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ब्वायज लाकर रूम-2ः बरसों से मैंने दुपट्टा डाले लड़की नहीं देखी…

स्त्री
यूरोप में अब स्त्री स्वतंत्रता की ये तस्वीर है। तस्वीर साभार डेली मेल

डॉ प्रशांत राजावत..सम्पादक मीडिया मिरर

ब्वायज लॉकर रूम की ये दूसरी कड़ी है। आपको बता दें कि ब्वायज लाकर रूम सोशल साइट इंस्टाग्राम पर टीनएज  छात्र-छात्राओं का एक समूह है जिसमें दिल्ली के प्रतिष्ठित स्कूल के तकरीबन 20 से ज्यादा छात्र छात्राएं जुड़े थे। ये सब यहां अश्लील बातें करते थे, अश्लील तस्वीरें साझा करते थे। मामला तब प्रकाश में आया जब समूह के एक छात्र ने समूह की एक लड़की की अश्लील तस्वीर इस ग्रुप में पोस्ट करते हुए लिखा कि इससे रेप कैसे हो सकता है। लड़की ने आपत्ति जताई। मामला पुलिस औऱ महिला आयोग पहुंचा। पुलिस की सायबर सेल हरकत में आई। केस दर्ज हुआ। ग्रुप बंद किया गया। समूह के एडमिन को गिरफ्तार कर लिया गया। तब ये मामला देशभर में चर्चा में आय़ा। और लोग बहस करने लगे।

पुलिस ने जांच बिठायी तो ग्रुप से जुड़े एक लड़के ने फ्लैट की ग्यारहवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। कल पुलिस जांच में पुष्टि हुई कि लड़के की मौत की जिम्मेदार ब्वायज लाकर रूम से जुड़ी एक लड़की है। मामला ये था कि आत्महत्या के पीछे लड़के ने नोट में बताया कि वो लड़की जिम्मेदार है। दरअसल आरोपी लड़की ने लाकर रूम में ये खुलासा किया था कि मृतक लड़के ने तीन साल पहले उससे रेप की कोशिश की थी। सवाल ये है कि तीन साल पहले वो लड़की चुप थी और लाकर रूम में उसने खुलासा किया और मृतक ने सामाजिक आलोचना शर्मिंदगी के डर से आत्महत्या कर ली क्योंकि मामला पुलिस तक पहले ही पहुंच चुका था।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रबुद्धजन, मनो वैज्ञानिक, मनो चिकित्सक, शिक्षक, अभिभावक टीनएज बच्चों के व्यवहार का विश्लेषण व अध्ययन नए सिरे से करने में लग गए हैं। अखबारों में लम्बे चौड़े स्तंभ आजकल इसी विषय पर हैं तो टीवी पर बहस। सोशल मीडिया पर भी चर्चा गरम है। कल मैंने ब्वायज लाकर रूम पर पहली कड़ी लिखी थी। उसीसे आगे आज…

बच्चे जब बड़े हो रहे होते हैं, जवानी में कदम रख रहे होते हैं, उनके शरीर में आंतरिक और बाह्य परिवर्तन हो रहे होते हैं। तब जरूरत है इस बात की है कि उन्हें कैसे ट्रीट किया जाए। उनका हीरो उनकी नजरों में कौन हो। उनका प्रेरक कौन हो। उनको किस तरह का फेमनिज्म-मेननिज्म प्रस्तुत किया जाए। ये किसी एक के संदर्भ में नहीं, लड़का औऱ लड़की दोनों की बात मैं संयुक्त रूप से कर रहा हूं।

शरीर, मन जब आकार ले रहा होता है, ये बच्चे दुनिया को समझ रहे होते हैं। तब आपको इन्हें दुनिया को उस हिसाब से समझाना है जो इनके अनुकूल है। माई बॉडी माई चोइस कहने वाली दीपिका पादुकोण इनकी आदर्श बनेंगी या कस्तूरबा गांधी (बा)। लड़कों के आदर्श हनी सिंह होंगे या महात्मा गांधी। आपके बच्चे पब्जी देखेंगे या आप समय निकालकर उन्हें लोक कथाएं, कहानी, कविता से जोड़कर सामाजिकता सिखाएंगे। ये बतौर अभिभावक आपको ही तय करना है। ये आपको ही तय करना है कि आपकी जवान हो रही बेटी छाती में दुपट्टा रखे या स्पोर्ट ब्रा पहनकर जिम जाए। या कॉलेज जाए तो टॉप के बाहर ब्रा की डोरियां दिखें या कुर्ते में दुपट्टा लेकर जाए। ये आपको तय करना है। स्त्री सशक्तिकरण, स्वतंत्रता, स्त्रीवाद को आप उसके लिए किस तरह परिभाषित करेंगे ये आपको तय करना है। मुझे याद आता है। हमारे आपके घरों में ही जवान होती लड़कियां समीज पहना करती थीं। क्यों पहनती थीं। पूछिए अपनी मां से, दादी से। क्या बुरा करती थीं वो। पूछिए जाकर समीज क्यों पहनाई जाती थी। मैं तो मानता हूं फिलहाल महिला अपराध का जो ग्राफ है, यौन हिंसा का जो ग्राफ है उससे तो बेहतर हालत रही होगी आज से बीस साल पहले। लेकिन क्यों दुपट्टा डाले जाते थे, क्यों समीज पहनी जाती थी। अब तो शायद समीज मिलती भी न हो। हम सब जानते हैं। हमारी बहनें औऱ माताएं सब जानती हैं। पर पता नहीं वो सार्वजिनक तौर पर कुछ फेमनिज्म की वकालत करने वाली लड़ाकू बेतरतीब औरतों के आगे चुप्पी क्यों साध लेती हैं।

सलवार कुर्ता चलन में था। अब तो सलवार कुर्ता मतलब लड़की की बेइज्जती और उसकी खूबसूरती पर बट्टा। सलवार कुर्ता के साथ दुपट्टा चलता था। अब तो टॉप, टी शर्ट का दौर है और वो भी स्किन टाइट। दुपट्टे की तो ऐसी की तैसी। सलवार कुर्ता और दुप्पटा। इस परिधान की व्यापकता का विश्लेषण किया है आपने। अगर आप सलवार कुर्ता पहनकर दुपट्टा डाल लेंगे। तो आपके वो अंग प्रदर्शित नहीं होंगे जिस पर फब्तियां कसी जाती हैं। कहने वालों को तो कोई कहां रोक सका पर स्त्री देह के मुताबिक परिधान बनाए गए भारत में।  कुर्ती को कमर के नीचे तक लाया गया ताकि आपका पिछला हिस्सा न दिखे। दुपट्टे से आपकी छाती पर नजर न जाए। ब्रा की बद्धी और मर्द की चड्डी से पुरुष और स्त्री में कामुकता पैदा होती है। इसके मनोवैज्ञिनक फैक्ट हैं। ब्रा मुंह में पहनी जाती तो शायद उसकी बद्धी देखकर कुछ न होता पर चूंकि स्तनों में पहनी जाती हैं जहां से यौन सुख की शुरूआत होती है। महिला और पुरुषों दोनों के लिए यौन सुख में स्तनों की भूमिका समान है। होने को तो नग्न औरत या पुरुष खड़ा हो। और आप सामान्य ही रहें। पर शरीर में हार्मोनल परिवर्तन होते हैं। आप सोचिए कि आधुनिक दौर में यानी इस समय लड़कियों के जितने भी ड्रेसेस हैं वो बांहों में, जांघों में, पीठ में, कमर में यानी जहां नहीं तहां कटे फटे टाइप के होते हैं। पुरुषों की तो शर्ट, टी शर्ट आदि में तो पीठ के पास कट नहीं लगा होता। छाती के पास भी कट नहीं लगा होता। क्यों। क्योंकि पुरुष के पास उभार नहीं है। स्त्री देह नहीं है। आप फिजूल की बात कहकर बच नहीं निकल सकते कि सलवार कुर्ते वाली लड़कियों से भी रेप होते ही हैं। रेप और छेड़छाड़ के लिए कपड़े जिम्मेदार नहीं है। आप कहती रहिए न। मुझे आपको नहीं सुनना। मैं पुरुष हूं। मैं खुलेआम कह रहा हूं ब्रा से भी कामुकता पैदा होती है। ब्रा की डोरियों को दिखाने के पीछे का गणित क्या है। पुरुषों के लिए तो ऐसे शर्ट डिजाइन नहीं हुए जिसमें उनकी सैंडों बनियान का एक हिस्सा दिखे।

कल अचानक मैं वेब सीरीज खंगाल रहा था तभी मेरी एक वेबसीरीज पर नजर गई। नाम था चड्ढी। जिसमें एक औऱत पुरुष की चड्ढी देखकर उस पुरुष से अपनी यौनइच्छा पूरी करना चाहती है। क्यों ये विषय फिल्म के लिए लिया गया। फिल्मों की पटकथाओं के पीछे एक रिसर्च तो रहती ही है। बहुत बड़ी संख्या में लड़कियां फेमनिज्म की अगुवा औरतों की बातों को सशक्तिकरण से जोड़ती हैं लेकिन उनके कहे का विश्लेषण नहीं करतीं। दीपिका पादुकोण ने कहा कि माय बॉडी माय चोइस। यानी मेरा शरीर है जैसे चाहूं करूं या रखूं। लेकिन ध्यान रखिए वो दीपिका पादुकोण हैं। उनका अपना स्टैंडर्ड है। वो बसों, आटो, टेम्पो में लटककर दफ्तर नहीं जातीं, वो ट्रेनों के सामान्य बोगियों में यात्रा नहीं करतीं, वो प्लेन में भी सामान्य यात्रियों के साथ नहीं होतीं। उनका कहा किसी उद्देश्य और मुहिम के तहत है। वो आम लोगों के लिए लागू नहीं होता।

स्त्रीवाद के इस युग में जहां स्त्रीवाद के केंद्र में महिला शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, महिला कानून, महिला आरक्षण, महिला अधिकार होने चाहिए थे, वहां अब स्त्रीवाद के नाम से विमर्श यहां से शुरू होता है कि आप सशक्त, स्वतंत्र, सबल हैं तो मेडिकल की दुकान से जाकर बेझिझक कंडोम लेकर आ जाएं, अंधनंगा जिस्म दिखाते हुए कपड़े पहन सकें, पुरातन कायदों को आधुनिकता का हवाला देकर कुचल सकें।

महिला सशक्तिकरण थीम पर जब भी मैंने कोई डाक्यूमेंट्री देखी, वो बड़ी अजीब लगी। एक में था कि कुछ महिलाएं हैं जो साथ जुटकर सुबह जॉगिंग का निर्णय लेती हैं, फिर एकदिन निकलती हैं लोग घूरते हैं, फिर रोज सब जाने लगती हैं लोग घूरते हैं। फिर उनमें से ज्यादातर स्पोर्ट्स ब्रा में आ जाती हैं। उनको लोगों के घूरने की परवाह नहीं है। जो मन हैं वो पहनना है। पार्चड, वीरे दे वेंडिंग फिल्मों की पटकथा देखिए। क्या वाकई यही महिला स्वतंत्रता औऱ अधिकार का अंतिम सत्य है। ये फिल्में महिला सशक्तिकरण के लिए बनाई जा रही हैं। पार्चड जिसमें कुछ पति से शोषित महिलाएं दिखाई जाती हैं। जो मन मर्जी से सेक्स करती हैं। पुरुषों को खुद की बनाई पुरुषप्रधान गालियां देती हैं। वीरे दी वेंडिंग में स्वरा भास्कर मस्टर बेसन करती दिखाई जाती हैं। आजकल का फेमनिज्म वाकई कंडोम, ब्रा, शार्ट्स तक सिमट गया है। क्या वाकई ये स्त्रीवाद है। बीच में फेमनिज्म के नाम पर एक औऱ विमर्श कुछ अति जागरूक महिलाओं के बीच शुरू हुआ था कि यौन सुख के चरम तक जाने का अधिकार महिलाओं का भी है और उन्हें मिले। ये बहसें स्त्रीवाद के केंद्र में हैं। महिला अधिकार आयोग द्वारा महिला अपराध के आंकड़ों पर विमर्श, या तमाम अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा जारी आंकड़ों जिनमें महिला शिक्षा और स्वास्थ्य पर सतत चिंता जताई जा रही हैं, ऐसे विषय स्त्रीवाद की अगुवा महिलाओं के विमर्श का हिस्सा नहीं होते। उनका स्त्रीवाद माय बॉडी माय चोइस से शुरू और यहीं खत्म होता है।

स्त्री
जी हां ये विदेशों में महिला अधिकारों के लिए हो रहा एक कैंम्पेन का दृश्य है, हम शायद आगामी बीस वर्षों में ऐसे दृश्य भारतीय सड़कों में देखें, क्योंकि स्त्री स्वतंत्रता अगर माय बाडी माय च्वायस तक पहुंच गई है भारत में भी, तो ये उसी का अगला कदम है। ये भी किसी के घर की बच्चियां ही तो हैं। 

मुझे नहीं पता आपमें से कितने लोग जानते होंगे कि जब हमारे यहां कि आधुनिक महिलाएं ब्रा की डोरियों को बाहर दिखाने की स्वतंत्रता का आनंद ले रही हैं। महिला प्रधान गालियों वाले देश में पुरुष प्रधान गालियां निर्मित कर रही है, तब पश्चिम का स्त्रीवाद एक नए विषय पर केंद्रित हो रहा है। वो है निप्पल फ्री, ब्रेस्ट फ्री कैम्पेन। जी हां। यूरोपीय देशों में बड़ी संख्या में महिलाएं इस अभियान को सपोर्ट कर रही हैं और चाहती हैं उन्हें ब्रेस्ट फ्री रहने की सरकारें इजाजत दें। मतलब कि पुरुषों की तरह छाती खोलकर महिलाएं भी सार्वजनिक तौर पर रह सकें। इसके लिए कई यूरोपीय देशों में बाकायदा रैलियां होती हैं जहां हजारों महिलाएं स्तनों को खोलकर शामिल होती हैं। इसके साथ ही यूरोपीय देशों में एक औऱ कैम्पेन गति ले रहा है ब्रा भी। महिलाओं का मानना है कि ब्रा से उनका शरीर बंधा रहता है। वो चाहती हैं कि वो अनिवार्य रूप से ब्रा न पहनें। मतलब किसी भी कपड़े के साथ जरूरी नहीं कि वो ब्रा पहने हीं। स्त्रियों के स्तनों की प्रकृति के अनुसार अगर ब्रा फ्री स्तन होंगे तो वो ज्यादा प्रतीत होंगे। लेकिन ब्रा फ्री की मांग चल रही है। पिछले दिनों भारत में भी मैंने कुछ महिलाएं को देखा उन्होंने इस अभियान का समर्थन किया और ब्रा फ्री तस्वीरें डालीं और कहा तुम घूरो तो घूरते रहो, हमें ऐसे रहना है अपने लिए। तो ठीक है अब आप महिला सशक्तिकण और स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे अभियानों का समर्थन कीजिए। देर सबेर शायद करेंगी भी। और अच्छी बात शायद होगी तब जब आप भी पुरुषों की तरह छाती खोलकर घूमती, बागती मिलेंगी। दिखेंगी। अपनी छतों पर, घरों के बाहर। पौधों में पानी डालते हुए। क्या दृश्य होंगे। स्त्री स्वतंत्रता बिल्कुल सही तरीके से कोई है जो डिजाइन करने में लगा है।

सवाल बार बार वही है। आपको अपने लिए कैसा जीवन चुनना है। पहले बनाए नियम कायदे, कानून, रिवाज या तो आप अनुशासन मान लें या बंदिशें। तय आपको करना है।

जवान होते लड़के। जिन्हें हम देखते हैं कि उनकी बात बात में मां बहन की गालियां शामिल होंगी। गालियां जैसे तकिया कलाम हों। फैशन के नाम पर फूहड़ता। बेढंगे बाल, टैटू। इन्हें रोकना इनकी स्वतंत्रता थामना नहीं है, इन्हें रोकना इन्हें अनुशासन की ओर ले जाना है। लड़कियों से कैसा व्यवहार ये करें, लड़कियों के लिए क्या शब्दावली उपयोग करें। ये आपको बार बार बताना होगा। क्या पहने, क्या खाएं, कहां जाएं। ये लड़कों को भी बताना होगा। अनुशासन औऱ नियंत्रण समान रूप से दोनो के लिए हैं। लड़कों को भी रोकटोक से गुजरना होगा। आपको लड़कों को बताना होगा कि लड़कियां माल नहीं होतीं। क्योंकि एक लड़की आपके घर में भी है। गालियां नहीं दी जाती। कहना होगा। लड़कियों पर हांथ न उठाने की बात आपको बतानी होगी। आप अगर मां हैं तो अपने जवान हो रहे बेटे को बताना होगा कि जब आपको कोई मनचला राह चलते छेड़ता था तो आपको कैसा लगता था, आपकी देह पर कोई फब्तियां कसता था या आपको बैड टच करता था तो आपको कैसा लगता था। आपके सामने कोई मां बहन की गालियां बकता था तो आपको कैसा लगता था। भीड़ का फायदा लेकर कोई आपको छूना चाहता था तो आपको कैसा लगता था। ये आपको अपने बेटे को समय रहते बताना होगा ताकि वो अगर कभी ऐसा करते देखे या करने की हिमाकत करे तो उसे अपने मां का कहा और उसकी पीड़ा य़ाद आए।

ठीक उसी तरह अपनी बेटियों को आपको बताना है आधुनिक स्त्रीवाद को किनारे रखकर कि स्त्री देह की प्रकृति, संरचना, वैज्ञानिकता पुरुषों से भिन्न है। उन्हें आपको बताना होगा कि आपके लिए क्या उचित औऱ अनुचित है। उन्हें समझाना होगा कि परिधान का चयन, समय का चयन उनकी स्वतंत्रता का हनन नहीं बल्कि उनकी प्रकृति के हिसाब से तय की मानक व्यवस्था है। मस्टरबेसन करती हुई स्वरा, या पुरुष प्रधान गालियां देती हुई राधिका आप्टे उनकी आदर्श न बनें। स्त्रीवाद की सही व्याख्या उनको बतानी होगी। स्त्रीवाद देहप्रदर्शन नहीं है, किसी भी तरह की हिंसा को सहते जाना औऱ उसका विरोध न करना। घरेलू हिंसा का विरोध न करना। शारीरिक प्रताड़ना को बर्दाश्त करना। अपने सपनों का मरना। अब इतना छोटा सपना भी क्या देखना कि सपने में भी कपड़े चुनने की स्वतंत्रता पर बहस हो। आप इन सबको केंद्र में रखकर स्त्रीवाद का झंडा बुलंद करें। ये हमारी भारतीय संस्कृति की तासीर के अनुकूल है और नारी प्रकृति के अनुकूल।

मेरी बात उन महिलाओं या लड़कियों को चुभ सकती है जो शर्ट की तीसरी बटन भी खोलने की अभिलाषा रखती हैं भीड़ में, पर मैं बता दूं ये बात ये महिलाएं भी जानती हैं कि तीसरी बटन वो हवा लेने के लिए तो नहीं खोलतीं।

बस यही अपील है कि आधुनिकता की दौड़ में दौड़ते दौड़ते हम कहीं जीतकर भी न हार जाएं। और फिर कोई ब्वायज लाकर रूम का लाक खुले। फिर तमाम अवयस्क लड़के लड़कियां यौनिक अपराध में संलिप्त पाए जाएं और फिर कोई जान दे दे…

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