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बॉयज लाकर रूमः बच्चों की करतूतों पर नजर ऱखिए वरना देर न हो जाए

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लेखक- डॉ प्रशांत राजावत, सम्पादक मीडिया मिरर 

 

बॉयज लाकर रूम। ये तीन शब्द तीन दिन पहले ही चर्चा में आए और एक प्रश्नचिंह छोड़ गए। समाज के लिए, शिक्षकों के लिए, अभिभावकों के लिए। दरअसल बॉयज लाकर रूम इंस्टाग्राम पर एक समूह है जिसे दिल्ली के एक प्रतिष्ठित स्कूल के 18 वर्ष से कम आयु के छात्र-छात्राओं ने बनाया था। जिसमें ये छात्र छात्राएं अश्लील बातें करते थे। पोल तब खुली जब एक छात्र ने एक लड़की की अश्लील तस्वीर पोस्ट कर दी और कमेंट किया कि रेप कैसे किया जा सकता है। विरोध में पीड़ित लड़की ने स्क्रीन शॉट लेकर सोशल मीडिया में जारी किए, आपत्ति दर्ज कराई और तब मामला महिला आयोग और पुलिस के संज्ञान में पहुंचा। पुलिस ने एडमिन लड़के को गिरफ्तार कर लिया है। ग्रुप को बंद करा दिया है और सूचना ऐसी भी मिल रही है कि इस समूह के एक बच्चे ने सामाजिक डर के चलते आत्महत्या कर ली है। कई लड़कों की गिरफ्तारी शेष हैं।

ये बहुत संवेदनशील विषय है। ये वो विषय है, मुद्दा है जिस पर हर मां बाप को सोचना होगा। डिजिटल मीडिया के इस दौर में जब हर हाथ में इंटरनेट युक्त मोबाइल, लैपटॉप हैं तो मुद्दा औऱ गंभीर हो जाता है। आपके जवान हो रहे बच्चे आखिर इंटरनेट का कैसे सद उपयोग औऱ दुरुपयोग कर रहे हैं। ये जानना आपका जरूरी हो जाता है तब, जब ऐसी चिंताजनक घटनाएं सामने आती हैं।

इंटरनेट ने आज की पीढ़ी को समय से पहले परिपक्व बना दिया है। समझदारी बढ़ी है। इसके फायदे भी हैं। पर समानरूप से नुकसान भी हैं जिसका परिणाम बॉयज लॉकर रूम सरीखे ग्रुप हैं।

मेरी उम्र तीस है। मैं अपने बचपने को याद करता हूं तो पाता हूं कि आज के बच्चों के बचपनों से एकदम अलग थलग था। अपने दादा दादी के दौर में जाने की तो जरूरत ही नहीं। हालांकि मैं गांव में पला बढ़ा, तब भी इंटरनेट और मोबाइल उपलब्ध नहीं था। यू ट्यूब नहीं था। सोशल मीडिया नहीं थी। हमें बहुत सारी वो जरूरी चीजें भी पता नहीं थीं जो आज के टीन एज बच्चों को हैं। ये मैं मानता हूं। पर उस दौर में मैंने ऐसी कोई घटना नहीं सुनी कि बारह तेरह साल के बच्चे ने बलात्कार कर दिया हो। हां अब एक नहीं कई घटनाएं हम मीडिया में पढ़ते हैं जब 15 वर्ष से कम उम्र के लड़के दुष्कर्म कर जाते हैं। परिपक्वता का ये स्तर खतरनाक है। मैं देखता हूं कि आजकल के स्कूली बच्चों के सोशल मीडिया के अकाउंट हैं, यू ट्यूब पर चैनल हैं। नेट सर्फिंग का उन्हें ज्ञान है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि बच्चों के लिए प्रतिबंधित सामग्री पर उनकी नजर न जाती हो। छोटी छोटी कक्षाओं में जाने वाले बच्चों को मैं कभी कभार ऐसी बातें करते सुनता हूं जो हम लोग कॉलेज के दिनों में ही सोच व समझ सकते थे। मसलन बच्चा कैसे पैदा होता है, कहां से पैदा होता है, कितने महीने गर्भ में रहता है। आदि।

मुझे याद है कि मेरा भतीजा जो दिल्ली के प्रतिष्ठित स्कूल में पढ़ता है, 5 साल का है। मैंने उससे ऐसे ही पूछा क्या हाल हैं। मैम के लिए खाना ले जा रहे हो न आजकल तो बोला हां। बोला मजे करता हूं, अपनी जिप के पास हाथ ले जाकर बोला मैम की जींस यही से खोलकर देखता हूं। दरअसल उसे पता है कि जिप के पास ऐसा कुछ है जो देखे जाने योग्य है और उसे देखने से मजे आते हैं। मैं सच कह रहा हूं ये लेबल है मैच्योरिटी का आजकल के क्लास वन और टू के बच्चों का।

मैं दिल्ली में ही पत्रकार हूं। मेरे पास अक्सर खबरें आती हैं कि दिल्ली के रईस परिवारों के अवयस्क लड़के लड़कियां जो बड़े बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं अक्सर दिल्ली से बाहर अवैध फार्महाउसों में अवैध तरीके से पार्टियां करते हैं औऱ अक्सर पुलिस रेड़ में पकड़े जाते हैं। ऐसा अक्सर होता है। गूगल कर लीजिए। ये पार्टियां दिल्ली से बाहर फार्म हाउसेस में देर रात चलती हैं। जहां 18 साल से कम उम्र के स्कूल बच्चे होते हैं। साथ में होती है शराब, हर किस्म का नशा। कंडोम भी मिलते हैं। गर्भ निरोधक गोलियां भी। अब बड़ा  सवाल ये  है कि वो कौन से मां बाप हैं जो अपने बच्चों को महंगी महंगी गाड़ियों से देर रात ऐसी पार्टियों में जाने की इजाजत देते हैं। कई बार हम देखते हैं कि एक ही क्लास में पढ़ने वाले बच्चे एक दूसरे को ब्लैकमेल करते हैं। स्कूली लड़के, लड़कियों से साथ पार्टियों में जाते हैं अश्लील हरकतों से शुरू मामला ब्लैकमेल के बाद रेप तक पहुंचता है। आखिर इसकी जड़ क्या है। मां बाप की परवरिश क्या है। वो कैसे मां बाप हैं। कैसा उनका सामाजिक जीवन है जहां उनके बच्चों का ख्याल हाशिये पर है।

स्कूली बच्चे। अरे पहले के स्कूली बच्चों को देखिए औऱ अब के पब्लिक स्कूलों के बच्चों को देखिए। शारीरिक परिवर्तन देखिए। शारीरिक भाषा देखिए इनकी, बोलने का लहजा, चलने का लहजा। आपको मैं बता दूं पता करिए पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वाले रईसजादों की संतानों ( लड़के व लड़कियां दोनो) के बारे में। शिक्षकों से बात करिए। मनोवैज्ञानिक सर्वे कराइए। ज्यादातर शिक्षिकाएं होती हैं पब्लिक स्कूलों में, उनके साथ छात्रों का व्यवहार देखिए। जितना उनको स्कूल के बाहर मनचलों से डर नहीं लगता उतना अपने छात्रों से लगता है। ये 9 कक्षा के ऊपर के छात्रों की बात हो रही है। शिक्षिकाओं की बॉडी आंखों से स्कैन करते हैं ये। घूरते हैं उनके अंगों को, चाहे अनचाहे टिप्पणी करते हैं। मेरठ की एक शिक्षिका ने बताया उनको जब ब्वायज हास्टल से शिकायत मिलती तो वो चेकिंग करने जातीं तो दसवीं बारहवीं के छात्र सिर्फ  अंडवियर में सामने खड़े हो जाते सबके सब। हॉस्टल में स्पर्म से सिकुड़ी चड्डियां पड़ी रहतीं।

ये कौन बच्चे हैं। आपके और हमारे ही है न। कैसी परवरिश दी है आपने हमने। तो फिर ये बॉयज लाकर रूम नहीं बनाएंगे तो क्या बनाएंगे। आज किसी और की बहन की तस्वीरें ये अपने ग्रुप में साझा कर रहे हैं औऱ पूछ रहे हैं इसका रेप कैसे हों, कल इनकी बहन का रेप करने का तरीका कोई और इनका साथी पूछेगा किसी और समूह में। और ये सिर्फ लड़कों की बात नहीं है। बिलकुल नहीं। आप यहां लिंगभेद की बात करके लड़कियों को डिफेंस न दें। इस कृत्य में बराबर की भागेदारी है। आप समान रूप से अपने बच्चों पर नजर रखें। लड़का हो या लड़की सबकी अपनी चाह और मनोदशा हो सकती है। सेक्स को लेकर लिंगभेद नहीं होता, कामुकता को लेकर लिंगभेद नहीं होता, वर्जित व्यवहार को लेकर लिंग भेद नहीं होता। ये कोई भी कर सकता है। दिल्ली के हॉस्टलों से कई बार मुझे जानकारी मिली और एक बार तो वार्डन ने ही दी कि तमाम लड़कियां अपना भाई, चाचा या मामा का लड़का या दूर का रिश्तेदार बताकर लड़कों को रूम में लाती हैं और ऐसा नियमित होता है। वार्डन औऱ सिक्योरिटी गार्ड सब समझते हैं। स्त्री स्वतंत्रता के नाम पर आप छूट नहीं दे सकते। पोर्न देखने के आंकड़ों में गौर करें तो वहां लिंगभेद की कोई बात नहीं। समान रूप से वहां पोर्न देखने वाले टीनएज बच्चों की संख्या है। चाहे लड़के हों या लड़कियां। टीनएज लड़के अगर महिलाओं की छाती ताकते हैं तो टीनएज लड़कियां भी सौश्टव शरीर को झांकती हैं। उनकी भी अपनी इच्छाएं है।

अपने बच्चों को स्वतंत्रता देने की पैरवी करते करते, उन्हें आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की सोचते सोचते आप उन्हें कहां ले पहुंचे। ठीक है एक दौर था जब लड़कियां और लड़के मां पिता से तमाम मसलों पर खुलकर बात नहीं कर पाते थे, लड़किया शादी के नाम पर शर्मा के भाग जाती थीं, पीरियड, कंडोम, माहवारी आदि शब्द मानों लड़कियों के लिए वर्जित थे, जिससे स्वास्थ्यगत समस्याओं से भी उनहें जूझना होता था। ठीक है हम बच्चों को जागरुक समाज का हिस्सा बनाने चाहते हैं। उन्हें एक स्वतंत्र वातावरण देना चाहते हैं। लेकिन क्या वो वातावरण ऐसा होगा कि जहां आपके बेटा किसी की बेटी की नग्न तस्वीर डालकर रेप के तरीके पूछ रहा होगा तो आपकी बेटी किसी बॉय फ्रेंड को अपनी नग्न तस्वीर भेज रही होगी। और आप की आंख तब खुलेगी जब बॉयज लाकर रूम को लेकर देश में हो हल्ला मचेगा।।

चेत जाइए। समय है।

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