब में लिख ही चुका हूं..आप टीवी के एंकरों की तरह बार-बार कुछ सवालों को दोहरा रहे हैं…रही बात पत्रकार संगठनों पर पत्रकार कैसे भरोसा करें..तो इसका सीधा जवाब यह है कि पत्रकार हित में आत्म त्याग की भावना से जो भी संगठन और उसका अगुआ काम करेगा..पत्रकार उस पर ही भरोसा करेंगे..मुझे यह स्वीकार करने से गुरेज नहीं है कि आज हम नैतिक क्षरण और छद्म नरेटिव खड़ा करने के दौर में रहने को अभिशप्त हैं..इस वजह से पत्रकारों का भरोसा जीतने का लक्ष्य आज किसी भी संगठन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है और जिस तरह के हालात हैं, उनमें भविष्य में बना रहेगा…वैसे यह भी सच है कि उदारीकरण के साथ पिछली सदी में करीब 1994-95 में पत्रकारों को कांट्रैक्ट पर रखने की टाइम्स समूह ने जो शुरूआत की, उसने पत्रकारिता, पत्रकार संगठनों दोनों को चुनौतीपूर्ण बनाया है..शुरू में पत्रकारों को ठेका नौकरियों में चूंकि नियमित नौकरियों की तुलना में ज्यादा सैलरियां मिलीं तो लोग खुश हुए..लेकिन वह सोने का पिंजरा था..उस पिंजरे में धीरे-धीरे पत्रकार फंसते गए। उदारीकरण में चमक-दमक तो बढ़ी, लेकिन जिंदगी की चुनौती भी बढ़ी। इसलिए सबके सामने अपनी नौकरी बचाने की चुनौती लगातार बड़ी होती गई। जब नौकरियों के ही लाले रहेंगे तो पत्रकार चाहे वह सामान्य हो या संगठन का पदाधिकारी..वह उसे ही बचाने के चक्कर में रहेगा..इसलिए उसका संघर्ष कुंद होगा…वह भी जानता है कि अगर वह संघर्ष पथ पर आगे बढ़ेगा और कल नौकरी गई तो उसके परिवार के सामने भूखे मरने की नौबत आएगी…इसलिए चाहे पदाधिकारी हो या फिर सामान्य पत्रकार, अतिरेकी कदम उठाने से बचता है। इसीलिए हमारा संगठन पिछले करीब एक दशक से लगातार मांग कर रहा है कि तीसरा प्रेस आयोग बने, वह मीडिया के सभी अंगों-उपांगो, पत्रकारीय विधाओं, कमाई, सरकारी दबाव, कारपोरेट कल्चर से रिश्ते पर विचार करे..लेकिन दुर्भाग्यवश हमारी यह मांग अब तक स्वीकार नहीं हुई है..हम चाहते हैं कि तीसरा प्रेस आयोग बने तो वह जांच कानून के तहत बने, ताकि वह जिसे बुलाए तो वह उसके सामने प्रस्तुत होने को बाध्य रहे..क्योंकि इस कानून के तहत बने आयोग के पास अधिकार होता है कि जो उसके सामने बुलाने पर भी प्रस्तुत ना हो, उसे दंडित कर सके, उसके खिलाफ वारंट निकाल सके..

प्र. आपको बताने या समझाने की जरूरत मैं नहीं समझता। आप कई दशकों से पत्रकारिता को समझ रहे हैं। बावजूद मैं कहना चाहता हूं कि कितने ही पत्रकार जो नेशनल ब्यूरों में हैं और कितने ही सम्पादक जिनका सीधे तौर पर सरकारों में दखल है। अगर मीडिया मामलों के मंत्री की बात करें तो सूचना प्रसारण मंत्री को भी कई पत्रकार व सम्पादक सीधे तौर पर जानते होंगे, उनके साथ उठना बैठना होगा। लेकिन पत्रकारों के हितों की जब बात आती है तो ये कोई लाभ क्यों नहीं दिलवा पाते सामूहिक रूप से।

उत्तर- यह बहुत कुछ आत्मविश्वास और नैतिकता की बुनियाद पर टिका है….ऐसे सवाल वही उठा सकते हैं, जिनकी नैतिक बुनियाद मजबूत हो..मुझे लगता है कि आज के दौर में इसकी ज्यादा कमी है।

प्र. अच्छा आप बताइए मांग पत्रों की बात छोड़िए क्या पत्रकार संघों के पदाधिकारी सीधे तौर पर प्रधानमंत्री से या सूचना प्रसारण मंत्री से मिलकर शिकायत या मांग नहीं रख सकते। अगर नहीं रख सकते तो संगठनों में कमी है, इन्हें सशक्त होना होगा।

उत्तर – हमारे संगठन ने लोकसभा के अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, संसदीय कार्य मंत्री, श्रम मंत्री, दिल्ली के मुख्यमंत्री से सीधे मिलकर अपनी मांगें समय-समय पर रखी है। हमने अपनी मांग प्रधानमंत्री के साथ ही सूचना और प्रसारण मंत्री को भी दी है..हालांकि हमारे ज्यादातर सवाल श्रम से जुड़े हैं और हम श्रम मंत्री से कई बार मिल चुके हैं।

प्र. कोरोना काल है। अच्छा मौका है। आप पदाधिकारी हैं पत्रकार संघ के। आप मुझे बताइए कि क्या आप दावा करते हैं कि मीडिया संस्थानों से किसी पत्रकार को निकाला नहीं जाएगा या वेतन में कटौती नहीं की जाएगी। और जिनकों निकाला जा रहा है उनकी बहाली करवाएंगे। एक ऐसे दौर में जब पत्रकारों को आर्थिक सुरक्षा की जरूरत है तब उन्हें निकाला जा रहा है। आगे आएं पत्रकार संगठन और केंद्र सरकार से प्रस्ताव पारित करवाएं पत्रकारों के हित में। जवाब दीजिए। वरना फिर किस मतलब के ये संगठन।

उत्तर – आपका सवाल अतिरेकी है..कोई संगठन कैसे दावा कर सकता है कि नौकरी नहीं जाएगी..या वेतन में कटौती नहीं की जाएगी..लेकिन हम चाहेंगे कि ऐसा न हो..हम सवाल उठा रहे हैं..जहां-जहां ऐसी समस्याएं आई हैं, हमारी राज्य इकाइयों ने संबंधित राज्य सरकारों और श्रम विभागों को लिखित में इसकी शिकायत की है..

प्र. आप दिल्ली पत्रकार संघ में हैं। पिछले दिनों का घटनाक्रम आपको पता ही होगा। दिल्ली पत्रकार संघ में जो बवाल हुआ। एक पूरी कार्यकारिणी को फर्जी बताकर एक दूसरे गुट ने चुनाव भी करवा लिए औऱ दावा किया हम सही हैं और दूसरी कार्य़कारिणी फर्जी। ये सब तमाशा जब आम पत्रकार देखते हैं तो क्या विश्वसनीयता रहेगी ऐसे पत्रकार संघों की। जो आपस में ही एक दूसरे को फर्जी और अवैध बता रहे हैं। ये सब सोशल मीडिया में खूब चला औऱ सबने देखा। मैंने ऊपर एक सवाल में आपको कहा कि शायद आप दिल्ली पत्रकार संघ से जुड़े हैं तो आपने कहा कि आपका होमवर्क अच्छा नहीं है। लेकिन ऐसी परिस्थितियां भी आप सबने ही निर्मित की हैं, जिसके चलते मुझे ही नहीं सबको संशय रहा कि दिल्ली पत्रकार संघ की वास्तविक कार्य़कारिणी दरअसल है कौन। बकायदा सोशल मीडिया में दिल्ली पत्रकार संघ की प्रेस रिलीज जारी होती थी औऱ दोनो गुट दावा करते थे कि हम असली तो हम असली।

उत्तर- इस बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है..और उचित है कि मैं कुछ ना कहूं…बाकी पत्रकार फैसला करेंगे कि कौन फर्जी है और कौन नहीं..अलबत्ता हमारे साथ हमारी दिल्ली इकाई में करीब बारह सौ सक्रिय सदस्य हैं…हमारी एनयूजे आई के साथ देश की 26 राज्य इकाइयां हैं..

प्र. चलिए कुछ बातें करते हैं। पत्रकार संघ से इतर। आकाशवाणी में आप सलाहकार हैं। साल से ऊपर तो हो ही रहा है। हमारे पाठकों को बताइए कि आपने आकाशवाणी के लिए कौन सी सलाहें दी हैं अबतक।

उत्तर- इसे सार्वजनिक ना करने के लिए मैं नैतिक और कानूनी रूप से बाध्य हूं…बस इतना ही कह सकता हूं कि मैं आकाशवाणी समाचार में कार्यरत हूं..इसलिए उसकी बेहतरी के लिए जब जैसी जरूरत पड़ी है, काम किया है..प्रोग्राम बनाया है..इंटरव्यू किए..चुनाव कार्यक्रमों की रूपरेखा बनाई…रही नीतिगत बातों की तो वह मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है…

प्र. आकाशवाणी में अपनी भूमिका को स्पष्ट करें कृपया…

उत्तर – आकाशवाणी समाचार की बेहतरी के लिए हर संभव कार्य करना, उचित मंचों पर उचित सुझाव देना…और हर मौके पर कर्मचारी, अधिकारी को सहयोग की जरूरत हो, सहयोग करना..

प्र. बतौर सलाहकार आप आकाशवाणी में क्या बदलाव चाहते हैं। वहां के कर्मचारियों के लिए क्या करना चाहते हैं। मेरा मतलब है कि आप अपने कार्य़काल में क्या ऐसा करके जाना चाहते हैं जो याद रखा जाए।

उत्तर- बदलाव लाना ना तो मेरे अधिकार क्षेत्र में है और ना ही मेरी जिम्मेदारी है..आकाशवाणी और दूरदर्शन के सभी अंग प्रसार भारती बोर्ड के अधीन काम करते हैं और बोर्ड जैसी नीतियां तय करता है, जो लक्ष्य निर्धारित करता है, उसे पूरा करना हर विभाग, चैनल का दायित्व है. आकाशवाणी, आकाशवाणी समाचार, दूरदर्शन, दूरदर्शन समाचार की कंटेंट और प्रशासनिक मशीनरी को उसी के अनुरूप कार्य करना होता है…मैं उससे अलग नहीं हूं।

प्र. आकाशवाणी रेडियो सेवा से मेरे पास शिकायतें आती रहती हैं कि न्यूज रीडर दस या पन्द्रह वर्षों से ज्यादा पुराने हो गए पर उन्हें परमानेंट नहीं किया गया। जॉब को लेकर कोई सिक्योरिटी नहीं है। सबसे निचले स्तर पर कर्मचारियों के साथ शोषण होता है। इस दिशा में आप कोई कार्रवाई चाहेंगे।

उत्तर – इस बारे में हर तरह के फैसले लेने का अधिकार सिर्फ प्रसार भारती बोर्ड को है..

प्र. आप आईआईएमसी के शुरुआती छात्र रहे हैं। उन दिनों आईआईएमसी से जुड़ी कोई याद हो, औऱ साझा करना चाहें। पढ़ाई के तौर तरीके आदि..

उत्तर – भारतीय जनसंचार संस्थान का मैं 1993-94 बैच का विद्यार्थी रहा..मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि देश के इस सर्वोत्कृष्ट संस्थान में मुझ जैसे सुदूर देहात के भदेस विद्यार्थी को अध्ययन का मौका मिला..मैं संस्थान का आभारी हूं कि उसने हमें राष्ट्रीय मंच मुहैया कराया.. हमारे दौर में जो अध्यापक थे, वे सक्रिय पत्रकारिता की नामचीन हस्ती रह चुके थे, फिर अध्यापन में आए थे..इसलिए उनके पास सैद्धांतिक और व्यवहारिक ज्ञान खूब था..उन्होंने हमें जो सिखाया, उसे सिर्फ एक सवाल के जवाब में समेटना आसान नहीं होगा..लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि अगर यहां नहीं आया होता तो राष्ट्रीय स्तर के लिए लिखना, बोलना, रिपोर्टिंग, स्क्रिप्टिंग और पत्रकारिता की चुनौतियों को समझ नहीं पाता..संस्थान की जिंदगी पर तो अलग से लंबी बात करनी पड़ेगी।

प्र. आपको लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा बताते हैं।

उत्तर- किसी संगठन से जुड़ना या ना जुड़ना व्यक्ति का निजी अधिकार है..मैं इस पर कोई टिप्पणी करना उचित नहीं समझता…

प्र. बलिया उत्तरप्रदेश से चलकर दिल्ली। औऱ दिल्ली में पत्रकारिता। कई दशकों की। जो सोचा था क्या वो पाया औऱ किया।

उत्तर- बहुत कुछ पाया, और बहुत कुछ पाना बाकी है..जिस दिन सोच लिया कि सबकुछ पा लिया, उसी दिन खत्म हो जाउंगा..वैसे भी पत्रकार निरंतरता का प्रोफेशन है..अंग्रेजी में कहते हैं न एक बार पत्रकार तो जिंदगी भर पत्रकार…इसलिए मैंने क्या खोया और क्या पाया, इसके मूल्यांकन का वक्त अभी नहीं आया है..अभी लंबी यात्रा करना बाकी है..

प्र. पत्रकारिता में आपके आदर्श कौन हैं। एक कोई टीवी और एक कोई अखबारी पत्रकार जिसे पसंद करते हों। बताइए।

उत्तर – मैं उन लोगों में से नहीं हूं, जो एक आदर्श के पीछे भागते हैं..मैं मधु मक्खी के समान सोच वाला हूं..मधुमक्खी शहद बनाने के लिए हर तरह के पेड़-पौधों की यात्रा करती है और उनके फूलों से उचित पराग इकट्ठा करती है..मैं भी कुछ वैसे ही हर उस पत्रकार से सीखने की कोशिश करता हूं, जिसका कुछ सीखने लायक लगता है..पत्रकार ही क्यों, मैं राह चलते लोगों से भी सीखता हूं..अगर उनमें मुझे कुछ सीखने लायक लगा तो मैं उसे आत्मसात करने की कोशिश करता हूं..मैं किसी को समग्र रूप में ना तो स्वीकार करता हूं और ना ही खारिज करता हूं..लेकिन एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि कई बार ऐसा होता है कि दूर से बड़ा दिखने वाला व्यक्ति नजदीक जाने के बाद पता चलता है कि बहुत छोटा है..इसी तरह दूर से दिखने पर कई शख्सियतें हमें छोटी लगती हैं..लेकिन नजदीक जाने के बाद पता चलता है कि असल में तो वह बड़ी और विशाल है..मेरी जिंदगी में अक्सर ऐसा हुआ है..इसलिए मैं किसी एक को अपना आदर्श नहीं बना सका…मैंने कई लोगों से सीखा है…किनका-किनका नाम लूं..

एक अंतिम सवालः आप अभी नेशनल जर्नलिस्ट यूनियन में कोषाध्यक्ष हैं। कितना कुल कोष है आपके संघ के पास। और उस कोष का उपयोग पत्रकारों के लिए किस तरह करने की योजना है। क्या कोरोना से किसी पत्रकार की मौत होती है तो आपने कुछ आर्थिक मदद की योजना बनाई है।

उत्तर- कोष की जानकारी मुझे नहीं है..इसकी वजह है कि अभी प्रभार की औपचारिकता भी पूरी नहीं हुई और महाबंदी शुरू हो गई..अलबत्ता यह जरूर कह सकता हूं कि हमने कोरोना के दौर में आर्थिक दिक्कतों से जूझ रहे पत्रकारों के लिए सहयोग की योजना शुरू की है..जिसमें हम बेबस हो चुके पत्रकारों को जरूरी मदद मुहैया करा रहे हैं..पत्रकारों का स्वाभिमान बड़ा होता है.. इसलिए संकट में आने के बावजूद वे बहुत कुछ मांगते नहीं..शायद यही वजह है कि हमारी योजना का फायदा लेने के लिए लोग झिझकते हुए ही आ रहे हैं..हम उन्हें कम से कम एक महीने के राशन की मदद मुहैया करा रहे हैं..हमारी कोशिश रहेगी कि भविष्य में एक ऐसा कोष बनाया जाए, जिसके जरिए जरूरतमंद पत्रकारों की जितना बन पड़े, मदद की जा सके।

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